Sunday, October 25, 2009

सुनो पीएम जनता क्या बोले ---------


अखिलेश अखिल
बिहार की आर्थिक राजधानी मुजफ्फरपुर । यहाँ से कोई २८-३० किलोमीटर उत्तर के भरथुआ , बेनीपुर, किरतपुर, जिवाजोर, और जनार गाँव की तस्वीर पिछले कुछ सालो में बदल गयी है। अगड़ी और पिछड़ी , दलित जाति वाले इन गाँव के रहन सहन बदले है और बदल गए है इनके पुस्तैनी धंधे और रोजगार के साधन । इन गाँव के लोहार, कुम्हार , हज्जाम,बढ़ई और खेतिहर लोग इन गाँव से पलायन कर गए है। गाँव में इस जाति प्रजाति के जो कुछ लोग बचे है , उनके पास पुस्तैनी काम के नाम पर कुछ नही बचा है। इसका कारण है किसानी का अंत । आपको बता दे की कई सालों से बाढ़ और सुखार के कारण ये गाँव प्राकृतिक मार झेल रहे है ।
पिछले दिनों इन गाँव को देखने के बाद मालूम हुआ की किसानी पर आधारित जो लोग वर्षो से पुस्तैनी कामो से जुड़े थे , गाँव छोड़ कर चले गए। भरथुआ गाँव के लोहारपट्टी का दौरा करने पर पता चला की वहा पुरुषों की आवादी कोई दर्जन भर भी नही बची है। कुछ बूढी महिलाओं और नंग धरंग बच्चो से मुलाकात हुई । पता चला की अधिकतर लोग काम की तलाश में बाहर चले गए है और कुछ लोग अपने परिवार के साथ दुसरे गाँव में पलायन कर गए है। गाँव के पूर्व मुखिया ने बताया की अब खेती तो यहाँ होती नही। वे कारण बताने लगे। गरीब और मजदूर टपके के लोग जो खेती में मदद करते थे , पहले ही गाँव से चले गए थे.बाद में खेती प्रभावित हुआ । जिन लोगों के पास खेती की जमीं है , कुछ जमीं पर खेती करने का प्रयास किया । लेकिन सम्भव नही हुआ। आलम ये हुआ की किसानी पर आधारित सभी रोजगार धंधे ख़त्म होते चले गए। आलम ये है की तीज -त्यौहार और मांगलिक कामो के लिए दूर दराज से ऐसे लोगों को बुलाना परता है।
इन गाँव में एक और बदलाव आए है। किसानी में सहयोगी रहे गरीब मजदूर तो पहले ही गाँव से बिदा हो गए है और बचे किसान मजदूर बनकर जीने को अभिशप्त है। नथुनी राय कहते है --- हम क्या करे? सरकार खेती करने वालो को मदद करती नही। कभी कभार रोजगार के नाम पर १००-५० रुपये पर काम करने की योजना भेजती है। हालत ये है की अब किसी गाँव में खेती करने के लिए मवेशी नही है। इतनी पूंजी नही है की त्राक्टर ख़रीदे। जब सारे लोग पैसे कमाने के लिए गाँव छोर रहे है तो खेती चौपट होगी ही। क्या लोग पैसा खायेंगे? पता नही सरकार क्या क्या करती रहती है। सरकार को खेती बढ़ाने का इंतजाम करना चाहिय था। गाँव में दूसरा बदलाव ये है की आर्थिक विकास के पैदान पर भले ही ये गाँव पिछडे है , लेकिन राजनितिक लोकतंत्र यहाँ पहुच गया है। राजनितिक पार्टियो के के झंडे बैनर यहाँ पहुच गए है। पार्टियो के कार्यकर्ता तैयार है और राजनितिक दावपेंच में भी लोग माहिर हो गए है। सड़क, बिजली , पानी, सौचालय , के आभाव के बीच राजनितिक लोकतंत्र ने गाँव को और दूषित कर दिया है। गरीबी और रोजगार के अभाव में बेईमानी , ठगी औए भ्रष्टाचार का बोलबाला है ।
मामला इन उपरोक्त गाँव तक ही सिमित नही है । लगभग पुरे बिहार का येही हाल है यही बिहार की सचाई है और यही बिहार का रुदन भी। केन्द्र से लेकर बिहार सरकार भी कहती है की देश- प्रदेश में बदलाव आ रहा है , लेकिन रचनात्मक बदलाव कही दिखाई नही पङता। किसानो के देश भारत , उसकी आत्मा , उसके लोगों और उसकी किसानी को samaapt करके विकास के जिस राह पर हम चल रहे है , आने वाले दिनों में हम गंभीर संकट में फंस सकते है।
मामला सिर्फ़ बिहार तक ही सिमित नही है। किसान और किसानी की हालत तो विकशित राज्य गुजरात में भी कुछ ऐसा ही है। गुजरात के दक्षिण इलाके दांग क्षेत्र में किसानी लगभग बंद हो गई है। जरा आहवा दांग चले जाइये । गरीबी से तंग आकर यहाँ की अधिकतर आदिवासी आवादी पहले अपना धर्म परिवर्तन कर चुकी है। अब धर्म परिवर्तन के बाद भी उनका जीना मुहाल है। वहा कौन किसान है और कौन मजदूर इसकी जानकारी नही मिलती। kodo ,सवाबाजरा और मक्के की खेती करने वाले लोग गरीबी से तंग आकर आहवा छोर रहे है। आहवा जिला और उसके गाँव को देख कर ऐसा लगता है , मानो सब कुछ स्वाहा हो चुका है। आहवा के मनु भाई कहते है की कुम्हारी की उनकीधंधा ख़त्म हो गया है और अब उन्हें मजदूर का काम भी नही मिलता। कुम्हारी करके हमारा परिवार चल जता था अब १० दिनों के काम से क्या मिलेगा। दो लड़का शहर जा चुका है और वहा बेरोजगार है। और इसी आहवा की मितिल्दा अपने पति के साथ खेती करती थी । खुश थी। महंगाई के कारण पति कमाने बहार चला गया और फ़िर लौट कर नही आया। मितिल्दा दुसरे के दूकान पर काम करके बच्चो का पेट पाल रही है। आप को बता दे की गरीब प्रदेशो के लोग काम की तलाश में गुजरात जा रहे है और आहवा के लोग दुसरे प्रदेशो में।
उधर , रोजगार देने के नाम पर केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के दपोर्शंखी ऐलान से विदर्भ के लोग खासे नाराज है। पिछले दिनों विदर्भ के दो दर्जन से ज्यादा लोग दिल्ली आकर अपनी जान बचाने की गुहार सरकार के लोगो से की। ये सभी किसान थे और चाहते है की सरकार की योजना किसान और किसानी को बचाने होनी चाहिए । इन किसानो से बातचीत के दौरान पता चला की आने वाले दिनों में सरकार किसानो और किसानी की हिफाजत नही करेगी तो न सिर्फ़ हजारो किसान मरेंगे वल्कि लोगो को भोजन जुटाना भी मुस्किल हो जायेगी। किसानो ने साफ़ किया की विदर्भ आज नक्सलियो के लिए सबसे बेह्टर इलाका बन रहा है। और लोग उनकी बात सुन भी रहे है। लोग सरकार से पूछती है की आख़िर विदर्भ खेती और किसानो का इलाका होकर भी परेशान क्यों है? जो लोग खेती नही करते वे ज्यादा बेहतर क्यों है। एक ही राज्य में दो लोग कैसे? लोगो में यह सोंच खतरे की घंटी के समान है। विकाश के पदान पर पिछडे राज्यों की श्रेणी में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा और झारखण्ड भी है। इसके अलावा कई विकसित राज्यों के भीतर भी अविकसित शेत्रो का भूगोल बढ़ता ही जा रहा है। क्या पंजाब, क्या हरियाणा विकाश की अंधी दौर में कई क्षेत्र काफी पीछे छुट गया है।
पहले लोग दरिद्रता का दर्शन करने ओडिशा के के बी के इलाके में जाते थे। भूख से दर्शन और अकाल से दर्शन अभी भी वहा होता है । ओडिशा में उद्योग लग रहे है लेकिन के बी के का चरित्र नही बदल रहा है। सूदखोरों और लुटेरो के चंगुल में फंसे किसान अपनी इज्जत बचने के लिए तरसते है। वरिष्ट पत्रकार आलोक तोमर इसे हरा भरा अकाल कहते है। उधर झारखण्ड के बारे में क्या कहना। बिहार से अलग हो कर कहाँ यह इलाका आगे बढ़ता लुटेरो का सैरगाह बन गया है। और इसी राज्य का पलामू दुनिया के सबसे गरीब बन गए है। आदिवासी विकाश के नाम पर गए सारे पैसे नेताओं के यहाँ पहुच गए है। येही वह इलाका है जहा नक्सलवाद कुलाचे मार रहा है। किसान और किसानी ख़त्म है और हजारो लोग परत के लियभागे जा रहे है। साकार सोचे नही तो देश को बरबाद होने से कोई नही बचा सकता । जब तक भूख और बेरोजगारी पर नियंत्रण नही hogi नाक्सालवाद बढ़ेंगे और आतंरिक कलह भी।

1 comment:

  1. is aalekh me un ilakon ke farming par chinta jatai gai hai jahan atiaadhuniktarike se kheti ki subidha nahi hai. lagta haisarkar ki najar viksit kisani vale ilakon tak hi simat gai hai. ye durdasa bhartiya arthvyabastha ke santulan ko bhi chaupat kar sakta hai. globalisation par ithalane valon ko bhi samajhana chahiye ki kheti ka 2.5 % vikas dar nirasajanak hai. kai log mandi se nipatne ke liye bhi krisi vikas ko jaroori mante hain. prastut aalekh me ek saath kai mudde uthaye gaye hain. regional imbalence rahte hue viksit desh ka sapna pura hone walanahi hai.

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