Thursday, November 12, 2009

भ्रष्टाचार और नक्सली पैतरे में चुनाव

अखिलेश अखिल


jhaarkhand में चुनाव की दुग्दुग्गी बजते ही सभी राजनितिक दलों में मानो तेजी से रक्त संचार होने लगा है। पिछले साल से झारखंडियो को अपने भाग्य पर छोर देने वाले नेता उनकी हाल जानने के लिए उमर पड़े है। राज्य की सभी पार्टी इकाई के लोगों ने तो गाँधी कपडो का वरन कर ही लिया है , दिल्ली से भी राष्ट्रीय राजनीति करने वाली पार्टियों के नेता झकाझक कपडो में खड़े है। रांची से लेकर दुमका और घोर नक्सली इलाका पलामू तक में नेताओं की सरगर्मी इतनी तेज हो गयी है कि नेताओं की लूट से गो वाले लोगो लोगो से वाले वाले है। गाँव में रहने वाले लोगों के साथ ही शहरी लोग भी जानना चाह रहे है की झारखंड में ये नेता क्या करने रहे है? लोगों की जुबान पर एक ही सवाल है की अब किसकी और कितनी लूट होगी।
कोडा एंड कंपनी लूट प्रकरण के बाद यहाँ के लोग खासे उदासीन है। कोडा लोगों को पता चला की कोडा एंड कंपनी ने उनका सब कुछ लूट लिया है ,लोग राजनीति और राजनीति वाजो से विदक से रहे है हालाकि अभी चुनाव होने में समय है लेकिन प्रदेश के सैकरो गाँव के लोगो ने वोट डालने का फैसला कर लिया है लेकिन इतना तय भी है की लोग वोट डालेंगे और जम कर डालेंगे येही तो हमारे लोकतंत्र की विशेषता है औए देश की भोली जनता बेवशी और मज़बूरी


८० के दशक के बाद हमारे चुनाव तंत्र में एक नै प्रजाति का उदय हुआ इस प्रजाति के लोग स्वाम चुनाव नही लड़ते , ये लड़वाने का काम करते है इसमे कुछ पूंजीपति होते है और कुछ दलाल और चुनाव लड़ने वाले होते है इनके गुलाम झारखंड में २००५ में जो चुनाव हुए थे , उसमे उपरोक्त प्रजाति की भूमिका ज्यादा थी और येही वजह है की पिछले पञ्च सालो में सभी विधायको और मंत्रियो ने लूटने का काम किया और अपने आकाओं को खुश रखा जैसा की प्रकृति का नियम है लूटने वाले लूटेंगे ही और मरने वाले मरेंगे ही इस चुनाव में भी लूट की पुरी तैयारी कर ली गयी है


राज्य भारी सूखे की चपेट में है,रोजगार की तलास में लोगो का पलायन जारी है आलम यह है की गो के लोगो में पैठ रखने वाली झारखण्ड मोर्चा जैसी पार्टी को सरकार से गुहार लगानी पड़ रही है की सरकार मजदूरों को पलायन से रोके राज्य में बिजली , पानी की गंभीर समस्या है , खेती चौपट है और पिने को पानी नही शिकायत करे तो कोई सुनाने वाला नही मंत्री से लेकर संत्री तक सालो में लोगो को जितना चाहा लूटा है पलामू से संताल तक के बीच जो कुछ भी देखा है कुछ बानगी आप देख सकते है


झारखंड को बिहार से अलग राज्य बनने के पीछे का तर्क ये था की बिहार इस इलाके के विकास पर ध्यान नही देती फ़िर दुसरा तर्क ये था की आदिवासी वहुल इस इलाके के विकास के लिए अलग राज्य चाहिए इसके अलावा झारखंडी नेताओं के मन में एक बात और बैठी थी की पटना में उनका कोई महत्व नही है और वहा उनकी कुछ नही चलती खैर राज्य बना खनिज संपदा से भरपूर राज्य सरकार बनने के बाद इस राज्य का पहला बजट सरप्लस पेश हुआ थाझारखंड में जय जैकार मचीयहा के नेताओं ने कहा की देखो अब झारखंड को कहा ले जाते हैउन्होंने जैसा कहा वैसा ही कियाआज यह राज्य सबसे पिछरा और शोषित राज्य हो गया है

साल में ९६ उद्योगों के लिया .५२ लाख करोड़ के एम्..उए हुए' लेकिन एक भी उद्योग नही लग सकाइनमे ७२ स्टील प्लांट और २४ पवार प्रोजेक्ट शामिल हैइनमे किसी को भी अभी तक जमीं नही मिली हैराज्य में एक लाख से ज्यादा सरकारी पड़ खाली पड़े है, तमाम शिक्षा योजनाये बंद पड़ी है,और राज्य की बड़ी आवादी मलेरिया,कालाजार जैसी बिमारी ग्रस्त हैलेकिन दूसरी तरफ़ नेताओ और नौकरशाहों के घर और रिश्तेदारों के यहाँ लम्बी लम्बी गाडियो की कतार लगी हुई हैएक जानकारी और आपको दे देइस राज्य की प्रति व्यक्ति आय १९००० रुपए है.जबकि इसी के साथ बने छत्तीसगढ़ की आय ३३०४७ रुपए है सालो में मत्र२२ फीसदी गाँव तक ही बिजली पहुच पाई है.अभी तक विधान सभा और सचिवालय नही बन पाये हैएक भी मेडिकल कोल्लेगे नही खुल पाया है.पंचायत चुनाव नही हुए हैविस्थापन और पलायन को रोकने के लिया अभी तक कोई निति नही बनी है

लेकिन इन सालो में नेताओं की अमीरी बढ़ी है और नाक्सालवाद का परचम तेज हुआ हैजाहिर हैऔर बेकारी का दंश झेल रहे लोग और युवा नाक्सालवाद की तरफ़ badhe है

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