Friday, September 2, 2011

आदिवासियों के हक पर डाका


झारखंड में आदिवासी उपयोजना घोटाला

अखिलेश अखिल

आदिवासियों की हिफाजत और उसके सामाजिक, आर्थिक विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से अलग से बजट का आवंटन होता है। इसके अलावा अति प्राचीन प्रीमीटिव आदिवासियों को बचाने और उनको सुरक्षित रखने के लिए भी सरकार कई तरह की योजनाएं चला रही है। उन्हीं योजनाओं में से एक है, टीएसपी यानी ट्राइबल उप योजना। हर राज्य की आदिवासी आबादी को देखते हुए केंद्र सरकार हर साल भारी रकम इस योजना में लगाती है। उसके अलावा राज्य सरकार अलग से टीएसपी योजना चलाती है, लेकिन इन योजनाओं का लाभ आज तक आदिवासियों को नहीं मिला। जनजाति आयोग के चेयरमैन डॉ. उरांव कहते हैं कि जब लोगों की मंशा ही ठीक नहीं होगी, तो विकास की बात ही बेमानी है। आदिवासियों को आज तक तरजीह नहीं मिली है। अगर तरजीह मिलती, तो आदिवासियों की दशा ऐसी नहीं होती। उनके फंड को शुरू से ही लूटा जा रहा है, जिसमें सारे लोग शामिल हैं।

झारखंड समेत पूरे देश के आदिवासी बहुल राज्यों में बड़े घोटाले की बू आ रही है। इसे आप टीएसपी’ (ट्राइबल सब प्लान) घोटाला कह सकते हैं, लेकिन इस घोटाले की सबसे मजबूत जडंÞे झारखंड में दिखाई पड़ रही हैं। राज्य की आदिवासी उप योजना (टीएसपी) के बारे में, न तो झारखंड सरकार के मुखिया को कुछ मालूम है और न ही मंत्री से लेकर जिला प्रशासन को कोई खबर है। पिछले 10 सालों से राज्य के वार्षिक बजट में टीएसपी के लिए फंड की व्यवस्था तो की जाती है, लेकिन यह फंड कहां और किस मद में खर्च किया गया है, इसका लेखा-जोखा राज्य सरकार की किसी फाइल में दर्ज नहीं है। पिछले महीने राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा आदिवासी एडवाइजरी कमेटी की बैठक के लिए दिल्ली पहुंचे, तब उनके पास न तो राज्य को मिले केंद्रीय टीएसपी फंड और न ही राज्य टीएसपी फंड का कोई लेखा जोखा था। आप कह सकते हैं कि टीएसपी फंड का वहां गबन हो चुका है। ऊपर से नीचे तक इस योजना और इसके फंड के बारे में कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है। राज्य में इस विभाग को मंत्री चंपई सोरेन देखते हैं, लेकिन इस पूरी योजना के बारे में साहबको ज्यादा जानकारी नहीं है। दूरभाष पर हुई बातचीत में चंपई सोरेन कहते हैं हम राज्य की टीएसपी योजना की जानकारी ले रहे हैं। जानकारी मिलते ही आपको सूचित कर दिया जाएगा।उधर राज्य के वित्त सचिव सुखदेव सिंह टीएसपी का पूरा रिकॉर्ड होने की बात तो करते हैं, लेकिन मुकम्मल जानकारी उनके पास भी नहीं है? उन्होंने ट्राइबल कल्याण विभाग के सचिव राजीव अरुण एक्का से बातचीत करने की सलाह दी। ऐसे में लगता है कि अगर इस पूरे मामले की जांच कराई जाए, तो आदिवासी विकास के नाम पर अरबों का घोटाला सामने आ सकता है।

भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, टीएसपी के तहत राज्य को 2005-2006 में 58 करोड़ 96 लाख रुपये केंद्र की ओर से दिए गए। 2006-07 में यह राशि 70 करोड़ 41 लाख, 2007-08 में 77 करोड़ 11 लाख, 2008-09 में 87 करोड़ 93 लाख और 2009 से दिसंबर 2010 तक 85 करोड़ 92 लाख रुपये दिए गए। यानि पांच सालों में 379 करोड़ 23 लाख रुपये। इसके अलावा केंद्र सरकार आदिम जनजातीय समूहों पीटीजीके विकास और संरक्षण के लिए अलग से धन मुहैया कराती है। 17 राज्यों और अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में यह योजना लागू है और देश के 75 आदिम जन जाति इस श्रेणी में रखे गए हैं। झारखंड को भी इस योजना का लाभ मिलता रहा है। राज्य में कोई 9 जनजातियां पीटीजी में शामिल हैं, जिनमें असुर, बिरहोर, बिरजिया, हिल खारिया, कोरबा, मल पहाड़िया, परहइया, सौरिया पहाड़िया और सावर। केंद्र ने इस योजना के तहत 2008-2010 के बीच में कुल 454 करोड़ की राशि आवंटित की है, जिनमें झारखंड को 12 करोड़ 98 लाख मिले। इसमें सीधे सरकार के पास 10 करोड़ 68 लाख रुपये मिले, जबकि शेष रकम कई एनजीओ को। इसी पीटीजी के विकास के लिए केंद्र सरकार ने जनश्री योजना शुरू की है, जिसमें हर आदिम परिवार के मुखिया को जनश्री बीमा योजना का लाभ दिया गया। इसमें भी 2004 से 2010 के बीच में इस राज्य को लगभग तीन करोड़ की राशि दी गई है।

इसके अलावा इसी पीटीजी के लिए चल रही अन्य योजनाओं के लिए केंद्र 2008-10 के बीच में राज्य को करीब 17 करोड़ दे चुकी है। सामाजिक कार्यकर्ता ठाकुर प्रसाद कहते हैं कि आज तक किसी ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया। यह इतना बड़ा घोटाला है कि ए राजा का घोटाला भी बौना पड़ जाए। इस घोटाले में सभी पार्टी के लोग शामिल हैं। आदिवासी फंड को लूटकर ही प्रदेश के कुछ लोग माला-माल हुए हैं।

छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा कहते हैं कि टीएसपी योजनाओं को शुरू से ही लूट का अड्डा बनाया गया है। रमन सिंह की सरकार और उनके विधायक इस फंड को लूट रहे हैं। ये योजनाएं कहां चली हैं और योजनाओं का लाभ किस आदिवासी को मिला, यह तो सरकार को पता है, लेकिन आदिवासियों के घर जाकर आप सब कुछ जान सकते हैं। न उनके पास घर है, न भोजन की व्यवस्था है। स्वास्थ्य के कोई इंतजाम भी नहीं हैं और न ही उनकी देह पर कपड़ा है। भला ये पैसे जा कहां रहे हैं? आदिवासी फंड को लूट कर ही अफसर और नेता अपना घर चला रहे हैं और अपनी राजनीति कर रहे हैं।इसी प्रदेश के एक अन्य आदिवासी नेता और विधायक कवासी लखमा का मानना है कि आदिवासियों के विकास के लिए पैसा केंद्र सरकार देती है और राज्य में रमन सरकार उसी पैसे का कुछ अंश खर्च कर अपनी वाहवाही लूटते हैं। इस फंड का पूरा पैसा सत्ताधारी पार्टी के विधायक और सरकार के लोग चट कर रहे हैंं।

लखमा आदिम जनजाति मंत्री केदार कश्यप पर भी आरोप लगाते हैं। उनका मानना है कि कश्यप नेता नहीं बनिया हैं और आदिवासियों का हिस्सा लूट रहे हैं। अब तक जितना धन टीएसपी फंड में आया है, उसका सही इस्तेमाल होता, तो प्रदेश का आदिवासी आगे चला गया होता और नक्सलवाद पर भी अंकुश लगता। टीएसपी योजना का सबसे ज्यादा फंड मध्य प्रदेश को मिला है। मध्य प्रदेश की कुल आबादी छह करोड़ है, जिनमें आदिवासियों की संख्या एक करोड़ 22 लाख के आसपास है, जो राज्य की आबादी का 20 फीसदी के बराबर है। इसमें कोई 6 लाख प्रीमीटिव आदिवासी हैं। इस अति प्राचीन जनजाति में बैगा एक लाख 31 हजार, सहारिया 4 लाख 71 हजार और भारिया 2012 हैं। इस आबादी की हिफाजत और कल्याण के लिए पांचवीं पंचवर्षीय योजना से ही कई तरह के केंद्रीय फंड दिए जा रहे हैं।

टीएसपी प्लान के तहत इस राज्य को 2005-06 में 81 करोड़ 86 लाख, 2006-07 में 101 करोड़ 26 लाख, 2007-08 में 91 करोड़ 29 लाख , 2008-09 में 126 करोड़ 44 लाख, 2009-2010 में 87 करोड़ 22 लाख और 2010 के दिसंबर तक 145 करोड़ 57 लाख रुपये मिले हैं। इसके अलावा प्रीमीटिव जनजाति के विकास के लिए 2008-09 में 37 करोड़ 54 लाख, 2009-10 में 50 करोड़ 67 लाख और दसंबर 2010 तक 54 करोड़ 28 लाख रुपये दिए गए हैं। इन योजनाओं के अलावा आदिवासियों के विकास के लिए केंद्र से प्रायोजित दर्जन भर से ज्यादा योजनाएं चल रही हैं, लेकिन आदिवासियों का आर्थिक, सामाजिक विकास आज तक नहीं हुआ। बैगा जनजाति की प्रदेश में कुल आवादी सवा लाख के आसपास है और यह जनजाति पहाड़ों और जंगलों से आज तक बाहर नहीं निकल पाई है। 2001 तक इस जनजाति के विकास पर 100 अरब से भी ज्यादा रकम खर्च हो चुकी है, लेकिन बैगा को इसकी जानकारी तक नहीं है।

मामले की जांच हो : उरांव

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रहीं टीएसपी उप योजना से जुड़े तमाम मसलों पर जनजाति आयोग के चेयरमैन डॉ. रामेश्वर उरांव से बातचीत के अंश़.़.

टीएसपी योजना क्या है?

पांचवीं पंचवर्षीय योजना से आदिवासियों के विकास के लिए यह योजना चल रही है। इस योजना में केंद्र सरकार राज्यों को धन देती है। यह फंड कहां और कैसे खर्च होना है, इसका पूरा ब्योरा योजना आयोग और आदिवासी विकास मंत्रालय के पास होता है। इसके अलावा राज्य सरकार की अपनी टीएसपी योजना और फंड है।

इसमें केंद्र का बजट कितना होता है?

देश में आदिवासियों की आवादी 8 फीसदी के बराबर है। इसी आवादी के हिसाब से केंद्र सरकार अपने कुल बजट का 8 फीसदी टीएसपी के लिए देती है। राज्य सरकार योजना बनाकर देती है। नियम के मुताबिक, केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों को अपने बजट का 8 फीसदी इसमें देना जरूरी है। टीएसपी योजना लागू करने में किस राज्य की भूमिका अच्छी रही है? अब तक महाराष्ट्र का काम सबसे अच्छा कहा जा सकता है। वहां बजट का 8 फीसदी खर्च हो रहा है। बाकी राज्यों में टीएसपी योजना सही से लागू नहीं है। आप कह सकते हैं कि इस योजना और इसके फंड को लूट लिया गया है। आदिवासी इलाकों में जो नक्सलवाद आप देख रहे हैं, उसका एक कारण यह भी है। अगर इन योजनाओं का सही इस्तेमाल किया गया होता, तो आज हालात कुछ और होते।

झारखंड में इस योजना में कितने की लूट होने की आशंका है?

यह बताना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि वहां इस योजना के तहत न के बराबर काम हुए हैं। वहां की वर्तमान सरकार को भी राज्य टीएसपी योजना के फंड और उसके खर्च की जानकारी नहीं है। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा पिछले पांच साल का फंड और खर्च का ब्यौरा ढूंढते फिर रहे हैं, लेकिन कहीं कोई रिकॉर्ड ही नही है। अर्जुन मुंडा पहले भी सरकार चला चुके हैं। उन्हें तो जानकारी होनी चाहिए? ये राजनीतिक सवाल है। इसका जवाब, तो वही दे सकते हैं। एक बात सही है कि राज्य में इस योजना का सही इस्तेमाल नहीं हुआ, यदि हुआ भी होगा, तो दूसरे मद में। अगर ऐसा हुआ है, तो आदिवासियों के साथ अन्याय किया गया है। हम चाहते हैं कि इस मामले की जांच हो।

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