Sunday, September 4, 2011

झलकता है आंखों से पलायन का दर्द

झलकता है आंखों से पलायन का दर्द

अखिलेश अखिल

पलायन करना मजबूरी है साहब! पेट पालने के लिए हम काम करना चाहते हैं और काम हमें मिलता नहीं। हम अपने सामने बच्चों को मरता नहीं देख सकते। सरकार कहती है कि बुंदेलखंड में काम हो रहा है। ऐसा है, तो इलाके के 90 फीसदी लोग क्यों भागे जा रहे हैं? हम मजदूरों को बाहर जाने का शौक नहीं है। बहुत से गांवों में महाजनों ने पलायन पर भी पाबंदी लगा दी है। कहां है सरकार?’

यह दर्द है टीकमगढ़, जतारा प्रखंड में राजेंद्र नगर के कमला प्रसाद अहीरवाल का। 34 वर्षीय कमला प्रसाद तीन बच्चों का पिता है और कई रोज से काम की तलाश में भटक रहा है। कमला प्रसाद के अनुसार, ‘उनके गांव के 90 फीसदी लोग घर छोड़ चुके हैं और गांव में जो लोग बचे हुए हैं, उनमें कुछ बूढ़े और बच्चे हैं। सरकार की योजनाएं कागजों पर चल रही है और हमें खाने को नहीं मिल रहा है। लगता है, हम जानवर हैं जिन्हें सरकार ने मरने के लिए छोड़ दिया है।बुंदेलखंड इलाका फिर अकाल की चपेट में है। सरकार हर बार बुंदेलखंडियों को अकाल के साए से निकालने की बात करती है, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं करती। राहुल गांधी ने न जाने कितनी बार बुंदेलखंड की यात्रा कर यहां के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही, लेकिन हुआ कुछ नहीं। वहां से हर महीने एक लाख से ज्यादा लोग अपनी जान बचाने के लिए पलायन को मजबूर हैं। पिछले जुलाई माह में यह आंकड़ा और ज्यादा हो गया है।

अकाल को देखते हुए बड़ी संख्या में लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं। लोगों के पास न अनाज का दाना है, न ही पीने का पानी। अनाज और पानी के लिए जब बड़े किसान बेहाल हैं, तो छोटे और भूमिहीन किसानों की क्या बिसात। और सरकारी योजनाएं? इसके बारे में ताल ठोक कर विकास का दावा करने वाली यूपी सरकार और उसके अफसरान ज्यादा बता सकते हैं कि उनकी योजनाओं का लाभ किसे, कितना मिला है? क्या ये योजनाएं उन्हें जिंदा रखने के लिए काफी हैं? वैसे इन सवालों का अब कोई मतलब भी नहीं है। क्योंकि जान बचाने के लिए बाहर की ओर निकले उनके कदम अब रुकने वाले नहीं हंै।

पिछले साल जुलाई-अगस्त में कुछ बारिश होने से ऐसा लगा था कि यहां के खेत लहलहा उठेंगे और लोगों की मुस्कान लौट आएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पहली बारिश के बाद यहां वर्षा की बूंद देखने तक को नहीं मिली। पहली बारिश के चलते किसानों ने पेट काटकर और कर्ज लेकर जो बीज डाले थे, सब बेकार चले गए। पानी के अभाव में फसलें सूख गर्इं और जमीन फट गई। इस साल बारिश तो हुई, लेकिन घर में अनाज का एक दाना भी नहीं है। इस बारिश का लाभ अगले साल मिलगा। टीकमगढ़ जतारा के ही लखन अहीरवाल कहते हैं कि हम अपने बच्चों के साथ काम की तलाश में जा रहे हैं। कहां जाना है, यह अभी तय नहीं है। बस भाड़े के लिए कर्ज मिल गया है। अब तो भगवान ही जाने कि आगे क्या होगा? बरसात के दिनों में यहां कोई काम मिलता ही नहीं और काम नहीं, तो भोजन नहीं। हमें अपने बच्चों को बचाना है।

बुदेलखंड के उरई में कई स्वयंसेवी संस्थाएं काम रही हैं। परमार्थ समाज सेवी संस्थान की गरीबों में काफी पकड़है और उनके लिए कई योजनाएं भी चला रही है। संस्थान के निदेशक अनिल सिंह कहते हैं कि काम की तलाश में लोगों का पलायन जारी है, यह रुकेगा भी नहीं।

बुंदेलखंड महज एक जिला नहीं है, बल्कि यह एक रेंजहै। जिसमें उत्तर प्रदेश के झांसी, ओरछा, जालौन, ललितपुर, बांदा, कालिंजर, चित्रकूट, हमीरपुर और महोबा जिले शामिल हैं। इसके अलावा मध्य प्रदेश के सागर, दमोह, टीकमगढ़, पन्ना, अजयगढ़, छतरपुर और दतिया जिले भी इसी रेंज के हिस्से हैं। इन सभी जिलों को मिलाकर बुंदेलखंड राज्यकी मांग की जा रही है।

बुंदेलखंड का जो इलाका उत्तर प्रदेश में पड़ता है, वहां से पांच सांसद और 20 विधायक चुनकर आते हैं, जबकि मध्य प्रदेश में पड़ने वाले बुदेलखंड इलाके से आठ सांसद और 35 विधायक चुने जाते हैं। यानी 13 सांसदों और 55 विधायकों को संसद से लेकर विधान सभा में भेजने वाले इलाके में गरीबी चौकड़ीभर रही है।

आपको चित्रकूट ले चलते हैं। यह वही चित्रकूट है, जहां कभी तुलसीदास को भगवान राम के दर्शन हुए थे। तब से ही चित्रकूट हिंदुओं का पवित्र तीर्थ स्थान भी है। चित्रकूट के बगल का गांव है लक्ष्मीपुर। चार हजार की आबादी के इस गांव में हर जाति, समाज के लोग रहते हैं। उनका कहना है कि भारत युवाओं का देश जरूर है, लेकिन इस गांव में एक भी युवा आपको दिखाई नहीं देगा। बंजर भूमि और पानी के लिए त्राहि-त्राहिकरते लोग गांव से भाग गए हैं। न रोजगार और न खाने को दाना, आप ही बताएं ऐसे गांव में कितने दिनों तक टिक सकते हैं? पलायन को मजबूर गांवों में अर्जुनपुर, खंडेहा और मऊ भी शामिल है।

बांदा के माधौपुर गांव का हाल मत पूछिए। उजाड़ ही उजाड़ है। लगता है, यहां की सूखी जमीन कह रही हो कि पानी के अभाव में वह किसी की जिंदगी बचाने में असमर्थ है। गांव के आधे से ज्यादा लोग रोजगार की तलाश में बाहर निकल चुके हैं और बाकी बचे लोग साहूकारों का दंश झेलने को अभिशप्त हैं। आपको बता दें कि पिछले तीन सालों से कांग्रेसी नेता राहुल गांधी इस इलाके का दौरा करते रहे हैं। केंद्र सरकार ने इस इलाके के विकास के लिए 7266 करोड़ की राशि विशेष पैकेज के रूप में देने की बात कही। लोग खुश हुए। लेकिन यह पैसे कहां जा रहे हैं और कहां है सरकार का विशेष पैकेज?

हमीरपुर से सांसद हैं गंगा चरण राजपूत। बसपा की राजनीति करते हैं। उनका कहना है कि बुंदेलखंड को अलग से कोई पैकेज नहीं मिला है। इस पैकेज को केंद्र सरकार ने वहां की विभिन्न योजनाओं में मिला दिया है। और कांग्रेस पैकेज के नाम पर लोगों को बरगलाने का काम कर रही है।

भूख और प्यास से बिलखते गांवों की लंबी सूची है, लेकिन उरई के सिकरी व्यास, हमीरपुर के पुरैनी और महोबा के पंडुई व बिलगांव गांव का हाल बेहाल है। प्रकृति की मार से जूझ रहे यहां के लोग दबंगों, ठेकेदारों, साहूकारों और सरकारी अमलों से ज्यादा आहत हैं। कर्ज के जाल में फंसे इन गांवों के अधिकतर लोगों की जमीनें तो पहले से ही साहूकारों के पास गिरवी हैं। ऊपर से ठेकेदार और सरकारी लोग काम के पैसे तक नहीं देते। सिकरी व्यास गांव और पंडुई के सैकड़ों लोग रोजी रोटी के लिए तो पहले ही गांव से बाहर निकल चुके हैं, बाकी बचे लोग इसलिए नहीं निकल पा रहे हैं क्योंकि साहूकार उन्हें बाहर जाने नहीं देते।

क्या हुआ राहुल का वादा?

पिछले साल जनवरी महीने में किसानों की आत्महत्या की खबर सुनकर कांग्रेस के युवा महासचिव राहुल गांधी ने बुंदेलखंड की यात्रा की थी और लोगों का दुख-दर्द देखकर असहज हो गए थे। राहुल गांधी ने दर्जन भर से ज्यादा गांवों की यात्रा करने के बाद कहा था कि यहां विकास करना सबसे ज्यादा जरूरी है और राज्य व केंद्र सरकार को यहां सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए।राहुल गांधी ने लोगों की बुंदेलखंड राज्य की मांग को भी सही माना था और कहा था कि वे स्वयं इस राज्य की मांग के पक्ष में हैं और केंद्र सरकार के पास भी इस बात को रखेंगे। लेकिन पंडुई, सिकरी व्यास और झांसी के गैराहा गांव के लोग इस बात को लेकर दुखी हैं कि राहुल गांधी ने जो वादा किया था, पूरा नहीं किया।

मध्य प्रदेश के इलाके में बुंदेलखंड का जो क्षेत्र है, उसका हाल भी बेहाल है। दमोह, दतिया और टीकमगढ़ के गांव के लोग फसल न होने के कारण दिसंबर महीने से ही रोजगार की तलाश में बाहर निकल रहे हैं। इन गांवों में सिर्फ बूढ़े और बच्चे रह गए हैं। दमोह के रानाडोगिर गांव का हाल ये है कि इस गांव के सभी लोग भीख मांगकर जीवन चलाते हैं। इस गांव में ब्याहने वाली बहुओं को भी भीख की झोलीपकड़ा दी जाती है। कहते हैं कि इस गांव में भीख मांगने की ट्रेनिंग दी जाती है, यहां के लोग ही मुंबई और बड़े शहरों में भीख मांगते हैं। गरीबी के लिए चर्चित कालाहांडी के साथ अब बुंदेलखंड का नाम भी जुड़ गया है। बुंदेलखंड अभी प्रकृति का मार झेल रहा है, लेकिन सरकार की इच्छाशक्ति हो, तो इसे हरा-भरा किया जा सकता है।

No comments:

Post a Comment