Sunday, September 4, 2011

दागियों को आरक्षण क्यों?

दागियों को आरक्षण क्यों?

पांच विधान मंडलों की तस्वीर चौंकाने वाली है ।‘‘आजादी के 64 सालों में लोकतंत्र का एक अलग नजारा सामने आया है। मंडल आयोग के बाद समाज के विभिन्न तबकों को आरक्षण देने की जो शुरुआत हुई, वह आज तक बरकरार है। फिर, मुसलमानों को आरक्षण देने की बात चल रही है, लेकिन एक आरक्षण ऐसा भी है, जिसे आप गुप्त आरक्षण कह सकते हैं। वह है दागियों को आरक्षण। प्रस्तुत है अखिलेश अखिल की विशेष रिपोर्ट...?’’

भ्रष्टाचार, घोटाला, कालाधन और लोकपाल के बाद पिछले कुछ सालों में संसद से लेकर राज्य विधान सभाओं में कथित मुद्दों को लेकर जो शोर-शराबे हुए हैं, उसमें आरक्षण के मसले को आप सबसे ऊपर रख सकते हैं। मसला चाहे महिला आरक्षण का हो, या फिर पिछड़ी, दलित और आदिवासी जाति का। मुसलमानों को आरक्षण देने का मामला हो या फिर आरक्षण में आरक्षण की राजनीति। प्रकाश झा भी अपनी फिल्म आरक्षण में कुछ मुद्दों को उकेरने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, हम जिस आरक्षण से आपका परिचय कराने जा रहे हैं, उसके बारे में पूरी संसद और नेता मौन हैं। आरक्षण की इस व्यवस्था पर किसी को कोई ऐतराज नहीं है। सालों से यह व्यवस्था जारी है। लगता है, गुप्त तरीके और आपसी मेलजोल के जरिए देश के राजनीतिक दलों, नेताओं और संसदीय कानूनों ने संसद से लेकर विधान सभाओं में 30 फीसदी से ज्यादा दागियों को आरक्षण देने पर आम सहमति बना ली है।

क्या है असलियत : क्या हमारी संसदीय प्रणाली ने अपराधियों को भी आरक्षण दे रखा है? सुनने और कहने में यह भले ही अटपटा लग रहा हो, लेकिन असलियत तो यही है। संसद में 140 से ज्यादा दागी लोग हैं और हर साल इनकी तादात बढ़ती ही जा रही है। पिछले महीने संपन्न हुए पांच विधान सभा चुनाव के बाद पाचों विधान मंडलों की जो तस्वीर सामने आ रही है, चौंकाने वाली है। आंकडेÞ बता रहे हैं कि पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पांडीचेरी विधान सभाओं में 31 फीसदी सदस्य गुंडई करने, हत्या और हत्या के प्रयास करने, डाका डालने, सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने और बलात्कार करने के आरोपी हैं। विधान मंडल की यह कोई पहली तस्वीर नहीं है। 2006 के चुनाव में भी इन विधान सभाओं की लगभग यही तस्वीर थी। आंकड़ों में सिर्फ फर्क है। तब इन सभाओं में अपराधियों की मौजूदगी करीब 25 फीसदी थी। यानि, आप कह सकते हैं कि इन पांचों सभाओं में पहले 25 फीसदी दागी लोग आरक्षित थे, जो अब बढ़कर 31 फीसदी हो गए हैं। लेकिन, इस मसले पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और जदयू सांसद कैप्टन जयनारायण निषाद की राय साफ है। निषाद का मानना है कि -संसद से लेकर विधान सभाओं में दागियों के घटनाक्रम को देखते हुए एक मौन आरक्षण जैसा लगता है। इस मुद्दे पर सभी पार्टियों की सहमति हो, ऐसा नहीं है। एक कड़वा सच यह भी है कि दागियों को टिकट देना सभी पार्टियों की मजबूरी है। सरकार बनाने के लिए जीत जरूरी है और जीतने के लिए दागदार भी स्वीकार्य है।

सर्वाधिक आपराधिक मामले : पांच राज्यों के कुल 820 विधान सभा सदस्यों के शपथ पत्रों की जांच के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उससे पता चलता है कि इनमें से 257 सदस्यों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। यानि, 31 फीसदी ऐसे सदस्य इन विधान सभाओं में पहुंचे हैं, जिन्हें जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए। जिन 257 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, उनमें से 133 यानि 16 फीसदी पर हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती से लेकर अपहरण और बलात्कार जैसे संगीन मामले दर्ज हैं। बता दें कि 293 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधान सभा के 102 सदस्यों के ऊपर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। केरल विधान सभा की क्षमता 140 सदस्यों की है, जिनमें 67 सदस्यों पर आपराधिक मामले लंबित हैं। यानि 48 फीसदी सदस्य लंबित आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। तमिलनाडु विधान सभा के 231 सदस्यों के शपथ पÞत्रों की जांच से पता चलता है कि 66 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जो कुल विधायकों के 29 फीसदी के बराबर आते हैं। इनमें से 36 लोगों पर संगीन आरोप हैं। 126 सदस्यीय असम विधान सभा में 13 यानि, 10 फीसदी सदस्य आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं और 30 सदस्यीय पुद्दुचेरी विधान सभा के 9 यानि, 30 फीसदी विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसे लोगों से समाज और देश का कोई भला है? कैप्टन निषाद कहते हैं कि -राजनीति नैतिकता, नैतिकता से नहीं चलती। महाभारत और रामायण काल को आप देख सकते हैं। इसके लिए चुनाव प्रक्रिया में सुधार करने की जरूरत है। याद रखने की बात है कि बबूल के खेत में आम नहीं मिलता।

किन्हें बना रहे हैं गार्जियन : विधान मंडलों को ऐसे नामचीन भाइयोंके पहुंचने से भले ही कोई आपत्ति नहीं हो, संभव है, आपको ऐसे महामानवोंसे आपत्ति हो सकती है। यह आपत्ति इसलिए कि शायद ही आप ऐसे लोगों को अपने घर का गार्जियन बनाने को तैयार हों? और अगर आप इन्हें अपने घर का गार्जियन नहीं बना सकते, तो फिर आपने उन्हें देश, राज्य और अपने इलाके का गार्जियन कैसे बना दिया? अब आपको मिलवाते हैं असम के तीन महामानवों से-जानिया सीट से चुनाव जीते रफीकुल इस्लाम, बारपेटा से अब्दुल रहीम खान और हाजो से द्वीपेन पाठक। पाठक तृणमूल के सदस्य हैं, तो इस्लाम और खान एआईयूडीएफ के सदस्य। रफीक इस्लाम पर सरकार के खिलाफ लड़ाई करने और हथियार रखने के तहत आईपीसी की धारा 121,122 और 123 के तहत आरोप दर्ज हैं। इसी तरह बारपेटा से चुनाव जीत कर आए अब्दुर रहमान खान धारा 171 एफ, 325 और धारा 365 के तहत आरोपित हैं। द्वीपेन पाठक हाजो विधान सभा से तृणमूल कांग्रेस के सदस्य चुने गए हैं। पाठक पर धारा 379 और 380 के तहत आरोप लगे हैं, जो बेहद ही संगीन हैं।

इसी तरह केरल विधान सभा से सीपीआई केसी दिबाकरन करूणागपई विधान सभा से चुनाव जीते हैं। इन पर दो मामले हत्या के प्रयास के हैं। इसी सदन में कांग्रेस का एक सदस्य धारा 308 के तहत आरोपित है जबकि सीपीएम का भी एक सदस्य 308 का आरोपी है। तमिलनाडु विधान सभा में वैसे तो खूंखार लोगों की कोई कमी नहीं है, लेकिन सबसे ज्यादा तीन खूंखारों की अगर सूची बनाई जाए, तो उनमें अन्नाद्रमुक के केथानियारासू और अरूकुट्टी सबसे ऊपर हैं। केथानियारासू पर कुल 36 मामले दर्ज हैं, जिनमें 302 और 307 के पांच मामलों समेत 14 अन्य गंभीर मामले दर्ज हैं। अरूकुट्टी पर भी 307 के दो मामले दर्ज हैं। इसी श्रेणी में पीएमके के गुरुनाथन भी हैं, जिनपर हत्या के प्रयास समेत 6 गंभीर आरोप हैं।

उधर, पश्चिम बंगाल विधान सभा में इस बार तृणमूल कांग्रेस से दर्जनों ऐसे लोग पहुंचे हैं, जिन पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। किटुग्राम से चुनाव जीतने वाले शेख शहनावाज पर दो मामले 302 के, तीन मामले 307 और 364 समेत कई अन्य मामले दर्ज हैं। हरिपाल से चुनाव जीतने वाले बेचाराम मन्ना पर 22 मामले दर्ज हैं, जिनमें 13 गंभीर आरोप हैं। इन पर 307 के आठ मामले दर्ज हैं। भाटपारा के अर्जुन सिंह पर कुल 14 मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें से 307, 308 और 384 समेत 10 मामले अति गंभीर हैं।

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