Thursday, September 22, 2011

तिल-तिल मरते शापित गांव


मालवा क्षेत्र से लौटकर अखिलेश अखिल की खास व मार्मिक रिपोर्ट

कपास की खेती के लिए देश में मशहूर पंजाब का मालवा क्षेत्र मानो शापितहो गया है। यहां के किसी भी गांव में आप चले जाइए, नीरव शांति के बीच बिलखते लोगों को देखकर आपकी आंखें पसीज उठेंगी। कैंसर का ऐसा प्रकोप शायद ही आपको कहीं देखने को मिला हो। किसी के हाथ में, तो किसी के कान, किसी के पैर तो किसी की छाती और किडनी को कैंसर ने भेद रखा है। जैसे शरीर में घुन लग गया है। कैंसर से छटपटाते बच्चे, बूढ़े, जवानों और महिलाओं को देखकर ऐसा लगता है, मानो जिस हरित क्रांति के दम पर पंजाब ने देश की दशा बदली, विकास का अलख जगाया, वही हरित क्रांति अब उसके लिए शापबन गई है। पहले गेहूं और पिछले 20 सालों से कपास और अब बीटी काटन की पेस्टीसाइड और कीटनाशक दवाइयों वाली खेती ने भले ही किसानों की आमदनी बढ़ा दी हो, लेकिन विकास के इस साइड इफेक्टसे इनकी जान के लाले पड़ रहे हैं। जिस तरह घुन अनाज को छलनी कर देता है, उसी तरह पंजाब के सैकड़ों गांवों के किसानों को कैंसर रूपी घुन छलनी कर रहा है। हर दिन आधा दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत कैंसर से हो रही है और हर रोज दर्जन भर गांव कैंसर की चपेट में आते दिख रहे हैं।

2009 में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक कैंसर का प्रकोप अब मालवा इलाके को पार कर चुका है और अब यह राज्य की पूरी भूमि को ग्रास बनाने की तैयारी में है। सरकार करने और कहने के लिए तो बहुत कुछ कहती है, लेकिन कंैसर रोगी से और कैंसर ग्रस्त गांव से आप मिलेंगे तो सरकार के ऐलान की पोल खुल जाएगी। अब तक यहां के गांवों में कैंसर से कितने लोगों की मौत हुई है, इसका आज तक कोई आधिकारिक आंकड़ा यहां के सरकार के पास नहीं है। हां, आप गांवों में चलेंगे, तोे मरने वालों की सूची से आपका साक्षात्कार हो जाएगा।

जहरीली जमीन वाले गांव

बठिंडा से लगभग 45 किलोमीटर दूर है जज्जल गांव। बठिंडा से पहले तलवंडी और फिर तलवंडी से रामा जाने वाली बस से आप जज्जल उतर सकते हैं। बस स्टैंड से जज्जल गांव की पैदल दूरी करीब एक किलोमीटर है। 3500 लोगों की आबादी वाले कपास के लहलहाते खेतों से भरा यह गांव ऊपर से देखने में तो खाते-पीते लोगों की दास्तान कहता है, लेकिन गांव के हर लोगों के मन में किसी अनहोनी की टीस छुपी हुई है। यह अनहोनी कैंसर से जुड़ी है। यहां के अवकाश प्राप्त शिक्षक जरनैल सिंह गांव की व्यथा सुनाते-सुनाते द्रवित हो जाते हैं। इसी बीच गांव वालों की भीड़ जुट गई। दर्जन भर से ज्यादा कैंसर पीड़ित ग्रामीण मुंह लटकाए बैठ गए। इतने बड़े पैमाने पर कैंसर रोगियों को देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। जरनैल सिंह ने अपनी डायरी खोली। उनकी डायरी में गांव में मरने वालों की सूची है। जरनैल सिंह की बगल में बैठे कैंसर रोगी दलजीत सिंह ने हमको बताया कि इस गांव के हर घर में कैंसर के रोगी हैं। कुछ के रोग सार्वजनिक हो गए हैं, जबकि अधिकतर लोग इसे शर्म से छुपाए हुए हैं। जब मौत होती है, तो नई जानकारी मिलती है। या फिर बीकानेर में मुलाकात होने पर बीमारी की पोल खुलती है।

आपको बता दें कि बीकानेर यहां के लिए एक कोड वर्डहै। इस पूरे मालवा क्षेत्र में बीकानेर का नाम सुनते ही आप इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि कैंसर पीड़ितों की चर्चा हो रही है। दरअसल, बठिंडा और आस पास के शहरों में कैंसर का इलाज न होने की वजह से इलाके के लोग राजस्थान के बीकानेर में इलाज कराने जाते हैं। आपको आश्चर्य होगा कि अबोहर से चलकर बीकानेर एक टेÑन जाती है, जो बठिंडा स्टेशन से 9 बजे रात में खुलती है। स्थानीय लोग इसे कैंसर ट्रेनभी कहते हैं। इस ट्रेन में यात्रा करने वाले अधिकतर यात्री कैंसर के मरीज होते हैं। दलजीत सिंह के कान में कैंसर है।

60 साल के दलजीत देखने में तो मस्त लगते हैं, लेकिन भीतर से टूट चुके हैं। इनके पिता आत्मा सिंह की मौत भी कैंसर से हो चुकी है। दलजीत सिंह कहते हैं कि हमारी मौत तो निश्चित है, लेकिन हम अपने बच्चों के लिए भी कुछ छोड़ने की स्थिति में नहीं हैं। हर माह इलाज में हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं, जिसे हम जमीन बेचकर या फिर कर्ज लेकर पूरा कर रहे हैं। पूरे गांव का यही हाल है। हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों खत्म है।

एक हैं इसी गांव के करनैल सिंह। उम्र लगभग 70 साल। कैंसर से पीले पड़ चुके हैं। पेशाब की नली में कैंसर है। इनकी पत्नी बलबीर कौर को भी कैंसर है। करनैल कहते हैं कि हमारी सभी जमीनें बिक चुकी हैें और लाखों रुपये का कर्जा भी चढ़ गया है। सरकार हर कैंसर रोगी को डेढ़ लाख रुपये देने की बात तो कहती है, लेकिन उन पैसों का आज तक पता नहीं।

इस संबंध में जब राज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के निदेशक और मुख्यमंत्री कैंसर राहत कोष के सदस्य डॉ. अशोक नैयर से बात की, तो उन्होंने बताया कि सरकार कैंसर पीड़ितों को डेढ़ लाख रुपये की सहायता करती है। कुछ इसी तरह की जानकारी बठिंडा के जिला स्वास्थ्य अधिकारी डा0 आर एस रंधावा ने दी। रंधावा के मुताबिक सरकार ऐसे रोगियों को डेढ़ लाख की राशि देती है और यह राशि 15-20 दिनों में मिल जाती है।

करतार कौर की दास्तान भी कुछ ऐसी ही है। उसके तीन बेटों को कैंसर ने लील लिया है। बेटे के इलाज में करतार ने अपनी पूरी जमीन बेच दी और फिर शुरू हुआ कर्ज का जाल। करतार पर 11 लाख का कर्ज चढ़ गया। वह कहां से इतना कर्ज चुकाएगी, उसे भी नहीं पता। वह हमेशा अपने तीनों बेटों की तस्वीरों को सीने से लगाए घूमती रहती है। गांव वाले इतना जरूर कहते हैं कि जब भी कोई मौत यहां होती है, सरकार के लोग और मीडिया वालों की धमक हो जाती है और हमें उनके विजिटिंग कार्डके अलावा कुछ नहीं मिलता। अभी तक गांव में 90 से ज्यादा मौतें हो गई हंै, और सरकार है कि चुप्प्ी साधे हुए है।

गांव शेखपुरा : तलवंडी से 12 किलोमीटर दूर मौर रोड पर बसा यह गांव भी सुर्खियों में है। साल 2002 में अचानक दर्जन भर से ज्यादा रोगी इस गांव में जब दिखने लगे, तो सरकार की नींद खुली। अभी इस गांव में 3 दर्जन से ज्यादा कैंसर से पीड़ित हैं।

हमें बचा लो साहब, हम मरना नहीं चाहते। हमारे कान के भीतर कैंसर है। हमारा पूरा गांव कैंसर की चपेट में है। सरकार कुछ नहीं करती। जहरीले भूजल के कारण पूरा इलाका जिंदा लाशों का गांव बनकर रह गया है’- इस दास्तां को बयां करते हैं गांव जज्जल के दलजीत सिंह। इसी तरह की करुणा भरी कहानी मालवा के हर गांव में सुनने को मिल जाएगी। लगता है, पंजाब के सारे गांव कैंसर से शापित हैं...

जज्जल के बाद कैंसर से शापित गांवों की सूची में यह दूसरे नंबर का गांव है। यहां चार दर्जन से ज्यादा लोग मौत से जूझ रहे हैं। यही हाल लालयाना और मलकाना गांव का भी है।

मुक्तसर मनप्रीत बादल का इलाका है। यहां के गिदड़बाहा हलके में अभी तक 350 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। मुक्तसर में 59, मलोट में 43, गिदड़बाहा में 27, लंबी में 73, चकखेरवाल में 128, दोद्दा में 113, आलापुर में 10 कैंसर मरीज कराह रहे हैं। उधर मनसा और बठिंडा जिले में मरने वालों की संख्या 2042 बताई जा रही है।

कर्मगढ़ सतरह गांव : डेढ़ हजार की आबादी वाला यह गांव भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। इस गांव में तीन माह के भीतर पांच लोगों की मौत हो चुकी है और पांच अभी कैंसर की चपेट में हैं। गांव के स्वर्ण सिंह कहते हैं कि दर्जनों और लोगों में यह बीमारी है, लेकिन वे बताना नहीं चाहते। यहां के पानी में यूरेनियम और जरेनियम की मात्रा काफी बढ़ गई है।

अब तो जानवरों को भी यह रोग पकड़ने लगा है। लोग अब यहां से भागने में ही भलाई समझ रहे हैं। इसी गांव के हैं लखबिंदर सिंह। उम्र करीब 24 साल। कैंसर ने तोड़ कर रख दिया है। लखबिंदर कहते हैं कि इलाज तो चल रहा है आगे भगवान जाने। अब तो जीने की इच्छा ही समाप्त हो गई है। लगता है कि सब पूर्व जन्म का पाप है।

मान गांव : बठिंडा से 35 किलोमीटर दूर बादल रोड पर बसा है यह गांव। बलविंदर ने गांव की तस्वीर बताई। इस गांव के 28 लोग बीकानेरमें इलाज के लिए दौड़ रहे हैं। इनमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल हंै। मंदर सिंह और मूर्तिकौर की हालत सबसे ज्यादा खराब है। इस गांव के 15 लोगों की मौत हो चुकी है। मरने वालों में मीठा सिंह, बबी सिंह, पलवंत की पत्नी, जगराय सिंह, प्रकर्ण सिंह, नायब सिंह और सुखा सिंह समय से पहले ही दुनिया से चल बसे। एक सवाल हरित क्रांतिके साइड इफेक्ट को लेकर भी उठ रहा है। सवाल पानी के प्रदूषण और दूषित पर्यावरण को लेकर भी है। सबसे बड़ा सवाल सरकार की उदासीनता को लेकर है। (नोट : अगले अंक में पढ़ें इस समस्या पर डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत )

कैंसर से अब तक मरने वाले

जज्जल गांव में सन् 2001 में 11 लोग, 2002 में 7, 2003 और 04 में 6-6 लोग, 2005 में 2 लोग, 2006 में 3 लोग, 2007 में 7 लोग, 2008 में 9 लोग, 2009 में 4 लोग और इस साल में अब तक 7 लोगों की मौत कैंसर से हो चुकी है। मरने वालों में 18 से 70 साल के लोग शामिल हैं।

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