Tuesday, September 20, 2011

चुनावी माहौल को बदलेगी मुसिलम पाटियां!

अखिलेश अखिल

उत्तरप्रदेश के आसन्न विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों की आंखें मुस्लिम वोट बैंक के साथ ही चार उन मुस्लिम आधारित राजनीतिक दलों पर टिक गई है जिसने मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू की है। अगर ऐसा हो जाता है तो पहली बार सूबे की राजनीति बदलेगी और चुनावी समीकरण भी । चार मुस्लिम दलों की चैकड़ी ने सूबे की राजनीति को गरम कर दिया है। ऐसे में मुसलमानों के बोट बैंक के सहारे राजनीति करने वाली पार्टियां बसपा,कांग्रेस और सपा का वजूद फिर क्या होगा एक बड़ा सवाल है? सवाल तो कई और भी हैं। एक बड़ा सवाल तो यह भी है कि क्या मुस्लिम आधारित चारों दल चुनावी माहौल को बदल सकते हैं? क्या ये दल सरकार बनाने और बिगाड़ने की स्थिति में होंगे? सवाल यह भी है कि क्या ये दल मुस्लिम वोट को अपनी ओर खींच कर भाजपा को सीधा लाभ नहीं पहुंचाऐंगे? सवाल कई और हो सकते हैं लेकिन सबसे पहले नई मुस्लिम राजनीति पर एक नजर-

मौलाना अब्दुल बदरूद्दीन को आप जानते होंगे।असम युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम से पार्टी चलाते हैं। हाल में असम में जो विधान सभा चुनाव हुए हैं उसमें इस पार्टी को 18 सीटें मिली है। पिछले चुनाव में एयूडीएफ को 9 सीटें मिली थी । मौलाना साहब ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी उत्तरप्रदेश विधान सभा चुनाव सभी 403 सीटों से लड़ेगी। असम में मौलाना साहब की पार्टी की अपनी हैसियत है और वहां कि यह सबसे बड़ी दूसरी पार्टी है । जहां तक उत्तरप्रदेश की बात है मौलाना साहब की पकड़ देवबंद और खासकर सहारनपुर के इलाकों में ठीक ठाक है और इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस इलाके के दर्जन भर सीटों पर वे उलट फेर कर सकते हैं । मौलाना बदरूद्दीन कहते हैं कि हम चुनाव तो सभी सीटों पर लउ़ेंगे लेकिन हमारी नजर समान विचारधारा वाली पार्टी पर भी है। हम मिलते विचार वाले दल से समझौता भी कर सकते हैं।जाहिर है मौलाना की पार्टी के चुनाव में उतरने से मुस्लिम वोट की राजनीति करने वाले दलों को परेशानी हो सकती है और खासकर सपा और बसपा को ।

उधर, सूबे की चुनावी राजनीति में इस बार पहली दफा तीन और राजनीतिक पार्टियां दखल देने जा रही है । पीस पार्टी आफ इंडिया,उलेमा कौंसिल और जमाते इस्लाम की नई पार्टी वेलफेयर पार्टी आफ इंडिया इस बार दम खम के साथ चुनावी पैंतरेबाजी की तैयारी में हैं । यह बात और है कि मुस्लिम आधारित ये पार्टियां अपने को सभी बर्गो को लेकर चलने वाली पार्टियां कह रही है लेकिन इन पार्टियों का जो आधार है वह सिर्फ मुस्लिम वोटों पर ही टिका है । सूबे की अगली राजनीति किस करवट बैठेगी , इस पर कुछ भी कहना अभी जल्दी वाजी होगी लेकिन इतना तय है कि इन नई पार्टियों की राजनीति कुछ अलग ही दिख रही है । आपको बता दें कि ये चारों मुस्लिम आधारित पार्टियां आपस में मिलकर एक मोर्चा बनाने के तरफ भी बढ रही है और ऐसा हो जाता है तो तय मानिए कि अन्य दलों को मुस्लिम राजनीति से कहीं तौबा न करना पड़े । लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस खेल के पीछे का खेल की राजनीति से भयभीत हैं। मुसलमानों को एक बड़ा संगठन मिली कौंसिल है ।कौंसिल के महासचिव डा0 मंजुर आलम कहते हैं कि जिन लोगों ने ये नई पार्टियां बनाई है, उससे समाज को कोइ्र भला नहीं होने वाला। पार्टी बनाने वाले इससे लाभ कमा सकते हैं । और हमें पता भी है कि किसे क्या मिलने वाला है, लेकिन मुसलमानों को कोई फायदा नहीं मिलेगा। संभव है कि ऐसा भी हो लेकिन इतना तो तय है कि ये मुस्लिम आधारित पार्टियां आपस में मुस्लिम वोट बैंक को बांटेगी और इस पूरे खेल में भाजपा को सीधा लाभ होगा ।

जमात ए इस्लामी की नई पार्टी वेलफेयर पार्टी आफ इंडिया के अध्यक्ष मुजतबा फारूख कहते हैं कि- सूबे के चुनाव में सिरकत करने वाली इन चारों पार्टियों को अपने अपने आधार वाले इलाके में ध्यान देने की जरूरत है। हमें एक दूसरे को सहयोग देने की जरूरत है या फिर साझा मंच के तहत चुनाव लड़ने की जरूरत है, तभी हम कुछ कर पाऐंगे। आपको बता दें कि जमात ए इस्लाम का पूरे देश में अच्छा नेटवर्क है और उसके अपने वोट बैंक भी है। जाहिर है इसका लाभ उसे मिलेगा लेकिन इसके साथ ही यह भी तय है कि अब तक जमात ए इस्लाम से जुड़े तमाम लोग सपा और बसपा में बंटे रहे है।बोट का यह बंटवारा कैसे रूकेगा कहना मुश्किल है । मुजतबा फारूख कहते हैं कि -हमारे आने से किसको हानि होना है हमें इससे कोई मतलब नहीं है। अभी तो हम पार्टी का नेटवर्क तैयार करने में लगे हैं और तय मानिए कि हमारे आने से बड़ी पार्टियां और खासकर सपा और बसपा को नुकसान होगा ही। ये वही पार्टियां हैं जो मुसलमानों को हर तरह के लोभ और लालच देकर सालों से बरगलाते रहे हैं। यही काम पहले कांग्रेस करती थी

उधर पीस पार्टी आफ इंडिया ने भी उत्तरप्रदेश के सभी सीटों पर उपना उम्मीदवार खड़ा करने की बात कही है। लेकिन इस पार्टी की जमीन गोरखपुर और उसके आसपास के इलाके तक ही सीमित है। उनकी आगे की राजनीति क्या होगी कहना मुश्किल है लेकिन इस बार पूर्वांचल में इस पार्टी की धमक को को देखा जा सकता है। राष्ट्ीय ओलमा कांउसिल के अध्यक्ष आमिर रिसादी मुसलमानों की राजनीति को एक दूसरे चश्में से देख रहे हैं । रिसादी कहते हैं कि -पिछले कई सालों से राजनीतिक पार्टियों की दुकानें सजी है और हम लोग ठगे जाते हैं ।इस बार के चुनाव में बड़ी राजनीतिक दलों की दुकाने बंद होगी और वे हासिए पर भी आ जाऐंगे । कांगे्रस ने पहले जनसंघ से डराकर हमारा वोट लिया।सपा ने भाजपा से डराकर हमसे वोट लिया और अब हम किसी के भय से वोट नहीं देंगे । हमें अपनी ताकत का एहसास है और हम सभी सीटों पर चुनाव लउ़ने की तैयारी में हैं।आमिर रिसादी पूर्वांचल से आते हैं और यही वजह है कि अभी राष्ट्ीय ओलमा कांउसिल का प्रधान कार्यालय भी आजमगढ में सिाित है । भोजपुरी बोलने वाले आमिर रिसादी आगे कहते हैं कि -कुछ लोग और यहां तक की आपने भी हमारी पार्टी को भाजपा समर्थित कहा है। इस बारे में हम ज्यादा कुछ नहीं कह सकते और भाजपा को भी यह सिद्ध करना चाहिए। भाजपा का अल्पसंख्यक मोर्चा ही मसलमान विरोधी है फिर हम उससे संबंध कैसे रख सकते हैं ? आगे का खेल देखिए। हम लंबी राजनीति करने आए है हम कोई आया राम गया राम नहीं हैं।

मुसलमानों की राजनीतिक पार्टियां प्रदेश चुनाव में उतरने के बाद सूबे की वड़ी पार्टियों में हउ़कंप मचा हुआ है । बसपा,सपा और कांग्रेस की राजनीति पर इन मुस्लिम पार्टियों के आने से क्या असर पउ़ेगा, इसको लेकर अंदरखाने में रणनीति बन रही है। बसपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए सपा क्या कर सकेगी देखना होगा। सपा को गुमान है कि आजम खान के आने के बाद और कल्याण सिंह के जाने के बाद और बसपा से ब्राम्हनों की माया टूटने के बाद सपा सूबे की राजनीति पर कब्जा कर सकती है। उधर भाजपा उमा भारती को सूबे की राजनीति में उतारकर मंदिर आंदोलन को जगाकर सहानुभूति वोट बनाने की तैयारी में है। कांगे्रस और खासकर राहुल गांधी के लिए सूबे का यह चुनाव किसी लिटमस टेस्ट से कम नहीं है। इसके अलावा चुनाव से पहले कांगे्रस गुलाम नवी आजाद को गृहमंत्री बनाकर मुसलमानों के बीच एक अलग संदेश भी देना चाह सकती है। इतना तय है कि मुसलमानों के वोट पाए वगैर किसी भी पार्टी की जीत संभव नही है और इन वोट बैंको के बिना किसी की सरकार बननी भी मुश्किल है। फिर जो मुस्लिम राजनीति की चैसर बिछी है उसमें कई सवाल तैर रहे है? क्या मुस्लिम पार्टियां कोई साथ्रक भूमिका निभा पाएगी? सभी राजनतिक दलों का हाल क्या होगा? और क्या कोई भी पार्टी मुस्लिम दलों को सहयोग देगी?

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