Monday, September 5, 2011

दोगली राजनीति का शिखंडी चेहरा

अखिलेश अखिल

क्या आप शिखंडी को जानते है? शिखंडी महाभारत का वह पात्र है जो पहले जन्म में महिला थी और दूसरे जन्म में कुरू वंश को नाश करने के लिए पुरूष बनकर कुरूक्षेत्र के मैदान में उतरा था। युद्ध हुआ, कुरूक्षेत्र कुरूवंशियों समेत दुनिया भर के योद्धाओं के रक्त से नहा गया और अपमानित शिखंडी की आत्मा को शांति मिल गई । वैसे तो पूरी दुनिया की राजनीति शिखंडियों से भरी पडी है लेकिन भारत में दोगली राजनीति काफी फल फूल रही है। पिछले कई सालों से देश की राजनीति ऐसे लोगों के हाथ में है जो दिखते तो हैं जनता के सेवक ,लेकिन हैं कंस, शकुनी और शिखंडी। इतिहास साक्षी है कि इस देश के शिखंडी के पास महाभारत के युद्ध शिखंडी ने अपने अपमान का बदला ले लिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शिखंडी राजनीति के शिकार हैं और यही वजह है कि प्रधानमंत्री भारत के लिए कम इंडिया के ज्यादा नजदीक देखे जा रहे हैं । आम जनता में मनमोहन सिंह की विश्वसनीयता कम हुई है और कांग्रेस की साख गिरी है। सरकार कानून का शासन चलाने की बात कहती है और कानून सरकार की कठपुतली है, ऐसे में शिखंडी राजनीति की दोगली नीति से देश को बर्वादी से भला कौन रोक सकता है। आइए प्रधानमंत्री से जानते हैं कुछ सवालों के जबाव।


प्रधानमंत्री ने सदन में नोट के बदले वोट मामले को सिरे से नकार दिया है जबकि इसी मामले की जांच के लिए बनी कृष्ण चंद्र देव कमेटी ने एटमी डील के समय सरकार बचाने के लिए घूस लेने की बात स्वीकार की थी। अब इसमें सच्चाई क्या है वह तो सरकार ही जाने लेकिन इतना तय है कि हमारे देश में विधायिका और कार्यपालिका जनहित में काम नहीं कर रही हैं और जनता के पैसों को सिर्फ लूट रही हैं। लोक सभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप कहते हैं कि ‘समय के साथ ही नेताओं की सोंच में काफी अंतर आ गया है और पहले की तुलना में आज के नेता -हजयूठ ज्यादा बोलने लगे हैं और उनकी विश्वसनीयता कम होती गई है। अब विधायक सांसद ही नहीं मंत्री तक -हजयूठ बोल जाते हैं और उन्हें इसका मलाल भी नहीं होता। और जब नेता -हजयूठ बोलना शुरू कर दे तो फिर सभी लोंतांत्रिक यह बात कहने में अब कोई गुरेज नहीं है कि वर्तमान सरकार सबसे भ्रष्ट है और इसके रहने और नहीं रहने का कोई मतलब नही हैं । सरकार केवल रोज हो रहे लूट के खेल पर सफाई देती नजर आ रही है और जनता भगवान भरोसे जी रही है। अगर किसी ने कोई आवाज निकाल दी तो इसकी खैर नही।


आइए कुछ तथ्यों पर बात करते हैं। महाराश्ट् में कुछ महीने पहले एक एडीएम को अपनी ईमानदारी की कीमत जान देकर चुकानी पडीै। इससे पहले भी बिहार और उत्तरप्रदेष में कई इमानदार अधिकारियों की हत्या कर दी गई थी। बिहार के इमानदार इंजीनियर सत्येंद्र दुवे की हत्या माफियाओं और सफेदपोष तंत्र के गुंडों और ठेकेदारों ने गोली मारकर कर दी थी। हमारे समाज में गलत काम करने वालों और खासकर देश को लूटकर धन पैदा करने वालों के हिम्मत के सामने कानून का शासन कितना ठिगना हो गया है, इसका जीता जागता उदाहरण मनमाड की वह दिल दहला देने वाली घटना है जिसमें एडीएम यशवंत की हत्या तेल तस्करों और भ्रश्टाचारियों ने कर दी। जिस तरह से यशवंत की हत्या की गई है और जिन लोगों ने की है उससे पता चलता है कि इस पूरे आपराधिक षडयंत्र में मंत्री से लेकर संतरी तक शामिल हैं। इतना बडा दुःसाहसिक काम वही कर सकता है जिसकी पहुंच उपर तक हो। फिर इसी तरह की घटना उत्तर प्रदेश में लगातार घटती जा रही है।


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, नरसिम्हा राव से भी दो कदम आगे निकलते दिख रहे हैं। मनमोहन सिंह के शासन काल में जितने धोटाले हुए है और जितनी सरकारी संपत्ति की लूट हुई है, शायद ही इससे पहले कभी हुई हो। स्पेक्ट्म धोटाले में जिस तरह ए राजा की गिरफ्तारी हुई है, वह भी आजाद भारत की पहली कहानी है । कोई भी सरकार अभी तक अपने मंत्री को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी। ए राजा की गिरफ्तारी से साफ हो जाता है कि 2जी मामले में लूट हुई है। लेकिन सबसे बडा सवाल यह है कि अगर लूट हुई है तो लूटे गए पैसे वापस आने चाहिए। अगर ऐसा नही होता है तो इस गिरफ्तारी का क्या मतलब है? सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री यदि ऐसा करने में सफल नहीं होते हैं तो उनकी इस असफलता के लिए देश कभी भी उन्हें माफ नहीं करेगा। इसके साथ ही कांगे्रस की स्थिति यदि कमजोर होती है तो इसके लिए सीधे प्रधानमंत्री जिम्मेदार होंगे।


आजाद भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा घोटाला और भ्रश्टाचार के लिए नरसिम्हा राव का शासन काल बदनाम रहा है, लेकिन अब मनमोहन सिंह राव से आगे ब भ्रष्टाचार और घोटाले के कारण 96 और 98 के लोक सभा चुनाव में कांगे्रस की करारी हार हुई और बीजेपी की अगुआई में एनडीए की सरकार बनी। आप को बता दे कि यही मनमोहन सिंह राव सरकार में वित मंत्री थे और उदारीकरण की नीति के प्रणेता भी। जाहिर है राव सरकार से लेकर अबतक के जितने घोटाले देश में हुए है और हो रहे है, सबके बारे में प्रधानमंत्री को पता है। और उन्हें इस बात की भी जानकारी है कि ये धोटाले किस वजह से हुए हैं । और ऐसा नही है तो तो फिर यह कहने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि एक बेहतर अर्थशास्त्री राजनीति में आने के बाद अर्थषास्त्र के नियमों को या तो भूल गए हैं या फिर सच्चाई को कहने से परहेज कर रहे हैं। क्योंकि अर्थषास्त्र के छात्र होने के नाते उन्हे मालूम है कि जहां विकास की प्रक्रिया शुरू होती है वहां लिंकेज की शुरूआत होती हैं । इसी लिंकेज को समाज में घोटाला और भ्रष्टाचार के नाम से जानते है। चूकि यह बात इसलिए कही जा सकती है कि 20 वीं सदी के महान अर्थषास्त्री जान मेनार्ड केंस की जिस अर्थनीति को प्रधानमंत्री 1991 से लागू करते आ रहे हैं उस नीति की शुरूआत ही विकास और रोजगार निर्माण के लिए होती है और इस विकास से होने वाले साइड इफेक्ट को कैसे रोका जाए, पर जाकर खत्म हो जाती हैं । हमारे प्रधानमंत्री संभव है कि जे एम केंस से मिले भी होंगे क्योंकि केंस भारत में काम कर चुके हैं। लेकिन साईड इफेक्ट के रूप में जो भ्रष्टाचार, घोटाले,बेरोजगारी,महंगाई, विस्थापन, नक्सलवाद, गैरबराबरी और असमानता सामने आई है, वह इसी नई आर्थिक नीति की देन है और विकास के नाम पर जो माडल दिखाई पड़ रहे है, वह भी इसी नीति की देन है।


तो 1991 के बाद देश में जितने घपले घोटाले हुए है, उसके सबसे नजदीकी गवाह देश में कोई है तो वह है हमारे प्रधानमंत्री। संभव है कि मनमोहन सिंह साफ सुथरे छबि के हों और इमानदार भी हों, लेकिन उस इमानदारी का क्या मतलब है जब मंत्रीमंडल में शामिल दर्जनों लोग घपले घोटाले में फंसे हैं और आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं। ऐसे लोगों के साथ काम करने की मजबूरी कांग्रेस और यूपीए की हो सकती है लेकिन पाक साफ प्रधानमंत्री जैसे लोगों के लिए तो कतई नहीं। और यदि प्रधानमंत्री को लगता है कि उनके बगैर देश नही चल सकता तो इस पर सिर्फ हंसा ही जा सकता है। प्रधापमंत्री को याद करना चाहिए कि वे पिछले सात साल से इस देश को चला रहे हैं। पिछले सात सालों में देश के आर्थिक विकास के साथ साथ देश के तंत्र से जुडे हुए जितने लोगों का विकास हुआ है उनकी ही आर्थिक स्थिति की जांच कर दी जाए तो उन्हें कई चैंकाने वाले आंकडे मिल सकते है। तब उनको मालूम होगा कि जिस विकास की दुहाई दी जा रही है उसकी सच्चाई क्या है, और जो लोग उनके तंत्र से जुडे हुए है, उनके सफेद कपडे कितने दागदार हैं। कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ नेता इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि नई आर्थिक नीति का मुकम्मल लाभ लोगों तक नहीं पहुंचा है और इसके लिए भ्रष्ट राजनीति जिम्मेदार हैं। लोक सभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप कहते हैं कि विकास की बात महज किसी छलावा से कम नहीं। और जहां तक लोकतंत्र की बात है ,उसे कुचलने की तैयारी चल रही है। जब संसद और विधान सभा में दागदार लोगों की भीड़ ब


अपने इमानदार प्रधानमंत्री से देश की जनता यह भी जानना चाहती है कि यदि कोई आम आदमी 10 रूपए की चोरी करता है तो वह सजा का हकदार होता है। और उसको सजा मिलती भी है। लेकिन देश के कारपोरेट घरानों ने बैंको से अरबों रूपए कर्ज लेकर भी लौटाने को तैयार नही है। वही पुलिस ,वही तंत्र, वही अदालत और वही कानून उन्हें दंडित क्यों नहीं करते। कर की चोरी के मामले में आम आदमी को दंडित कर दिया जाता है लेकिन अरबों खरबों की कर चोरी करने वालों के यहां से संतरी से मंत्री तक उपकृत होते देखे जाते हैं । क्या हमारे पीएम को इस बात की जानकारी नही है कि देश में आम जनों के साथ क्या किया जाता है । जब दिल्ली जैसे शहरों में गुंडों ,बदमाषों और दलालों की कारिस्तानी को रोकने में सरकार के लोग हांफते नजर आ रहे हैं तो बाकी देश का क्या हाल है भगवान ही जानता है। फिर जो लोग दिन दहारे सत्ता सरकार को चकमा देकर सरकारी धन को लूट रहे हैं क्या सरकार उसे दंडित कर पा रही है। सवाल यह भी है कि निजी कंपनियों में घोटाले क्यों नही होते। निजी कंपनियों में काम करने वाले लोग बहुत जल्द अमीर नही बनते। और अगर ऐसा नही है तो प्रधानमंत्री पिछले 20 सालों के भीतर निजी कंपनियों में काम करने वाले लोगों और सरकारी महकमें में काम करने वाले लोगों की आर्थिक सर्वे कर के देख ले तो पता चल जाएगा कि उनकी आर्थिक नीति का लाभ किसने उठाया हैं । जाहिर है कि प्रधानमंत्री जी को सब कुछ मालूम है लेकिन वे अंजान बने हुए है। तो फिर ऐसे अंजान ब्यक्ति को अपने बारे में सोंचना चाहिए कि उनकी नैतिकता क्या कहती हैं ।


और एक सवाल और। क्या अन्ना हजारे देश के दुश्मन हैं जो भ्रष्टाचार को कम करने की लड़ाई लउ़ रहे हैं। क्या अन्ना संसदीय प्रणाली को खत्म करना चाह रहे है और देश के बाकी नेता औा सरकारी तंत्र में शामिल लोग संसदीय प्रणाली को बचाने में लगे हैं? बाहर घूमने वाले अपराधी और कानून के तोड़ने वाले और संसद व विधान सभा में पहुंचने वालों से लेकर जनतंत्र को सालों से लूटने वाले नौकरशाह और कर्मचारी संविधान के संरक्षक , इसका फैसला कौन करेगा। और अंत में तो यही कहा जा सकता है कि जिस तरह जैसे तैसे सत्ता चलाने वाले नरसिंम्हा राव कांग्रेस की लुटिया डूबों कर चले गए ,उसी राह पर मनमोहन सिंह भी है। और आने वाले दिनों में इसका खामियाजा मनमोहन सिंह को नहीं कांग्रेस को होनी है जिसे इस बात का गुमान है कि वह देश की सबसे बड़ी पार्टी है और वही इस देश को हांक सकती है। याद रखिए इस देश को अभी तक किसी भी पार्टी ने चलाया नहीं है, हांका है। अगर देश चलता तो आजादी के 64 सालों में देश की 70 फीसदी आवादी 30 फीसदी अमीरों और शोषक लूटेरों का गुलाम नहीं बनती।

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