Friday, September 16, 2011

ये हैं देश की बटमार पार्टियां

अखिलेश अखिल

लोकपाल के मसले पर अन्ना हजारे और सरकार अब तमाम राजनीतिक दलों से जनमत हासिल कर रहे हैं। इस मुद्दे पर सरकार सर्वदलीय राय लेने की कोशिश कर रही है ताकि जनता की आवाज को दबाया जा सके । सरकार को सर्वदलीय राय भी मिल गई है। राय वही है जो सरकार चाहती है । और भला उन पार्टियों की औकात ही क्या है जो भ्रष्टाचार से लेकर हत्या, डकैती, चार सौ बीसी से लेकर काले धन और आय से अधिक संपत्ति के मामले में अदालत और सीबीआई के फांस में हैं । ये हाल यूपीए में शामिल घटक दलों का तो है ही विपक्ष की राजनीति करने वाला एनडीए या फिर तीसरे मोर्चा से जुड़ी पार्टियां भ्रष्टाचार के हमाम में सब नंगे और बेआबरू हैं। और जिसके पास आबरू नही हो उसे आप क्या कहते हैं ? जिसके पास कोई नैतिकता नही ं हो उसे आप क्या कहेंगे? या फिर जो बोलता है कुछ और कहता है कुछ और इस जमात को आप क्या कहेंगे? आप इन्हें जो भी कहें लेकिन सही मायने में ऐसे नेता को बटमार कह सकते हैं और इनकी पार्टी को गिरोह।

सरकार के साथ सर्वदलीय बैठक में ये राजनीतिक दल या तमाम क्षेत्रीय पार्टियां सरकार की नीतियों के समर्थन में खडी आती दिख रही है जबकि अन्ना को समर्थन देने की बात भी इन पार्टियों के नेता करते नजर आ रहे हैं। जाहिर हैं नेता लोग अन्ना के साथ राजनीति कर रहे हैं। क्योंकि ये वहीं नेता हैं जिनके भ्रष्टाचार को शमन करने के लिए अन्ना जन लोकपाल की वकालत कर रहे हैं। सरकार और राजनीतिक दलों का घालमेल तो समझ में आ रहा है लेकिन अन्ना का इन राजनीतिक दलों और उनके नेताओं से समर्थन लेने की बात समझ से पड़े की बात है। क्योंकि जिन राजनीतिक दलों से वे मिल रहे हैं उन दलों के अधिकतर नेता भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों में कानून के धेरे में हैं। ऐसे में अन्ना के प्रयास को भी शक की नजरों से देखा जा सकता है। देश में अभी 7 नेशनल राजनीतिक पार्टियां है और कोई 48 राज्य स्तरीय पार्टियां। इसके अलावा सैकडों अन्य पंजीकृत पार्टियां है जिनकी राजनीति जनता की भलाई के लिए नहीं वल्कि लोकतंत्र के नाम पर देश को लूटने के लिए की जाती है। पाठकों के सामने इस रिपार्ट के जरिए ऐसे दलों की सच्चाई खोलने की कोशिश की जा रही है। बार बार और हर बार चुनाव में शिरकत करने वाले ऐसे दलों और उनके नेताओं को परखने से पता चलता है कि किस तरह तमाम क्षेत्रीय पार्टियां देश को चुना लगा रही हैं।

राह चलते लोगों को लूट लेना राहजनी और लूटने वालों को बटमार कहा जाता है। यह हमारे देश का प्राचीन पेशा रहा है। आदिम युग से लेकर आज तक राहजनी और बटमारी का कारोबार इस देश में अबाध गति से चल रहा है।कारोबार इसलिए कि इससे न जाने कितने लोगों और परिवारों का भरण पोषण चलता है। इतिहास के पन्नों में जाएं तो ऐसे सैंकड़ों जातियों और उपजातियों के उदाहरण मिल जाऐंगे जिनका मुख्य धंधा ही राहजनी और बटमारी रहा है। यहां उन जातियों की सूची जारी कर दी जाए तो संभव है कि एक अलग राजनीतिक बवाल खडा हो जाएगा। क्योंकि कल की वही लूटेरी जातियां देश के कई इलाकों में न सिर्फ राजनीति कर रही है बल्कि आरक्षण का लाभ उठाकर सम्मानित जीवन जीती नजर आ रही है।

आजादी के पहले और आजादी के बहुत बाद भी राहजनी का काम गांव के कुछ लोग या कुछ जातियां करती थी,। अब यही काम कुछ होशियार लोग जनता को हांकने के नाम पर गिरोहबंद होकर कर रहे हैं। कुकुरमुत्ते की तरह इस लोकतंत्र में पिछले 30 सालों में जितनी राजनीतिक पार्टियां सामने आई हैं, उसे देख परखकर कहा जा सकता है कि ये पार्टियां लोकतंत्र की हिफाजत के लिए नहीं हैं बल्कि जनता और लोकतंत्र को लूटने के लिए अलग अलग नाम औंर चरित्र चेहरों के साथ गिरोह में खडी हैं । इन गिरोहों से हम आपका परिचय कराऐंगे और ले चलेंगे इनके सरगना और उनकी पृष्ठभूमि पर भी लेकिन आगे बढने से पहले जरा रूकिए।

आपको बता दें कि समाज को हांकने वाले ये तमाम गिरोह लोकतंत्र को लूटने के लिए कोई तीन धड़ों में बंट गए है। इसे तीन धड़ें कहें या फिर तीन महागिरोह। कुछ गिरोह अपने लाभ के लिए यूपीए जैसे महासंगठन के साथ है तो कुछ गिरोह एनडीए के साथ । कुछ गिरोह मौका के इंतजार में रहते हैं । ये मौका के अनुसार अपना पाला बदलते हैं। इन्हें आप मौकाटेरियन कह सकते हैं । आज भी दर्जनों गिरोह इस फेर में बैठे है कि पता नहीं कब उनका दाव सफल हो जाए । लोकतंत्र को हांकने के लिए जिस एक वडी पार्टी पर जिम्मेदारी आती है ये गिरोह उस पार्टी को हांकती रहती है। इनका अपना एजेंडा होता है और वोट उगाहने से लेकर लोगों को बरगलाने तक के अपने तरीके । देश, राष्ट् , इमानदारी, विश्वसनीयता,एकता, जनता जैसे शब्दों से भले ही इन्हें परहेज न हो लेकिन इतना तय मानिए इन शब्दों को ये आत्मसात नहीं करते ।

आइए, आपको हम मिलाते हैं देश के एक वडे नेता ओमप्रकाश चैटाला से। चैटाला किसान नेता पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल के पुत्र हैं और हरियाणा की राजनीति करते हैं।इंडियन नेशनल लोकदल इनकी पार्टी है और कम से कम पांच बार हरियाणा के मुख्यमंत्री ये बन चुके हैं। चैटाला एनडीए के समर्थक हैं और वंशवादी राजनीति के पोषक भी। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के समर्थन में चैटाला अपना पसीना बहा चुके हैं। यानी चैटाला देश से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए बेचैन हैं। लेकिन जरा इनके भ्रष्टाचार और अत्याचार को तो देखिए । दसवीं पास चैटाला हरियाणा के उंचा कला से विधायक है। चुनाव आयोग में दिए गए सूचना के मुताबिक इनकी संपत्ति 15 करोड की है । इसके अलावा इनके और इनके दोनो विधायक पुत्रों पर आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला दर्ज है और जांच चल रही है। चैटाला साहब हैं तो किसान नेता लेकिन इनके उपर जो आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं उसे देखकर अपराध भी शरमा जाए । घारा 120बी,467,468,420,471 जैसे मामलों में चैटाला आरोपित हैं। आपको बता दे कि 80 के दशक में मेहम जैसा चर्चित नरसंहार भी चैटाला के काल में ही हुआ था। और चैटाला की कलई खुल गई थी । अब चैटाला अन्ना हजारे के संग हैं।

आदिवासियों के सबसे बडे़ नेता शिबू सोरेन को तो आप जानते ही हैं। झारखंड राज्य बनाने से लेकर झारखंड में शराबखोरी और सूदखोरी के विरोध में आंदोलन चलाने वाले दिशम गुरू शिबू सोरेन अगर राजनीति में नहीं आए होते तो शायद यह गांधी के बराबर का आदमी होता। लेकिन राजनीति में आकर शिबू की जो पहचान बनी उससे लोकतंत्र भी लज्जित होता रहा। संसद घूस कांड से लेकर झारखंड में सरकार बनाने और गिराने के लिए विख्यात गुरूजी वंशवाद के तो पोषक रहे ही कई आपराधिक क्रियाकलापों में भी आरोपित और अभियुक्त रहे हैं। गुरूजी यूपीए के समर्थक रहे है और वर्तमान में झारखंड सरकार भाजपा के समर्थन से चला रहे हैं। भ्रष्टाचार पर गुरू जी अन्ना के समर्थक हैं लेकिन खुद उनकी पार्टी के लोग और सरकार के लोग लूट में शामिल रहे हैं। गुरूजी 302,307 के अलावा दर्जन भर अन्य मामलों में आरोपित हैं। दुमका से सांसद गुरूजी की संपत्ति 82 लाख की बताई गई है । असलियत ये है कि झारखंड की राजनीति गुरूजी को माइनस करके नहीं चल सकती। अन्ना हजारे गुरूजी से भी मिलेंगे। गुरूजी अपना समर्थन भी दे देंगे।

झारखंड की वर्तमान सरकार में उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे सुदेश महतो भी आजसु जैसी पार्टी को चलाते हैं। हर चुनाव में कुछ सीटें जीतकर महतो हमेशा सरकार में बने रहते हैं । महतो को किसी भी पार्टी या गठबंधन से कोई परहेज नहीं । जिस गठबंधन ने इनकी कुर्सी तय की उनके हो जाते हैं महतो। 35 साल के महतो को आप मौकाटेरियन कह सकते हैं। चुनाव आयोग की फाईल में महतो एक करोड के मालिक हैं लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि महतो अपनी उम्र से ज्यादा कमा चुके हैं। महतो 188,171ई,34, और 123 धारा के अंतर्गत आरोपी भी हैं अगर राजनीतिक पार्टियां गिरोह के रूप में काम कर रही है तो महतो भी एक पार्टी के सरगना हैं।

स्थानीय मुद्दों पर लोकतंत्र को हांकने वालों में राजद मुखिया लालू प्रसाद का नाम सबसे उपर रखा जा सकता है। लालू प्रसाद 15 साल तक अपने अंदाज में बिहार को हांकते रहे हैं। लालू ने बिहार को भले ही कुछ नहीं दिया हो लेकिन सबसे ज्यादा अपराधी किस्म के विधायक और सांसदों से बिहार महिमा मंडित होता रहा है। लालू प्रसाद भ्रष्ट राजनीति के नमूना हैं या लालू ने राजनीति को भ्रष्ट किया है इस पर अभी एक राय नही है, लेकिन इतना तय मानिए कि क्षेत्रीय राजनीति को हवा देने वाले इसी राजनीति के दम पर केंद्र सरकार में कई सालों तक दखल देने वालों में लालू प्रसाद सबसे आगे रहे हैं। लालू प्रसाद की पार्टी राजद 15 वीं लोकसभा चुनाव से लेकर विधान सभा चुनाव में अपना सब कुछ गंवा चुकी है । लालू हांसिए पर है ं। भविष्य की राजनीति अंधकार में है। लालू प्रसाद 3 करोड़ के मालिक हैं और उपर से आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला भी। चारा घोटाला में कई दफा जेल जा चुके हैं । कई मामलों में धारा 120बी,420,201,511,418,409,467,468,471,477ए,473,और 472 के तहत आरोपित हैं । इन सबके बावजूद लालू प्रसाद अपने को पाक साफ और हजारे और रामदेव को गलत गलत साबित करने में लगे हुए हैं। लालू के इस खेल के पीछे का खेल यह है कि वह किसी तरह केंद्र में मंत्री बन जाए। क्षेत्रीय पार्टी को अगर गिरोह कहा जाए तो लालू प्रसाद भी एक गिरोह के सरगना कहे जा सकते हैं।

क्षेत्रीय राजनीति के दम पर पश्चिमी उत्तरप्रदेश की राजनीति करने वाले चैधरी अजित सिंह देश के पूर्व प्रधानमंत्री चैधरी चरण सिंह के पुत्र हैं। किसान नेता चैधरी चरण सिंह अपने किस्म के अलग ब्यक्ति थे और गरीबों के मसीहा कहे जाते थे। विदेश में पढे अजित सिंह को राजनीति विरासत में मिली लेकिन जबसे राजनीति में आए दलबदलते रहे । अब तो शायद अजित सिंह को भी नहीं मालूम होगा कि उन्होने न जाने कितनी पार्टियां बदली ? अभी लोक पाल के मसले पर अजित सिंह की मुलाकात अन्ना से भी हुई । जन लोकपाल का अजित सिंह ने समर्थन किया , अन्ना खुश हुए। लेकिन दूसरी तरफ यही अजित सिंह केंद्र सरकार में शामिल होने के लिए भी बेकरार हैं। सरकारी फाईलों में 5 करोड़ के मालिक अजित सिंह पर कई भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं । क्या अन्ना को ऐसे नेताओं से समर्थन लेना चाहिए? अगर हां तो अन्ना पर विश्वास कैसे किया जाए।

और ये हैं प्रकाश सिंह बादल। पंजाब में शिरोमनी अकाली दल की राजनीति करने वाली यह पार्टी प्रकाश सिंह बादल से शुरू होती है और यहीं पर खत्म। स्नातक प्रकाश सिंह बादल अकाली राजनीति की धुरी हैं और और वर्तमान में पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री। चुनाव आयोग की फाईल में बादल 9 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं। वर्तमान में कई आरोपों समेत बादल आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसे हैं। बादल एनडीए के समर्थक हैं और हर दफा कुछ सांसदों के जरिए केंद्र की राजनीति को भी प्रभावित करते रहे है। और क्षे़त्रीय दलों की तरह अकाली दल की राजनीति भी पंजाब तक ही सीमित है। राट्ीय सरोकारों और केंद्रीय मुद्दों से इस दल का भी कोइ्र लेना देना नहीं रहा है। बादल भ्रष्टाचार के मुद्दों पर अन्ना हजारे के भी साथ है और सरकार की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में दलगत राजनीति के साथ भी हैं। भ्रष्टाचार और कई आपराधिक मामलों में आरोपित होने के बावजूद बादल हर बार चुनाव जीत जाते हैं और जनता ठगी सी रह जाती है। बादल आईपीसी की धारा 420,467,468,471 और 120बी के तहत आरोपित है और पंजाब की जनता को वाकायदा सालों से हांक रहे हैं। पंजाब के इस अकाली दल को भी आप किसी बटमार दल से ही तुलना कर सकते हैं।

और समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव को आप कैसे भूल सकते हैं। लोग इन्हें नेता जी के नाम से भी जानते हैं। आजादी की लडाई में अपना सबकुछ देश के नाम होम करने के बाद सुभाष चंद्र बोस नेता जी के नाम से जाने गए लेकिन मुलायम सिंह एक बार केंद्र में रक्षा मंत्री बनने के बाद नेता जी कहलाने लगे। यह अभी जांच का विषय है कि मुलायम सिंह को सबसे पहले किस आदमी ने नेता जी के नाम से पुकारा। मुलायम सिंह के उभार के बाद ही उत्तर प्रदेश से कांग्रेस का खात्मा हुआ । समाजवादी पार्टी को हांकते हुए मुलायम सिंह ने समाज को जिस तरह से जातियों में बांटने का काम किया अपने आप में एक मिशाल है । तीन दफा राज्य की बागडोर संभालने वाले नेता जी की दवंगई से राज्य की जनता कराहती रही है। राजनीति के कलंक और कई बार माफिया मुलायम के नाम से चर्चित रहे मुलायम सिंह समाजवादी पार्टी को अपनी जेब की संस्था की तरह चलाते हैं ।राजनीति में बंशवाद के पोषक मुलायम सिंह कई आपराधिक मामलों में लिप्त हैं।लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले मुलायम सिंह मासटरी करते राजनीति में पहुंचे और उत्तर प्रदेश की राजनीति को लहूलुहान करते रहे। नेताजी के शासन के लोग गवाह हैं। जब जब नेता जी मुख्यमंत्री बने राज्य लूट, हत्या और धार्मिक उन्माद का गवाह बना। शिक्षा का बेउ़ा गर्क हुआ और राजनीति कलंकित हुई । नेता जी और उनके परिजनों पर इतने भ्रष्टाचार के मामले चढे कि आज तक नेता जी अपनी जान बचाने के लिए कांगे्रस के सामने नतमस्तक है। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे नेता जी यूपीए 1 सरकार को अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बचाने का काम किया था। नेता जी चलाते तो हैं समाजवादी पार्टी लेकिन प्रदेश की जनता इसे लूट पार्टी से कम नही मानती। नेता जी मुस्लिम वोट की राजनीति भी करते हैं और तिजारत भी। विकास के पैमाने में सूबे को सबसे नीचे लाने में नेता जी की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। राष्टीय राजनीति को कमजोर कर अपना उल्लू सीधा करने में नेता जी सबसे आगे रहे हैं। चुनाव के दौरान नेता जी एक से बढकर एक अपराधियों को टिकट देने से बाज नहीं आते। कई डकैतो को नेता जी समाज से जोड़ने का काम किया तो दर्जनों शातीर अपराधियों को राजनीति मे लाकर सांसद और विधायक बनाने का महान कार्य भी किया ।नेता जी खुद भ्रष्टाचारी है तो भला अन्ना का साथ क्यों देते । सरकार की सर्वदलीय बैठक में नेता जी सरकार के साथ दिखे । समाज पार्टी को भी आप किसी बटमार पार्टी या किसी गिरोह से कम नही ंकह सकते ।

आइए आपको ले चलते हैं दक्षिण भारत की ओर । आंध्रा से केरल तक के चार राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों ने जिस तरह की राजनीति जनता के सामने पेश की है, उसे देखकर जनता हतप्रभ है। कांगे्रस की राजनीति से तंग आकर एनटी रामा राव ने तेलगू देशम पार्टी की स्थापना की और राज्य में नई सरकार ला कर कांग्रेस को भारी चुनौती दी थी। रामा राव नहीं रहे लेकिन उनकी विरासत अभी भी जारी है। उनका दामाद एन चंद्रबाबू नायडू पिछले कई सालों से टीडीपी को हांक रहे हैं। एमए पास नायडू मूलतः राजनीति करते दिखते हैं लेकिन ये अभी 68 करोड़ के मालिक बताए जाते हैं। कई दफा राज्य की बागडोर संभाले नायडू अभी भले ही विपक्ष की भूमिका में हैं लेकिन जोड़ तोड़ में इनका लालू प्रसाद जैसा ही दिमाग चलता है। अपने शासन काल में हैदराबाद को साईबराबाद का दर्जा देने वाले नायडू की पोल तब खुल गई थी जब आंध्रा में गरीबी और बेकारी की उसी मीडिया ने पोल खोली थी जिसे विज्ञापन दे दे कर आंध्रा को सबसे विकसित प्रदेश बनाने का खेल खेला था। राज्य से लेकर केंद्र की राजनीति में टीडीपी की भूमिका हमेशा रही है लेकिन राज्य में अब चुद्रबाबू नायडू का जलवा खत्म सा हो गया है। जगन रेड्डी और प्रजा राज्यम जैसी पार्टी के आने के बाद टीडीपी कमजोर हुई है और अब किसी बटमार पार्टी से कम नहीं रह गई है। नायडू पर भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं और कई आपराधिक मामलों में आरोपित भी । नायडू पर धारा 126,,500 और 501 के मामले चल रहे हैं। नायडू हमेशा मौके की तलाश में रहते हैं और राजनीतिक बटमारी करने में इनकी पार्टी हमेशा ही आगे रही है । यह टीडीपी का ही दंश है कि गरीबी और शोषण से तंग आकर आज राज्य का तेलंगाना इलाका जल रहा र्है। आंध्रा में प्रजा राज्यम और और जगन रेड्डी का गुट बटमार दलों की सूची में नए नाम हैं लेकिन इतना तय मानिए कि इन बटमार पार्टियों की वजह से ही आंध्रा पिछडता गया हैं ।

दक्षिण की सिने सुंदरी और तामिलनाडू में अन्नाद्रमुक की मुखिया जे जयललिता के माया जाल को आप जानते ही होगें। और नहीं जानते हैं तो आइए इस मोहतरमा से आपका परिचय कराते हैं । दक्षिण भारतीय फिल्मों के अलावा कई हिन्दी फिल्मों में नायिका क्ी भूमिका निभाने वाली जयललिता को राजनीति में लाने का श्रेय तामिलनाडू के दिग्गज फिल्म नायक और नेता एम जी रामचंद्रन को जाता है। साफ शब्दों में कहें तो अन्नाद्रमुक की राजनीति जयललिता को एमजी रामचंद्रन से विरासत में मिली है। जयललिता के पूरे माया जाल पर बात करने से पहले हम आपको बता दें कि तामिलनाडू की राजनीति शुरू से ही क्षेत्रीय दलों के बीच झुलती रही है। करूणानिधि की द्रमुक और जयललिता की अन्नाद्रमुक के बीच बंटी सूबे की जनता राष्टीय दलों को हमेशा मुंह चिढाती रही है । एक तरफ करूणानिधि का ब्यक्तित्व और दूसरी तरफ जयललिता का मोहफांस । सूबे की जनता इन दोनों से आगे कुछ देखती ही नहीं हैं । इस चुनाव में भी यही हुआ। भ्रष्टाचार में फंसे द्रमुक के केंद्रीय मंत्री और उसके भ्रष्ट नेताओं के कारण इस बार करूणानिधि गद्दी पर नहीं बैठ पाए। दांव जयललिता की चली । प्रदेश की जनता के सामने दो गिरोह और उसके सरगना में से एक को चुनना था, जनता ने इस बार जयललिता को सूबे की कुर्सी सौंप दी । कभी एनडीए की घटक रही अन्नाद्रमुक आज कल यूपीए से नाता जोड़ने के फिराक में है। इसके पीछे जयललिता की कोई सामाजिक सोंच नहीं है । खेल के पीछे की राजनीति चोरी,लूट और भ्रष्टाचार के मामलों से अपने को बचाना है। 10 वी पास जयललिता चुनाव आयोग की फाईल में 51 करोड़ की मालकीन है और धारा 120बी,499,500, 501,109,415,447,469,और 471 के तहत आरोपी भी । इसके अलावो भ्रष्टाचार के कई मामले मोहतरमा के उपर दर्ज है। मीडिया को अपनी मुट्ठी में रखने वाली जयललिता द्रमुक राजनीति की ऐसी धुरी है जिसके माइनस हो जाने से केंद्र की राजनीति भी डगमगा जाती है। बटमार पार्टियों में सबसे आगे अन्नाद्रमुक की सोंच आज तक तामिलनाडू से आगे की नही हो पायी। जयललिता को देश महिला प्रधानमंत्री के उम्मीदवार तौर पर भी देखता रहा है। तय मानिए अगर ऐसा कुछ होता है तो तामिलनाडू की राजनीति की नई शुरूआत होगी।

और अंत में आपका परिचय क्षेत्रीय दलों के एक ऐसे नायक से कराते हैं जिसे राजनीति का चाणक्य भी कहा जाता हैं । 10 वीं पास 87 वर्षीय कें करूणानिधि तमिल राजनीति के सलाका पुरूष माने जाते हैं । आधा दर्जन से ज्यादा बार तामिलनाडू की गद्दी पर बैठे करूणानिधि इस बार के चुनाव में सीधे चित हो गए। ती पत्नियों से हुई संतानों के बीच की राजनीति के साथ ही केंद्र सरकार में उनकी पार्टी के नेताओं ने जिस तरह से देश को लूटने का काम किया, द्रमुक को सड़क पर ला दिया । पार्टी के दलित नेता ए राजा तो जेल गए ही,बेटी कनिमोझी के जेल जाने का दंश करूणानिधि झेल नहीं पा रहे हैं। राजनीतिक समीक्षक अभी इस बात को साफ नहीं कर पाए है कि द्रमुक के सुफरा साफ के पीछे का कारण करूणानिधि के परिवार का अंतर्कलह रहा या फिर 2 जी घेटाला। केंद्र की राजनीति में अक्सर उपद्रव पैदा करने वाले करूणानिधि हमेशा मौका की तलाश में रहते आए हैं । संसद के अगले मानसून सत्र में भी करूणानिधि क्या गुल खिलाऐंगे अभी कुछ भी कहना मुश्किल है । इस बार के विधान सभा चुनाव के दौरान दक्षिण के इस नेता ने सरकार को अपनी आय की जानकारी जो सरकार को दी है उसके मुताबिक करूणानिधि 44 करोड़ के मालिक हैं। इनको धारा 298, 153ए, के अलावा 505 के तहत आरोपित किया गया है । श्रीलंका के एलटीटी का विरोध करने वाली केंद्र सरकार के विपरित करूणानिधि एलटीटी के समर्थक रहे हैं। और अभी यूपीए के घटक भी। आप ही तय करेंगे कि कौन सी पार्टी राष्टीय एकता और अखंडता की राजनीति कर रही है और कौन सी पार्टी राहजनी ।



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