Monday, September 5, 2011

ये हैं दुनिया के सत्याग्रही

अखिलेश अखिल

भ्रष्टाचार के विरोध में सत्याग्रह के जरिए सरकार की नाक में दम कर देने वाले अन्ना हजारे पर सरकार और सरकार के लोग आज उसी तरह से हमला करते दिख रहे हैंए जिस तरह सितंबर 1906 में महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका में विरोध का सामना करना पड़ा था। गांधी जी ने उसी दक्षिण अफ्रीका में सबसे पहले अपने सत्याग्रह का प्रयोग रंग.भेद कानून के विरोध में किया था। विदेशी धरती पर गांधी का यह न सिर्फ पहला अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रयोग थाए बल्कि अपने आप में अजूबा भी। गांधी को बिना किसी खून.खराबे के जीत मिली और काले लोगों को कानूनी प्रक्रिया में न्याय।


गांधी के इस अहिंसक प्रयोग से उन्हें खुद को तो बल मिला हीए दुनिया को भी एक सीख मिली। वह यह कि शांति और अहिंसा के जरिए भी क्रांति की जा सकती है और सरकार और हुक़ूमत को झुकाया जा सकता है। गांधी ने अपने इस सत्याग्रही अस्त्र का दूसरा प्रयोग अपने देश की धरती बिहार के चंपारण में 1917 में किया। अंग्रेजों के चंगुल में सालों से फंसे नील किसानों को गांधी ने अंग्रेजी कानून से आजाद कराया और अंग्रेजों को अपने कानून में संशोधन करना पड़ा। फिर 1918 में गुजरात के खेड़ा में गांधी ने अपने इस अस्त्र का प्रयोग किया और सफल रहे। सत्य और अहिंसा पर आधारित गांधी के इन आंदोलनों ने दुनिया पर शासन करने वाली कई हुक़ूमतों की चूलें हिला दीं।


फिर तो गांधी के नेतृत्व में चली आजादी की हर लड़ाई सत्याग्रह पर ही टिक गई। बाद मेंए लोहिया ने गांधी के इस अस्त्र को मानवता के लिए सबसे बड़ा उपहार माना और कहा कि जो लोग सत्य और अहिंसा पर आधारित लड़ाई लड़ते हैंए उनकी जीत निश्चित होती है। गांधी ने अपने इस सत्याग्रह के बारे में कहा है कि सत्याग्रह का दर्शन हैए व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर संघर्ष करना। इससे एक तरफ चरित्र का निर्माण होता हैए तो दूसरी तरफ राष्ट्र का। हालांकि भारतीय दर्शन में सत्य और अहिंसा की चर्चा जैन और बौद्ध धर्म में ईसा से छह सौ साल पहले ही की गई हैए लेकिन आधुनिक भारत में इसका सफल प्रयोग करने का श्रेय गांधी को ही जाता है। भारत में आजादी की लड़ाई के दौरान सत्याग्रह का प्रयोग कई और लोगों ने किया और सफलता भी पायी। इन्हीं में से एक हैंए खान अब्दुल गफ्फार खान। इन्हें सीमांत गांधी भी कहते हैं। गांधी के सहयोगी रहे खानए गांधी दर्शन के तो कायल थे हीए महिला अधिकार और अहिंसा के भी कट्टर समर्थक थे।


आजादी के बाद खान कई सालों तक पाकिस्तान के जेलों में बंद रहेए लेकिन उन्होंने कभी भी सत्य और अहिंसा को नहीं त्यागा। सरकार हर बार उनके सामने झुकती रही। यह सत्याग्रह ही था कि बाबा साहेब अंबेडकर दलितों को उनका अधिकार दिलाने में सफल रहे। महाराष्ट्र के महाद और धरम में दलितों को सार्वजनिक जगहों से पानी भरने की मनाही थी। इसके विरोध में अंबेडकर ने 19 मार्च 1927 को पांच हजार लोगों के साथ सत्याग्रह किया और सरकार को झुकना पड़ा। इस जीत के बाद दलितों में आशा की एक नई किरण जागी और सत्याग्रह के प्रति विश्वास दृढ़ हुआ। फिर क्या था। अंबेडकर ने छुआछूत के विरोध में सत्याग्रह किया। लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार बंबई हाईकोर्ट ने 17 मार्च 1936 को दलितों के समर्थन में अपना फैसला सुनाया। यह दलितों के लिए एक ऐतिहासिक और नैतिक जीत थी। डॉण् राममनोहर लोहिया को गांधी के सत्याग्रह में पूरा विश्वास था। उन्होंने गरीबोंए महिलाओंए दलितों और अल्पसंख्यकों की लंबी लड़ाई लड़ी। लोहिया इसके लिए 60 फीसदी आरक्षण की बात करते थे। वे धर्म के आधार पर देश के बंटवारे के भी खिलाफ थे और इसके लिए हमेशा सत्याग्रह भी करते रहे। सत्याग्रह पर लोहिया का मानना था कि अगर सत्याग्रह में निर्माण की बात नहीं हैए तो वह ठीक उसी तरह जिस तरह है किसी वाक्य में क्रिया नहीं होती।


गांधी के सत्याग्रह के सच्चे पुजारी लोक नायक जयप्रकाश भी थे। हालांकि जयप्रकाश सर्वोदय के पक्षकार थेए लेकिन इसकी लड़ाई सत्याग्रह के जरिए लड़ना चाहते थे। 1974 के आंदोलन की सफलता के पीछे भी वही सत्याग्रह है। इसके बाद 1977 में पूर्व प्रधानमंत्री स्वण् इंदिरा गांधी की सरकार चली गई और जनता पार्टी की सरकार बनी। यह बात अलग है कि संपूर्ण क्रांति की यह लड़ाई अधूरी रह गई और जेपी के लोग बेईमान साबित हुएए लेकिन 1977 के सत्ता परिवर्तन के मूल में सत्याग्रह ही था। बिनोवा भावे को आप कैसे भूल सकते हैंघ् सर्वोदय और भूदान आंदोलन के प्रणेता बिनोवा गांधी दर्शन के कायल थे। सत्य और अहिंसा में कितना दम हैए इसका कई दफा बिनोवा ने उदाहरण पेश किया था।



1956 में गांधीवादी नेता जेपी के भाषण से प्रभावित होकर चंडी प्रसाद भट्ट ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर उत्तराखंड के गांवों में सत्याग्रह करके शराब माफियाओं की चंगुल से लोगों को आजाद कराने में सफलता पाई थी। इस सफलता से प्रेरित होकर एक बार फिर चंडी प्रसाद भट्ट और गौरी देवी ने पहाड़ और मजदूरों को लूटते भू.माफियाओं और ठेकेदारों से लोगों की हिफाजत की थी। सरकार को भी इस आंदोलन के सामने झुकना पड़ा था। कुछ सालों में मजदूरोंए शोषितोंए दलितोंए महिलाओंए विस्थापितों और आदिवासियों के लिए अहिंसक लड़ाई लड़ने वालों में मेधा पाटेकर और सुंदरलाल बहुगुणा सबसे आगे हैं।


गांधी के सत्याग्रह की धूम केवल अपने देश में ही नहीं रहीए विदेशों मे भी सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का वरण कर दर्जनों महान विभूतियां ने अपने देश में क्रांति लाने में सफल रहे। अमेरिका में जूनियर मार्टिन लुथर किंग ने सत्याग्रह के दम पर ही रंग.भेद के विरोध में लड़ाई लड़ी और सफल भी हुए। काले लोगों के समर्थन में मार्टिन की अहिंसक लड़ाई गांधी जी की जीत के रूप में ही देखा जा रहा है। तिब्बत के निर्वासित धर्मगुरू दलाई लामा आज भी गांधी की राह पर चल रहे हैं और सत्याग्रह के दम पर तिब्बत को आजाद कराने में लगे हुए हैं। नेल्सन मंडेला को भला कौन नहीं जानताघ् दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति मंडेला का आदर्श ही गांधी दर्शन है। सत्य और अहिंसा के दम पर मंडेला द्वारा अपने देश की आजादी के लिए लड़ी गई लड़ाई सत्याग्रह का एक ऐतिहासिक साक्ष्य है।


उधरए खूनी इतिहास और अधिनायकवाद से त्रस्त इंडोनेशिया में भी गांधी के दर्शनए सत्य और अहिंसा का सफल प्रयोग हुआ और लोगों को सफलता भी मिली। सुलूक शिवरक्षा ने गांधी के सत्याग्रह को अपनाकर इंडोनेशिया और वहां के लोगों को शांति का जो पाठ पढ़ायाए वह भी ऐतिहासिक है। पड़ोसी देश म्यांमार की महान सत्याग्रही आंग.सान.सू.की के आंदोलन को भला आप कैसे भूल सकते हैंघ् तानाशाही सरकार के विरोध में सालों तक अहिंसक लड़ाई लड़ने वाली सू.की ने आखिर में तानाशाही सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। यह गांधी दर्शन का सबसे नवीनतम उदाहरण है। इरान में भी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कई अहिंसक आंदोलन हुए और इसके प्रणेता सफल भी हुए। सिरिन इबादी बच्चों और महिलाओं के मानवीय अधिकार को लेकर लंबी लड़ाई सरकार से लड़ी और सफल रही।


सिरिन ने कहा कि मानव सभ्यता में कोई भी समाज तब तक सभ्य नहीं कहला सकताए जब तक महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा नहीं होती। अभी कुछ साल पहले ही नेपाल में गांधी के सत्य और अहिंसा के दर्शन के उदाहरण देखने को मिले हैं। 2006 में नेपाल की घटना को देख कर दुनिया भी सन्न रह गई। राजशाही के विरोध में विश्वनाथ प्रताप कोईराला के नेतृत्व में जनता का अहिंसक आंदोलन इतना तीव्र हुआ कि आखिर में राजतंत्र का खात्मा करना पड़ा। जनता के इस शांति और अहिंसक प्रदर्शन के सामने राजतंत्र को झुकना पड़ा। माओवादी जो बंदूक के दम पर सत्ता हथियाने की बात कर रहे थेए वह भी इस आंदोलन के सुर में सुर मिला लिए। नेपाल को मिले लोकतंत्र को गांधी के सत्याग्रह की जीत के रूप में आप याद कर सकते हैं।


जपान में दूसरे विश्व युद्ध में तबाह हो गयाए लेकिन जापानियों ने हिम्मत नहीं हारी। जापान के डॉण् दाईसेकु इकेडा ने गांधी दर्शन को अपनाया और दुनिया से सत्य और अहिंसा पर चलने की अपील की। इसी अपील की वजह से दुनिया के कई देश जहां लड़ाई.झगडे“ में लगे रहेए जापान शांति से अपना विकास करता रहा। आज भी जापान गांधी के दर्शन पर चल रहा है और इकेडा के आंदोलन को आगे बढ़ा रहा है। श्रीलंका में एटी अरियारत्ने ने गांधी के सत्याग्रह को अपनाकर गांव और समाज के लिए कई कानूनों को बनवाने में सफलता पाई। सर्वोदय को जीवन का मूलमंत्र मानने वाले अरियारत्ने श्रीलंका के गांधी कहे जाते हैं। कम्युनिस्ट देश पोलैंड में भी गांधी के दर्शन का बखूबी प्रयोग हो चुका है। पोलैंड में 1980 का अहिंसक आंदोलन रोटी और स्वतंत्रता की मांग को लेकर हुआ और वह भी अहिंसक तरीके से। वालेसा की यह लड़ाई सालों तक चलती रहीए लेकिन कही हिंसा नहीं हुई। बाद में वालेसा वहां की प्रसीडेंट भी बनी। इसके अलावाए जर्मनीए फलस्तीनए चेकोस्लोवाकिया और ग्वाटेमाला में गांधी के दर्शन का सफलता पूर्वक प्रयोग हो रहा है और इससे जनता के कई अधिकारों की रक्षा की गई।



कांग्रेस और भाजपा में गुप्त समझौता रू रामचंद्र

वरिष्ठ गांधीवादी चिंतक और गांधी स्मारक निधि के सचिव रामचंद्र राही गांधी दर्शन के हिमायती हैं। उनका मानना है कि आज विकास का मॉडल राजनीतिक हिंसा और लूट पर टिका है। इसे खत्म किए बगैर जनता का विकास नहीं हो सकता। अन्ना के सत्याग्रह से राही अभिभूत हैं और इसे वे जेपी आंदोलन का अगला पड़ाव मान रहे हैं। राही से


अखिलेश अखिल ने गांधी दर्शन से लेकर अन्ना के सत्याग्रह पर बातचीत की। पेश है बातचीत

के अंश़.


सत्य और अहिंसा पर टिके रहकर सत्यपूर्ण आग्रह करना ही सत्याग्रह है। गांधी जी के सत्याग्रह के सिद्धांत को अंगीकार कर दुनिया के कई सुधारवादी नेताओं ने सफलता हासिल की। अन्ना भी उन्हीं के मार्गों का अनुसरण कर देश में समूल परिवर्तन करना चाहते हैं।


सत्याग्रह क्या हैघ्

अन्याय के खिलाफ अहिंसा और शांतिपूर्ण तरीके से भौतिक बल के इस्तेमाल की जगह आत्मशक्ति का इस्तेमाल करते हुए सत्यपूर्ण आग्रह करना ही सत्याग्रह है। दूसरे शब्दों मेंए अन्याय के मुकाबले आत्मशक्ति के बल पर जो लोकशक्ति मानवीय चेतना को जगाने का काम करती हैए वही सत्याग्रह है। इसकी बुनियाद सत्य पर आधारित होती है। सत्य पर आरूढ़ रहते हुए उसका आग्रह रखना ही सत्याग्रह की भूमिका है।


गांधी ने सत्याग्रह का पहला प्रयोग कब किया थाघ्

दक्षिण अफ्रीका में 1906 में। वह अन्याय के विरोध में एक कूच था। इस प्रयोग में गांधी सफल हुए थे। अन्याय तभी तक चलता हैए जब तक लोग उसे सहते हैं। इसके लिए सविनय प्रतिरोध करके प्रतिक्रिया की जाए और उसे बिना हिंसक प्रतिक्रिया के बर्दाश्त कर लेए यही सत्याग्रह का मूल मंत्र है। गांधी इस पर खरे उतरे हैं। गांधी के इन्हीं प्रयोगों को दुनिया के कई महान नेताओं ने अंगीकार किया। उनके मार्गों पर चलते हुए उन्होंने अपने देश में जनता की लड़ाइयां लड़ीं और वे सफल हुए।


गांधी और अन्ना के सत्याग्रह में कोई अंतर आप देख रहे हैंघ्

किसी महापुरुष से किसी की तुलना करना ठीक नहीं। सबकी अपनी सीमाएं और अहमियत है। गांधी के प्रयोगों को लोग स्वीकार कर उसे आगे बढ़ा रहे हैं। उनमें अन्ना भी हैंं। जो लोग मुद्दा को अपने से आगे रखते हैंए वही महान होते हैं।


अन्ना भी ऐसे ही हैं। गांधी ने कहा था कि सत्याग्रह एक प्रतिशोधात्मक प्रतिक्रिया नहीं हैए बल्कि एक विधायक शक्ति है। अन्ना इसमें सफल हैं। सही सत्याग्रही वही हैए जो अपने कार्यक्षेत्र में रचनात्मक काम और जनता से सीधा आंतरिक संवाद करता है।


सरकार कह रही है कि अन्ना संसदीय प्रणाली को चुनौती दे रहे हैं घ्

समाज की बुराइयों को हटाना और सहकारिता को बढ़ाना रचनात्मक काम है। अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले भला संसदीय व्यवस्था को चुनौती कैसे दे सकते हैंघ् उन्होंने अहिंसा पर आधारित आंदोलन चलाया है और फिर लोकहित की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें सरकार को परेशानी क्या हैघ् क्या सरकार के लोग मान रहे हैं कि देश में वे जो भी कर रहे हैंए सब ठीक हैघ् यदि सब ठीक हैए तो जनता बार.बार क्यों ठगी जा रही हैघ् नेताओं और ठेकेदारों के पास इतना पैसा कहां से आ रहा हैघ् जिन लोगों का विकास होना चाहिएए उनका क्या हुआघ् अगर नहीं हुआए तो जनता के पास अस्त्र क्या हैघ् संसद जनता के लिए हैए न कि जनता संसद के लिए।


अन्ना के आंदोलन में विपक्ष की भूमिका को आप किस रूप में देख रहे हैंघ्

यहां तो विपक्ष है ही नहीं। जो काम आज अन्ना कर रहे हैंए वह विपक्ष का काम है। घटिया राजनीति के कारण विपक्ष और पक्ष ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। अन्ना ने अगर सेना की नौकरी छोड़कर सालों तक अपने गांव व इलाकों में जो काम किया हैए वही काम आज उन्होंने आगे बढ़ाया है। उनकी विश्वसनीयता कायम है। इतना तय मानिएए इसे 74 के आंदोलन का अगला पड़ाव आप कह सकते हैं।


कोई राजनीतिक विकल्पघ्

क्रांति परिवर्तन का नाम है। 1974 के आंदोलन के बाद 77 में एक विकल्प सामने आया था। फिर कोई नई रोशनी सामने आ जाएए लेकिन आज सत्ता के जितनी दावेदार पार्टी हैंए सब दागदार हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। सब पैसेए बाहुबली और जात.पात की राजनीति कर रहे हैं।


किसी के पास राष्ट्रीय सोच नहीं। देखिएए अन्ना के इस आंदोलन की दो संभावनाएं हैं। एक तो संपूर्ण क्रांति के बाद जो ठहराव आ गया थाए उसमें गति मिलेगी। देश की अंतरूचेतना जागी हैए अन्ना की अपील पर। इससे लोकतंत्र और मजबूत होगा। भ्रष्टाचारी निराश होंगे। दूसराए यह आंदोलन कांग्रेस समेत सभी पार्टियों को कमजोर कर देगा। कितनी दुखद स्थिति है कि प्रधानमंत्री ने कहा है कि विपक्ष के बहुत सारे राज उनके पास हैं। जवाब में सुषमा ने कहा है कि पीएम तीर चलाएंए उसके पास भी तीर हैं। आप इसी से जान सकते हैं कि दोनों पार्टियां देश और समाज के लिए कितनी गंभीर हैं। असल मेंए दोनों भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हैं। भ्रष्टाचार पर दोनों पार्टियों में गुप्त समझौता है।

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