Monday, September 5, 2011

आयरन लेडी आफ मणिपुर

अखिलेश अखिल

नाम इरोन चानु शर्मिला। काम कविता लिखना और गांधीवाद को अपनाते हुए मानवाधिकार की लड़ाई लड़ना। जगह मणिपुर, देश में सेवेन सिस्टिर के नाम से मशहूर पूर्वोत्तर राज्यों का एक हिस्सा। आज इरोम 39 साल की हो गई है। गांधीवादी तरीके से वह आर्मी जवानों को शक के आधार पर किसी को मारने के अधिकार वाले कानून का विरोध कर रही है । उसका यह आंदोलन सत्याग्रह और भूख हउ़ताल के जरिए पिछले 11 सालों से जारी है। इरोम इसे मानवाधिकार की लउ़ाई कहती है। 20 नवंबर 2000 से वह लगातार शांतिपूर्ण तरीके से भूख हउ़ताल पर है और पुलिस हिरासत में भी। पुलिस उसकी जान बचाने के लिए नाक से पाईप के जरिए तरल भोजन पहुचाती हैं। और जब इरोम हिरासत से निकलती है और फिर भूख हड़ताल पर बैठ जाती है। इरोम के नाम दो विश्व रिकार्ड भी है।सबसे अधिक दिनों तक भूख हड़ताल करने का रिर्काउ और सबसे ज्यादा जेल जाकर रिहा होने का रिकार्ड। यही वजह है कि इरोम को मणिपुर का आयरन लेडी कहा जाता है। साधारन परिवार में जन्मीं इरोन के पिता राज्य के वेटनरी विभाग में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी हैं और बड़ी मुश्किल से परिवार का भरन पोषण करते रहे हैं। इरोम की इमानदारी,जज्बा,संघर्ष,त्याग और सत्य और अहिंसा के साथ आंदोलन करने की वजह से ही 2005 में राज्य की एक महिला मानवाधिकार संस्था ने इरोन का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए भेजा था। इरोम का साथ देने वालों की कमी नहीं है। इरोम का संगठन जस्ट पीस फांउडेशन से हजारों लोग जुड़े हैं जो लगातार अपनी आवाज दिल्ली सरकार को सुनाते रहते हैं। उनकी एक अदद मांग होती है उस एएफएसपीए कानून का खात्मा जिसकी वजह से हर साल न जाने कितने बेगुनाहों की मौत होती है,कितनी मां बहनों की इज्जत लूट ली जाती है और न जाने इस कानून के डर से कितने लोग अपना घर वार छोउ़कर भाग गए हैं? लेकिन दिल्ली इस आवाज को नहीं सुनती। अन्ना के आंदोलन का भी इरोम के संगठन ने समर्थन किया था लेकिन अन्ना अभी तक इरोम के समर्थन में नहीं उतरे हैं। हालाकि अन्ना ने इरोम से मिलने का वादा किया है और उस कानून के विरोध में आवाज उठाने की बात भी कही है । इधर इरोम के भूख हउ़ताल और मानवाधिकार को लेकर उठ रही जनता की आवाज को देखते हुए गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि ‘सरकार इस कानून को दोबारा चर्चा में लाने की कोशिश कर रही है। इस कानून में संशोधन से पहले सरकार के भीतर आम सहमति की जरूरत होती है और हम इसमें लगे हुए हैं। ’सरकार का फैसला क्या होगा कहना मुश्किल है लेकिन इरोम ने फैसला कर रखा है कि उसका आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक इस कानून को हटा नहीं लिया जाता ।


साल 2000 में इरोम शर्मिला की उम्र 28 साल की थी । बस स्टैंड पर खड़ी इरोम कहीं जाने के लिए बस का इंतजार कर रही थी कि अचानक अर्द्धसैनिक बलों के जवानों ने देखते ही देखते तरा तर गोलियां चलाकर 10 लोगों की हत्या कर दी। इरोम को पहले तो लगा कि किसी फिल्म की शूटिंग चल रही हैं और गोली लगने से गिरने वाले लोग मरने का नाटक कर रहे हैं। लेकिन चीख -पुकार और भगदड़ के बीच इरोम की नजर जब बहते खून और छटपटाते लोगों पर पड़ी तो उसके होस उड़ गए। उसके आंखों के सामने अंधेरा छा गया। मरने वाले कौन थे और क्यों चली गोलियां यह सवाल इरोम के जेहन में समा गया । इरोम को पता चला कि राज्य में जो एएफएसपीए कानून लागू है उसी के तहत ये गोलियां चलाई गई है और गोली चलाने वाले सैनिकों पर इसके लिए कोई कार्रवाई भी नहीं हो सकती। यह कानून जवानों को शक के आधार पर किसी को मारने का अधिकार देता है । इस एएफएसपीए कानून की यही विशेषता है और यही विवसता भी। उग्रवाद से हलाकान मणिपुर में उग्रवादियों पर नकेल कसने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जाता हैं। लेकिन निर्दोष की मौत कहां का न्याय है? इरोम की आत्मा विद्रोह कर गयी।इस गोली कांड की वह चश्मदीद गवाह थी।


दरअसल पूर्वोत्तर में फैले उग्रवाद को दबाने के लिए केंद्र सरकार ने संसद में 1 सितंबर 1958 को पूर्वोत्तर के सात राज्यों में सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार देने के लिए यह कानून पारित किया था। इस कानून को लेकर तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के बीच बाद विवाद के अलावा कई पत्राचार भी हुए थे। लेकिन पूर्वोत्तर के हालात को देखते हुए इसे लागू करने पर सहमती बनी थी । तब से यह कानून मणिपुर समेत पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में लागू है। हालाकि इस कानून के तहत ही आज पूर्वोत्र के हालात थोड़े सुधरे दिखाई पर रहे हैं लेकिन यह भी सही है कि इस कानून की आउ़ में कई निर्दोष लोगों की हत्या भी हुई है । इस कानून के विरोध में संयुक्त राअ् संघ में भी आवाज उठाई गयी, संसद से लेकर सरकार के सामने कई दफा जनता की आवाजें बुलंद हुई लेकिन अभी तक लोगों को इस कानून से निजात नहीं मिली है।

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