Saturday, October 29, 2011

तिकड़मी संतों की दुनिया



अखिलेश अखिल

अभी हाल में ही उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के प्रसिद्ध देवी पाटन मंदिर के महंत को संपत्ति विवाद को लेकर अपनी गद्दी गवांनी पड़ी है। यह मंदिर गोरखनाथ संप्रदाय से जुड़ा है और अकुत संपत्ति वाली मंदिर के रूप में जाना जाता है। ऐसा नही है कि देवी पाटन मंदिर के महंत को पहली बार संपत्ति विवाद के लिए चलता किया गया है। देश की मंदिरों और संत साधुओं की कहानी पर नजर डालें तो कई चैंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। आइए हम आपको ले चलते हैं संतों की नगरी अयोद्या जहां संपत्ति विवाद को लेकर न जाने कितनी जाने चली गई है और न जाने कितने लोगों पर चोरी, डकैती से लेकर हत्या तक के मामले दर्ज हैं। आइए जानते हैं देश के कुछ इलाकों की मंदिरों और साधु संतों की तस्वीरें .....
धनलोलुप समाज में बाजार का जो अर्थशास्त्र व तिल तिकड़म काम करता है, उसमें भारत के ज्यादातर मठ मंदिर आकंठ उूबे हैं। जिस साधु समाज को हम सिर आंखों पर बिठाते नहीं थकते उसकी हकीकत जानकर आप दंग हो सकते हैं। भारत साधु संतों की भूमि रही है और साधु संत समाज आज भी हमारी संस्कृति के अंग हैं। लेकिन जिस तरह से समाज में गिरावट आई है, साधु संतों की सोंच में भी बदलाव आए हैं । मठ मंदिर जो कभी आस्था और सच्चाई के प्रतीक माने जाते थे , अब वहां सच्चाई की जगह पर नंगई और मानव कल्याण व धर्म प्रचार की जगह लूट खसोट और प्रपंच के केंद्र बनते दिख रहे हैं। उत्तरप्रदेश में बड़े मठों की संख्या लगभग आठ हजार के बीच है और इसमें 90 फीसदी मठ सिर्फ अयोद्या में है। लेकिन अयोद्या के 50 फीसदी मठ भारी संपतित विवाद में हैं । संपत्ति को लेकर होने वाले इस विवाद में न जाने कितनी जाने गई है।अयोद्या स्थित बावरी छावनी,हनुमान गढी,बारी स्थान, मणिराम छावनी,लक्ष्मण किला, चुरबुजी स्थान, जानकी घाट और हरिधाम पीठ में संपत्ति को लेकर सालों से तनातनी चल रही है।इन मठों की संपत्ति करोड़ों की है और इनकी शाखाएं बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश तक फैली हुई है।
हनुमान गढी के दो महंथ हैं ज्ञानदास और रामदास। ज्ञानदास उत्तरप्रदेश के हैं और सगरिया पटटी से उनका संबंध है। रामदास बिहार से आते हैंऔर उज्जैनिया पटटी से जुड़े हुए हैं। इसी हनुमानगढी में दो अन्य महंतों मुरारी दास हरिद्वारी पटटी और रामचरण दास बसंतिया पटटी सें संबंध रखते हैं। गढी में कोई 600 से ज्यादा नागा हैं जो चार महंतों के बीच बंटे हुए हैं। लेकिन बर्चस्व की सबसे ज्यादा लड़ाई ज्ञानदास और रामदास के बीच है। ये दोनो अपने को पाक साफ लेकिन दूसरे को अपराधी मानते हैं। थानों में इन दोनेा के खिलाफ कई मामले दर्ज हैं जो सालों से चल रहे हैं। इन दोनेा के पास लाइसेंसी हथियार भी है और आरोप है कि ये एक दूसरे पर हमला करते हैं और करवाते हैं।
फैजाबाद के मठों का आपराधिकरण 1960 में ही शुरू हुआ था, जब उज्जैनिया पटटी के महंत त्रिभुवन दास ने सबसे पहले अपराधियों को हनुमान गढी में शरण दी थी ।गढी में शरण लेने वाले तीन अपराधी ऐसे थे जिनके उपर हत्या के आठ मामले चल रहे थे। फैजाबाद में ही बिहार के एक अन्य महंत थे उपेंद्र दास। बेगूसराय के रहने वाले इस महंत ने पहले एक मठ पर कब्जा किया और बाद में अपराधियों को बुलाकर अयोद्या के सारे महंतो को चुनौति दे डाली। बाद में वह पकडा भी गया , लेकिन उसका मठ आज भी चल रहा है। हजारों का चढावा आज वहां चढता है।
अयोद्या पुलिस रिकार्ड में दर्ज ्र मामलों की तहकीकात करने पर पता चलता है कि कुछ साल पूर्व 170 से ज्यादा साधु संत संपत्ति विवाद में मारे गए हैं जबकि सैकड़ों घायल हुए हैं। पुलिस का मानना है कि यहां के मठों पर सबसे ज्यादा कब्जा बिहार और पूर्वी यूपी के लोगों का है , जो अपराधियों के सहयोंग से विवादित भूमि पर जबरन मठ बनाते हैं और मठों की आर में गलत काम करते हैं। 17 जनवरी 1997 को राज्य पुलिस ने फैजाबाद में तीन महंतों सुदामा दास, लक्ष्मण दास और बजरंग दास को उस समय गिरफ्ता किया जब ये तीनो हथियारों की स्मगलिंग कर रहे थे। इनके पास से भारी मात्रा में अमेरिकी राइफल,पिस्तौल और गोलियां बरामद हुई थी। पूछताछ में पता चला था कि ये तीनो पिछले 6 साल से हथियार तस्करी कर रहे थे। इन संतों ने यह भी खुलासा किया था कि अयोद्या के कई और महंत गलत कामों में लिप्त हैं और उन्हे राजनीतिक संरखण भी प्राप्त है।
जनकी घाट सालों से विवाद में हैं। इस मठ को अपने कबजे में लेने के लिए तीन महंतों के बीच सालों से संधर्ष जारी है।यहां हजारों रूप्ए हर रोज का चढावा आता है और सैकरों एकड़ जमीन इस मठ के पास है। इसी मठ के महंत ने कहा था कि उन्हें धर्म से कोई मतलब नहंी है, उन्हे ताकतवर बनना है और ताकतवर बनने के लिए गोलियां तो चलानी ही होगी । अयोद्या में कोई 40 हजार साधु संन्यासी और महंत हैं। इनमें 60 फीसदी महंत अकेले बिहार के हैं और 25 से 30 हजार साधु बिहार की किसी एक खास जाति के हैं। स्थानीय खबरों के मुताबिक पिछले एक दशक में 40 से ज्यादा नए मठ उग आए हैं और इन्हें तैयार करने में कानून की धज्जियां उड़ाई गई है।
देश की आम जनता की आस्था भले ही साधु संतों में हो , लेकिन साधु संतों की आस्था जन कल्याण,इश्वर भक्ति,और समाज सुधार में अब कतई नहीं हैं। वे अपना प्रभामंडल बढाने या अपनी संपत्ति बचाने के लिए तरह तरह के हथकंडे इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके लिए वे जातिगत या पार्टीगत महंत की भूमिका में भी नजर आते हैं। यही वजह है कि हनुमान गढी के महंत रामदास भाजपा के लिए काम करते हैं तो उनके विरोधी ज्ञानदास सपा के लिए।
असम के कामरूप कामाख्या मंदिर परिसर में भी संत महंतों की बड़ी तादाद है। लगभग आठ हजार साधु संत इस मंदिर के जरिए अपना परिवार चलाते हैं। साल 2001 में दो संतो ंके बीच लड़ाइ्र हुई,दोनों घायल हो गए। बाद में पता चला कि एक जजमान से जजमानी वसूलने के चक्कर में दोनों लड़ पड़े। स्थानीय पुलिस थानों में तीन साल पूर्व तक 150 से ज्यादा ऐसे मामले दज्र थे जो साधु संतो ंके बर्चसव को लेकर हुए थे।
राजस्थान के नाथद्वारा मंदिर में 300 से ज्यादा साधु संत रहते हैं। वर्चस्व की लड़ाई यहां खूब चलती है। 1998 में दो संतो ंके बीच भारी लड़ाई हुई थी जिसमें गोलियां भी चली। गुजरात के सोमनाथ मंदिर में साधु संतो ंके बीच काफी झगड़े फसाद हुए हैं। और उड़ीसा के धार्मिक मंदिरों के पंडे पुजारियों पर 1300 से ज्यादा मामले दर्ज हैं। पिछले साल ही पूरी के तीन पंडों ने मिलकर चार यात्रियों को लूटने की कोशिश की थी। पकड़े गए।

बाक्स

संतों की दुनिया निराली होती है। तुरंत खुश तो तुरंत नाराज। लेकिन काम एक ही है समाज का कल्याण और मानव उद्धार। लेकिन देश के अधिकतर संत अब यह काम नहीं करते । उनका अधिकतर समय संपत्ति बनाने और समाज विरोधी गतिविधियों में लगा होता है। व ेअब पूजा पाठ कम बंदूक चलाने में ज्यादा सिद्धहस्त हैं। महिलाओं की छाया से कभी उन्हें नफरत होती थी लेकिन अब वे महिलाओं के अंकफांस के बिना रह नहीं सकते। इन तमाम मसलों पर हमवतन की अयोद्या स्थित रंगमहल मठ के संत महाकाल से लंबी बातचीत हुई। पेश है बातचीत के अंश....
संतों की दुनिया अब बदल गई है?

हां अब संतों की दुनिया विल्कुल बदल गई है। ऐसी बदली है कि हम कह भी नहीं सकते । शर्म आती है संत कहलाने में। उपभोक्तावाद संतों पर भी हावी है। अब संत समाज कल्याण का काम कम करते हैं अपने फायउा का काम ज्यादा करते हैं। धर्म के प्रचार से उनका कोई नाता नहीं रह गया है। हालाकि इस पूरे खेल में अच्छे संतों की भी बदनामी हो रही है। यहां ऐसे संत और ब्रम्हज्ञानी लोग है जिनके दर्शन से जीवन सुधर जाता है। ऐसे संत महात्माओं से मिलना बड़ा ही दुर्लभ है। संत माया से परे होते हैं और ऐसे संतों की भी यहां कोई कमी नही है।
संतो ंके बीच संपत्ति को लेकर काफी विवाद रहे हैं?

काफी विवाद है यहां। जमीन को लेकर तो है ही वर्चस्व की लड़ाई ज्यादा है। ऐसा कोई मंदिर यहां नहीं है जिसमें विवाद नहीं है। लोभ की राजनीति है। लोभ होगा तो गुंडई होगा ही ।कभी कभी तो लगता है कि कई मंदिर गुंडों के हाथ में चली गई है । थानों में आप चले जांए तो इन संतो की सही तस्वीर आपको मिल जाएगी । असल में गलत हाथों में मंदिर के चले जाने से यह सब हो रहा है।

आप कहना चाह रहे हैं कि संत साधुओं की परंपरा बदल गई है?

जी, हम यही कह रहे हैं। हमारी संतों की जो परंपरा थी वह समाप्ति की ओर है। कम ही लोग बचे हैं जों संत परंपरा में जी रहे हैं। जब संत चोरी, डकैती और बालात्कार करने लगे तो उसे हम क्या कहेंगे? इसी अयोद्या में दर्जनों ऐसे संत रह रहे हैं जो कहने के लिए शादी तो नहीं रचाए हैं लेकिन रखैलों के साथ रह रहे हैं। ऐसे लोग एक दो नहीं हैं। मैं उन लोगों का नाम नहीं लेना चाहता लेकिन रखैल रखने की यहां नई परंपरा बनती जा रही है। इन्हें कुछ कहिए तो उग्र हो जाते हैं।

संत परंपरा में भी राजनीति घुस गई है?

यह सब राजनीति की वजह से ही हैं। मंदिरों से राजनीति हांकी जा रही है। मंदि और मठों का काम लोगों का उद्धार करना हैं, बच्चों को पढाना हैं, विधवाओं के लिए पुनर्वास करना है,स्कूल चलाना है लेकिन अब यह नहीं होता। मठों की संपत्ति दूसरे कामों में चली जाती है। सरकार भी सब जानती हैं लेकिन वोट बैंक को लेकर सब चुप्प हैं।

कुछ संत बंदुक लेकर चलते हैं?

बंदुक कोई फैशन में नहीं उठाता। संपत्ति का मसला हैं । कुछ लोग जान के डर से बंदुक उठाए हुए है तो कुछ संत जान लेने के लिए। लेकिन यह सब वर्चस्व की लड़ाई ही है।

आपको किस श्रेणी में रखा जाए?

हम अपने बरत्रारे में कुछ नहीं कह सकते। वह तो लोग और साधु समाज ही बताऐंगे। आप हमारी कहानी को ढूंढ सकते हैं। जो गलत नहीं होगा उसे किस बात का डर है?


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