Saturday, October 29, 2011

बटमार दलों में त्राहिमाम.......


अखिलेश अखिल

इसे भ्रष्ट राजनीति पर नकेल कसने की तैयारी कहें या फिर घास फूस की तरह चुनाव आयोग के खातों में दर्ज हजार से ज्यादा राजनीतिक पार्टियों की सूची को कम करने की रणनीति या फिर बड़ी पार्टियों की छोटी पार्टियों को खत्म करने की साजिस कहें,चुनाव आयोंग ने चुनाव सुधार के नाम पर सभी राजनीतिक दलों पर कुल मतदान का कम से कम 8 फीसदी वोट पाने की शत्र्त लगा दी है। अभी तक नेशनल या क्षेत्रीय पार्टियों के लिए कम से कम 6 फीसदी वोट पाने की वाध्यता थी । मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने कहा है कि ‘चुनाव आयोग ने अपने गाइड लाइन को बदल दिया है और मान्यता प्राप्त पार्टियों के लिए न्यूनतम वोट पाने की सीमा 8 फीसदी कर दिया है। अब जो दल राज्य स्तर पर या फिर नेशनल स्तर पर चुनाव लड़ते हैं , उन्हें कम से कम 8 फीसदी वोट पाने होंगे। पहले के गाइड लाइन में न्यूनतम वोट की सीमा 6 फीसदी थी।’ चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद जिसे आप छोटी या बटमार दल कहते हैं वे त्राहिमाम करने लगे हैं।
चुनाव आयोग के इस गाइड लाइन का बड़ी राजनीतिक दलों पर भले ही कोई असर न पड़े लेकिन कई छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों के लिए यह किसी भष्मासूर से कम नहीं है। बड़ी पार्टियां आयोंग के इस नए गाइड लाइन पर हलाकि चुप्पी साधे हुए है लेकिन क्षेत्रीय पार्टियों में खलबली सी मच गई हैं । अपने वजूद को खतरे में पड़ता देख कई छोटी राजनीतिक दलों ने आपस में बैठक करने की भी बात कही है और संभव हुआ तो इस पर आगे की लड़ाई भी करेंगे। आपको बता दें कि पिछले साल तक लालू प्रसाद यादव की राजद नेशनल पार्टी के रूप में थी लेकिन कई राज्यों में उनकी स्थिति खराब होने और कुल मतदान में उनका हिस्सा 6 फीसदी से कम होने के बाद आयोग ने राजद को उसकी अवसान के आंकड़े पेश कर उसे नेशनल पार्टी से राज्य स्तरीय पार्टी की श्रेणी में रख दिया । लेकिन चुनाव आयोग के हालिया गाइड लाइन को लेकर राजद सांसद राजनीति प्रसाद कहते हैं कि ‘अगर किसी पार्टी की पहुंच जनता तक नहीं है और वह वोट लेने में असफल है तो ऐसी पार्टी को रहने का क्या औचित्य है? जनता में पैठ के साथ ही पार्टी के लिए वोट बैंक भी जरूरी है। हालाकि हम छोटी पार्टियों के पक्ष में है क्योंकि लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक दलों की सहभागिता जरूरी है लेकिन वोट नही है तो केवल नाम की पार्टी रहने का कोई मतलब नहीं है।’
आपको बता दें कि अभी देश में 57 मान्यता प्राप्त पार्टियां है जिनमें 7 नेशनल पार्टियां,48 राज्य स्तरीय पार्टियां हैं। इसके अलावा 1048 से ज्यादा पंजीकृत लेकिन गैरमान्यता प्राप्त पार्टियां है जबकि चुनाव में मात्र में 60 से ज्यादा पार्टियां हिस्सा नहीं ले रही है। सबसे बूरा हाल तो राज्य विधान सभा चुनाव के दौरान होती है जब नेशनल,क्षेत्रीय,गैर मान्यताप्राप्त पार्टियों के अलावा सैकड़ों की तादाद में उम्मीदवार चुनाव में हिस्सा लेते हैं और कुछ एक को छोड़कर सारे अपने जमान को भी नहीं बचा पाते हैं। निजी और सरकारी तौर पर इन लोगों पर कितने पैसे खर्च होते हैं सबको पता ही है। आसन्न उत्तरप्रदेश चुनाव में कितनी राजनीति पार्टियां शिरकत करेगी अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इस बार के चुनाव में राजनीतिक दलों पर चुनाव आयोग की पैनी नजर रहेगी । सूबे के 2007 के विधान सभा चुनाव में पर नजर डाले तो पता चलता है कि नेशनल पार्टियों को छोड़ जितनी क्षेत्रिय पार्टियों ने चुनाव में शिरकत की थी उनमें समाजवादी पार्टी को छोड़ किसी भी दल को 6 फीसदी वोट नहीं मिले थे।सूबे के तमाम क्षेत्रिय दल 4 फीसदी वोट उगाहने में भी विफल रहे हैं। ऐसे हालात में चुनाव आयोग की नई गाइड लाइन कई पार्टियों के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। जनता दल यू के राष्ट्ीय उपाध्यक्ष और पूर्व सांसद नवल किशोर राय इस पूरे मामले को दूसरे नजरिए से देख रहे हैं। नवल किशोर राय कहते हैं कि ‘जिन दलों की मान्यता चुनाव आयोग से मिली हुई है उनके लिए जरूरी है कि जनता के बीच न सिर्फ उसका विश्वास बढे वल्कि जनता का वोट भी उसे मिले। अगर कोई मान्यता प्राप्त पार्टी चुनाव आयेग के मापदंडों पर खड़ा नही उतरता तो उसे जाना ही पड़ेगा। ऐसी दलों के लिए 6फीसदी वोंट बैंक या 8 फीसदी वोट बैंक में कोई खास फर्क नहीं है। हां आयोग के अस फैसले के बाद कई दूसरी छोटी पार्टियों को मान्यता मिलने में असर पड़ेगा। हां लोकतंत्र में छोटी पार्टियों की भी अपनी भूमिका है और उसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता लेकिन लेकिन वोट नहीं है तो पार्टी चलाने का क्या मतलब है?’उधर उत्तर प्रदेश इलेक्शन वाच से जुड़े महेश आनंद चुनाव आयोग के गाइड लाइन को सही मान रहे हैं। आनंद कहते हैं कि ‘जो पार्टी चुनाव आयोग के गाइड लाइन पर खड़ा नहीं उतर पाती उसें तो हट ही जाना चाहिए। जातिवाद खत्म तभी होगा जब छोटी पार्टियां खत्म हो जाएगी। लेकिन इसे बड़ी पार्टी का खेल भी आप कह सकते हैं। देखिए इस बार फिर प्रदेश में हाने वाले चुनाव को देखते हुए अखलेंद्र प्रताप का जनमोर्चा,अमर सिंह की पाटी्र,कल्याण सिंह की पार्टी चुनाव में उतर रही है। पहले से कई क्षेत्रीय पार्टियां मौजुद है ही। फिर बड़ी पार्टियां अलग से। जबकि सच्चाई यह है कि 2007 के चुनाव में क्ष्ेात्रिय पार्टियों में सपा को छोड़कर किसी दलों को 4 फीसदी से ज्यादा वोट नहीं मिले।’
उधर, संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप चुनाव आयोग के चुनाव सुधार प्रक्रिया को सही दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं। उनका कहना है कि ‘अभी आयोग में 1248 रजिस्टर्ड पार्टियां है और चुनाव केवल 60 पार्टियां ही लड़ती है, फिर इतनी पार्टियों के बने रहने का कोई औचित्य नहीं होना चाहिए। कई राजनीतिक पार्टी को सालों से 6 फीसदी वोट नहीं मिल रहे हैं ऐसे में 8 फीसदी वोट की बात उनके लिए किसी आफत से कम नही। दरअसल ये पार्टियां लोकतंत्र के नाम पर कई दूसरे कामों में लगी होती हैं और सबसे वड़ी बात जात पात और धर्म की जो राजनीति देश में चल रही है उसके पीछे यही छोटी पार्टियां है।ऐसी पार्टियों को बने रहने का कोई मतलब नहीं है। देश के जो हालात हैं उसमें दो दलीय व्यवस्था की ही जरूरत है।’
सुभाष कश्यप के तर्कों से भले ही कई पार्टी सहमत नहीं हो लेकिन इतना तो सही है कि छोटी छोटी पार्टियों ने देश में जात पात की राजनीति फैलाने में आगे रही है। हालाकि धर्म और जाति की राजनीति कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां भी करने में पीछे नही है। कांग्रेस अल्पसंख्यकों और दलितों की राजनीति करके ही कई सालों तक देश में शासन करती रही है तो भाजपा भी कभी मुस्लिम विरोध के नाम पर तो कभी मंदिर मस्जिद के नाम पर केंद्र से लेकर राज्य तक सरकार चलाती रही है। फिर ऐसी स्थिति में छोटी दलों को बंटमार पार्टी और समाज तोड़ने वाली पार्टी के रूप में देखने की बात को समाजवादी नेता और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष रधु ठाकुर बेकार की बात मान रहे हैं । रघु ठाकुर कहते हैं कि ‘लोकतांत्रिक देश में सबको अपनी बात कहने का हक है। हम अलग अलग मंचों से जनता के लिए काम करते हैं। बड़ी पार्टियां जिसके पास धन की कमी नही है और जिसे करोड़ों में कारपोरेट चंदे मिलते हैं, उसकी पहुंच अधिक लोगों तक हैं, उनका जनाधार बड़ा हो सकता है लेकिन यह नहीं माना जा सकता ह ैकि वे जनता के हित की ही बात करते हैं और छोटी पार्टियां गलत काम करती है। फिर चुनाव आयोग ने जो मान्यता प्राप्त पार्टियों के लिए 8 फीसदी वोट की जो शर्त रखी है उसके पीछे का खेल साफ है। चुनाव आयोग बड़ी पार्टियों के इशारे पर छोटी पार्टियों को हटाना चाहती है और ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र का गला घोटने के प्रयास जैसे हैं । चुनाव आयोग देश की राजनीतिक प्रणाली को खत्म करने में लगा है।’
झारखंड विधान सभा चुनाव में कई दलों को 6 फीसदी वोट नही मिले हैं। उनमें राज्य सरकार में शामिल आजसु भी एक हैं । इस पार्टी को भी 6 फीसदी से कम ही वोट मिले थे लेकिन इसके 5 विधायक चुनाव जितने में सफल हो गए । इस पार्टी को सुदेश महतो चलाते हैं और वर्तमान सरकार में महतो उप मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं ।झारखंड इलेक्शन वाच के सुधीर पाल कहते हैं कि ‘8 फीसदी वोट पाने की शर्त कई दलों के लिढ भारी पड़ेगा। ऐसे में छोटी पार्टियों के लिए अस्तित्व बचाना मुश्किल हो जाएगा। केंद्र में भले ही यूपीए और एनडीए की सरकार हो लेकिन राज्य स्तर पर छोटी पार्टियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता । कई राज्यों में छोटी दलों ने बेहतर भूमिका भी निभाई है और उनका जनाधार भी अच्छा है। यही वजह है कि कई राज्यों में छोटी दलों ने नेशनल दलों को पीछे छोड़ दिया है और बड़ी पार्टियां इनकी पिछलगू हो गई है। चुनाव आयोग का यह फैसला स्थानीय मुद्दों के खिलाफ जा सकता है।’
आपको बता दें कि अगले साल कई राज्यों में विधान सभा चुनाव होने हैं। अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की अंतिम परिणति क्या होगी नहीं कहा जा सकता, लेकिल इतना तय मानिए चुनाव सुधार के नाम पर चुनाव आयोग जो भी काम कर रहा है उसमें अन्ना का इफेक्ट तो है ही साथ ही इसी के बहाने कांग्रेस अपने मन की सोंच को भी अमल करती आ रही हैं । एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म नेशनल संयोजक अनिल बैरवाल कहते हैं कि ‘चुनाव सुधार प्रक्रिया पर काम होना चाहिए और यह जयरी भी है। मान्यता प्राप्त दलों के लिए 6 या 8 फीसदी वोट भी कम ही है। जो पार्टी नेशनल या क्षेत्रीय रूतर पर काम कर रही है उन्हे सही मायनों में उन इलाकों का प्रतिनिधित्व करनी चाहिए वरना उनकी मान्यता बने रहने को कोई मतलब नहीं है। तय मानिए आगामी लोक सभा चुनाव तक कई क्षेत्रीय पार्टियां समाप्त हो जाएगी या फिर उनके सिंबल छिन जाऐंगे।’ चुनाव आयोग का नया फैसला छोटी पार्टियों के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं। आप कह सकते हैं कि उनकी बटमारी अब खत्म हो सकती है।

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