Wednesday, November 16, 2011

फांसी में भी आरक्षण

अखिलेश अखिल

देश के इतिहास को टटोलें, तो आजादी के बाद अब तक जितने भी लोगों को फांसी की सजा दी गई है, उनमें कुछ अपवादों को छोड़कर दलितों, पिछड़ी जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यक लोग ही शामिल हैं। देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इस ‘आरक्षण’ को बांटने की कोशिश नहीं की है।

देश में आरक्षण का मामला अभी गर्म है। कोई महिला आरक्षण को लेकर संसद के आगामी सत्र में हंगामा करने की तैयारी कर रहा है, तो कोई मुसलमानों को सच्चर कमेटी के अनुसार आरक्षण देने की तैयारी में जुटा हुआ है। कोई सवर्णों को रिझाने के लिए ‘सवर्ण आयोग’ बना रहा है, कोई जाटों को आरक्षण के लॉलीपॉप से रिझाने की कोशिश कर रहा है। चुनाव सामने हैं और वोट के लिए ‘आरक्षण’ जरूरी हो गया है!! लेकिन हम यहां एक ऐसे ‘अनोखे आरक्षण’ की बात कर रहे हैं, जहां सौ फीसदी आरक्षण पहले से ही लागू है। मजे की बात यह कि इस आरक्षण को लेकर किसी के मन में कोई कसक भी नहीं है। चूंकि यहां मामला वोट का नहीं है, इसलिए जानते हुए भी इस ‘आरक्षण’ की तरफ से हमारे नीति-निर्माताओं ने अपनी आंखें फेर रखी हैं। यह आरक्षण है फांसी का।

देश के इतिहास को टटोलें, तो आजादी के बाद अब तक जितने लोगों को भी फांसी की सजा दी गई है, उनमें कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकतर फांसी की सजा दलितों, पिछड़ी जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों को ही दी गई हैं। देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इस ‘आरक्षण’ को बांटने की कोशिश नहीं की है। चंूकि यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है, फिर भी प्रभात कुमार शांडिल्य गोवर्धन पर्वत की तरह इस सामाजिक मुद्दे को अकेले अपने सिर पर लेकर देशव्यापी अलख जगाने में लगे हुए हैं।

भारतीय कानून प्रक्रिया में हत्यारों और जघन्य अपराध करने वालों के लिए फांसी की सजा मुकर्रर की गई है। अंग्रेजों का बनाया यह कानून आज भी हमारे देश में लागू है। लेकिन अंग्रेजों के जमाने में सभी भारतीय एक ही तराजू पर तौले जाते थे। इतना जरूर था कि अंग्रेज अभियुक्तों को संदेह का लाभ देकर मामले से बरी कर देने, रिहा कर देने या कम अथवा हल्की सजा देने जैसी बेइमानी की जाती थी और गुलाम भारतीयों की मजबूरी थी कि वे उस प्रकार की नाइंसाफी के खिलाफ किसी तरह की आवाज नहीं उठा पाते थे। किंतु आजादी के बाद स्थिति बदल गई। जिस प्रकार का नाजायज लाभ अंग्रेजों को मिला करता था, अब उस पर सवर्णों का एकाधिकार हो गया है। यह बात इसलिए कही जा रही है कि आजादी के बाद बिहार समेत पूरे देश में फांसी की सजा पाने वाले दो-चार को छोड़ दिया जाए, तो जो तस्वीर सामने आती है, आंखें खोल देने वाली है। बिहार की जेलों में अभी 69 ऐसे कैदी बंद हैं, जिन्हें विभिन्न अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई हुई है। फांसी की सजा पाए ये सभी लोग दलित, पिछड़ी, जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। लेकिन पहले हम आपको ले चलते हैं भागलपुर केंद्रीय जेल, जहां फांसी की सजा पाए 36 लोग मौत का इंतजार कर रहे हैं।

भागलपुर जेल में बंदी बनाकर रखे गए ये सभी फांसी की सजा पाए लोग गरीब और भूमिहीन हैं। इनके पास न खाने को अनाज है और न ही पीने को पानी। तन ढकने के लिए कपड़े की व्यवस्था भी इनके घरवाले नहीं कर पाते। न इनके पास राशन कार्ड है और न ही किसी पार्टी के लोगों को चंदा देने की स्थिति में हैं। इनमें से कइयों के नाम तो मतदाता सूची में भी नहीं हैं। इनमें केवल पांच वीर कुंवर पासवान, कृष्णा मोची, नंदलाल मोची, धमेंद्र्र सिंह और शोभित चमार की फांसी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखा है। पहले चार कैदियों को गया टाडा कोर्ट ने तथा पांचवें अभियुक्त को रोहतास जिले की अदालत ने फांसी की सजा दी है। अन्य 31 के मामले उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में पुष्टि के लिए लंबित हैं। फांसी की सजा पाए कुल 69 कैदियों में से 67 ऐसे हैं, जो अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़ी जातियों से आते हैं या धार्मिक, भाषाई या क्षेत्रीय अल्पसंख्यक की श्रेणी से आते हैं। फांसी की सजा पाए ये वे लोग हैं, जिनको पैसों के अभाव में सही वकील नहीं मिल सके। लगता है, फांसी की सजा में इन समुदायों को शत-प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है? भले ही यह आरक्षण अघोषित और अलिखित हो तथा कतिपय पूर्वाग्रहों एवं परंपराओं से प्रेरित हों। और हां, देश के दूसरे राज्यों की स्थिति कोई अलग हो यह बात भी नहीं है।

आजाद भारत में 55 से ज्यादा लोगों को अब तक फांसी पर लटकाया गया है। सबसे ताजा घटना है 2004 की। 14 अगस्त 2004 को पश्चिम बंगाल की अलीपुर सेंट्रल जेल में हत्या और बलात्कार के आरोपी धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी। इसके बाद अभी तक किसी को फांसी नहीं मिली है। इससे पहले बंगाल में ही 1993 में कार्तिक शील सुकुमार बर्मन को हत्या के मामले में फांसी हुई थी। बिहार में 1995 में सुरेशचंद्र नामक व्यक्ति को फांसी दी गई। इंदिरा गांधी के हत्यारों सतवंत सिंह और केहर सिंह को 6 जनवरी 1989 को फांसी दी गई थी। दिल्ली में संजय चोपड़ा और गीता चोपड़ा भाई बहन के हत्यारों रंगा और बिल्ला को सूली पर चढ़ाया गया था। 1983 में पंजाब में मच्छी सिंह, कश्मीर सिंह और जागीर सिंह को हत्या के मामले में फांसी दी गई थी। असम में अनिल फूकन को फांसी मिली थी। दक्षिण भारत के सीरियल किलर शंकर पिल्लई को फांसी दी गई।

फांसी की तिथि के दिन कश्मीरा और हरबंश सिंह डॉक्टर और जेल की मदद से बीमार पड़ गए। वे तत्काल फांसी से बच गए। जबकि जीता सिंह को फांसी लग गई। सजा एक और क्रियान्वयन में अलग-अलग व्यवहार हो रहा है।

-प्रभात कुमार शांडिल्य

मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने वाले पीयूसीएल, बिहार इकाई के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रभात कुमार शांडिल्य गरीब और मुजलिमों की लड़ाई अपने ही अंदाज में लड़ते रहे हैं। कभी पानी की लड़ाई, तो कभी भूमिहीनों के लिए जमीन की लड़ाई लड़ने वाले शांडिल्य इन दिनों जेल में बंद फांसी की सजा पाए गरीब गुरबों की लड़Þाई लड़ रहे हैं। उनका मानना है कि गांधी के देश में हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। फांसी जरूरी ही है, तो कानून की नजर में जाति-धर्म से ऊपर उठकर हर उस आदमी को फांसी दी जानी चाहिए, जो फांसी का हकदार है। दरअसल, शांडिल्य का मानना है कि आजादी के बाद कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो फांसी की सजा पाने वाले अधिकतर लोग दलित, अल्पसंख्यक, पिछड़ी जाति और जनजाति समाज से आते हैं। यही वजह है कि शांडिल्य फांसी में सौ फीसदी आरक्षण का मुद्दा उठा रहे हैं। फांसी के जाल में फंसे लोगों की असलियत पर प्रभात कुमार शांडिल्य से अखिलेश अखिल ने बातचीत की। पेश हैं संपादित अंश:

- मानवाधिकार की यह अनोखी लड़ाई आप कब से लड़ रहे हैं?

मानवाधिकार की लड़ाई तो सालों से जारी है। गया इस देश का अति पिछड़ा इलाका है और यहां दलितों व पिछड़ों की आबादी ज्यादा है। वर्ग संघर्ष की लड़ाई भी यहां ज्यादा होती रही है। देखने में आया कि हमेशा गरीबों को न्याय नहीं मिलता और जबकि अन्याय करके भी अमीर लोग न्याय के हकदार हो जाते हैं। जहां तक फांसी के मसले पर काम करने की बात है, इसकी शुरूआत हमनें 16 अगस्त 2003 से की। हमनें पाया की बिहार की विभिन्न जेलों में बंद जिन लोगों को फांसी की सजा दी गई है, वे समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े हैं। जिन्हें दो वक्त का भोजन नहीं मिल सकता वे भला कानूनी लड़ाई कहां से लड़ सकते हैं? उसी समय हमनें तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब को इस बारे में जानकारी देने की कोशिश की थी।

- लेकिन राष्ट्रपति तो सभी पत्रों को पढ़ नहीं पाते, फिर आपके आवेदन को उन्होंने पढ़ा है क्या?

मैं नहीं कह सकता कि राष्ट्रपति ने उसे पढ़ा कि नहीं, लेकिन बाद में लगा कि उस मसले पर कार्रवाई हो रही है। दरअसल, हमनें कलाम साहब के पास जो पत्र भेजा था, वह उस मेल पर भेजा था जो उन्होंने बच्चों के लिए खोल रखा था। बच्चों वाली मेल को वे पढ़ते थे। बाद में हमनें उस पत्र को देश के प्रधानमंत्री से लेकर सभी मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों से लेकर मानवाधिकार आयोग और न्यायाधीशों को भी भेजा।

- कहीं से कोई जवाब आया?

जवाब तो नहीं आया, लेकिन कुछ काम ऐसा हुआ जिससे लगा कि हमारे पत्र का असर हुआ है। अब तक क्षमादान के लिए सीधे राष्ट्रपति के पास आवेदन करने का चलन था। हमारे पत्र के बाद राष्ट्रपति भवन से 51 फाइलें गृहमंत्रालय को लौटार्इं गर्इं और कहा गया कि क्षमादान के आवेदन पर गृहमंत्रालय और पीएम आफिस के नोट लगे होने चाहिए। इसके अलावा कलाम साहब ने सरकार को फांसी की सजा पाए कैदियों के क्षमादान लिए पे्ररित किया था। यह काम अपने आप में बहुत बड़ा है।

- लेकिन जो अपराध करेगा, दंड तो उसे मिलेगा ही?

यहां दंड की बात नहीं हो रही है। मंशा की बात है। सत्ता और कानून जिन लोगों के पास है और जिनके पास मुकदमा लड़ने की क्षमता है, वेअकसर बच निकलते हैं। एक ही मामले में एक आदमी को उम्र कैद और एक को फांसी हो जाती है। ऐसा कोई इत्तेफाक से नहीं होता। किया जाता है। जो लोग रोटी नहीं खरीद सकते, जिनका राशन कार्ड तक नहीं है, जो आयकर नहीं भरते, भला वे मुकदमा कहां से लड़ेंगे? जहां तक अपराध करने की बात है, आपको बता दें कि इस देश में अगड़ी जाति के लोगों ने ज्यादा हिंसक अपराध किया होगा। लेकिन उन्हें आज तक फांसी की सजा नहीं दी गई। एक उदाहरण देता हूं। जीता सिंह, कश्मीरा सिंह और हरबंश सिंह को फांसी की सजा हुई। फांसी की तिथि के दिन कश्मीरा सिंह और हरबंश सिंह डॉक्टर और जेल की मदद से बीमार पड़ गए। वे तत्काल फांसी से बच गए। जबकि जीता सिंह को फांसी लग गई। सजा एक और क्रियान्वयन में अलग-अलग व्यवहार हो रहा है।

- तो क्या आप राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी की सजा को सही नहीं मानते?

फांसी की सजा नहीं होनी चाहिए। इससे से देश में अस्थिरता भी बढेÞगी और राजनीति भी गर्म होगी। राजीव गांधी के हत्यारों की फाइल भी राष्ट्रपति के पास है और अफजल गुरु की फाइल भी। दोनों पर राजनीति चल

रही है।

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