Friday, November 4, 2011

राहुल को गरीबी देखने में मजा आता है


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की ‘युवा राजनीति’ कितनी सार्थक होगी, कहना मुश्किल है। क्योंकि अब तक बुंदेलखंड इलाके में राहुल के बार-बार दौरों के बावजूद कांग्रेस के प्रति लोगों में विश्वास नहीं जम पाया है। यही वजह है कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ा यह इलाका अपने तारणहार के रूप में राजा बुंदेला को देख रहा है। कभी कांग्रेस की राजनीति करने वाले राजा बुंदेला अब ‘एकला चलो’ की राह पर हैं। अखिलेश अखिल से उनकी बातचीत के अंश़...

आगामी विधानसभा चुनाव में राजा बुंदेला का क्या खेल है?

हम कोई खेल नहीं कर रहे हैं। हां, राजनीति जरूर कर रहे हैं और वह भी बुंदेलखंडवासियों के विकास की राजनीति और इसी से जुड़ी बुंदेलखंड राज्य की मांग की राजनीति। बुंदेलखंड राज्य बने, इसके लिए हम किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। यहां के लोग भी राज्य से कम किसी बात पर तैयार नहीं हैं। अगर यह खेल है, तो इसे आप जो भी कहें।

बुंदेलखंड की मांग वर्षों से की जा रही है। आप भी इससे जुड़े रहे हैं। फिर चुनाव के समय राज्य की मांग को क्या कहा जाए?

राज्य की मांग सालों से चल रही है। चुनाव के समय तो सभी पार्टियां यहां के लोगों को बुंदेलखंड राज्य देने आ जाती हैं, लेकिन चुनाव के बाद पार्टियां नहीं, उनके लोग भर यहां रह जाते हैं। बार-बार और हर बार बुंदेलखंडी ही ठगे जाते हैं। हम वोट लेने के लिए राज्य की मांग नहीं कर रहे हैं। हमें सही मायनों में राज्य चाहिए। इसी वजह से हम आंदोलन भी करते रहे हैं। हम राज्य के लिए आंदोलन कर रहे हैं, न कि सत्ता और सरकार चलाने के लिए। आंदोलनकारियों को सत्ता से दूर ही रहना चाहिए। हम बुंदेलखंडियों को राज्य की मांग के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अगर वे जाग जाते हैं, तो हमारा प्रयास सफल हो जाएगा। हम चुनाव भी इसी नजरिए से लड़ना चाह रहे हैं। हमारा लक्ष्य राज्य है। राज्य के बाद हमारी भूमिका नहीं रह जाएगी। दूसरे लोग राज्य को आगे बढ़ाने का काम करेंगे।

आपकी पार्टी का घोषणा पत्र क्या होगा?

अभी इस पर बात करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि हमारा इरादा साफ है और हमारा लक्ष्य किसानों को खुशहाल बनाने का है। किसानों की उपज की कीमत क्या होगी, इसको किसान तय करें, न कि आढ़ती। अगर इतना भर हो जाए, तो बुंदेलखंड की आधी समस्या खत्म हो जाएगी। हम सहकारिता नीति लाने की बात कर रहे हैं। जो लोग काम की तलाश में बाहर जा रहे हैं, उनके लिए घर में ही काम की व्यवस्था किए जाने की बात होगी। युवाओं को रोजगार मिले और स्वास्थ्य, शिक्षा और भोजन-पानी की समस्या दूर हो, यही तो लोग चाहते हैं।

आपने नई पार्टी का गठन किया है? क्या आप कांग्रेस के विरोधी हैं?

हां, हमने राजनीतिक पार्टी बनाई है ‘बुंदेलखंड कांग्रेस’ के नाम से। इसी बैनर पर हमारे लोग इस बार चुनाव लड़ेंगे। आने वाले कुछ दिनों में हम इस बारे में घोषणा भी करेंगे और जहां तक कांग्रेस के विरोध का है, तो आपको साफ कर दें कि हम कांग्रेस क्या, किसी दल के विरोधी नहीं हैं। बुंदेलखंड में हमारी पार्टी को आप कांग्रेस का पर्याय ही कह सकते हैं। हम सत्ता के भूखे नहीं हैं, हम बुंदेलखंड राज्य के भूखे हैं। कई सालों से चार पार्टियां यहां से चुनाव लड़ती रही हैं, लेकिन वोट लेने के बाद यहां के गरीबों को आज तक किसी ने नहीं देखा। वही बदहाली, वही सूखा, वही बेकारी, वही पलायन और वही पानी के लिए तरसते लोग। इस चुनाव में भी तमाम पार्टियां वादे लेकर आएंगी। यह तो जनता को तय करना है कि उन्हें वादा चाहिए या फिर बुंदेलखंड राज्य।

कितनी सीटों पर बुंदेलखंड कांगे्रस चुनाव लड़ेगी?

उत्तर प्रदेश के 11 जिले बुंदेलखंड इलाके में आते हैं, जबकि मध्य प्रदेश के 12 जिले हैं। उत्तर प्रदेश के चुनाव में हमारी पार्टी इस इलाके से 37 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इसकी पूरी तैयारी हमने कर ली है और जल्द ही इसकी घोषणा भी हम करने जा रहे हैं। इसके अलावा जिन इलाकों में बुंदेलखंड के लोग ज्यादा संख्या में रह रहे हैं, वहां भी हम उम्मीदवार खड़ा करेंगे। लखनऊ और कानपुर में इस इलाके के काफी लोग काम करते हैं। हम इन इलाकों में भी उम्मीदवार खड़ा कर रहे हैं। कुल मिलाकर 50 से ज्यादा सीटों पर हमारी पार्टी चुनाव लड़ेगी।

राहुल गांधी बुंदेलखंड की अकसर यात्रा करते हैं। इलाके के विकास की बात भी करते हैं, फिर समस्या क्या है?

राहुल जी क्या करते हैं और किनसे मिलते हैं, इसकी जानकारी तो वही देंगे। जिस हालत में यहां के लोग हैं, उससे तो यही लगता है कि राहुल जी को गरीबी और बीमारी देखने में मजा आता है। वे आते हैं और चले जाते हैं। जहां का पूरा इलाका ही बीमार और गरीब है, वहां हाल-चाल पूछने की नहीं, काम करने की जरूरत है।

यानी, राहुल गांधी की वहां कोई अहमियत नहीं है?

हम किसी की अहमियत की बात क्यों करे? किसी को हम सर्टिफिकेट देने वाले नहीं हैं। यहां के लोग सब देख रहे हैं। भुगत रहे हैं। भूखे को भोजन चाहिए, न कि भरोसा। बेकारों को काम चाहिए, न कि आश्वासन। खेत को पानी चाहिए और बीमारों को दवा चाहिए। राहुल जी चाहें, तो संभव हो सकता है। सच्चाई ये है कि चंदे के पैसों से राहुल जी वहां बुलाए जाते हैं। राहुल जी आखिर इनके लिए संघर्ष क्यों करेंगे? उन्हें भी यहां आकर मजा आता होगा।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी बुंदेलखंड के हालात पर चिंता जताते रहे हैं?

जिस तरह सचिन तेंदुलकर से हॉकी में गोल की अपेक्षा नहीं की जा सकती, उसी तरह मनमोहन सिंह से राजनीतिक बात नहीं की जा सकती। वे दुनिया के बेहतरीन अर्थशास्त्री हैं और देश को अनुभव का लाभ भी वे दे चुके हैं। राजनीति उनके लिए ठीक नहीं है। कांग्रेस की राजनीति में प्रणब जैसे घाघ नेताओं के सामने उनकी क्या चलेगी? आर्थिक स्तर पर वे सफल हैं, जबकि राजनीतिक नजरिए से उन्हें फेल कह सकते हैं। पी. चिदंबरम गृहमंत्री हैं, जबकि वे दागदार हैं। जयललिता ने उन पर आरोप लगा रखा है। ऐसे दागदार को बड़ी जिम्मेदारी क्यों दी गई है? आप गलत खाके में आदमी को डालेंगे, तो परिणाम बुरा ही होगा। यही पीएम के साथ भी हो रहा है। बुंदेलखंड पर राजनीति प्रधानमंत्री नहीं, उनके लोग कर रहे हैं।

उधर मायावती सर्वजन हिताय की बात कर रही हैें?

मायावती क्या कहती हैं, उन्हें खुद मालूूम नहीं है। पूरे प्रदेश में जितने मायावती के कटआउट लगे हुए हैं और उस पर विकास की बातें कही गई हैं, शायद ही इसकी जानकारी माया के वर्कर को भी हो। जब तक मायावती के जातिगत वोट हैं, तब तक उनकी राजनीति चल रही है। इस देश में बहुत दिनों तक आप किसी को बरगला नहीं सकते। उनके लोगों का भी भ्रम जल्द टूटेगा। डंके की चोट पर मायावती कह नहीं सकतीं कि उन्होंने एक काम में भी पूरी तरह सफलता पाई है। केवल स्कूली व्यवस्था को ही ठीक कर दिया जाए, तो मायावती की राजनीति कुछ सालों में खत्म हो जाएगी। लेकिन यह भी नहीं हो रहा है।

लेकिन जाति की राजनीति तो सभी पार्टियां कर रही हैं?

लेकिन ठीक नहीं है। पहले जाति सूचक शब्द बोलने पर रोक लगाई गई और अब तो जाति के आधार पर जनगणना हो रही है। अब किसी आदमी को जब उसके जाति के नाम से पुकारा जाएगा, तो समाज में लड़ाई ही तो होगी। राजनीति में जातीय खेल और बढ़ सकता है। माया जैसी नेताओं का विकास ऐसे ही हो रहा है।

तो फिर बदलाव कैसे संभव होगा?

बदलाव समाज का नियम है। एक सीमा तक ही आप किसी को बेवकूफ बना सकते हैं। अब देश के युवा आगे बढ़ रहे हैं। सोच में बदलाव आ रहे हैं। बाबा रामदेव और अन्ना के आंदोलन ने लोगों को हक की लड़ाई लड़ने के रास्ते बता दिए हैंं। हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। देखिए, बिहार में बदलाव आया है। छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में बदलाव आए हैं, लेकिन झारखंड अभी भी पिछड़ा है। वहां के लोग अभी चुप बैठे हैं। शिबू सोरेन ने जिस तरह से राज्य की लड़ाई लड़ी, अगर वे राजनीति में नहीं आते और मुख्यमंत्री नहीं बनते, तो संभव था कि राज्य आज आगे चला गया होता। हमारा मानना है कि राज्य की लड़ाई अलग बात है, जबकि उसको चलाना अलग बात है। राज्य चलाने के लिए विजन वाले लोगों की जरूरत है।

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