Friday, November 11, 2011

आदिवासी सिखाएंगे माया को सबक

अखिलेश अखिल/ सोनभद्र

इस समय उत्तर प्रदेश में बिजली संकट के साथ-साथ चुनाव में सत्ता बचाने का भी बड़ा संकट है। इसलिए कनहर परियोजना चर्चा में है। उससे भी बड़ा मुद्दा है हजारों आदिवासियों को दर-बदर भटकाने का। लेकिन ये आदिवासी माया सरकार से दो-दो हाथ करने के मूड में हैं। कैसे, आइए
जानते हैं......

उत्तर प्रदेश के नक्सल प्रभावित और बदहाल सोनभद्र जिले के आदिवासी अब सरकार से आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। कनहर बांध विकास के नाम पर सरकारी तिकड़मबाजी को समझने के बाद हजारों आदिवासियों ने अपनी लंगोट कस ली है और अपने परंपरागत हथियार ‘धनुष’ को उठा लिया है। ‘करो या मरो’ का राग अलाप रहे ये आदिवासी सूबे की माया सरकार को वह सबक सिखाने की तैयारी में हैं, जिसकी कल्पना भी मायावती ने नहीं की होगी।

‘‘विकास का लाभ किसी को और विस्थापन होए हमार, नहीं रहेगी माया सरकार....’’ के नारों से सोनभद्र का जंगल गंूज रहा है। 1953 से 2011 तक ये भोले-भाले आदिवासी विकास का वास्तविक सच समझ चुके हैं और विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर विस्थापित ये वनवासी समाज अब किसी भी कीमत पर सोनभद्र को विस्थापन और बदहाली से मुक्ति दिलाने का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं।
सन् 1947 में देश को आजादी दिलाने के बाद हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने पानी, बिजली, इस्पात, सीमेंट आदि में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू कीं। बड़े बांधों के निर्माण का कार्य तेजी से शुरू हुआ। पं. नेहरू के शब्दों में आधुनिक भारत के महान तीर्थों के रूप में इन बांधों का निर्माण हुआ। 1953 में पूर्णतया कंक्रीट निर्मित गोविंद वल्लभ पंत जलाशय तैयार हुआ, जो एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित झील है। इस मानव निर्मित झील को देखने देश-दुनिया के लोग आते रहे हैं, लेकिन कम ही लोगों को मालूम है कि इस झील के नाम पर 105 गांवों के 46 हजार ग्रामीण, आदिवासियों को अपना घर, गांव, खेत, खलिहान और जंगल छोड़ना पड़ा। आज उन लोगों की क्या स्थिति है, कोई नहीं जानता। इसके बाद तो देश में बड़े बांधों का सिलसिला ही शुरू हो गया। बांध पर बांध बनते गए, लोग उजड़ते गए। एक बांध बनाने में कितनी र्इंटें, सीमेंट, लोहा और बालू के साथ ही कितने मजदूर और कितनी राशि खर्च होगी, इसकी पूरी तस्वीर सरकार के पास होती है, लेकिन उस विकास योजना से कितने लोग बेघर होंगे, इसकी जानकारी आज तक सरकार को नहीं है। हर बार विकास के नाम पर आदिवासी समाज विस्थापित होकर अपनी बलि देता रहा है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, क्योंकि इसकी दुदुंभी सोनभद्र के आदिवासी पीट रहे हैं।


आपको बता दें कि 1976 में कनहर सिंचाई परियोजना की आधारशिला कनहर नदी पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने रखी थी। 37 वर्षों से वहां कोई भी निर्माण कार्य गांववासियों ने नहीं होने दिया। अब उसी परियोजना को विस्तारित कर विगत 15 जनवरी, 2011 को अपने जन्मदिन पर वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती ने अपने नाम का पत्थर लगाकर वृहद् कनहर सिंचाई परियोजना की घोषणा कर दी। माया की इस घोषणा के साथ ही सोनभद्र के जंगल में मानो आग लग गई हो। इस परियोजना की फिर से घोषणा होने के बाद 37 सालों से सोए लोगों में उन्माद-सा छा गया और वे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गए हैं।


कनहर बचाओ आंदोलन से जुड़े महेश आनंद भाई कहते हैं कि ‘इस समय उत्तर प्रदेश में बिजली संकट के साथ-साथ चुनाव में सत्ता बचाने का भी बड़ा संकट है। इस लिए कनहर परियोजना चर्चा में है। बिजली उत्पादन की क्षमता बढ़े और क्षेत्र में पानी से हरियाली और विकास लाने की पुरजोर वकालत की जा रही है। उत्पादन क्षमता वृद्धि हेतु कनहर को बांधना ही एकमात्र विकल्प समझा जा रहा है। परियोजना में कुर्बान होने वाले विस्थापित परिवारों की सुध लेने में सरकार की तत्परता नहीं दिखा रही है। इन्हीं कारणों से कनहर विस्थापित संगठित हो चुके हैं। कनहर बचाओ आंदोलन देश में चल रहे आंदालनों के साथ एकाकार होने की प्रक्रिया में अग्रसर है। धरना-प्रदर्शन व ज्ञापन देने के कार्यक्रम लगातार चल रहे हैं। आंदोलन को नैतिक समर्थन भी मिल रहा है।’

सोनभद्र का इलाका औद्योगिक विकास के लिहाज से प्रदेश में एक बड़ी हैसियत रखता है। यह अलग बात है कि आदिवासियों को इसका फल निरंतर विस्थापन व बदहालियों के घनीभूत हो जाने के रूप में मिलता रहा है। रेनुकूट स्थित हिंडालको एशिया का सबसे बड़ा एल्युमिनियम संयंत्र है। बिड़ला समूह के इस उपक्रम में 5000 से भी अधिक मजदूर काम करते हैं। बिड़ला हाइटेक कार्बन प्लांट भी इसी क्षेत्र में है। इसके अलावा शक्ति नगर तथा बीजापुर में एनटीपीसी विद्युत संयंत्रों की श्रृंखला है, जिसका नियंत्रण केंद्र सरकार के हाथ में है। यह औद्योगिक इलाका मिनी मुंबई के नाम से जाना जाता है। इस मायने से जिले के औद्योगिक विकास एवं कद के रुतबे का अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है कि इस इलाके के तार सियासी गलियारे तक कितने मजबूत बंधे हुए हैं।

इस इलाके में औद्योगिक विकास की शुरुआत 1953 में रिहंद बांध निर्माण के साथ हुआ। पूर्णतया कंक्रीट का बना हुआ पक्का बांध गोविंद वल्लभ पंत सागर के नाम से एशिया की सबसे बड़ी कृत्रिम झील के रूप में जाना जाता है। इस बांध के निर्माण से 46 हजार ग्रामीण आदिवासी 105 गांवों से विस्थापित हुए हैं। ओबरा व अनपरा में थर्मल पॉवर का निर्माण कर एनटीपीसी की स्थापना के साथ एक के बाद एक सुपरतापीय बिजली घरों की परियोजना एवं अन्य परियोजनाओं का जाल इस क्षेत्र में बिछना शुरू हुआ। चुर्क व डाला में सीमेंट फैक्ट्री के लिए अनेक निर्माण कार्यों, 250 से ज्यादा क्रशर उद्योगों एवं चूने के पत्थर के कारखानों का नि:संदेह परचम लहरा रहा है, किंतु सत्य यह है कि ऐसे छोटे-बडेÞ सभी उद्योगों ने अनेक आदिवासी परिवारों को उजाड़ा भी है।


कितने परिवार होंगे बेघर
सन् 2000 में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार, रिहंद बांध से 10 हजार परिवार, सीमेंट फैक्ट्री से 800 परिवार, कनहर बांध से 2000 परिवार, अनपरा व ओबरा से 1500 परिवार, वर्ल्ड फूड प्रोग्राम फॉरेस्टी प्रोजेक्ट से एक हजार परिवार, एनटीपीसी से 700 परिवार तथा रोड रेलवे, हेलीपैड, हाइटेंशन लाइन से 15 हजार परिवार प्रारंभिक दौर में विस्थापित हुए। इन विभिन्न परियोजनाओं के लिए यहां के 36 हजार मूल परिवार तीन बार विस्थापित हुए हैं। इन उद्योगों की स्थापना से जंगलों का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ है। रिहंद जलाशय के पानी के साथ-साथ सिंगरौली व दुद्धी क्षेत्र के हवा, पानी व मिट्टी में पारा मिलकर वातावरण को प्रदूषित करने में सहायक है। इस क्षेत्र के कुंआें में निर्धारित सीमा से 9 गुना अधिक पारा चिंता का विषय है। यही नहीं, कन्नौरिया केमिकल द्वारा 420 किग्रा हर वर्ष पारा एवं हिंडालकों द्वारा 435 टन हर वर्ष फ्लोराइड का उत्सर्जन होने का अनुमान है।

इसके बावजूद आज तक विकास के नाम पर बड़े-बड़े उद्योगों, बांधों, विद्युत गृहों का अंतहीन सिलसिला जारी है। तथाकथित पुनर्वास योजना एवं उपायों के आधा-अधूरा और उस पर भी प्रशासनिक बंदरबांट से बची रत्ती भर मुआवजे की राशि ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के बराबर साबित हो रही है। परिणामस्वरूप, ये विस्थापित परिवार स्वाभाविक रूप से अपने पास-पड़ोस के जंगलों में जाकर बसने के लिए मजबूर हैं। एक बार फिर वन संरक्षण व पर्यावरण संरक्षण के नाम पर नंगी तलवार इनके सिर पर लटकी है। वन विभाग का सामंती शोषण आज भी इस क्षेत्र में जारी है।
विकास के नाम पर विस्थापित हुए ये आदिवासी और उनकी संतान दशकों से यह देखते चले आ रहे हैंं कि जिन जमीनों को छोड़कर वे दर-दर भटक रहे हैं, वहां बड़े-बड़े कल-करखानों के साथ कॉलोनियां बस गई हैं। बहरहाल, आदिवासियों को पीने का पानी आज भी जुगाड़ करना पड़ता है। प्रस्तावित कनहर बांध का कुल कैचमेंट एरिया 2000 वर्ग में है। इस एरिया में आज के दिन 25 गांव आते हैं। इसके अलावा 16 गांव छत्तीसगढ़ और 8 गांव झारखंड के भी हैं, जिनकी जल-समाधि इस बांध में होनी है। इसके अलावा 30 सरकारी प्राथमिक स्कूल, 20 पक्के मकान तथा लगभग नौ लाख छोटे-बड़े पेड़ जल समाधि की स्थिति में हैं। साथ ही, 78 प्रतिशत अनुसचित जाति, जनजाति के समुदाय और 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक मुसलमानों को बेदखली का शिकार होना पड़ेगा।


विनाश का पर्याय बना विकास

इस आंदोलन का मिजाज ‘कनहर’ को बचाने का है। आंदोलन का उद्देश्य गांवों के लोगों को अपनी जमीन की सुरक्षा और जल को बचाने का है। सरकारी शब्दावली में तो विकास के लिए बांध है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए विनाश का पर्याय है। सरकारी तर्क है कि बांध से बिजली बनेगी, सिंचाई की व्यवस्था होगी, लेकिन जमीनी हकीकत है कि बांध से हजारों-हजार लोग अपनी जमीन से उजड़ जाएंगे और जिंदा रहने के उनके बुनियादी अधिकारों का हनन होगा। बांध का फायदा उद्योग-धंधों को मिलेगा और इसकी कीमत चुकाएंगे गरीब लोग। लेकिन भोले-भाले आदिवासी अब मूर्ख नहीं बनाए जा सकते, तमाम जगहों की तरह दुद्धी के आदिवासी विकास के लिए अपने विनाश को तैयार नहीं हैं।
यह भी एक ऐतिहासिक संयोग कहा जाएगा कि धूल फांकती कनहर बांध की फाइलों को झाड़-पोंछकर अपने जन्मदिन पर प्रदेश की मुखिया मायावती ने जहां कनहर सिंचाई परियोजना का शिलान्यास किया, वहीं कनहर बचाओ आंदोलन के बैनर तले प्रभावित 25 गांवों के हजारों परिवारों ने 15 मार्च को दलित राजनीति के महान पुरोधा कांशीराम के जन्मदिन पर कनहर सिंचाई परियोजना रद्द करने की मांग सरकार से कर डाली तथा विस्थापन और बदहाली के विरुद्ध एक लंबे संघर्ष की घोषणा भी कर दी। कनहर बचाओ आंदोलन की एकजुटता के लिए भूमि हकदारी मोर्चा, महिला शक्ति पंचायत, रोजगार हक अभियान के साथ कई प्रमुख जनसंगठनों का जुड़ाव और समर्थक इस लड़ाई को व्यापक दिशा देने में शामिल हैं।

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