Wednesday, November 16, 2011

खून का आरोप और नाम...नेता जी!!


संसद में बाहुबली

80 के दशक में चुनाव की दशा ही बदल गई थी, अपराधी किस्म के लोग चुनाव में हिस्सा लेने लगे। जो लोग कभी बूथ लूटने का काम करते थे, वे गांधी टोपी व खादी का कुर्ता पहन हाथ जोड़े वोट मांगने लगे थे। देश के विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में अपराधी चुनाव जीतकर विधान सभाओं और संसद में पहुंचे। ......ये लोग देश चला रहे थे।


नेताओं को जनता चाहे जिस नाम से पुकारे, वे अपने को अपराधी नहीं मानते। वे खुद को जनता का सेवक ही मानते हैं। लेकिन नागरिक समाज अब इनका नकाब उतारने में लगा है। आइए, कुछ तथ्यों पर गौर करें। राजनीति का अपराधीकरण हुआ है, या अपराधी का राजनीतिकरण! इस पर समाजशास्त्रियों और राजनेताओं की अलग-अलग राय है। लेकिन बीते तीन दशकों में राजनीति का जो स्वरूप हमारे सामने आया है, वह अति भयावह है। संसद से लेकर विधान सभाओं में गुंडई करने वाले, चोरी करने वाले, डाका डालने वाले, खून करने वाले, बलात्कार से लेकर अपहरण करने वालों की गिनती की जाए, तो जनता की यह अदालत दागी दिखाई पड़ने लगती है। कानून की विभिन्न धाराओं में आरोपित किसी भी सांसद और विधायक से आप पूछ लें कि क्या आप अपराधी हैं? तो उत्तर मिलेगा कि उन्हें राजनीतिक रंजिश में फंसाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही दागी लोगों पर नकेल कसने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कहा है कि ऐसे लोगों के मुकदमों को जल्द से जल्द निपटाने के लिए क्या किया जा रहा है, इस बावत एक माह के भीतर आने जवाब पेश करें। सरकारें क्या जवाब देंगी, उसका इंतजार है। तब तक हम आपको मिलवाते हैं, देश के कुछ टॉप आरोपी सांसदों से, जिन पर कई आपराधिक आरोप हैं।

जल्द सुनवाई हो : पटेल

यह हैं उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से सपा सांसद बाल कुमार पटेल। 10 मामलों के आरोपी हैं। एक से बढ़कर एक मामले। लेकिन पटेल साहब अपने को अपराधी नहीं मानते। उनका कहना है कि ‘पहले वह बसपा की राजनीति करते थे। सपा में आने के बाद बसपा वालों ने उन पर तरह-तरह के आरोप लगा दिए। हमें फंसाया गया है। हम जनता की लड़ाई लड़ते हैं और लड़ेंगे भी। हम भी चाहते हैं कि हमारे मामले की निष्पक्ष जांच हो और जल्द हो। हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सही मानते हैं, ताकि हमें जल्द न्याय मिल सके।’

हम तो चूहा भी नहीं मारे : रामकिशुन

सपा के ही एक और सांसद हैं रामकिशुन। चंदौली से जीतकर आते हैं। इलाके के दबंगों में इनकी गिनती होती है। कहते हैं कि चंदौली में रामकिशुन के आदेश के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। सपा को भी रामकिशुन पर नाज है। लेकिन रामकिशुन अपने को अपराधी नहीं मानते। कहते हैं --‘हम जनता की लड़ाई लड़ते हैं और इसी लड़ाई में कभी कभी हिंसक वारदातें हो जाती हैं। हम तो आज तक चूहा भी नहीं मारे हैं।जनप्रतिनिधियों पर ऐसे आरोप लगते रहते हैं, हम इसकी चिंता नहीं करते। हमारे साथ जनता है।’ आपको बता दें कि रामकिशुन पर सभी तरह की आपराधिक धाराओं के तहत मामले दर्ज हैं।

सरकार में जिजीविषा की कमी : महेश

इस पूरे मामले पर उत्तर प्रदेश इलेक्शन वाच से जुड़े और मानवाधिकार कार्यकर्ता महेश आनंद की राय कुछ अलग ही है। उनका मानना है कि ‘जब तक सरकार के भीतर जनता को सही न्याय देने की चिंता नहीं होगी, तब तक इस देश में कुछ नहीं होने वाला। राजनीतिक दलों पर लोगों का विश्वास अब रहा नहीं। यही वजह है कि जनता से जुड़े हुए मसलों को अब नागरिक समाज उठा रहा है और अभी जो चुनाव में सुधार करने के लिए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त लिंगदोह और उनके साथियों ने जो याचिका सुप्रीम कोर्ट में दी है, इसे तो राजनीति से जुड़े लोगों को करना चाहिए था। यह अच्छा अवसर है और अब सुप्रीम कोर्ट के पहल के बाद अगर सरकार दागी नेताओं के मुकदमे के लिए त्वरित सुनवाई करवाती है, तो आगामी लोक सभा चुनाव और संसद की तस्वीर ही अलग होगी।’हालांकि चुनाव सुधार को लेकर सरकार भी कई काम करती दिख रही है और चुनाव आयोग भी सक्रिय है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार कितना पहल करती दिखती है, वह महत्वपूर्ण होगा। यदि दागी सांसदों और विधायकों के मामले को शीघ्र निपटाने की कोशिश हुई, तो याद रखिए, अगले चुनाव में इसमें से कई दागी संसद में नहीं, जेल के भीतर नजर आएंगे।

मैं अपराधी नहीं : बावलिया

00-- 15वीं लोक सभा में टॉप-टेन आपराधिक सांसदों में शामिल कुंपजी भाई बावलिया भी हैं। राजकोट से कांग्रेस के सांसद हैं। बावलिया दो गंभीर मामलों में आरोपित हैं। राजकोट में बावलिया का सिक्का चलता है। इनकी अपनी दुनिया है और अपनी पंचायत। लेकिन बावलिया खुद को अपराधी नहीं मानते। बावलिया कहते हैं--‘हम तो गांधी के लोग हैं। गांधी के इलाके से आने वाला आदमी अपराधी कैसे हो सकता है। हमें भाजपा वालों ने फंसाया है। हमारे बारे में जनता सब कुछ जानती है।हम चाहते हैं कि हमारे मामले की जल्द जांच हो, ताकि हकीकत सामने आ जाए।’

उदाहरण के तौर पर हमने आपके सामने तीन उन सांसदों की बातों को रखने की कोशिश की है, जिनका नाम 15 वीं लोकसभा में आरोपियों की सूची में ऊपर रखा गया है। 15वीं लोक सभा में जीतकर आए दबंग और आपराधिक चरित्र के लोगों की बात करें, तो आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इसमें 153 लोगों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव में संसद में अपराधियों की संख्या 128 थी, जबकि 2009 में 153 हो गई। यानी लगभग 20 फीसदी की बढ़ोतरी। इन आरोपी 153 सांसदों में से 74 सांसद गंभीर आपराधिक रिकार्ड वाले हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि 2009 के चुनाव में सभी दलों ने अधिकतम आपराधिक चरित्र के लोगों को टिकट दिया था। 26 अपराधी तो कम मार्जिन के वोट से संसद में पहुंचने से वंचित रह गए, वर्ना लोक सभा में एक से बढ़कर एक गुंडे होते?

15 वीं लोक सभा चुनाव 2009 में चुने

गए सांसदों की स्थिति

आपराधिक मामले वाले सांसद --153

गंभीर आपराधिक आरोप वाले सांसद -- 74

सांसदों के विरुद्ध कुल मुकदमे --464

सांसदों के विरुद्ध कुल गंभीर आइपीसी धाराएं -- 268

सुप्रीम कोर्ट की फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने अब तक जितनी डांट यूपीए 2 सरकार को लगाई है, शायद ही इससे पहले किसी अन्य केंद्र सरकार को सुननी पड़ी हो। कभी महंगाई के मुद्दे पर, तो कभी कृषि मंत्री के बेहूदा बयान को लेकर कोर्ट के निशाने पर सरकार रही है। पिछले एक साल में दर्जनों बार तो सरकार को भ्रष्टाचार, घोटाला और काले धन के मसलों से लेकर सरकार के काम-काज पर सुप्रीम कोर्ट ने उंगली उठाई और सरकार को जनता के हित में काम करने की नसीहत दी। लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में 150 से ज्यादा सांसदों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों को बेहद परेशान करने वाला बताते हुए केंद्र और राज्य सरकार को इस मसले पर चार सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट देने को कहा है। दरअसल, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह, पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह, पूर्व चुनाव आयुक्त केजे राव, पूर्व डीजपी रिबेरो समेत 10 लोगों ने एक याचिका के जरिए सांसदों और विधायकों पर लंबित मामलों को जल्द निपटाने की मांग की थी। याचिका में कहा गया है कि चुने हुए प्रतिनिधि ही जनता के कल्याण के रखवाले होते हैं। वे संसद और विधान सभा में कानून बनाते हैं लेकिन उनके ही आपराधिक मामलों में घिरने से जरूरी है कि उनके मुकदमे जल्द निपटाए जाएं और मामलों की निष्पक्ष जांच हो, ताकि वे निर्वाचित होने के 6 माह के भीतर खुद को निर्दोष साबित करें या आपराधिक गतिविधियों के परिणाम भोंगे।

याचिका में यह भी कहा गया है कि जो लोग चुनाव लड़कर संसद और विधान सभा में पहुंचते हैं, और बाद में वे सरकार में भी शामिल होते हैं और आरोपी आदमी सरकार में आने के बाद जनता के साथ न्याय कतई नहीं कर सकते। याचिकाकर्ताओं में से एक पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह कहते हैं कि -‘अपराध के आरोपी लोग बार बार संसद और विधान सभाओं में पहुंच रहे हैं और सरकार भी चलाते हैं, ऐसे लोगों पर विश्वास कैसे किया जा सकता है? हम लोग दागी लोगों के बारे में दो बातों की मांग कर रहे हैं। एक तो यह कि दागी के खिलाफ जो आरोप हैं, उसकी विवेचना में काफी समय लग रहा है। कभी कभी इसके लिए ‘खेल’ भी होते हैं, ताकि उनके चुनाव लड़ने पर कोई असर नहीं पड़े। इसके लिए हमारी मांग है कि एसआईटी के जरिए ऐसे मामलों की जांच कराई जाए, ताकि मामले को सरल किया जा सके। हमारी दूसरी मांग है कि दागियों के जो मामले अदालतों में चल रहे हैं, उनका निपटारा जल्द हो और इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की जाए। यह कोर्ट मामले को एक साल के भीतर निपटाए। अगर ऐसा हो जाता है, तो बहुत सारे दागी चुनाव लड़ने से वंंचित हो जाएंगे और फिर कोई दागी आदमी चुनाव में आने से बचेगा भी।’

दरअसल, यह सारा खेल चुनाव सुधार को लेकर है। वर्षों से चुनाव में सुधार लाने की बात की जा रही है, ताकि राजनीति और अपराधियों के गठजोड़ को तोड़ा जा सके। चुनाव सुधार को लेकर सबसे पहले 1974 में जय प्रकाश नारायण ने सिटीजन फार डेमोक्रेसी की तरफ से जस्टिस वीएम तारकुंडे की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इस समिति ने 1975 में अपनी रिपोर्ट भी पेश कर दी लेकिन आज तक उस पर अमल नहीं हुआ। 80 के बाद तो चुनाव की दशा ही बदल गई और अपराधी किस्म के लोग चुनाव में हिस्सा लेने लगे। जो लोग नेताओं के लिए बूथ लूटने का काम करते थे, वे खुद ही चुनाव में कूदने लगे। देश के विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में अपराधी चुनाव जीतकर न सिर्फ विधान सभाओं में पहुंचे, बल्कि देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में भी आपराधिक तत्वों की उपस्थिति दर्ज हुई। 80 के दशक से जो अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हुआ है, वह आज तक जारी है।

सन् 1990 में चुनाव सुधार को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने दिनेश गोस्वामी समिति गठित की। इस समिति ने भी अपना प्रतिवेदन सरकार को तो सौंपा लेकिन हर बार की तरह सरकार की ओर से उस पर कोई काम नहीं हुआ। 1993 में बोहरा कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद तो जैसे राजनीति में भूचाल ही आ गया। एनएन बोहरा ने राजनीति और अपराधियों के गठजोड़ की पूरी रिपोर्ट पेश की थी। चुनाव में किस तरह आपराधी, गैंगस्टर, माफिया, पुलिस और गुंडे अपने आका के लिए काम करते हैं, इसका खुलासा पहली दफा बोहरा कमेटी की रिपोर्ट में किया गया था। इस रिपोर्ट को संसद पटल पर भी रखा गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद उस रिपोर्ट पर अमल नहीं किया गया। अगर इस रिपोर्ट पर अमल उसी समय हो जाता, तो राजनीति की दशा थोड़ी बदल जरूर जाती।

राज्यवार आपराधिक सांसद

राज्य् कुल आरोपी सांसद गंभीर आरोपी सांसद

उत्तर प्रदेश 80 31 22

महाराष्ट 48 23 9

बिहार 40 17 6

आंध्रा 42 11 3

गुजरात 26 11 7

कर्नाटक 28 9 5

झारखंड 14 8 2

तामिलनाडु 31 7 5

पश्चिम बंगाल 42 7 7

केरला 20 6 2

उड़िसा 21 5 2

मध्य प्रदेश 29 4 2

छत्तीसगढ़ 11 2 0

राजस्थान 25 2 0

हरियाणा 10 2 1

पंजाब 13 2 1

असम 14 1 0

उत्तराखंड 5 1 0

जम्मू कश्मीर 6 1 0

दिल्ली 7 1 0

दादर नगर हवेली 1 1 0

अंडमान निकोबार 1 1 0

कुल 153 74

दलगत आपराधिक मामले वाले सांसद

पार्टी कुल आरोपी सांसद गंभीर आरोपी सांसद

कांग्रेस 206 41 12

भाजपा 116 43 19

सपा 23 9 8

शिवसेना 11 8 3

जदयू 20 7 3

बसपा 21 6 6

बीजद 4 4 1

तृणमूल कांग्रेस 19 4 4

एनसीपी 9 4 3

आरजेडी 4 3 2

सीपीएम 15 3 1

एडीएमके 7 3 3

डीएमके 16 3 1

आरएलडी 5 2 1

जेडीएस 3 2 1

टीडीपी 6 2 1

जेएमएम 2 2 2

अकाली दल 4 1 0

अन्य 20 9 4

कुल 153 74

चुनाव प्रक्रिया में बदलाव हो : सुभाष कश्यप

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि ‘चुनाव अपराध मुक्त हों, इसके लिए जरूरी है कि चुनाव प्रक्रिया में बदलाव हो। जिन लोगों पर मुकदमे चल रहे हैं, उनके मुकदमों को जल्द निपटाया जाए। उनके मुकदमों की निष्पक्ष जांच की जाए। हमलोग बहुत पहले से इसकी मांग कर रहे हैं। अब याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने पहल की है, तो देश के लिए कुछ अच्छा ही होगा।’


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