Saturday, November 26, 2011

दान की जमीन पर डाका


अखिलेश अखिल

भारत जैसे देश में आजादी के बाद से ही आबादी का एक बड़ा हिस्सा भूमिहीनों का रहा है। इनके पास खेती के लिए तो दूर, दफन होने के लिए 6 गज जमीन भी मयस्सर नहीं है। यह तबका हर बार चोर उचक्कों, डकैत, अपराधियों से लेकर कथित तौर पर साफ-सुथरे लोगों को जिताकर संसद से लेकर विधानसभा तक में भेजता है। लेकिन किसी ने भी भूमिहीनों को ऊपर लाने की कोशिश नहीं की। आज जो नक्सलवाद देश में फैला है, उसका एक बड़ा कारण लोगों का भूमिहीन होना है। गांधी के सच्चे समर्थक बिनोवा भावे ने भूमिहीनों को जमीन देने के लिए जमींदारों से भूमि मांगने की शुरुआत की। बिनोवा जी 1951 में पनवार आश्रम से हैदराबाद के दक्षिण में शिवरामपल्ली गांव पहुंचे। वहां तीसरे सर्वोदय सम्मेलन का आयोजन था। 18 अप्रैल 1951 को बिनोवा जी नागालैंड पहुंचे। बिनोवा जी पोचमपल्ली गांव में ठहरे। 700 की आबादी वाले इस गांव में दो तिहाई लोग भूमिहीन थे। भूमिहीनों ने विनोबा जी से 80 एकड़ जमीन की मांग की। बिनोवा जी के आग्रह पर गांव के जमींदार रामचंद्र रेड्डी ने 100 एकड़ जमीन देने की घोषणा की। इसके बाद बिनोवा जी ने इसे आंदोलन का रूप देकर पूरे देश से अपने जीवन में 47 लाख एकड़ जमीन दान में ली। जमीन बांटने का काम राज्य और जिला भूदान समिति को दिया गया। लेकिन देखा जा रहा है कि भूदान की जमीन लूट की शिकार होती गई हैं। आगे बढेÞं, इससे पहले एक नजर डालते हैं भूदानी जमीनों पर।

आपको बता दें कि संयुक्त बिहार से सबसे ज्यादा जमीनें भूदान आंदोलन को दान की गई थी। करीब 22 लाख एकड़ जमीन संयुक्त बिहार से मिली थी। इनमें से बिहार के जमींदारों ने 6,48,593 एकड़ और झारख्ांड के जमींदारों ने 14,69,280 एकड़ जमीन बिनोवा जी को दी थी। 45 सालों के बाद भी ये जमीनें आज तक भूमिहीनों को नहीं दी गई है। बिहार और झारखंड में 2 लाख 32 हजार लोगों ने ये जमीन दान दी थी। बिहार में मात्र 2,78,320 एकड़ जमीन ही आज तक बंट पायी है, जबकि झारखंड में मात्र 4,88,735 एकड़ जमीन ही भूमिहीनों तक पहुंच पाई है। इनमें भी जिन भूमिहीनों को जमीन दे भी दी गई, उसका मालिकाना पट्टा आज तक लोगों को नहीं मिला है। राजस्व विभाग सारे कागजात अपने पास रखे हुए है और कागज देने के नाम पर मोटी रकम की मांग कर रहे हैं। बिहार और झारखंड से मिली लगभग 22 लाख एकड़ जमीनों में से अधिकतर जमीनों को दलालों और भ्रष्ट नौकरशाहों से लेकर भूदान समिति से जुड़े लोगोें ने अनफिट और बेकार घोषित कर दिया है। नदी नाला और पहाड़ी जमीन के नाम पर ये जमीने लूट की शिकार हो रही हैं।

इसके अलावा बहुत सारी जमीनें तो ऐसी भी हैं, जिसे दानदाताओं ने नाम कमाने के लिए दान तो दे दी, लेकिन आज भी उन जमीनों पर कब्जा उन्हीं का बना हुआ है। झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता ठाकुर प्रसाद कहते हैं कि -‘आदिवासियों, गरीबों और भूमिहीनों की बात करने वाली बिहार और झारखंड सरकार से कौन पूछने जाए कि भूदानी जमीन कहां है और उन जमीनों को सही तरीके से भूमिहीनों के बीच क्यों नहीं बांटा जा रहा है। जो सरकार इतना भी काम नहीं कर सकती भला उससे उम्मीद क्या की जाएगी। सही बात तो यह है कि अधिकतर जमीनों को बिल्डरों ने हड़प लिया है और इसमें राज्य सरकार के लोग भी शामिल हैं। राज्य के भू राजस्व मंत्री हैं मथुरा महतो। जमीनी आदमी हैं और लोकप्रिय भी। लेकिन भूदान से संबंधित जमीन वितरण के बारे में जब एक संवाददाता ने सवाल किया, तो महतो साहब चुप हो गए। कहने लगे कि, ‘कुछ जमीनें पहले भूमिहीनों को बांटी गई थी और अभी इस पर फिर से काम किया जाना है, जमीन की मॉनीटरिंग की जा रही है।

अब आपको ले चलते हैं नीतीश जी के राज्य में। कहा जा रहा है कि वहां सब कुछ हरा-भरा हो गया है। लेकिन भूदानी जमीन के मामले में बिहार में भी लूटपाट कम नहीं हुई है। बिहार में भूमि सुधार के नाम पर डी बंदोपाध्याय आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 11 जून 2007 को राज्य सरकार को सौंप दी। आयोग का कहना है कि पहले तो सरकार के पास भूदानी जमीन के अलावा किसी भी जमीन की सही जानकारी नहीं है और न ही उसका हिसाब किताब है। दूसरा, भूदान की जमीन में भारी गड़बड़ी हुई है। भूदान यज्ञ समिति और राजस्व विभाग के जमीन संबंधी आंकड़ों में काफी अंतर है। तीसरा, 1961 में भू हदबंदी कानून बनाया गया, लेकिन आज तक लागू नहीं हुआ। चौथा, 500 एकड़ से ऊपर जमीन रखने वाले भूस्वामियों की नई-नई सूचियां तैयार होती रही हैं। इस प्रकार की सूची 1070़76 एवं 1982़83 और 29 जून 1990 को बिहार विधानसभा के अंदर 500 एकड़ से ऊपर जमीन रखने वाले 35 भूस्वामियों की सूची प्रस्तुत की गई थी, लेकिन मामला दब कर रह गया।

बिहार में कई मामले तो चौंकाने वाले हैं। उपरोक्त कमीशन की रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि भूदान की 11130 एकड़ जमीन 59 संस्थाओं को दे दी गई। जो भूदान कानून के विरुद्घ है। औसतन एक संस्था को 189 एकड़ जमीन दी गई है। चंूकि यह मामला राज्य सरकार से संबंधित है इसलिए कहा जा सकता है कि सरकारी बाबुओं और भूदान समिति के लोगों ने मिलकर यह सारा खेल खेला है। पूर्णिया जिले में भूदान कार्यालय मंत्री हैं मुस्तफा रजा आलम। आलम ने अपनी पत्नी रेहाना खातून के नाम 4 एकड़ जमीन खाता नंबर 444, खसरा नंबर 405, 23 जुलाई 2008 को करा दी है। यह जमीन पूर्णिया जिले के रूपौली थाने के मउआ परबल गांव में दी गई है। इसका प्रमाण पत्र संख्या है 778549। इसी महिला के नाम पूर्णिया जिले के गोपालपुर थाने के जहांगीरपुर बैसी में 2 एकड़ की एक और जमीन है। इस जमीन का खाता नंबर 866 और खसरा नंबर है 101। इसका प्रमाणपत्र संख्या है 768166। यह जमीन 3 नवंबर 2007 को दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट का इस मसले में साफ आदेश है कि भूमिहीनों को जमीन दी जाएगी और वह भी स्थानीय भूमिहीनों को। मुस्तफा रजा का सगा भाई मो. इसराफिल पटना भूदान आफिस में काम करते हैं। इन्होंने अपनी पत्नी रजिया खातून के नाम 4 एकड़ जमीन पूर्णिया के ही भउआ परबल गांव में करवाई है। इस जमीन का प्रमाण संख्या है 778530। यह जमीन 23 जुलाई 2008 को रजिया खातून के नाम की गई है। इसी महिला के नाम एक एकड़ जमीन जहांगीर पुर बैसी में भी की गई है, जिसका प्रमाण संख्या 768211 है। यह जमीन 3 नवंबर 2007 को लिखी गई है।

एक अन्य 2 एकड़ की तीसरी जमीन भी इसी रजिया खातून के नाम जहांगीरपुर बैसी में की गई है, जिसका खाता नंबर है 896 और खसरा नंबर है 101। इस जमीन का प्रमाण पत्र देने वालों में विजय कुमार शर्मा, कार्यालय मंत्री, भागलपुर भूदान कार्यालय के हस्ताक्षर हैं। आपको यह भी बता दें कि ये सारी जमीनें नीतीश कुमार के शासन में बांटी गई हैं। बिहार भूदान यज्ञ समिति के अध्यक्ष शुभमूर्ति उपरोक्त मामले पर चुप्पी तोड़ते हुए कहते हैं कि ‘जिस मामले की आप चर्चा कर रहे हैं वह सही है। लेकिन सही ये भी है कि मुस्तफा रजा और और इसराफिल की पत्नी के नाम से जो जमीन दी गई थी उसे वापस ले लिया गया है। गलती हुई थी, लेकिन उसे सुधार दिया गया है। अब उस जमीन के कागजात रद्द हो गए हैं और उसके प्रमाणपत्र भी वापस कर लिए गए हैं। आपको बता दें कि हमारे कुछ विरोधी हैं जो हमें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। गलती राज्य सरकार करती है और बदनाम भूदान कमेटी को किया जाता है।’ जैविक खेती अभियान के संयोजक क्रांति प्रकाश कहते हैं कि ‘बिनोवा जी ने देश में घूम-घूम कर जमीनें हासिल कीं ताकि गरीब और भूमिहीनों को जमीन दी जा सके। लेकिन इस देश की राजनीति ने बिनोवा भावे के सपनों को भी तोड़ दिया। कुछ जमीनें बांटी गर्ईं जबकि अधिकतर जमीने लालफीताशाही के चक्कर में फंसी हंै। इसके अलावा कुछ जमीनें तो अभी भी लठैतों के कब्जें में हैं। या तो जमीन बंटनी चाहिए या फिर उस जमीन को वापस कर देना चाहिए।’ शुभमूतर्र््िा लंबे समय से भूदान आंदोलन से जुड़े हैं। इन्हें अवैतनिक सेवा शुल्क के रूप में 8 हजार रुपए दिए जाते हैं। लेकिन उनको हर महीने 43801 रुपये वेतन के रूप में मिल रहे हैं। इनको महंगाई भत्ते के रूप में 4320 रुपये, अतिथि भत्ता के रूप में 14

हजार रुपये, क्षेत्रीय भत्ते के रूप में 12 हजार रुपये और ड्राइवर भत्ते के रूप में 5481 रुपये भी मिल रहे हैं। सवाल है कि क्या अवैतनिक लोगों को महंगाई भत्ता दिया जाता है? आपको बता दें कि बिहार भूदान समिति से जुड़े सैकड़ों कार्यकर्ता 27 माह से वेतन न मिलने की शिकायत कर रहे हैं, जबकि हर साल राज्य सरकार भूदानी लोगों के लिए 60 से 70 लाख रुपये देती है। शुभमूर्ति कहते हैं कि मुझे बदनाम किया जा रहा है। दरअसल अध्यक्ष का पद राज्य मंत्री का होता हैं। आज की तिथि में एक राज्य मंत्री को 60-70 हजार रुपये वोतन के रूप में मिलते हैं, ऊपर से घर और गाड़ी अलग से। अब चंूकि मैं भूदान कमेटी से जुड़ा हूं इसलिए मैं आधा वेतन ही ले रहा हूं, लेकिन भाइयों को यह पसंद नहीं।’ भूदानी जमीन की लूट केवल बिहार या गुजरात में ही नहीं की गई है। जहां-जहां से जमीनें मिली हैं, जमीने लूट की शिकार हुई हैं। आंध्र में कुल 2,52,119 एकड़ जमीन दान में मिली थी। इनमें से 1,08,770 एकड़ जमीन अनियमिततापूर्वक बंट तो गई हैं बाकि लगभग एक लाख जमीन बिल्डरों और संस्थाओं के हाथ में चली गई है। बिल्डरों के कई मामले अभी अदालत में चल रहे हैं।

तमिलनाडु में तो भूदानी जमीन को लूटने के लिए भूदान एक्ट में ही संशोधन कर दिया गया। तमिलनाडु में कुल 27677 एकड़ जमीन दान में मिली थी। इनमें से 22837 एकड़ जमीन किसी तरह बंट गई है, शेष 4840 एकड़ जमीन संस्थाएं और बिल्डरों के चंगुल में हंै। उड़ीसा में भी भूदानी जमीन को लूटा गया है। उड़ीसा में भूदान आंदोलन के तहत कुल 6,38,706 एकड़ जमीन दान में मिली थी। इसमें से 5,79,984 एकड़ जमीन बांट दी गई है। इनमें भी कई जमीन ऐसे लोगों को दे दी गई है, जो भूमिहीन वर्ग में नहीं आते हैं। इसके अलावा खुर्दा जिले के पीपली तहसील में 171 एकड़ जमीन बिल्डर के हाथों बेच दी गई है। बिल्डरों ने इस पर निर्माण भी कर लिया था, जिसे एफआईआर के बाद खुर्दा के कलेक्टर ने तोड़ दिया है। लेकिन अभी तक जमीन बेचने वाले और खरीदने वाले पुलिस के हाथ नहीं लगे हैं। राज्य के राजस्व और आपदा मंत्री सूर्य नारायण कहते हैं कि ‘दोषी चाहे जो भी हो हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे। भूदानी जमीन किसी को नहीं दी जा सकती। यह भूमिहीनों के लिए है। जिन लोगों ने जमीन लूटी है, हम उन्हें तलाश रहे हैं।’

बिनोवा भावे के भूदान आंदोलन के तहत भूमिहीनों के लिए देशभर से दान में मिली जमीनों की पहली शर्त ये है कि स्थानीय भूमिहीनों के अलावा जमीन किसी और को न तो दी जा सकती है और न हीं किसी भी सूरत में बेची जा सकती है। भूदानी कानून के अलावा माननीय सुप्रीम कोर्ट का भी यही आदेश है। सबसे पहले आइए नजर डालते हैं गुजरात में भूदानी जमीनों पर। सरकार के लोगों और राज्य भूदान समिति के लोगों ने मिलकर पैसे की लालच में भूदानी जमीनों को बिल्डरों के हाथ बेच दी है। गुजरात का ब्लॉक नंबर 542। गांव भदज। इस इलाके को आधुनिक समय में साइंस सिटी के नाम से जाना जाता है। राज्य सरकार और भूदानी समिति से जुड़े लोगों ने यहां की लगभग 12 एकड़ भूदानी जमीन एक बिल्डर रश्मिकांत छगान भाई पटेल को मात्र एक करोड़ 18 लाख में बेच दी। वर्तमान समय में यहां एक एकड़ जमीन की कीमत 2 करोड़ के आसपास है। गुजरात के ही खेड़ा जिले के राधु गांव की ही भूदानी 5 एकड़ जमीन सभी नियमों को ताख पर रखकर मात्र 3 लाख में बिल्डर दिनेश भाई रमण भाई पटेल को बेच दी है। इस जमीन का सर्वे नं. है 1662 और 1664। आपको बता दें कि भूदान के तहत पहले यह जमीन अलेफ खान और गुलाब खान पठान को दी गई थी। बाद में यह बिल्डर के हवाले कर दी गई। अहमदाबाद शहर में ही साबरमती आश्रम के पास ग्राम स्वराज आश्रम स्थित है। यहां की लगभग आधा एकड़ जमीन 3 नवंबर 2009 को एक व्यापारी के हाथ मात्र 39 लाख रुपये में बेच दी गई है। बाघोरिया रोड पर पापोद मोहल्ला की 1़4 हेक्टेयर भूदानी जमीन प्रणव पंचाल, बैकुंठ नाथ बिल्डर को 2004 में बेच दी गई है। अहमदाबाद के ही नरोदा में एक और भूदानी जमीन को बिल्डर के हवाले किया जा चुका है। 0़43़43 हेक्टेयर जमीन 2008 में प्रवीण भाई मणि भाई पटेल के हाथ बेच दी गई है। इस जमीन का रजिस्ट्री नं. है 5160/2008।

जरा दिल्ली का हाल भी देखें। भूदान यज्ञ में दिल्ली के लोगों ने बिनोवा भावे को 300 एकड़ जमीन दान में दी थी। इन जमीनों में से 180 एकड़ जमीन का वितरण दिल्ली सरकार करने का दावा कर रही है। बाकि120 एकड़ जमीन कहां है और किसके कब्जे में है, इसका कोई रिकार्ड किसी के पास नहीं है। फरीदाबाद और नोएडा की भूदानी जमीनों को बिल्डरों ने कब्जा रखा है। डिफेंस हाउसिंग के नाम पर माफियाओं ने यहां की 30 एकड़ जमीन लूट ली है। यह मामला अदालत में है। कहा जा रहा है कि दिल्ली और हरियाणा के तीन नेताओं ने मिलकर यह काम किया था और करोड़पति बन गए। इसी तरह महाराष्ट्र से भूदान के तहत 1,58,160 एकड़ जमीन मिली थी। इसमें से 1,13,230 एकड़ जमीन बंट चुकी है। बाकि की 44,930 एकड़ जमीन अभी विवादों में फंसी हुई है। बिनोवा भावे ने सबसे पहले भूदान आंदोलन की शुरुआत बर्धा से की थी। लेकिन बाद के दिनों में बर्धा और थाने इलाके में भूदानी जमीन की जमकर लूट की गई।

भूदानी जमीन की हो रही है लूट : महादेव विद्रोही

अखिल भारत सर्वोदय मंडल, सर्व सेवा संघ के महासचिव रहे महादेव विद्रोही इन दिनों गुजरात के अहमदाबाद में गांधी और बिनोवा के कामों को आगे बढ़ाने में लगे हैं। भूदान आंदोलन में मिली भूदान की जमीनों को जिस तरह से देश भर में लूटा गया है और लूटने की साजिश की जा रही है, इससे विद्रोही खासे दुखी है। जमीन को लेकर अखिलेश अखिल की महादेव विद्रोही से लंबी बातचीत के प्रमुख अंश-

आप बिनोवा भावे के सर्वोदय आंदोलन को समझते हैं। आप उनके आंदोलन को किस रूप में देख रहे हैं?

गांधी जी की चर्चा तो आज की राजनीति में हो भी जाती है, लेकिन महान संत और भूमिहीनों के मसीहा कहे जाने वाले भावे की चर्चा तो आज की राजनीति करती भी नहीं है। यह हमारे पतन की बात है। हम अपनी विरासत और उसके कामों को अगर भूल जाएं तो आगे कुछ बचता ही नहीं है। भले ही आप कुछ भी कहते रहें। भावे महान नेता थे। उन्होंने भूमिहीनों के लिए जो काम किया आज के नेता सरकारी फंडों के जरिए भी उतना बड़ा काम नहीं कर रहे हैं। लंगोटी पहनकर जिस संत ने गांव-गांव जाकर गरीबों और भूमिहीनों के लिए जमीन दान में ली, आज वही जमीन लोगों के लिए लूट और बिजनेस का जरिया बन गई है। आज तक किसी सरकार ने भूदानी जमीन को सही रूप में भूमिहीनों तक पहुंचाने की कोशिश नहीं की है ।र्

बिनोवा जी को दान में कितनी जमीन मिली थी?

देखिए इसमें विवाद है। केंद्र सरकार के अपने आंकड़े हैं, राज्य सरकार के अपने आंकड़े हैं। भूदान समिति के अलग आंकड़े हैं और सर्वोदय मंडल के अपने आंकड़े हैं। लेकिन भूदान समिति के पास जो आंकड़े हैं उसके मुताबिक आंदोलन में 47 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन मिली थी। आज का कोई नेता एक एकड़ जमीन भी किसी से लेकर दिखा दे। लोगों को विश्वास ही नहीं है आज के नेताओं पर। लेकिन आप को बता दें कि कुछ राज्यों में तो किसी तरह जमीन लोगों में बांटी गई, जबकि कई राज्यों में जमीनों को लूटा गया। अभी भी कई राज्यों में भूदानी जमीन को नदी, नाला और पहाड़ बताकर लूटने का खेल चल रहा है, बिहार इसमें से एक है। र्

सबसे ज्यादा जमीन किस राज्य से मिली थी?

सबसे ज्यादा जमीन तो संयुक्त बिहार से मिली थी। कोई 22 लाख एकड़ जमीन बिहार के 2 लाख से ज्यादा लोगों ने दी थी। आज की तिथि में बिहार का हिस्सा मानें, तो करीब साढ़ 6 लाख एकड़ जमीन बिहार से और बाकि के 14 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन झारखंड से मिली थी। इन दोनों राज्यों में भूमि बांटने की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है। एक-एक आदमी के नाम से कई जगह जमीनें हैं। फिर जिन लोगों को जमीन मिली है, कागजी पट्टा आज तक उन्हें नहीं दिया गया है। लगता है भूदानी जमीन पर इन राज्यों में राजनीति खूब चल रही है। बिहार की एक और सच्चाई आपको बता दूं कि भूमिहीनों में दो फीसदी महिलाओं को भी भूदानी जमीन नहीं मिल सकी है।

भूदानी जमीन को कई राज्यों में बिल्डरों को बेचने की बात सामने आई है?

इसके बारे में मत पूछिए। जांच हो जाए तो आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला सामने आएगा। सबसे ज्यादा जमीन गुजरात में बिल्डरों को बेची गई है। और इसमें राज्य सरकार और भूदान समिति के लोगों ने मिलकर खेल किया है। करोड़ों की जमीन लाखों में बेची गई है और और तमाम भूदान कानून को तोड़कर। आंध्र में भी बिल्डरों ने काफी जमीनें ले रखी है। इसके अलावा महाराष्ट्र और तमिलनाडु में भी बिल्डरों ने जमीन ले रखी है। सरकार भूमिहीनों को जमीन दे नहीं रही है और बिल्डरों के साथ शेयर करके जमीन को लूट रही है। फरीदाबाद, नोएडा और दिल्ली में 30 एकड़ से ज्यादा जमीन बिल्डरों ने डिफेंस आवास समिति के नाम पर ले रखी है। र्

कुछ राज्यों में भूदान कानून खत्म करने की बात भी सामने आई है?

हां कुछ राज्यों ने अपनी सुविधा के लिए यह कानून समाप्त कर दिया है। इस कानून को राजस्व विभाग से मिला दिया गया है। पंजाब, हरियाणा, प. बंगाल, मध्यप्रदेश, हिमाचल समेत कई राज्य और भी हैं, जहां भूदान कानून को समाप्त कर दिया गया है।र्

क्या आप मानते हैं कि देश में जो नक्सली समस्या है, उसका एक प्रमुख कारण जमीन है?

यह एक समस्या नहीं, मूल कारण है। जमीन सही मायने में भूमिहीनों में बांट दी गई होती, तो आज यह समस्या इतनी बड़ी नहीं होती। कभी-कभी तो हमें लगता है कि देश के नेता जानबूझ कर समस्या को बढ़ाते हैं ताकि उनकी राजनीति चलती रहे। आज भी बिहार और झारखंड की भूदानी जमीने लोगों में बांट दी जाए तो बहुत हद तक नक्सली समस्या समाप्त हो सकती हैं। र्

कहा जा रहा है कि भूदान आंदोलन से जुड़े वॉलेंटियर आज भी गरीबी में जी रहे हैं?

किसी भी आंदोलन से जुड़े लोग अंत तक परेशान ही रहते हैं। यह बात और है कि कुछ तेज लोग बाद में बदल जाते हैं और अमीर बन जाते हैं। यह जो आज की अमीरी है, वह लूटतंत्र पर आधारित है। आप वेतन पाकर अमीर नहीं हो सकते। अमीर बनने के लिए आपको लूटना होगा और आज सबसे ज्यादा कमाई तो जमीन में ही है। आप भूदानी लोगों की सही तस्वीर देखना चाहते हैं तो पटना चले जाएं। 27 महीने से लोगों को वेतन नहीं मिला है। और भूदान समिति के जो अध्यक्ष है वे ठाठ का जीवन जी रहे हैं। उन्हें मानद रूप में 8 हजार रुपए के बजाए 40 हजार से ज्यादा मिलता है। ऊपर से महंगाई भत्ता अलग। क्या अवैतनिक लोगों को भी महंगाई भत्ता मिलता है?र्

भूदानी जमीन के बारे में कानून क्या कहता है?

अरे भाई इस देश में कानून को कौन मान रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह रखा है कि भूदानी जमीन केवल स्थानीय भूमिहीनों को ही दी जाएगी। लेकिन ऐसा होता तो नहीं दिखता। कुछ लोगों को इस दिशा में काम करने की जरूरत है।

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