Friday, November 11, 2011

सवर्णों को भी आरक्षण


सुशासनी सरकार के ‘चतुर’ मुखिया नीतीश कुमार ने अगले विधानसभा चुनाव में जीत की बिसात अभी से ही बिछानी शुरू कर दी है। सवर्ण आयोग के माध्यम से उन्होंने सवर्णों को चुनाव की चाशनी में बने आरक्षण का लॉलीपॉप देने का इंतजाम भी कर लिया है। इसके लिए सवर्ण आयोग की ओर से रिपोर्ट तैयार की जा रही है। रिपोर्ट के आधार पर ही गरीब सवर्णों को आरक्षण मिलेगा। कब और कितना मिलेगा आरक्षण, अभी यह कह पाना मुश्किल है, लेकिन, कैसे मिलेगा लॉलीपॉप, यह सभी जानते हैं। पढ़िए रिपोर्ट...

अपने देश के लोग गिफ्ट पर मर मिटते हैं। गिफ्ट के उपयोग से भले ही आप अंधे हो जाएं, आपकी जान चली जाए, आपके खर्च बढ़ जाएं, आपका प्राकृतिक जीवन प्रभावित हो जाए, लेकिन गिफ्ट तो गिफ्ट है। गिफ्ट के रूप में जहर भी लेने से लोग बाज नहीं आते। बाजारवाद ने इंसान की प्रकृति को ही नहीं बदला है, बल्कि अब बाजार इंसान पर हुकूमत करता दिख रहा है। इसी बाजार के प्रभाव को राजनीति में भी अपनाया जा रहा है। चुनाव के मौसम में तमाम राजनीतिक पार्टियां जनता के सामने गुलगुले परोसती नजर आती है। तमाम नेता, उम्मीदवार चाहे वह पाखंडी ही क्यों न हो, हमारी सारी समस्याएं खत्म करते नजर आते हैं, लेकिन असल में करते कुछ नहीं। लोगों की ऐसी समझ बन गई है। जनता इनकी डपोरशंखी बोल से ऊब-सी गई थी। पिछले 10 सालों से जनता के सामने कुछ नई चीजें लेकर कोई राजनीतिक पार्टी नहीं आई, लेकिन संभव है कि एनडीए आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अगड़ी जाति के सामने एक बडुा गिफ्ट हैंपर रखे। अगड़ी जाति को आरक्षण देने का गिफ्ट।

अगले चुनाव में इस गिफ्ट को भुनाने के लिए एनडीए ने इस नायाब तोहफे का सफल प्रयोग बिहार में सवर्ण आयोग के रूप में करने जा रहा है। इस गिफ्ट से बिहार की जनता पर क्या असर पड़ेगा और अगड़ी जाति आर्थिक आरक्षण के नाम पर दो हिस्सों में बंट जाने से उसके सांस्कृतिक आरैर सामाजिक जीवन पर क्या असर पडेÞगा, अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन तय मानिए कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस दिमागी प्रयोग का लाभ एनडीए को अगले चुनाव में मिलेगा। बिहार इस मामले में एक मॉडल स्टेट के रूप में आता दिख रहा है और नीतीश की छवि बिहार से निकल कर भारत के भूगोल पर निखरती जा रही है। संभव है कि नीतीश की इस छवि पर राजनीतिक बहस भी शुरू हो जाए ।

वोट का लाभ उठाने की कोशिश : अपने शासन की पहली पारी में राज्य के दलितों को बांट और महादलित आयोग बनाकर पिछले विधानसभा चुनाव में भरपूर वोट का लाभ उठाने वाले नीतीश कुमार ने शासन की दूसरी पारी में अगड़ी जाति, यानी सवर्णों को सवर्ण आयोग के जरिए जो राजनीति शुरू की है, उसके दूरगामी परिणाम होने वाले हैं। नीतीश की यह राजनीति भले ही तत्काल में सूबे के गरीब सवर्णों को आर्थिक लाभ पहुंचाने को लेकर दिखती हो, लेकिन इसका असर सूबे की सीमा पार कर राष्टÑीय फलक पर पड़ता दिख रहा है। नीतीश कुमार को सवर्ण आयोग का लाभ आगामी बिहार विधानसभा में क्या मिलेगा, अभी कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तो तय है कि इस तरह के खेल का लाभ उसे आगामी लोकसभा चुनाव में जरूर मिलेगा। नीतीश ने इस तरह पहल करके न सिर्फअन्य राज्यों के गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण के रास्ते खोल दिए हैं, बल्कि केंद्र के सामने भी गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की एक नई चुनौती रख दी है। अभी तो केंद्र सरकार को सच्चर कमेटी की अनुशंसा पर मुसलमानों को ही आरक्षण देने में परेशानी हो रही है, जब सवर्णों की आरक्षण मांग उठेगी, तब की राजनीति की कल्पना लोग खुद ही कर सकते हैं। संभव है, पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू प्राथमिकता के तौर पर अपने घोषणा पत्र में गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग उठाएंगी और लोकसभा चुनाव में भाजपा और जदयू का संभवत: जनता से पहला वादा होगा कि अगर उनकी सरकार बनती है, तो सरकार गरीब सवर्णों को आरक्षण देगी। बिहार में किए गए प्रयोग को एनडीए उदाहरण के तौर पर पेश कर सवर्णों का एक बड़ा वोट बैंक अपने पक्ष में लाने में सफल हो सकता है।

खेल की है सबको जानकारी : ऐसा नहीं है कि दूर की राजनीति करने वाली कांग्रेस को एनडीए के इस खेल की जानकारी नहीं है। आप यह भी नहीं कह सकते हैं कि नीतीश के लोक लुभावन योजनाओं और उनकी अगली राजनीतिक रणनीति को कांग्रेस नहीं समझ रही है, लेकिन सच्चाई यही है कि अगड़ों को आरक्षण का लाभ देने जा रही बिहार सरकार देश की पहली सरकार है और इस खेल के पीछे नीतीश की लंबी सोच है। लेकिन सवर्णों को आरक्षण देने को लेकर बिहार में एक तरफ जहां नीतीश सरकार की जय-जयकार हो रही है, वहीं इस सवर्ण आयोग की कार्यप्रणाली और अगड़ों को बांटने को लेकर भी कई तरह के विरोधी स्वर भी मुखर होने लगे हैं।

नीतीश की हरकतों पर है नजर : नीतीश कुमार के कट्टर विरोधी सांसद और बिहार निर्माण मंच के अगुवा उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि ‘हमारी नजर नीतीश कुमार की तमाम हरकतों पर है। सवर्ण आयोग के जरिए वे समाज को चाहे जो भी देने की बात कर रहे हों, उनकी नीयत में खोट है और उनमें इच्छाशक्ति का भी अभाव है। मार्च महीने में आयोग का गठन हुआ है और अब तक इस पर कोई काम नहीं हो सका है। नीतीश कुमार इससे पहले भी कई आयोग बना चुके हैं, लेकिन उन आयोगों की रपटों पर आज तक अमल नहीं हो पाया है।

आरक्षण के नाम पर बरगलाने की तैयारी : दरअसल, वे लोगों को बरगला रहे हैं। हमें इसमें संदेह है कि इस आयोग का लाभ सवर्णों को मिलेगा और अगर कुछ हुआ भी तो समाज को बांटने का एक और खेल इसे कहा जा सकता है।’ दरअसल, सवर्ण आयोग की परिकल्पना नीतीश कुमार ने 2010 के चुनाव के समय ही की थी। चुनाव में जीत हासिल करने के बाद जनवरी, 2011 में सरकार ने इस बारे में घोषणा की और मार्च में इस आयोग ने काम करना शुरू कर दिया। पांच सदस्यीय इस आयोग के चेयरमैन बीके त्रिवेदी हैं और सदस्य के रूप में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुडेÞ चार लोग हैं। आयोग की जिम्मेदारी उच्च जाति में गरीबों की पहचान करने की है और उन सवर्ण गरीबों का कल्याण कैसे हो, इसके लिए संभावित योजनाओं की अनुशंसा करना है। फिर सरकार इस समुदाय के विकास के लिए आगे क्या करती है, वह देखने वाली बात हो सकती है। आयोग मुख्यत: राजपूत, ब्राह्मण, भूमिहार, कायस्थ, शेख, सैयद और पठानों के बीच गरीबों की पहचान करने के लिए कई तरह के सर्वे पर काम कर रहा है।

बता दें कि आगामी लोकसभा चुनाव में नीतीश इस कार्ड को खेलने का प्रयास करेंगे और इसके लिए जरूरी है कि यह आयोग अगले दो साल तक काम करता रहे और 2014 के पहले अपना रिपोर्ट सरकार के पास जमा करे। आयोग के सदस्य संजय मयूख कहते हैं कि अभी 6 माह हुए हैं, आयोग बने हुए। हम लोग अभी सवर्णों के शैक्षणिक और आर्थिक हालात का जायजा लेने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए हमलोग जिला अधिकारी और शिक्षा विभाग के संपर्कमें हैं। इसके अलावा गरीबों के कल्याण के लिए अन्य राज्यों में बने इस तरह के आयोगों और उसकी रपटों को भी हमलोग अध्ययन कर रहे हैं, ताकि गरीब सवर्णों को आर्थिक रूप से सबल बनाया जा सके।’ हलाकि संजय मयूख इस आयोग के राजनीतिक दांव के बारे में कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन बिहार एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट ‘आद्री’ के निदेशक और प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता शैबाल गुप्ता की राय अलग है। शैबाल गुप्ता कहते हैं कि राजनीति तो हर काम में होती है। उस नजरिए से देखें, तो सवर्ण आयोग को आप राजनीतिक खेल कह सकते हैं। जब राजनीतिक स्तर पर कोई काम होता है, तो उसमें राजनीतिक लाभ-हानि भी छुपी होती है। अगर गरीब सवर्णों को इस आयोग के जरिए कोई लाभ मिलता है, तो इसके राजनीतिक लाभ भी राजनीति करने वाले ही लेंगे। कर्पूरी ठाकुर के जमाने में इस दिशा में मुंगेरी लाल कमीशन बनाया गया था। आप कह सकते हैं कि यह काम भी उसी दिशा में होगा, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है, समाज के निचले पायदान पर खडेÞ लोगों का हम कितना भला कर पाते हैं? सरकार गरीब सवर्णों के लिए कुछ करती है, तो अच्छा ही होगा।’ बता दें कि देश में अब तक जो जातिगत आंकड़ा उपलब्ध है, वह 1931 की जनगणना रिपोर्ट वाली है।

इसी जातिगत आंकड़ों के आधार पर देश में अब तक जातिगत चुनावी समीकरण बनते बिगड़ते रहे हैं। आजादी के बाद पहली बार जातिगत जनगणना इस साल कराई जा रही है, जिसके आंकडेÞ अब तक नहीं आए हैं। 1931 की जनगणना के मुताबिक, अगड़ी जातियों की आबादी लगभग 17 फीसदी है। बता दें कि राज्य सरकार कहती रही है कि सूबे में गरीब परिवारों की आबादी डेढ़ करोड़ के आसपास है। यदि इस आंकडेंÞ को सही मानें, तो राज्य की 60से 65 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। उधर, राज्य में गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों के लिए एक और आंकड़ा है। यह आंकड़ा एएन सिन्हा शोध अध्ययन केंद्र का हैं। इस आंकडेÞ के मुताबिक, सूबे के करीब 40 फीसदी लोग ही बीपीएल के दायरे में आते हैं। हालांकि यह आंकड़ा तीन साल पुराना है। सूत्रों की मानें, तो सवर्ण आयोग इसी आंकडेÞ को लेकर अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा है। अगर इस आंकडेÞ को गरीबी का आधार माना जाता है, तो सूबे के करीब 60 फीसदी लोग गरीब नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अनुसूचित जनजाति के 43.4,अनुसूचित जाति के 64.2 अन्य पिछड़ी जाति के 34.6 और सवर्ण के 17.3 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। यानी, अगड़ी जाति के 82.7 फीसदी लोग अमीर हैं।

हालांकि आयोग के सदस्य संजय मयूख कहते हैं कि आयोग के सामने कई तरह के आंकडेÞ तो हैं, लेकिन आयोग व्यापक स्तर पर सर्वे कराकर सही आंकड़ा तैयार करने की कोशिश में लगा हुआ है, ताकि आयोग अपने लक्ष्य के साथ न्याय कर सके। हम लोग अगड़ी जाति के उन गरीबों को मुख्यधारा से जोड़ने में लगे हुए हैं, जो सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछडेÞ हुए हैं।’ सवर्ण आयोग की रपट का सूबे के सवर्णों को इंतजार है। आयोग की रपट आने के बाद किस तरह की राजनीति सामने आएगी, अभी कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि अगर नीतीश की यह राजनीति सफल हो जाती है, तो आगामी लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए को लाभ जरूर मिल सकता है।

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