Saturday, November 26, 2011

खामियों को छिपाने में सफल




जांच आयोग यानी, ‘कमीशन आॅफ एन्क्वॉयरी’ को यदि जनता के साथ धोखा करने वाली संस्था कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। राजनीतिज्ञ और नौकरशाह पहले से ही इसकी सच्चाई को जानते-समझते थे। मगर अब इस अप्रभावी और दंतहीन संस्था से आमजनता का विश्वास भी टूट चुका है। जांच आयोग में काम करने वाले या उसकी अध्यक्षता करने वाले अवकाश प्राप्त जज या अन्य लोग सरकारी दामाद की ही तरह होते हैं, जो जांच आयोग के जरिए सिर्फ अपनी तिजोरी भरते हैं? बदले में सरकार और व्यवस्था की नाकामियों को दबाकर जनता को मूर्ख बनाते हैं। आजाद भारत में कितने जांच आयोग बने, यह बताना मुश्किल है। पर इतना जरूर है कि उनमें से अधिकतर की जांच रपट के आधार पर काम नहीं हुआ। आइए, देश के कुछ चर्चित जांच आयोगों पर नजर डालें- लंबे समय तक चलने वाले, खासे चर्चित और बेहद खर्चीले जांच आयोग की श्रेणी में लिब्रहान जांच आयोग सबसे ऊपर है। अयोध्या में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की जांच के लिए इस आयोग का गठन 16 दिसंबर 1992 में किया गया। सेवानिवृत्त जज एमएस लिब्रहान की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय यह आयोग देश में सबसे लंबे समय तक चलने वाला आयोग है। इस पर 9 करोड़ रुपये खर्च हुए और इसकी समय सीमा 48 बार बढ़ाई गई। 2009 के अंत में जब इसकी रपट सामने आई।

17 सालों में इस आयोग ने देश के सामने जो तथ्य रखा, वह आधा-अधूरा था और बिना निष्कर्ष के। आयोग ने अयोध्या के विवादित ढांचे के मसले पर न तो किसी को पूर्णतया दोषी माना और न ही तथ्यों की सही जानकारी दी। कुल मिलाकर इस आयोग पर जो करोड़ों रुपये खर्च हुए, उससे आभास होता है कि जनता के पैसे पानी में ही डूब गए। आजादी के बाद और खासकर 1950 के बाद विभिन्न दंगों, घोटालों, हत्याकांड, अलग-अलग तरह की दुर्घटनाओं और अन्य सामाजिक आर्थिक मसलों को लेकर सैकड़ों जांच आयोग बनाए गए, लेकिन कुछ एक को छोड़कर बाकी सारे जांच आयोग सफेद हाथी ही साबित हुए हैं। जदयू नेता और पार्टी के उपाध्यक्ष नवल किशोर राय कहते हैं कि ‘लोकतंत्र में जांच आयोग को गलत नहीं कहा जा सकता। आयोग का गठन तो मामलों की जांच तक ही सीमित है। कोई सरकार आयोग की रपट पर कितना अमल करती है, यह महत्वपूर्ण है। देखने में आया है कि अधिकतर आयोग की रपट पर कोई अमल नहीं होता।’ लोकतंत्र में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिनकी सरकार और सरकारी संस्थाओं पर अभी भी आस्था है। ऐसे लोगों के लिए जांच आयोगों के क्रिया कलापों की कुछ बानगी पेश है। गोधरा, गुजरात में साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी में कारसेवकों ने आग लगा दी थी। इसके बाद पूरा गुजरात हिंदू और ाुसलमानों के बीच हुए दंगों से कराह उठा।

इस घटना की जांच के लिए जज जीटी नानावटी की अध्यक्षता में जांच आयोग 2001 में बना। इस आयोग की पहली रिपोर्ट जब सामने आई, तो राजनीतिक दलों में भूचाल आ गया। सभी ने इस रिपोर्ट की आलोचना की और जज नानावटी को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। दरअसल, नानावटी ने अपनी इस रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी सरकार को क्लीनचिट तो दिया ही था, अलग से इस षड्यंत्र की थ्योरी को भी जायज माना था। कई लोगों ने इसे आईवाश कहा, तो कइयों ने इसे स्पॉन्सर रिपोर्ट माना। उधर एनडीए ने इस रिपोर्ट को सच करार दिया। इसकी जांच के लिए फिर से यूसी बनर्जी कमेटी बनी, जिसमें मोदी सरकार दोषी बताई गई। रिपोर्ट को लेकर कुछ ऐसे सवाल खडेÞ हो रहे हैं कि क्या जांच आयोग ने अपने कर्तव्य का सही से पालन किया? क्या यह आईवाश नहीं है? फिर क्या इस तरह के आयोग दोषी को सामने लाने में सक्षम हुए? लेकिन इतना सही है कि इस आयोग से जुड़े लोगों ने लाखों रुपये वेतन और भत्ते में ले लिए। जस्टिस राजेंद्र सच्चर का भी मानना है कि ‘जांच आयोग तो अपना काम करता है, मामले की जांच के बाद रिपोर्ट भी सामने आ जाती है, लेकिन उस पर अमल करने की बात आती है, तो राजनीति शुरू हो जाती है। ऐसी स्थिति में आप कह सकते हैं जांच आयोग का फिर कोई मतलब नहीं होता ।’ आइए कुछ मशहूर जांच आयोगों से आपका परिचय कराएं, जो अपनी जांच प्रणाली और कार्यकाल के लिए चर्चित रहे हैं। 1984 में सिख विरोधी दंगों में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में भारी संख्या में सिख मारे गए और उजाड़े गए थे।

इसकी जांच के लिए दस आयोग बने। इनमें मारवाह आयोग, रंगनाथ मिश्रा आयोग, कपूर मित्तल कमेटी, जैन बनर्जी कमेटी, पोटी-रोसा कमेटी, जैन-अग्रवाल कमेटी और जीटी नानावती कमेटी प्रमुख हैं। इनकीे रिपोर्ट कहां गई और इन पर कितने खर्च हुए, इसकी जानकारी शायद ही गृह मंत्रालय दे पाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये जांच आयोग किसी भी बडेÞ नेता को दंडित कर पाए? जज बीएन कृपाल जांच आयोग का मामला भी कुछ इसी तरह का है। इसका गठन 13 जुलाई 1985 को किया गया था ताकि वह 23 जून 1985 को अटलांटिक महासागर में ध्वस्त हो चुकी एयर इंडिया की फ्लाइट 182 बोइंग 747 की जांच कर सके। इसमें 329 लोग मारे गए थे। आयोग के सदस्यों ने कनाडा और अमेरिका की कई कई बार लंबी यात्रा कर अपनी रिपोर्ट पेश की। लेकिन जब इसकी सुनवाई शुरू हुई तो न इस रिपोर्ट से कुछ सावित हुआ और न ही कोई दंडित ही हो पाया। वहीं गोधरा कांड की जांच करने वाले जस्टिस नानावती जांच आयोग की रिपोर्ट जिस तरह बेकार गई, उसी तरह इस जांच आयोग की 1984 के सिख विरोधी दंग् की रिपोर्ट भी कचरे में चली गई। यह आयोग वर्ष 2000 में बनाया गया था। फरवरी 2005 में इसकी रिपोर्ट आई। इस आयोग पर 1 करोड़ 12 लाख 50 हजार रुपये खर्च हुए और नतीजा शून्य रहा। राजीव गांधी की हत्या की जांच के लिए जस्टिस जैन आयोग का 1991 में गठन हुआ और इसकी रिपोर्ट 1998 में आमने आई। इस आयोग पर 2 करोड़ 81 लाख रुपये खर्च हो गए। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु की जांच के लिए आधा दर्जन से ज्यादा आयोग गठित हो चुके हैं, लेकिन उनकी मृत्यु की सच्चाई आज तक देशवासियों के लिए एक रहस्य ही है। इस पर कितने करोड़ खर्च हो चुके हैं इसकी जानकारी अब गृह मंत्रालय के पास भी नहीं है।

गृहमंत्रालय के पास केवल जस्टिस मुखर्जी जांच आयोग का रिकार्ड ही है, जिसके मुताबिक 1991 से 1998 तक चलने वाले इस आयोग पर देश के 7 करोड़ रुपए खर्च हुए थे, लेकिन नेता जी की मृत्यु का पता नहीं चल सका। पोटा एक्ट में संशोधन मामले में वर्ष 2003 से 2005 के बीच इस मसले पर चार अलग-अलग जांच आयोग बनाए गए। सबसे पहले जस्टिस अरुण बी सहारया आयोग बना। इस पर 22 लाख 22 हजार रुपये खर्च हुए। फिर जस्टिस पुषा मेहरा कमेटी बनी, जिस पर 41 लाख 34 हजार रुपये खर्च हुए। फिर जस्टिस पीएन नाग कमेटी और एससी जैन आयोग बनाए गए। इन दोनों आयोगों पर क्रमश: 12 लाख 73 हजार और 17 लाख 26 हजार रुपये खर्च किए गए। संभव है कि इस पूरे खेल पर सरकार का अपना तर्क हो, लेकिन इतना तो पूछा ही जा सकता है कि आखिर इतने खर्च का औचित्य क्या है? असम नागालैंड संघर्ष को लेकर 1985 में शास्त्री जांच आयोग का गठन हुआ। दो वर्षों में इस आयोग पर 11 लाख रुपये खर्च हुए। बिहार में भी कुछ जांच आयोग बदनामी के शिकार हुए हैं। 1997 में राज्य सरकार की ओर से एक अमीर दास जांच आयोग का गठन हुआ, जिसका मकसद था प्रतिबंधित रणबीर सेना के साथ राजनीतिक दलों और नेताओं के संबंधों को उजागर करना। 2006 में यह आयोग बंद कर दिया गया। इस आयोग की रिपोर्ट में केवल कुछ लोगों के नाम सामने आए, जो सेना के लोगों से बातचीत करते थे। आपको बता दें कि इस आयोग पर भी लाखों रुपये खर्च हुए, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

बिहार में खजाना से अधिक निकाषी मामले की जांच के लिए 1996 में जस्टिस अली मोहम्मद जांच आयोग का गठन हुआ, लेकिन आजतक प्रदेश की जनता को यह पता नहीं चला कि वह जांच रिपोर्ट कहां है और उसपर अमल कितना हुआ? इसी तरह भागलपुर दंगे की जांच के लिए जस्टिस आरसीपी सिन्हा और जस्टिस सैमसुल जांच आयोग का गठन1989 में किया गया। इस आयोग की रिपोर्ट 1995 में आई। इस आयोग पर काफी धन खर्च हुआ था, लेकिन इस रिपोर्ट पर अमल करने के बजाए सत्ता में आई नई सरकार ने इसी मसले की जांच के लिए जस्टिस एनएन सिंह जांच आयोग का गठन कर दिया। 2008 में फिर जस्टिस सदानंद मुखर्जी जांच आयोग का गठन कहलगांव पुलिस फायरिंग की जांच करने के लिए किया गया है। बिहार के सांसद उपेंद्र कुशवाहा जांच आयोग को महज एक दिखावा मानते हैं। कुशवाहा कहते हैं कि ‘नीतीश सरकार ने कई आयोग बनाए। कई आयोग की रिपोर्ट भी आई, लेकिन उस पर अमल से सरकार भागती फिर रही है। ऐसे में आयोग का औचित्य ही क्या है? लगता है जनता को ठगने के लिए तत्काल आयोग बना दिए जाते हैं ताकि लोगों का ध्यान हट जाए और एक बात और रिटायर्ड जजों के लिए इससे भत्ता पानी का जुगाड़ भी हो जाता है।’ राजनीति के अपराधीकरण और 1992 में हुए मुंबई ब्लास्ट की जांच के लिए एनएन वोहरा कमेटी बनाई गई थी। कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद राजनीति में भूचाल आ गया था। कई नामचीन नेताओं की कलई खुली थी। कमेटी पर लाखों रुपए यूं ही बर्बाद हो गए। देश के नागरिकों के लिए एक बड़ा सवाल है कि क्या इस तरह के कमीशन आपराधिक जांच के विकल्प हो सकते है? क्या एक जज फॉरेंसिक जांच करने के काबिल हो सकता है?

क्या एक जज प्रशिक्षित पुलिस अफसर की तरह मामले की वैज्ञानिक जांच कर सकता है? क्या आयोग के पास यह अधिकार है कि वह गुनहगार और साक्ष्य मिटाने वालों को गिरफ्तार कर सके? इन तमाम सवालों को लेकर और आयोग के प्रभाव के मद्देनजर 1987 में दो जजों की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया था। कुछ चर्चित आयोगों की सूची आयोग जांच का विषय खर्च लिब्रहान आयोग बाबरी मस्जिद मामला 9 करोड़ नानावटी आयोग गोधरा कांड आंकड़ा नहीं मारवाह आयोग सिख दंगा आंकड़ा नहीं रंगनाथ मिश्र आयोग सिख दंगा आंकड़ा नहीं कपूर मित्तल आयोग सिख दंगा आंकड़ा नहीं जैन बनर्जी आयोग सिख दंगा आंकड़ा नहीं पोटा रोसा कमेटी सिख दंगा आंकड़ा नहीं जैन अग्रवाल आयोग सिख दंगा आंकड़ा नहीं नानावटी आयोग सख दंगा 1़12 करोड़ बीएन कृपाल आयोग् बोइंग 747 की जांच 97 लाख फूकन आयोग तहलका एक्सपोज जांच आंकड़ा नहीं जैन आयोग राजीव गांधी हत्याकांड 2.81 करोड़ मुखर्जी आयोग नेताजी सुभाषचंद्र मृत्यु जांच 7 करोड़ 6 अन्य आयोग उपरोक्त जांच आंकड़ा नहीं अरुण सहाय आयोग पोटा एक्ट 22.22 लाख ऊषा मेहरा कमेटी पोटा एक्ट 41.34 लाख पीएन नाग कमेटी पोटा एक्ट 12.73 लाख एससी जैन आयोग पोटा एक्ट 17.26 लाख शास्त्री जांच आयोग नागालैंड संघर्ष आंकड़ा नहीं वोहरा कमेटी मुंबई ब्लास्ट आंकड़ा नहीं अमीर दास आयोग निजी सेना के राजनीतिक संबंध आंकड़ा नहीं आरपी सिंह आयोग भागलपुर दंगा आंकड़ा नहीं सैमुअल आयोग भागलपुर दंगा आंकड़ा नहीं सदानंद मुखर्जी आयोग कहलगांव फायरिंग आंकड़ा नहीं दर्जनों आयोग दंगों पर आधारित आंकड़ा नहीं कोसी आयोग कोसी पीड़ितों पर आंकड़ा नहीं

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