Friday, November 4, 2011

वापसी की नहीं गारंटी


akhilesh akhil

आगामी उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में सत्तासीन भाजपा जहां अपनी सरकार बचाने की जद्दोजहद में लगी है, वहीं विपक्षी दल कांग्रेस भाजपा को खदेड़ कर सत्तासीन होने की पूरी रणनीति बना रही है। हालांकि अब तक दोनों दल उम्मीदवारों के चयन पर चुप्पी साधे हुए हैं और दोनों एक-दूसरे के पहले ‘कौन और कैसा’ उम्मीदवार की बाट जोह रहा है। भाजपा भी इस चुनाव को लेकर फिलहाल इस स्थिति में नहीं है कि वह डंके की चोट पर उम्मीदवार खड़ा कर दे और अपनी सरकार की वापसी की गारंटी दे सके। पांच साल की सरकार में सूबे में क्या-क्या काम हुए हैं और सूबे की कितनी जनता भाजपा से खफा है, इसकी जांच प्रदेश भाजपा अपने जमीनी नेताओं से करा रही है।

सूत्रों का कहना है कि सूबे की जनता पर अन्ना के आंदोलन का प्रभाव है, तो निशंक के काल में हुए घोटालों की भी पूरी सूची है। ऐसी स्थिति में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मुद्दा ढंूढने की है, जिसे लेकर पार्टी चुनावी मैदान में उतरेगी। साफ तौर पर कहा जाए कि प्रदेश भाजपा ‘मुद्दा विहीन’ है, जबकि विपक्षी कांगे्रस के पास पांच साल की भाजपा सरकार को घेरने के लिए मुद्दे ही मुद्दे हैं। आप कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे दो दलों में से एक के पक्ष में जनता को वोट देना है। काम बेहद कठिन है। लगता है उत्तराखंड सियासी चक्रव्यूह में फंसा है।

सूबे के आगामी चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बाद बसपा भी एक बड़ी पार्टी है और सूबे के कई इलाकों में उसकी पकड़ के सामने भाजपा और कांग्रेस भी कमजोर पड़ जाती है। ऐसा पहले भी था और आज भी है। 70 सदस्यीय उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2007 में भाजपा को जहां 32 फीसदी मतों के साथ 34 सीटों पर जीत हुई थी, वहीं कांग्रेस को 30 फीसदी मतों के साथ 21 सीटें मिली थीं। बसपा को 12 फीसदी मत और 8 सीटें मिली थीं, जबकि उत्तराखंड क्रांति दल को 6 फीसदी मतों के साथ तीन सीटें हाथ लगी थीं। 3 सीटें निर्दलीय ले गए थे, लेकिन निर्दलीय को कुल मत 11 फीसदी मिले थे। पिछले चुनाव में 5 फीसदी मत सपा और दो फीसदी मत एनसीपी को भी मिले थे, लेकिन इन दोनों पार्टियों को एक भी सीट हाथ नहीं लगी थी। इन आंकड़ों को देखकर आप कह सकते हैं कि इस बार के चुनाव में भी बसपा की भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।

उत्तराखंड के चुनाव में बसपा एक फैक्टर है और संभव है कि इस बार कांग्रेस और भाजपा के कई बागी बसपा की तरफ हाथ बढ़ाएंगे। बसपा को इसका इंतजार भी है। बसपा के नए प्रदेश अध्यक्ष सूरज मल कहते हैं कि -‘हमारी तैयारी यहां सरकार बनाने को लेकर है। हम सभी सीटों पर चुनाव लड़ने जा रहे हैं। यहां की जनता वर्षों से कांग्रेस और भाजपा को देख रही है और उसकी कथनी और करनी को भी परख रही है। एक घोटालेबाज है, तो दूसरी महा घोटालेबाज है। दोनों से जनता त्रस्त है और दोनों फिर जनता को लुभाने का खेल कर रही हैं। हमने 51 उम्मीदवारों की सूची जा कर दी है और शेष सीटों के लिए काबिल उम्मीदवारों की तलाश है। आप देखते जाइए, आगे क्या-क्या हो रहा है।’

पिछले चुनाव में कांग्रेस को भले ही 30 फीसदी वोट मिले हों, लेकिन गुटों में बंटी प्रदेश कांग्रेस पिछले पांच सालों में भाजपा सरकार के खिलाफ कोई जन आंदोलन नहीं कर सकी है। आलम ये है कि सांसद सतपाल महाराज अपना अलग गुट चलाते हैं, तो हरीश रावत की अपनी अलग कहानी है। प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्या दलित चेहरा होकर भी दलितों के बीच में आज तक कोई खास जगह नहीं बना पाए हैं। उधर, सांसद प्रदीप टमटा और विजय बहुगुणा देहरादून से ज्यादा दिल्ली की राजनीति करते दिखते हैं। कुल मिलाकर आज भी प्रदेश कांग्रेस एक होकर चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है। प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि -‘हमें डर भाजपा या अन्य दूसरी पार्टियों से नहीं है, हमें सबसे ज्यादा डर आपसी गुटबाजी से है। हालांकि राहुल और सोनिया गांधी ने गुटबाजी खत्म करने की सलाह और हिदायत सबकोे दी है, लेकिन लोग सबक नहीं लेंगे, तो फिर कुछ भी कहना मुश्किल है।’ लेकिन सांसद सतपाल महाराज पार्टी की मजबूती की बात करते हैं। महाराज कहते हैं कि ‘कुछ मुद्दों पर राजनीति में मतभेद रहते हैं, लेकिन हमारा लक्ष्य चुनाव जीतने का है और हमसब मिलकर उस ओर लगे हुए हैं। भाजपा को अब जनता को जवाब देना होगा। हम विकास के मुद्दे के साथ चुनाव में जा रहे हैं। इसके अलावा हम जवाबदेह और पारदर्शी सरकार देंगे। ई-गवर्नेस लाने के साथ ही ‘सिटिजन चार्टर’ के अनुसार सरकार चलाएंगे और भ्रष्टाचार को जड़मूल से खत्म करेंगे।’

इस बार के चुनाव में अगर किसी को लगता है कि मुकाबला सीधे कांग्रेस और भाजपा के बीच है, तो यह सोचना गलत साबित होगा। इस बार सूबे में त्रिकोणात्मक संघर्ष होंगे और निर्दलीय भी अपनी ताकत दिखाने से बाज नहीं आएंगे। लेकिन सबसे ज्यादा जोर आजमाइश कांग्रेस और भाजपा के बीच उन सीटों को लेकर होनी है, जिस पर पिछले चुनाव में मामूली अंतर से हार-जीत का फैसला हुआ था। 2007 के विधानसभा चुनाव में 14 ऐसी सीटें थीं, जिनमें हार जीत का फैसला 4 से लेकर 2000 से कम वोटों का रहा था।

इन 14 सीटों में 7 सीटें कांग्रेस को मिलीं, 4 सीटें भाजपा के पक्ष में गर्इं, एक सीट उक्रांद को और 2 सीटें निर्दलीय की झोली में पड़ी थीं। कम मार्जिन से जीत वाली कांग्रेस को जो 7 सीटें मिलीं, उसमें दूसरे नंबर पर कम सीटों से हारने वाली भाजपा को पांच सीटें गंवानी पड़ी थीं। इसी तरह एनसीपी और निर्दलीय भी एक-एक सीट पर कांग्रेस को भारी टक्कर देते हुए पिछड़ गई थी। कम मार्जिन से पिछले चुनाव में भाजपा चार सीटें जीतने में सफल हुई, जबकि इन्हीं सीटों पर कांग्रेस तीन सीटों पर भारी टक्कर देते हुए हार गई थी। भाजपा को एक सीट पर उक्रांद ने भी अंत तक टक्कर दी थी, लेकिन वह भी हार गई। कम मार्जिन से हार जीत होने वाली 14 सीटों में से जो एक सीट उक्रांद को मिली थी, वह कांग्रेस को हराकर मिली थी और निर्दलीय को जो दो सीटें मिलीं, वह भाजपा को हराकर मिली थीं।

कम सीटों के मार्जिन से हार-जीत वाली सीटें कांग्रेस और भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। कांग्रेस किसी भी सूरत में अपनी जीती सीट को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेगी और भाजपा अपनी खोई सीट को वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। इन दोनों के प्रयास में बसपा और निर्दलीय क्या कुछ करेंगे, अभी कहना मुश्किल है। इसके साथ ही सपा भी इस चुनाव में जातीय खेल खेलने को तैयार है। पिछले चुनाव में भले ही उसे सीटें नहीं मिली थीं, लेकिन पांच फीसदी वोट मिलने के बाद कई दलों की नजरें उस पर गड़ गई थीं। कांग्रेस नेता सतपाल महाराज कहते हैं कि ‘लोकतंत्र में सभी दलों को चुनाव लड़ने का हक है, लेकिन कांग्रेस राज्य की जनता को अच्छी सरकार देने के लिए कटिबद्ध है। पांच सालों में भाजपा की सरकार ने जिस तरह से राज्य को पीछे कर दिया है, हमें उसे वापस लाना है।’ चुनावी माहौल में नेताओं के कई बयान सामने आने हैं, लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि चुनाव में दो भ्रष्टों के बीच जनता किसके पक्ष में मतदान करती है। ताजा हालातों में बसपा की भूमिका अहम दिख रही है।

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