Sunday, December 11, 2011

रीटेल का मायाजाल


राजनीतिक दल व्यापारियों के कथित नुकसान को तो देख रहे हैं, लेकिन उपभोक्ताओं के बारे में कोई नहीं सोच रहे हैं। जबकि उनकी संख्या व्यापारियों से कई गुना ज्यादा है। किसानों के हित की बात नहीं की जाती, जिनकी देश की आबादी में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है। आखिर क्यों? पढ़ें विचारोत्तेजक रपट...

अखिलेश अखिल

थपेड़ों से धराशाई है, वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था ‘स्लो एंड स्टडी ग्रोथ’ के साथ आगे बढ़ती जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था की यही विशेषता अब दुनिया की बहुराष्ट्रीय रीटेल कंपनियों को अपनी ओर खींचने के लिए बाध्य कर रही है। आप इसे फिलहाल कांग्रेस की ‘चुनावी राजनीति’ कह सकते हैं। लेकिन इसकी पूरी तैयारी पिछले छह सालों से चल रही थी। भाजपा की भी जब सरकार थी, तब भी इस दिशा में काम हुए थे। यह बात और है कि तब की एनडीए सरकार इसे लागू नहीं कर पाई थी। उदारीकरण के 20 सालों में गांव, कस्बों और छोटे शहरों से लेकर मेट्रो शहरों तक की जीवन शैली में जो बदलाव आए हैं, आजादी के 45 सालों में नहीं देखे गए थे। यह बात इस लिए कही जा रही है कि पहले जिस ब्रांडेड सामानों पर सिर्फ धन्ना सेठ अपना एकाधिकार मानते थे, अब वही सामान गांव के लोगों के पास भी उपलब्ध है। कहने का आशय यह कि ब्रांडेड वस्तुएं अब किसी की बपौती नहीं रह गई हंै। यह बात और है कि जिसके पास जितना धन है और जितनी आमदनी है, उसके अनुसार वह इन भौतिक वस्तुओं का उपभोग करता है। उदारीकरण ने न सिर्फ देश की तकदीर बदली है, बल्कि आम लोगों की जीवन शैली को भी बदल डाला है। इसे उदारीकरण का सबसे बड़ा असर मान सकते हैं।

आज जिस यूपीए पर विदेशी रीटेल क्षेत्र के जरिए देसी खुदरा व्यापारियों को तबाह करने की बात सामने आ रही है, एनडीए के शासनकाल में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। यह एनडीए ही है, जिसने देसी कंपनियों को बेचने के लिए विनिवेश मंत्रालय का गठन किया और देखते देखते दर्जनों सरकारी कंपनियां औने पौने दामों में बेच दी गर्इं। उस कारोबार में किसने कितने का घपला किया, आज तक नहीं सुलझ पाया है। इतिहास के पन्नों को थोड़ा और उलटें, तो इन राजनीतिक दलों की कलई और भी खुल सकती है। जरा गैट एग्रीमेंट, ट्रीप्स, ट्रीम्स और पेटेंट लॉ की कहानी को आप याद कीजिए। एक दशक पहले संसद में पेटेंट लॉ को लेकर संसद में बहस चल रही थी, तो इस कानून के विरोध करने वाले नेता ही सबसे पहले संसद में चल रही वोटिंग से बाहर हो गए थे। इसमें भाजपा के दो वरिष्ठ नेता और एक जार्ज फर्नांडीस थे। मात्र एक वोट से संसद में पेटेंट कानून पास हो गया। संभव है कि जो तीन नेता संसद से बाहर निकले थे, अगर वे बाहर नहीं जाते, तो पेटेंट कानून पास नहीं होता। दूसरे दिन ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में ग्लैक्सो कंपनी के सीएमडी के हवाले से एक खबर छपी। जिसमें सीएमडी ने कहा था कि ‘हमने भारतीय संसद में पेटेंट कानून पास कराने के लिए 5 लाख डॉलर खर्च किए थे।’ आप अनुमान लगा सकते हैं कि पेटेंट कानून कैसे पास हुआ और किन लोगों ने इसमें मदद की।

राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तब पेप्सी कोला का फिर इस देश में प्रवेश हुआ। 1977 में उद्योग मंत्री रहते हुए जार्ज फर्नांडीस ने उसे देश से बाहर कर दिया था। पेप्सी कोला को फिर अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए 40 सांसदों की अनुमति जरूरी थी। पंजाब के गुरुदासपुर में पेप्सी का प्लांट लगना था और दक्षिण भारत के 40 सांसद चेन्नई में इसके पक्ष में आंदोलन कर रहे थे। जाहिर है, 40 सांसदों को पेप्सी वालों ने खरीदा हुआ था! उपरोक्त बातों की चर्चा इसलिए की गई, ताकि हमारे देश के भोले-भाले लोग समझ पाएं कि इस देश के नेताओं की कथनी और करनी में क्या अंतर है। संभव है कि रीटेल क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाने के पीछे भी कोई बड़ा दलाल गिरोह काम कर रहा हो? लेकिन बावजूद इसके, यह भी देखना जरूरी है कि क्या वाकई रीटेल में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से खुदरा व्यापारियों का खात्मा हो जाएगा? अगर ऐसा है, तो सरकार अब तक जिन क्षेत्रों में एफडीआई दिए हुए है, उन क्षेत्रों का खात्मा क्यों नहीं हुआ? जिन क्षेत्रों में 26 फीसदी से लेकर 100 फीसदी तक एफडीआई है, वे क्षेत्र तो दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़े हैं। वहां राजगार भी बढ़े हैं। दवा उद्योग में सौ फीसदी एफडीआई है और आप कह सकते हैं कि दवा क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एकाधिकार है। फिर भी मूल्य नियंत्रण सरकार के हाथ में है।

पिछले 10 सालों में इस क्षेत्र में जितने रोजगार पैदा हुए हैं, शायद ही किसी और क्षेत्र में हुए हों। फिर कई देसी दवा कंपनियां सीना ताने न सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुकाबला कर रही हैं, बल्कि कई देसी कंपनियां तो विदेशी कंपनियों से आगे बढ़ सी गई हैं। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों बहुराष्ट्र्ीय कंपनियों के लिए खुदरा व्यापार करने का रास्ता जैसे ही खालने की बात कही, राजनीति गर्म हो गई। अनुमान है कि संसद की कार्यवाही नहीं होने से अब तक 20 करोड़ रुपये स्वाहा हो चुके हैं। दरअसल, सरकार ने विदेशी कंपनियों के लिए सिंगल ब्रांड में 51 फीसदी और मल्टी ब्रांड में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत दी है। हालांकि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। सिंगल ब्रांड में तो 51 फीसदी एफडीआई की इजाजत सरकार ने 2006 में ही दे दी थी, और कई कंपनियां यहां काम भी कर रहीं थी। अभी 5 दर्जन से ज्यादा कंपनियां सिंगल ब्रांड में काम कर भी रही हैं। सरकार ने इन विदेशी कंपनियों को यह भी कहा है कि वे अपने स्टोर पर ‘नॉन ब्रांड’ सामान भी बेचें। इसके पीछे सरकार का तर्क है कि इससे देसी कंपनियों को कोई हानि नहीं होगी।

यह भी सच है कि विदेशी कंपनियों का पूरा जोर लाभ कमाने पर ही होता है, लेकिन इस मामले में देसी कंपनियां ही कहां पीछे हैं? आप कह सकते हैं कि देसी कंपनियां लूटें तो कोई बात नहीं और विदेशी कंपनियां लूट लें, तो जुल्म हो गया? ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में आप चाहकर भी इससे बच नहीं सकते। एक दशक पहले जब ‘केंटुकी फ्रॉयड चिकेन’ (केएफसी) और ‘पिज्जा हट’ का देश में प्रवेश हुआ था, तो विरोध में ऐसे ही स्वर उठे थे। लेकिन आज क्या हुआ? फैशन परस्त लोगों और धनी लोगों को छोड़ दें, तो देश की बड़ी आबादी को उससे कोई मतलब भी नहीं है और लोग उसका नाम भी नहीं जानते हैं। इन्हीं कंपनियों के समानांतर हमारे देश की ‘हल्दीराम’ जैसी कई कंपनियां बेहतर काम कर रही हैं। इस पूरे खेल में जो लोग चार करोड़ खुदरा विक्रेताओं के तबाह होने की बात कर रहे हैं वे लोग भूल रहे हैं कि अगर देश की एक अरब आबादी विद्रोह पर उतर आए, तब क्या होगा? राजनीतिक दल व्यापारियों के कथित नुकसान को तो देख रहे हैं, लेकिन उपभोक्ताओं के बारे में कोई नहीं सोच रहा है। जबकि उनकी संख्या व्यापारियों से कई गुना ज्यादा है। किसानों के हित की बात नहीं की जा रही है, जिनकी आबादी में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है।

भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज और अरुण जेटली एफडीआई पर कुछ ज्यादा ही तल्ख हैं। इन्होंने सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार देश को गुलामी की ओर ले जा रही है। अगर ऐसा है, तो फिर विपक्ष का क्या मतलब? भाजपा को इसे पूरी तरह से रोकने के प्रयास करने चाहिए। आप कह सकते हैं कि यह पूरा का पूरा एक पॉलिटिकल ड्रामा है, जिसे आगामी चुनाव में हर पार्टी मुद्दा बनाने को तैयार है। लगता है, इस पूरे खेल में भ्रष्टाचार, कालाधन और लोकपाल के मसले पर सभी दलों के बीच ‘आपसी सहमति’ हो गई है कि उन विषयों पर काम ही नहीं करना है? जब हमाम में सब नंगे हों, तो आप किस पर उंगली उठा सकते हैं। इसी बीच कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण का मामला लाकर और बखेड़ा खड़ा कर दिया है।

भारत में एफडीआई का जाल

क्षेत्र फीसदी में

होटल और टूरिज्म 100

नॉन बैंकिंग 49

बीमा 26

टेलीकम्यूनिकेशन 49-100

टेÑडिंग 51

ई-कॉमर्स 100

ड्रग एंड फर्मास्यूटिकल्स 100

रोड एंड हाइवे 100

प्रदूषण नियंत्रण प्रबंधन 100

कॉल सेंटर 100

बीपीओ 100

लघु उद्योग 100

पीएसयू 49

नागरिक उड्डयन 74

एयर क्राफ्ट मेंटनेंस 100

कॉमोडिटी एक्सचेंज 26

टाइटेनियम खनन 100

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