Friday, December 23, 2011

सियासी युवराजों में संघर्ष

प्रदेश के चुनाव में सियासी संघर्ष रोचक होने जा रहा है। सूबे की जनता के बीच आकर्षण का केंद्र अब दो युवराज, यानी कांग्रेस के राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव बनते जा रहे हैं। यदि समूची राजनीति इन्हीं दो पहलुओं के इर्द-गिर्द घूम गई, तो संभव है कई राजनीतिक दलों को मुंह की न खानी पड़ जाए? देखें, तेजी से बदलते समीकरणों पर क्या कहती है यह रपट...

अखिलेश अखिल

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की दुदुंभी बज चुकी है और अलग-अलग राग रंग के साथ लॉलीपॉप लिए दर्जनों राजनीतिक पार्टियां और राजनीति के चतुर सुजान जनता को बहलाने-फुसलाने के लिए मैदान में उतर गए हैं। यहां मुकाबला दो ‘युवराजों’ के बीच आकर्षण का केंद्र है। सपा नेता मुलायम सिंह के सांसद बेटे अखिलेश यादव एक तरफ युवा समाजवादी ब्रिगेड को लेकर जहां गांव-गांव जाकर देसी और भदेश लोगों से मिलकर सपा के पक्ष में वोट डालने की ‘चिरौरी’ कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस के युवराज व सांसद राहुल गांधी ‘पजेरो’ गाड़ी से गांव-गांव को नापने की कोशिश में लगे हुए हैं। लगभग एक ही उम्र और देशी-विदेशी शिक्षा से दोनों ही लैस हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अखिलेश यादव जहां केवल मुलायम सिंह की विरासत को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं, वहीं राहुल गांधी-सोनिया और राजीव की कांग्रेस के प्रधानमंत्री के लिए जमीन बना रहे हैं। इसे आप क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति करने वाले दो युवाओं के बीच की भिड़ंत भी कह सकते हैं। और आप यह जानते ही हैं कि राहुल के लिए प्रधानमंत्री बनने का रास्ता उत्तर प्रदेश के गांवों से गुजरता है।

उल्लेखनीय है कि पीएम और सीएम के उम्मीदवार इन दोनों युवराजों की लाख कोशिश के बावजूद प्रदेश की जनता किसी पर भी सौ फीसदी यकीन करने को तैयार नहीं है। कुछ लोग राहुल के पक्ष में हैं और उससे ज्यादा कुछ मतदाता अखिलेश यादव के पक्ष में भले ही खड़े ही दिखाई पड़ रहे हों, आसन्न चुनाव में इन दोनों युवराजों की पार्टी को सत्ता मिलेगी, यकीन से नहीं कहा जा सकता। और ऐसा भी नहीं है कि मायावती इस दफा बहुमत पाकर सरकार बना ही लेंगी। बसपा सबसे बड़ी पार्टी बनी रहेगी, इस पर तमाम राजनीतिक समीक्षकों की राय एक है। पिछले 304 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में बसपा 206, सपा 97, भाजपा 51, कांग्रेस 22, आरएलडी 10 सीटों को पाने में सफल रही थी। अन्य सीटें निर्दलीय और छोटी पार्टियां लेने में कामयाब हुर्इं थीं। अब जरा आज की स्थिति को देख लें। वर्तमान में बसपा के पास 219 सीटें हैं। सपा 97 से घटकर 88 पर आ गई है। कांग्रेस 22 से कम होकर 20 पर और आरएलडी अपने 10 विधायकों को नियंत्रण में रखे हुए है। अब जहां तक चुनाव में हार जीत और सरकार बनाने की बात है, साफ हो गया है कि मायावती को 206 सीटें नहीं मिलने जा रही हैं। सपा और बसपा को मिलाकर 250 से लेकर 260 सीटों पर जीत हासिल हो सकती है। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा और कांग्रेस को कोई बड़ी सफलता इस चुनाव में मिलेगी। जो हालात दिख रहे हैं, उसके अनुसार भाजपा, कांग्रेस और उनकी सहयोगी पार्टियों को 130 से 140 सीटों से ज्यादा नहीं मिल सकती है, जबकि निर्दलीय और अन्य पार्टियों को 15 से 20 सीटें मिल सकती हैं।

2007 के चुनाव में कांग्रेस, भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को 83 सीटें मिलीं थी, लेकिन इस बार इन्हें 50 से 60 सीटों का लाभ हो सकता है। यह बात और है कि कांग्रेस और भाजपा अपने गठबंधनों के साथ मिलकर सौ-सौ सीटें पाने के लिए काम कर रही हैं, जो कतई संभव नहीं है। लखनऊ से कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि ‘पार्टी का लक्ष्य 100 सीटों पर केंद्रित है, लेकिन हमारी पूरी तैयारी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर है। इतना जरूर है कि हमें पिछले चुनाव से ज्यादा सीटें मिलेंगी और हम मजबूत विपक्ष के रूप में उभरेंगे। जहां तक राहुल गांधी का सवाल है, उस बारे में मीडिया की रिपोर्ट चाहे जो भी हो, लेकिन प्रदेश कांग्रेस में जान आ गई है और इसका फायदा हमें 2014 में मिलेगा।’ अब जरा दो युवराजों के ‘चुनावी टकराव’ को भी देख लें। उत्तर प्रदेश में बसपा और भाजपा भले ही एक बड़ी ताकत हैं, लेकिन सूबे में चर्चा के केंद्र बिंदु राहुल और अखिलेश ही हैं। शाहजहांपुर के रमेश उपाध्याय कहते हैं कि दोनों ने सूबे की पूरी राजनीति को अपनी ओर समेट लिया है। एक गैर सरकारी संगठन के जरिए बच्चों में शिक्षा का अलख जगाने वाले रमेश भाई सपा की राजनीति के सदा आलोचक रहे हैं और भाजपा के समर्थक। लेकिन इधर उनका ध्यान राहुल की राजनीति पर ज्यादा टिका है। रमेश भाई कहते हैं कि राहुल और अखिलेश में न सिर्फ कुछ करने का जज्बा है, बल्कि ये दोनों नए विचारों से भी लैस हैं।

रमेश भाई की नजरों में दोनों युवा नेताओं में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन सिर्फ संभावनाओं से राजनीति नहीं चलती। 38 वर्षीय अखिलेश यादव स्मार्ट, ब्राइट और सदा अलर्ट रहते हैं। ये अपने पिता मुलायम सिंह यादव की तरह ग्रामीण वातावरण में रहने के आदी हो गए हैं। अखिलेश को अपने पिता मुलायम सिंह की तरह पहलवानी का शौक नहीं है, उन्हें फुटबॉल खेलने, देखने और अमिताभ बच्चन की फिल्में देखने में मजा आता है। अखिलेश 13वीं लोकसभा से ही लगातार संसद के सदस्य हैं और कई गंभीर मसलों पर अपनी राय सदन में रखते रहे हैं। मैसूर विश्वविद्यालय से बीई और एमई करने के बाद वे आस्टेÑलिया से पर्यावरण विज्ञान की भी डिग्री ले चुके हैं। पत्नी डिंपल यादव भी राजनीति में हैं। लैपटॉप में अपने चुनाव क्षेत्र के आंकड़ों की जानकारी रखने वाले अखिलेश को ग्रामीण क्षेत्र में आप साइकिल से घूमते अक्सर देख सकते हैं। अखिलेश के बारे में पिछले साल एक विदेशी पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि करिश्मा मनुष्य के भीतर एक चमक के समान है, जिसे पैसों से नहीं खरीदा जा सकता। अखिलेश में यही शक्ति है। लोगों को प्रभावित करने वाली शक्ति।

सपा नेता आजम खान कहते हैं कि ‘पार्टी को अखिलेश जैसा युवा चेहरा मिला है जिसमें अपार संभावनाएं हैं। आज आप गांवों में जाकर देख सकते हैं कि अखिलेश ने किस तरह से न सिर्फ युवाओं को बल्कि आम आदमी को भी इस मंच पर लाने का काम किया है। देश की राजनीति की समझ जितना यह आदमी रख रहा है, बहुत कम युवा नेताओं में यह देखने को मिलती है।’

अखिलेश कहते हैं, ‘मै हर रोज लोगों की मुस्कान और आंसू के बारे में सोचता हूं। मैंने यहां के गांवों में तीन सौ दिन बिताए हैं, जबकि राहुल जी केवल 60 से 65 दिन गांव में रहे हैं। फिर भी राहुल लोगों के लिए कुछ बेहतर काम करना चाहते हैं, इसलिए मैं उनका आदर करता हूं। वे बधाई के पात्र हैं।’

समाजवादी नेता महमूद कहते हैं, ‘हम लोगों ने अखिलेश को आगामी मुख्यमंत्री के रूप में देखना शुरू कर दिया है। वही इस प्रदेश को ठीक से चला सकते हैं। मुलायम सिंह अपने जीवन में जो नहीं कर पाए, अखिलेश करेंगे। उनकी टीम तैयार है। बसपा भाजपा और कांग्रेस से लोहा लेने के लिए अखिलेश की टीम में ब्राह्मण, राजपूत, दलित, कायस्थ और अन्य पिछड़ी जातियों के लोग सपा को जिताने के लिए हर कोशिश में लग गए हैं।’

उधर राहुल की सेना भी सज रही है। बल्कि सज गई है। राहुल पिछले साल भर से गांवों का दौरा कर रहे हैं और कुछ करने से ज्यादा लोगों के बीच अपनी छवि से लोगों को दोचार करा रहे हैं। कांग्रेस का भविष्य और अगले प्रधानमंत्री की छवि। देशी और विदेशी डिग्रियों से लैस राहुल को भारत पसंद है और देश के गांव उनके निशाने पर हैं। राहुल कहते रहे हैं कि गांव की तस्वीर जब तक नहीं बदलेगी, देश आगे नहीं बढेÞगा। राहुल गांव को आत्मनिर्भर करना चाहते हैं और नई तकनीक और विकास के जरिए देश को बुलंदी पर ले जाने की सोच में पड़े हैं। राहुल ने सूबे को बेहतर तरीके से समझने के लिए कई तरह की रणनीति बना ली है। सूबे को 10 जोन में बांट कर हर जोन को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी में जिन लोगों को लगाया गया है, वे राजनीतिक कम समाजसेवी ज्यादा हैं। राहुल पजेरो में चढ़कर भले ही गांवों को दख रहे हों, लेकिन उनकी राजनीति को आप कमतर नहीं कह सकते। राहुल के सामने अखिलेश चुनौती भी हैं। कांग्रेसी भी इस बात को मान रहे हैं कि आने वाली राजनीति में राहुल को अखिलेश चुनौती दे सकते हैं। सूबे के चुनाव को जीतने के लिए राहुल को रीता और प्रमोद तिवारी के झगड़े को भी शांत करने की जरूरत है। कांग्रेस के कानपुर जोन के एक अधिकारी का कहना है कि आने वाले समय में कांग्रेस की स्थिति काफी मजबूत होगी और इतना तय मानिए कि राहुल और कांग्रेस के लिए इस चुनाव से ज्यादा मिशन 2014 महत्वपूर्ण है।

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