Thursday, December 15, 2011

शरणार्थियों का देश भारत?

देश में रह रहे शरणार्थियों के सही आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं। इन पर काफी खर्च भी किया जा रहा है। ये शरणार्थी देश की मुख्यधारा से जुड़ने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। लोग भले ही यकीन न करें, लेकिन आने वाले कल में यही शरणार्थी देश के लिए मुसीबत बन सकते हैं। पढ़िए एक खास रिपोर्ट...

अखिलेश अखिल

क्या भारत शरणार्थियों का देश है? सुनने में भले ही आपको अटपटा लग रहा हो, लेकिन सच्चाई यही है कि आजादी के बाद एक ओर जहां बढ़ती आबादी ने देश के सामने कई चुनौतियां खड़ी की हैं, उसी तरह हर साल पड़ोसी देशों से आते शरणार्थियों ने भी हमारी अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था के लिए मुश्किलें पैदा कर दी हैं। यहां तक की सरकार भी यकीन से नहीं कह सकती कि भारत में किस देश के कितने शरणार्थी हैं और वे कहां-कहां रह रहे हैं? जहां तक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है, आप गृह मंत्रालय से लेकर विदेश मंत्रालय तक की फाइलें खंगाल लें और मंत्री से लेकर संतरी तक से जानकारी ले लें। शायद ही कहीं से आपको दिल्ली में रह रहे शरणार्थियों की सही तस्वीर मिले। आंकड़ों की राजनीति करने वाली सरकार से आप पूछ सकते हैं कि देश में रह रहे शरणार्थी क्या कर रहे हैं और पिछले 10 सालों में उनके ऊपर कितना खर्च हम कर रहे हैं?

सरकार के पास तो शायद यह भी मुकम्मल जानकारी नहीं होगी कि कितने विदेशी हर साल देश में आकर लापता हो जाते हैं और वीजा खत्म होने के बावजूद वे यही के होकर रह जाते हैं। फिर वे कहां जाते हैं, क्या करते हैं और किससे मिलते-जुलते हैं, इसके बारे में कुछ भी कह पाना आसान नहीं है। जब देश के ही हजारों गुम हुए लोगों को ढूंढ निकालने में हमारी तमाम खुफिया एजेंसी फेल हैं, तो भला इन विदेशियों को कौन खोज सकता है? इससे जुड़े कई और सवाल खड़े हो सकते हैं, लेकिन जो इस देश में हो रहा है उसे होने दीजिए और आइए हम आपको ले चलते हैं शरणार्थियों की अनंत दुनिया में। इस दुनिया में कोई अपने बिछड़ों से मिलने के लिए आज भी आहें भर रहा है, तो कोई धर्म-जाति बचाकर ही संतोष कर रहा है। किसी को रोजगार न मिलने की शिकायत है, तो कोई नागरिकता पाने के लिए राजनेताओं और नौकरशाहों की चिरौरी करता फिर रहा है। किसी के पास घर नहीं है, तो कोई शरणार्थी होकर भी देसी लोगों के मुकाबले आलीशान जीवन जी रहा है। कहीं बसुधैव कुटुंबकम का नारा है, तो कहीं शरणार्थियों को हथियार बनाकर राजनीतिक उलटफेर का खेल जारी है। आखिर यही तो भारत है!

चार साल पहले, 2007 में भारत में रह रहे रिफ्यूजी यानि शरणार्थियों का सर्वे कराया गया। इस सर्वे के मुताबिक 1 लाख 10 हजार तिब्बती, एक लाख से ज्यादा नेपाली प्रवासी, 99,600 श्रीलंकाई, 50 हजार बर्मी, 35 हजार से ज्यादा बांग्लादेशी, 30,400 अफगानी और 10 हजार भूटानी शरणार्थियों के आंकड़े दर्ज किए गए थे। इन आंकड़ों में श्रीलंका के कोई लाख शरणार्थियों की बात कही गई, जबकि तामिलनाडु समेत दक्षिण के कई राज्यों में 2 लाख से ज्यादा लोगों को सरकार मदद मुहैया करा रही है। फिर बांग्लादेश से आए लगभग 31 हजार शरणार्थियों की बात सर्वे में दर्ज है, जबकि सच्चाई यह है कि बांग्लादेश के 2 लाख से ज्यादा लोग देश के विभिन्न इलाकों में रहकर मुख्यधारा से जुड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसी तरह बर्मी और तिब्बती शरणार्थियों की भी सही तस्वीर हमारे पास नहीं है। लेकिन कुल मिलाकर आप कह सकते हैं कि देश में जितने शरणार्थी रहने की बात कही जा रही है उससे कई गुना ज्यादा शरणार्थी यहां रह रहे हैं। आगे बढेÞं, इससे पहले इन शरणार्थियों के हालात की थोड़ी चर्चा कर ली जाए। 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया। यह हमला मुजाहिदीनों और तालिबानों को सबक सिखाने के लिए था। दरअसल, तालिबानों को सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका ने हवा दी थी और उसे काफी मात्रा में हथियार भी उपलब्ध कराए थे।

सोवियत संघ के हमले के बाद अफगानिस्तान से करीब 60 हजार अफगानी जान बचाकर भागे थे। अफगान से सोवियत संघ 1989 में पीछे हटा। इन दस सालों में कितने और लोग देश छोड़कर अफगान से निकले थे इसकी सही जानकारी आजतक किसी सरकार के पास नहीं है। दुनिया का कोई भी देश इस बारे में सही जानकारी नहीं दे सकता। सोवियत संघ के हटने के तुरंत बाद अफगानिस्तान में सिविल वार शुरू हो गया। यह तत्कालीन नजीबुल्लाह सरकार और तालिबानों के बीच चली। 4 साल में ही पूरा काबुल बर्बाद हो गया। वहां की 80 फीसदी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई। बड़े पैमाने पर लोगों के कत्ल हुए और भारी संख्या में लोग अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। तालिबानी 1996 में अफगान की सत्ता पर काबिज हुए और फिर शुरू हुआ उसका शरिया कानून। इस कानून के तहत 8 साल की उम्र के बाद लड़कियों की पढ़ाई पर पाबंदी लग गई, गाना सुनने, गीत गाने और खुली हवा में चलने पर लड़कियों पर रोक लग गई। जो अल्पसंख्यक हिंदू सिख वहां रह रहे थे उनका जीना दूभर हो गया। 11 सितंबर 2001 को अमेरिका, इंग्लैंड और नाटों की सेना ने तालिबान पर संयुक्त हमला किया और अंत में तालिबानों को पीछे हटना पड़ा। सोवियत संघ के हमले में जहां आधिकारिक रूप से 30 हजार से ज्यादा शरणार्थी भारत में प्रवेश कर गए थे। वहीं तालिबानी शासन के दौरान करीब 10 हजार से ज्यादा अफगानी भारत में आए।

आपको बता दें कि वर्तमान और अतीत के शरणार्थी संकट और शरण देने की पुरानी परम्परा के बावजूद किसी भी सार्क देश ने 1951 के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन या 1967 के प्रोटोकाल को स्वीकार नहीं किया है। इस कानून को दुनिया के 136 देशों में मान्यता मिली हुई है। बावजूद इसके भूटान और नेपाल के अलावा सभी सार्क देशों ने शरणार्थियों की सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र की यूएनएचसीआर संस्था के लिए अन्तर्राष्ट्ीय मानवीय सहयोग के आधार पर मदद करने की बात कही है। 1951 सम्मेलन, 1967 प्रोटोकाल और सार्क देशों के बीच इस मसले पर असहमति की कई वजहें थीं। इनका तर्क था कि शरण देने की उनकी परम्परा अंतर्राष्ट्रीय मानकों की तुलना में कहीं बेहतर है। यही वजह है कि भारत अपने मानवीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था के साथ जुड़कर शरणार्थियों की पूरी हिफाजत कर रहा है। यह बात और है कि भारत में रह रहे सभी शरणार्थी संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएचसीआर से जुड़े हुए नहीं हैं। दिल्ली में 28 फरवरी 2010 तक यूएनएचसीआर से जुड़े शरणार्थियों को आप तालिका से समझ सकते हैं।

यूएनएचसीआर भारत सरकार के गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और कई स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिए उपरोक्त शरणार्थियों की समस्याओं को खत्म करने में लगा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र की दिल्ली स्थित इकाई से जुड़ी नैना बोस कहती हैं कि दिल्ली में कोई 21 हजार शरणार्थी हमारी देख-रेख में हैं। हम उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और रोजगार की व्यवस्था करते हैं ताकि उनका जीवन चल सके। इसके अलावा हम उन्हें कुछ आर्थिक मदद भी करते हैं और मदद की ये राशि सरकार देती है। संस्था इन्हें नागरिकता प्रमाण पत्र दिलाने में भी मदद करती है। अभी तक दिल्ली में 650 अफगानी शरणार्थी को यहां की नागरिकता मिल गई है, इनमें अधिकतर हिन्दू और सिख हैं। हालांकि जनवरी 2011 के यूएनएचसीआर आंकड़ों के मुताबिक देश भर में 188567 रिफ्यूजी रह रहे हैं। बाकी को यह संस्था रिफ्यूजी की श्रेणी में नहीं रखती।

भारत सरकार ने इन अफगानी रिफ्यूजी को आवास बनाने का परमिट भी दे रखा है। इसी कानून के तहत देश में रह रहे सभी अफगानी बेहतर जीवन जी रहे हैं। दिल्ली के तिलक नगर और हरियाणा के फरीदाबाद इलाके में आप चले जाएं, तो इनकी बस्ती और रहन सहन देखकर आप दंग रह जाएंगे। बड़े-बड़े मकान और इनके बड़े व्यापार को देखकर देशी पूंजीपति भी शरमा सकते हैं। तिलक नगर में ही मनोहर सिंह रहते हैं। मनोहर सिंह 1987 में अफगान से यहां आए थे। मनोहर सिंह खालसा दीवान वेलफेयर सोसाइटी चलाते हैं। इनकी यह सोसाइटी अफगान में भी थी। मनोहर सिंह अब इस देश के नागरिक हो गए हैं। वे कहते हैं कि ‘हमें अच्छा लगता है कि हम अपने देश में हैं, लेकिन अभी भी अधिकतर लोगों को यहां की नागरिकता नहीं मिली है, जिससे उन्हें काम करने से लेकर पढ़ाई करने में तकलीफ होती है। हालांकि अधिकतर लोग छोटा-मोटा व्यवसाय करके घर चला रहे हैं, लेकिन बच्चों को ज्यादा तकलीफ है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।

दरअसल इन शरणार्थियों को नागरिकता के अभाव में हर साल सरकार से अपने वीजे का नवीनीकरण कराना होता है और पुलिस से लेकर तमाम सरकारी आफिस को पैसे देने होते हैं। जहां तक नागरिकता का सवाल है, देश के कानून में कहा गया है कि जो लोग इस देश में पिछले 7 सालों से रह रहे हों, वे नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। हालांकि अब इसे बढ़ाकर 12 साल कर दिया गया है। कई अन्य देशों में नागरिकता 3 से 6 साल के भीतर मिल जाती है। देश में तिब्बती शरणार्थियों की आबादी भी कोई कम नहीं है। 1949 में तिब्बत पर चीन के हमले के बाद तिब्बतियों का पलायन शुरू हुआ था। 1959 में पहले कोई हजार तिब्बती भारत में आए। बाद में इनकी आबादी बढ़ती चली गई। आज इनकी आबादी 1 लाख 50 हजार बताई जा रही है, जबकि असलियत यह है कि इनकी आबादी 2 लाख से भी ज्यादा है। इस देश में तिब्बतियों को अन्य रिफ्यूजियों से ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं। तिब्बती देश के 37 जगहों पर कोई 70 समुदायों में रह रहे हैं। देश में इन्हें रिफ्यूजी का स्टेटस मिला हुआ है। इन्हें रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र जारी किया जाता है, जिसका हर साल नवीनीकरण कराना होता है।

इन शरणार्थियों को आवास परमिट के साथ ही रोजगार करने का भी अधिकार मिला हुआ है। भारत में श्रीलंकाई रिफ्यूजी के बारे में सही आंकड़ा किसी के पास नहीं है। सरकारी आंकड़ों में 99600 श्रीलंकाई रिफ्यूजी की बात भले ही कही जा रही हो, लेकिन सच्चाई है कि देश में 2 लाख से ज्यादा तमिल शरणार्थी हैं। आलम यह है कि पूरी तामिलनाडु की राजनीति ही इसी के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। देश में तमिल रिफ्यूजी का आगमन 1983 से लेकर 2007 तक हुआ है। अभी कोई एक लाख तमिल शरणार्थी दक्षिण राज्यों के 120 कैंपों में रह रहे हैं। सरकार की ओर से इन्हें खाने-पीने के लिए अनाज, दैनिक भत्ते और रोजगार के साधन भी उपलब्ध कराए गए हैं। यह बात और है कि शाम 7 बजे के बाद इनके इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया जाता है। इसके बाद देश में बड़ी संख्या में भूटानी, 5 लाख से ज्यादा नेपाली, 7 लाख से ज्यादा पाकिस्तानी, सोमालियाई, फिलीस्तीनी, इरानी और सूडानी शरणार्थी रह रहे हैं। 228 इरानी, 349 सोमाली, 109 सूडानी और 107 अन्य देश के लोग यहां आकर कहां विलीन हैं, इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

मामला केवल बाहरी शरणार्थियों का ही नहीं हैं। पड़ोसी देश बांग्लादेश से 1986 में 70 हजार से ज्यादा जुम्मा रिफ्यूजी कहें या घुसपैठिए पूर्वोत्तर के राज्यों में रह रहे हैं। 1971 के बांग्लादेश वार के बाद से इनका इस देश में आना शुरू हुआ, वह आज तक जारी है। गृह मंत्रालय के सूत्र की बात मानें तो इस देश में 10 लाख से भी ज्यादा बांग्लादेशी रह रहे हैं। और हमारी राजनीति उसके इर्द गिर्द घूम रही है। इसके अलावा 4 लाख से ज्यादा देश के कश्मीरी पंडित कश्मीर से भागकर दर-दर भटक रहे हैं। इन कश्मीरियों को देखकर और दूसरे देश के शरणार्थियों को देखकर ऐसा आप कह सकते हैं कि ये सब अपने देश के शापित लोग हैं, जिसे देश की राजनीति ने अपनी जमीन से काट दिया है। पनुन करूमीर से जुडेÞ अवतार नेहरू कहते हैं कि यह दुनिया का पहला देश है, जहां के लोग दर-दर भटक रहे हैं और बाहरी लोगों को पूजा जा रहा है। आंकड़ों को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि देश में शरणार्थी कितने हैं और उनको लेकर देश की जमीन, जायदाद और व्यवस्था पर कितना खर्च हो रहा है। आप भले ही यकीन न करें, लेकिन आने वाले कल में यही शरणार्थी देश के लिए काल भी बन सकते हैं।

कौन से कितने शरणार्थी?

मानसिक रूप से बीमार 7,630

अफगानी 2661

म्यांमार 4493

अन्य 476

रिफ्यूजी 12792

अफगान 8704

म्यांमार 3111

अन्य 977

रिफ्यूजी बच्चे 4275

पुरुष 2260

महिला 2015

रिफ्यूजी महिलाएं 4515

रिफ्यूजी पुरुष 4004

-मंत्रालयों के पास सही आंकड़े नहीं

-विदेशी यहां आकर हो जाते हैं ‘लापता’

-वोट बैंक के लिए हो रही राजनीति

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