Sunday, January 22, 2012

आदिवासी कब होगा राष्ट्रपति?

इस देश में आदिवासी राजा तो हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रपति नहीं बन सकते। ऐसा संविधान में नहीं है, लेकिन ऐसा ही हो रहा है। इसे विडंबना ही कह सकते हैं कि आज तक आदिवासियों में से किसी एक का भी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पद के लिए चयन नहीं किया गया। यानी, देश की राजनीति आदिवासी समाज को संविधान के सबसे ऊंचे ओहदे पर लाने को तैयार नहीं है.....?

अखिलेश अखिल

संविधान लागू होने के बाद सन् 1950 से समाज के प्राय: हर वर्ग को लुभाने, कठपुतली बनाए रखने और राजनीतिक लाभ उठाने के लिए राष्ट्रपति पद पर लाने की कोशिश की गई। अब तक जितने लोग देश में राष्ट्रपति बने हैं, उनमें से अधिकांश लोगों की जाति की आबादी, पूरी आबादी में कम ही रही है, लेकिन आठ फीसदी आबादी वाले आदिवासी समाज को हमेशा संविधान के ऊंचे पदों से अलग ही रखा गया है। आदिवासियों की आजादी की लड़ाई में क्या भूमिका थी, इसे कौन नहीं जानता? देश के तमाम क्षेत्रों में आदिवासी रणवीरों ने देश की हिफाजत, सामाजिक सुधार और प्रकृति को संजोने के लिए काफी कुर्बानियां दी हैं, लेकिन इस समाज को देश की राजनीति शायद अपने लायक नहीं मान रही। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में इस साल कोई आदिवासी राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति बनेगा?

क्या कांग्रेस, भाजपा और देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां पहली दफा किसी मूलवंशी आदिवासी को संविधान के इन ऊंचे पदों पर बैठाने की जुर्रत करेंगी? क्या राहुल गांधी, सोनिया गांधी, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, आडवाणी जी से लेकर शरद पवार, शरद यादव, ममता बनर्जी और छोटे-बड़े क्षेत्रीय दलों के नेता मुलायम सिंह यादव, बहन मायावती और दक्षिण के नेतागण इस बार किसी आदिवासी को संविधान के सबसे ऊंचे पदों पर बैठाने में एकजुट होंगे? क्या इस बार राष्ट्रपति के संभावित नामों एपीजे अब्दुल कलाम, डॉ. मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, सुशील कुमार शिंदे, हामिद अंसारी, डॉ. सी रंगराजन, नैना लाल किदवई और नारायणमूर्ति जैसे नामों की सूची में आदिवासी नेता पीए संगमा, करिया मुंडा, अरविंद नेताम जैसे अन्य आदिवासी नेताओं का नाम भी दर्ज करेंगे? यह सवाल इसलिए किए जा रहे हैं कि आजादी के 65 साल बाद भी लगभग 10 करोड़ की आबादी वाले इस समाज के लोगों को आज तक संविधान के ऊंचे पदों पर लाने की कोशिश नहीं की गई।

कांग्रेस और भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी हैं। दोनों पार्टियां अक्सर आदिवासी और उसके विकास के मुद्दे पर राजनीति करती तो नजर आती हैं, लेकिन कभी भी इन दलों ने आदिवासी को ऊंचे पदों पर बैठाने की कोशिश नहीं की। कोई दो साल पहले राहुल गांधी उड़ीसा में कुछ आदिवासियों को कहा था कि वह दिल्ली में उनकी लड़ाई लड़ेंगे। नियमागिरी के डोंगरिया कोंड आदिवासियों की दीनता, उपेक्षा और शोषण को देखकर राहुल गांधी विचलित हो गए थे। राहुल गांधी यह भी कह गए थे कि आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत है और उनमें सरकार के प्रति विश्वास जगाने की जरूरत है, लेकिन दिल्ली लौटने के बाद राहुल के फोकस में अब शायद देश के आदिवासी नहीं रहे। राहुल के फोकस में अभी मुसलमान, दलित और जाट हैं। राहुल गांधी ने उड़ीसा समेत देश के आदिवासी समाज को बिसार दिया है। प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं कि राहुल का यह व्यवहार समूचे राजनीतिक वर्ग के चरित्र को प्रदर्शित करता है। आजादी के बाद संविधान द्वारा चिह्नित दो समूहों में आदिवासी भी एक थे, जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत थी। इसी वजह से संसद और सरकारी नौकरियों में दलित और आदिवासियों के लिए सीटें आरक्षित की गर्इं, लेकिन आदिवासियों को अंबेडकर जैसा कोई मसीहा नहीं मिला है। एक ऐसा नेता जिसका देश भर में महत्व हो, राजनीतिक पार्टियों के फोकस में आदिवासी हैं ही नहीं।

आपको बता दें कि 545 सदस्यीय लोकसभा में 41 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। हर चुनाव में 41 आदिवासी सदस्य संसद में पहुंच तो जाते हैं, लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने की तूती की आवाज बनकर रह जाती है। इसी तरह देश के तमाम राज्यों में आदिवासी सीट से सैकड़ों आदिवासी विधानसभा पहुंचते रहे हैं, लेकिन उन्हें किसी ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठाया गया हो, कम ही देखने को मिलेगा। देश में अब तक मात्र एक आदिवासी उर्मिला सिंह राज्यपाल बनने में सफल हो सकी हैं।

सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट में जजों की सूची आप देख सकते हैं। आठ साल पहले तक इस सूची में कोई आदिवासी नहीं था। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों के प्रमुख सचिवों, सचिवों की सूची में आदिवासियों के नाम आपको मेहनत करके ढूंढने होंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि देश में आदिवासियों की दर्जनों बोलियां प्रचलित हैं, जबकि सिर्फ संथाली को छोड़कर किसी अन्य आदिवासी बोली को आधिकारिक मान्यता नहीं दी गई। जहां तक शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आदिवासियों के लिए आरक्षण का सवाल है, इसका कुछ लाभ पूर्वोत्तर के अंग्रेजी दां आदिवासियों को ही मिला है। देश के अन्य राज्यों के आदिवासी आज भी शिक्षा और सरकारी नौकरियों से कोसों दूर हैं।

लोकसभा के डिप्टी स्पीकर और भाजपा सांसद करिया मुंडा आदिवासियों की बेहाली पर काफी चिंतित हैं। करिया मुंडा कहते हैं कि राजनीति में भी आदिवासियों को हाशिए पर रखा गया है। कोई भी पार्टी हो, मतलब निकल जाने के बाद आदिवासी नेता को निकाल बाहर करती है। ऐसी स्थिति में राजनीति और सरकार के प्रति विश्वास कैसे बने? जहां तक आदिवासी को संविधान के ऊंचे पदों पर लाने की बात है, इस पर तो बड़ी राजनीतिक पार्टियों को सोचना चाहिए। जो पार्टी देश को एकता के सूत्र में बांधने का नारा देती है, उसे पहल करना चाहिए। दलीय व्यवस्था में इस विषय पर दल को ही सोचना है। हमें भी इसको लेकर पीड़ा होती है, लेकिन जो व्यवस्था है, उससे बाहर जाकर कुछ नहीं हो सकता। पिछले साल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में विश्व आदिवासी सम्मेलन हुआ था। यह आयोजन भारत के संदर्भ में था। उस आयोजन के मिनट्स को आप देखेंगे, तो आदिवासी नेताओं की पीड़ा झलकेगी। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और वर्तमान में मेघालय के तुरा से विधानसभा के सदस्य पीए संगमा कहते हैं कि जब अमेरिका के ह्वाइट हाउस में एक नीग्रो राष्ट्रपति बनकर गोरों की परंपरा को तोड़ सकता है, तो फिर भारत में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आदिवासी क्यों नहीं बन सकता? भले ही आज देश की राजनीति का फोकस आदिवासी पर नहीं है, लेकिन आप और ज्यादा दिनों तक उसे नजरंदाज नहीं कर सकते।

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा आदिवासियों से जुड़े मसलों पर तल्ख हो जाते हैं। कर्मा कहते हैं कि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक है। जब हर धर्म, संप्रदाय को इस पद पर जाने का मौका दिया गया है, तब आदिवासियों के बारे में राजनीति करने वाली पार्टियां क्यों नहीं सोचतीं? इस बिंदु पर आम सहमति बनाने की जरूरत है। जब राष्ट्रपति के लिए राजनीतिक दलों की आम सहमति की जरूरत होती है, तो आदिवासी पर सहमति क्यों नहीं बनती? जाहिर है, हमारी राजनीति के केंद्र में आदिवासी को रखा ही नहीं गया है। यही वजह है कि आदिवासी वर्तमान व्यवस्था से नाराज हैं और सरकार के प्रति उनमें अविश्वास भी है। देश के चर्चित आदिवासी नेताओं में अरविंद नेताम, कांतिलाल भूरिया, दिलीप सिंह भूरिया, शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी, हीरा सिंह मरकाम, उर्मिला सिंह, महेंद्र कर्मा और टेकम संजय शुमार हैं। इन्हीं नेताओं के इर्द-गिर्द आदिवासी राजनीति घूमती है।

आदिवासियों की राजनीति पार्टीगत व्यवस्था से कम होकर अब व्यक्तिगत व्यवस्था पर आधारित होती जा रही है। इसके मायने चाहे जो भी हों, लेकिन इतना तय मानिए कि आदिवासी मांगे मोर...। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर का चुनाव होने के बाद राष्ट्रपति को लेकर घमासान होगा। कांग्रेस को ऐसे आदमी को इस कुर्सी पर बैठाना है, जो पार्टी के भविष्य राहुल गांधी की अगली राजनीति को संवार सके या उसके लिए कोई खतरा न बन सके, लेकिन राहुल गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस व अन्य दलोें के नेताओं से क्या यह अपेक्षा की जा सकती है?

सबसे पहले कांग्रेस सोचे : दाभोर

गुजरात के चर्चित आदिवासी नेता व पूर्व सांसद हैं, सोम जी भाई दाभोर। दाभोर अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष भी हैं। आदिवासियों की यह परिषद पूरे देश में आदिवासियों की लड़ाई, उनकी समस्याओं पर नजर रखे हुए है। इसी परिषद से संगमा, अरविंद नेताम जैसे नेता भी जुड़े हुए हैं। सोमजी भाई दाभोर कहते हैं कि आजादी के 64 सालों में तो आदिवासियों के लिए कोई भी राजनीतिक पार्टी या सरकार कुछ नहीं कर सकी। करोड़ों रुपये खर्च के नाम पर लूटे गए। जहां तक राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का सवाल है, इस पर तो सबसे पहले कांग्रेस को सोचना चाहिए। फिर भाजपा और अन्य दलों को।

आदिवासी आज भी बदहाल

आइए, आपको आदिवासी और उनसे जुड़े आदिवासी इलाकों में फैली नक्सलवादी गतिविधियों की भी थोड़ी जानकारी मुहैया करा दें। गृह मंत्रालय का मानना है कि देश के नौ राज्यों के 83 जिले नक्सल प्रभावित हैं और उनमें से 48 जिलों में नक्सलवाद की जड़ें काफी मजबूत हैं। इन जिलों में सरकार तरह-तरह की योजना चला रही है, ताकि आदिवासी इलाकों के साथ ही आदिवासियों का विकास हो। 64 साल की आजादी पर नजर डालें, तो पाएंगे कि भले ही अरबों-खरबों की राशि आदिवासियों के नाम पर जारी की गई, लेकिन आदिवासी जहां थे, आज भी वहीं हैं। मध्य प्रदेश छिंदवाड़ा के पूर्व विधायक और राष्ट्रीय गोंडवाना पार्टी के अध्यक्ष मनमोहन साह बट्टी कहते हैं कि अगर नक्सलियों को लोकतंत्र में विश्वास नहीं है, तो सरकार और राजनीतिक दलों को उनमें विश्वास जगाने के लिए भी आदिवासियों को राष्ट्रपति जैसे पदों पर ले जाने की जरूरत है। संभव है इसका व्यापक असर पड़ेगा।

किसी को नहीं चिंता : करिया मुंडा

देश में आदिवासियों की दशा, आदिवासियों के प्रति सरकार की सोच और संवैधानिक पदों पर आदिवासियों की अब तक हुई तैनाती पर लोकसभा के डिप्टी स्पीकर करिया मुंडा से बातचीत के अंश :-

अब तक आदिवासी समाज कहां खड़ा है?

आदिवासी के बारे में किसे चिंता है? जहां यह समाज पहले था, वहीं है। किसी तरह के बदलाव उनके जीवन में नहीं है। कभी-कभी तो लगता है कि हमारी सरकार ने आदिवासियों को और ज्यादा हाशिए पर ले गई है।

लेकिन उनके विकास के लिए काम तो हुए हैं?

कहां काम है। कुछ हुआ है, तो वह दिखना चाहिए। दिल्ली में बैठकर जंगल में रहने वाले लोगों के लिए योजना बनेगी, तो वह कारगर नहीं होगा? आदिवासी इलाके के लिए योजनाएं वहां की भौगोलिक स्तर पर लोगों की सोच और संस्कृति के अनरूप बननी चाहिए। जो लोग योजना बनाते हैं, उन्हें आदिवासी समाज की क्या जानकारी होती है?

योजनाएं सफल क्यों नहीं होतीं?

क्योंकि आदिवासी समाज को सरकार और उसके लोगों पर विश्वास नहीं है। सबसे पहले तो आदिवासियों के बीच सरकार और तंत्र के प्रति विश्वास जगाने की बात होनी चाहिए। जो लोग आदिवासी क्षेत्रों में काम करने जाते हैं, पहले उन्हें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। फिर स्थानीय लोगों को उसमें शामिल करना जरूरी है। फिर आदिवासी इलाके में काम कर रहे सरकारी लोगों का जल्द-जल्द स्थानांतरण रुके तो बात बनेगी। शहरों की तरह आदिवासी इलाके में विकास नहीं हो सकते।

झारखंड सरकार कैसी चल रही है?

इस पर बोलना ठीक नहीं है। लेकिन पिछले 11 सालों में वहां आदिवासी सरकार दिखाई नहीं पड़ती। लोगों की अपेक्षा पर झारखंड सरकार नहीं चल रही है। पारदर्शिता, प्रतिबद्धता के साथ सरकार काम करे, तो बहुत कुछ संभव है।

आदिवासियों को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से दूर क्यों रखा गया?

यह तो आप राजनीतिक दलों से पूछें। आदिवासियों को कौन सी पार्टी महत्व दे रही है? चुनाव के समय आदिवासियों की पूछ होती है। फिर 90 के बाद देश में जो हो रहा है, वह आदिवासियों के विरुद्ध ही है। कांग्रेस सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी है, वही बताएगी कि आदिवासी राष्ट्रपति क्यों नहीं बन सकता।

इसके लिए जिम्मेदार कौन पार्टी है?

इसके लिए कोई एक दल जिम्मेदार नहीं है। सभी पार्टी को आप कह सकते हैं। कांग्रेस को तो सबसे पहले यह काम करना चाहिए था। फिर भाजपा और अन्य दलों को भी इस पर विचार कर एक राय बनानी चाहिए। 8 फीसदी की आबादी वाले इस समाज को हाशिए पर रखा गया है।

दलों को सोचना होगा : नेताम

मध्य प्रदेश के आदिवासी नेता अरविंद नेताम कभी कांग्रेस के चहेते थे। वे केंद्र में मंत्री भी बने। फिर कांग्रेस ने पार्टी से निकाल दिया। आदिवासियों के लिए नेताम आज भी लड़ रहे हैं। पेश है उनसे बातचीत के अंश-

आदिवासियों को ऊंचे संवैधानिक पदों पर अब तक नहीं लाया गया?

इस बारे में राजनीति दलों को सोचना है। अब तक तो ऐसा नहीं हुआ है। टैलेंटेड को कौन पूछता है? आदिवासी देश प्रेमी होते हैं, विश्वसनीय होते हैं, लेकिन यहां की राजनीति को आदिवासी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति शायद नहीं चाहिए। आज तक किसी दल ने यह पहल नहीं की। कभी संगमा जी के नाम पर उस तरह की चर्चा चली थी, पर संभव नहीं हो सका।

आप कांग्रेस में रहे हैं, उसकी इस बारे में क्या सोच है?

कांग्रेस वोट बैंक देखती है। उसे लगता होगा कि आदिवासी वोट उसे नहीं मिलता। कांग्रेस आदिवासियों को आगे लाती, इसके बजाय उसने तमाम आदिवासी नेताओं को दबाने का काम किया।

आदिवासी समाज आवाज क्यों नहीं उठाता?

देखिए, हमारी संस्कृति कुछ अलग है। जंगल, पहाड़ों में रहने वाले लोग संतोषी होते हैं। उनकी अपनी जीवन शैली है। 90 के बाद तो इस समाज को उदारीकरण के जरिए विस्थापित करने की तैयारी शुरू हो गई है। हम अपनी लड़ाई यहां लड़ें या फिर राष्ट्रपति की मांग करें? देश का संविधान सुरक्षा देने की तमाम बातें करता है, लेकिन उन कानूनों को तोड़ा जा रहा है। उदारीकरण का आदिवासी पर इसका असर पड़ा है उसका रिव्यू होना चाहिए, तो पता चलेगा कि आदिवासी है कहां?

क्या आप मानते हैं कि आदिवासी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बने, तो नक्सलवाद में कमी आएगी?

देखिए, नक्सलवाद विकास न होने के कारण है। उसके लिए राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं। जब सरकार के प्रति उनमें विश्वास ही नहीं रह गया है, तो उसके लिए दोषी कौन है?

No comments:

Post a Comment