Saturday, February 11, 2012

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किस पार्टी की सरकार बनेगी और किसका पत्ता साफ होगा...? इसको लेकर चर्चा तो खूब है, लेकिन पिछले 10 सालों में सूबे की अर्थव्यवस्था कहां चली गई है, इस पर शायद ही कोई पार्टी या जनमानस बहस करने को तैयार है। देखें, क्या हैं यूपी के आर्थिक हालात...?

अखिलेश अखिल

उत्तर प्रदेश में सात सालों में अर्थव्यवस्था अन्य सामान्य राज्यों की तुलना में बद से बदतर हो गई है, जबकि इन्हीं सालों में केंद्र से लेकर सूबे में राजनीति करने वाली तमाम बड़ी राजनीतिक पार्टियों का कोष लबालब भर गया है। आप इस पूरे प्रकरण को सरकारी और निजी क्षेत्रों से तुलना कर सकते हैं। जिस प्रकार एक सरकारी उपक्रम लूट का शिकार होकर घाटे में चला जाता है और उसी क्षेत्र का निजी उपक्रम दिन-दूनी रात-चौगुनी की रफ्तार से दौड़ता रहता है, उसी तर्ज पर प्रदेश के सारे उद्योग धंधे या तो बंद हो गए हैं या बंदी के कगार पर हैं, लेकिन यहां चुनाव लड़ रहीं सभी राजनीतिक पार्टियां मालामाल हो रही हैं। मजे की बात है कि इस मसले पर कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है।

सूबे की 13 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रहीं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के मुखिया और समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर कहते हैं, ‘जो पार्टियां आज चुनाव के समय बेहतर सरकार देने की बात कर रही हैं, वही पार्टियां सालों से प्रदेश को लूट भी रही हैं। जनता की आंखों पर पट्टी बांध दी गई है। राजनीतिक दल के पास जो फंड आ रहा है, वे सारा भ्रष्टाचार की ही तो है। जनता से लूटे गए पैसों से ही राजनीतिक पार्टियां फिर चुनाव लड़ रही हैं और जीतेंगी भी। इसमें दोष पार्टी का नहीं, वोट देने वालों का है। फिर जो निजी कंपनियां राजनीतिक पार्टी को चंदा देने का काम कर रही हैं, सरकार बनने के बाद वे उसका लाभ उठाएंगी।’

पिछले पांच से सात सालों में प्रदेश की माली हालत कहां पहुंच गई है, इस पर हम बात करेंगे, लेकिन सबसे पहले हम आपको दिखाते हैं उन पार्टियों की तस्वीरें, जो चुनावी समर में ईमानदारी की ताल ठोककर लोगों से अपने पक्ष में वोट डालने की बात कह रही हंै। ‘नेशनल इलेक्शन वाच’ ने आरटीआई के जरिए जो तथ्य हासिल किए हैं, उसके मुताबिक 2009-10 में कांग्रेस पार्टी के खजाने में 12,43.67 करोड़ रुपये दिखाए गए हैं, जबकि भाजपा के कोष में 60,1.81 करोड़, बसपा के कोष में 308.74 करोड़, सपा के कोष में 106.95 करोड़ और रालोद के कोष में 7़12 करोड़ पाए गए हैं। ये आंकड़े 2009-10 के हैं। जाहिर है, चुनाव आते-आते इन पार्टियों के कोष में कई करोड़ की राशि और भी आ गई होगी। अब आप ही बता सकते हैं कि इस तरह की ये पार्टियां राजनीतिक दल हैं या फिर कोई कॉरपोरेट कंपनियां? भाजपा संगठन से जुड़े एक नेता कहते भी हैं कि पार्टियों के फंड से तो इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन जिस तरह से इस माध्यम से कुछ सालों से फंड इकट्ठे हो रहे हैं, उसे कहीं से भी जायज नहीं कहा जा सकता। जो लोग या कंपनी चंदा देते हैं, बाद मेंउसका सौ गुना लाभ भी ले जाते हैं और यह बात कहने में कोई गुरेज नहीं है कि इसमें जनता को ही सब भुगतना पड़ता है।

आंकड़ों को देखकर आप खुद अंदाज लगा सकते हैं कि चुनाव लड़ने वाली ये तमाम पार्टियां क्या कर रही हैं? उत्तर प्रदेश के 2007 के चुनाव में कोई 127 करोड़पति चुनाव जीतने में सफल हुए थे और इनमें अधिकतर वही लोग थे, जो 2002 के चुनाव में भी विधानसभा पहुंचे थे। इलेक्शन वाच के राष्ट्रीय संयोजक अनिल बैरवाल कहते हैं कि कुछ सालों से एक विचित्र नजारा नेताओं और पार्टियों के बीच देखने को मिल रहा है। नेता भी करोड़पति और पार्टी भी अरबपति। पहले ऐसा नहीं था। पहले पार्टी ही धनी होती थी, लेकिन अब पार्टी से कम औकात नेता की नहीं है। चुनाव एक खेल के सिवा कुछ नहीं रह गया है। गरीब और साफ सुथरे लोगों का चुनाव लड़ना तो बड़ी समस्या दिख रही है। देखने में भी आ रहा है कि कोई भी पार्टी गरीब और साफ-सुथरे उम्मीदवारों को खड़ा करने में पीछे रही है।

2002 के चुनाव के बाद 2007 में जो 127 लोग चुनाव जीतकर उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे, उसमें ऐसा नहीं है कि कोई एक दल के लोग ही शामिल थे। आपको 2007 के पार्टीवार करोड़पति विधायकों से परिचित कराते हैं--

अब जरा राज्य की माली हालत पर एक नजर डाल ली जाए। सबसे पहले गरीबी की बात। केंद्रीय स्तर पर अभी देश में 35 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह सरकारी आंकड़ा है, जबकि गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक 45 फीसदी से ज्यादा लोग अभी भी देश में गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं। और जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है, वहां 50 फीसदी से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। आप कह सकते हैं कि बीमारू राज्यों में अभी सबसे खराब हालत इसी सूबे की हो गई है। अन्य प्रदेशों की तुलना में सबसे ज्यादा बाल मृत्यु दर इसी राज्य में है। इसके साथ ही जीवन जीने की प्रतिशत दर भी अन्य राज्यों की तुलना में इस राज्य में काफी कम है। जहां तक जीडीपी का सवाल है, अन्य सामान्य राज्यों से भी यह काफी पीछे जा चुका है। 2001 से 2009 के बीच इस राज्य की सम्मिलित विकास दर 10.8 फीसदी रही है जबकि इसी दौरान अन्य सामान्य राज्य का विकास दर 13.4 फीसदी रहा है।

आंकड़े बता रहे हैं कि अभी जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं या हो गए हैं, वहां 2005 और 2010 के बीच सर्वाधिक घाटा इसी प्रदेश को हुआ है। इस प्रदेश को कुल 72,693 करोड़ का घाटा हुआ है जिससे इसकी माली हालत और खराब हो गई है। 2008 -09 में राज्य का यह वित्तीय घाटा पांच राज्यों की अपेक्षा सबसे ज्यादा 20,513 करोड़ का रहा है। इस सूबे के बाद पंजाब दूसरे स्थान पर है। सूबे की मुखिया मायावती विकास की बात तो खूब करती हैं, लेकिन उन्होंने राज्य को कहां पहुंचा दिया है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। 2009-10 में राजस्व व्यय में 18 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ब्याज और पेंशन भुगतान को मिलाकर 09-10 में कुल राजस्व व्यय 59 फीसदी तक पहुंच गया है। राज्य में केवल वेतन के रूप में कुल आमदनी का 50 फीसदी भुगतान हुआ। इस मामले में वित्त आयोग के निर्देश की भी अवहेलना की गई। 12 वे वित्त आयोग ने वेतन पर 35 फीसदी से ज्यादा भुगतान करने पर रोक लगाने की बात कही थी, लेकिन राज्य सरकार के ऊपर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। सूबे के दशकीय विकास दर भी नजर डाले, तो चौंकाने वाली बात सामने आती है। पिछले 10 साल में यह राज्य बिहार से भी पीछे चला गया है। पिछले एक दशक में बिहार की विकास दर 28.62 फीसदी रही, जबकि उत्तर प्रदेश की विकास दर 25.85 फीसदी रही। चुनाव के दौरान चाहे कोई भी पार्टी विकास की कहानी जितनी कह ले, इतना तो सच है कि इन 10 सालों में राज्य के नेताओं की झोली भरी है और पार्टियों के कोष लबालब भरे हैं।

कुछ बड़ी राजनीतिक पार्टियों को मिले फंड का ब्यौरा (2007-08 में)

भाजपा : वीडियोकान-5 करोड़, पुंज लॉयड, 2़5 करोड़, टोरेंट पावर-2 करोड़, निरंजन एल हीरानंदानी-2 करोड़, मल्टीफेस्ड फिनस्टोक-1.75 करोड़, वीएम सालगांवकर एंड ब्रोस-72 लाख, वीएस डेंपो एंड कं0- 62़5 लाख, चौगुले चेरिटेबल ट्रस्ट-60 लाख, मुंद्रा पोर्ट्स-50 लाख।

कांग्रेस : वीडियोकान इंडस्ट्रीज-2 करोड़, टोरेंट पावर-2 करोड़, वीएम सालगांवकर-72़5 लाख, चौगुले चेरिटेबल ट्रस्ट-72़5 लाख, निर्मल केमिकल-50 लाख, वीएस एंड कं.- 50 लाख, सेसा गोवा लि0-27़5 लाख, जनरल इलेक्ट्रल ट्रस्ट-25 लाख, वीएस डेम्पो एंड कं0-12़5 लाख,

केम्पो माइनिंग-10 लाख।

सीपीआई : केरला स्टेट सीपीआई-10 लाख, एबी बर्धन-6.8 लाख, एमपी स्टेट सीपीआई-4़5 लाख, डिजाइन लैब-3 लाख, अतुल कुमार अंजान-2.4 लाख।

सीपीएम : राधा रियलिटी-11 लाख, गायत्री प्रोजेक्ट-5 लाख, सिव कंस्ट्रक्शन-5 लाख, जी बालरेड्डी-4 लाख, एक्सएल टेलीकॉम-3 लाख,

वीरचो कैब-3 लाख, एलांस रंगारेड्डी-3 लाख।

शिव सेना : न्यू लुक कंस्ट्रक्शन-15 लाख, शेलातकर कंस्ट्रक्शन-11 लाख, एफ ए कंस्ट्रक्शन-10 लाख, साई पुष्प कंस्ट्रक्शन-1़10 लाख, म्युनिसिपल कर्मचारी कामगार सेना-1 लाख।



किस पार्टी के खजाने में कितनी राशि (करोड़ में)



पार्टी 2007-08 08-09 09-10 कुल कोष

कांग्रेस 220.81 496.98 525.98 1243.67

भाजपा 123.78 220.02 258.01 601.81

बसपा 69.74 182.02 56.97 308.74

सपा 32.30 39.00 35.65 106.95

रालोद 3.34 2़18 1.59 7़12



पार्टी कुल विधायक करोड़पति प्रतिशत



कांग्रेस 22 08 36

रालोद 10 5 50

भाजपा 51 16 53

बसपा 206 51 25

सपा 97 38 39

अन्य 17 09 53

कुल 403 127 32

चंदा नहीं, कमीशन कहिए : रघु ठाकुर

उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में 1300 से ज्यादा राजनीतिक पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं। लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी भी 13 सीटों के लिए मैदान में है। पार्टी अध्यक्ष रघु ठाकुर से अखिलेश अखिल ने की चुनाव की राजनीति से लेकर दलों के फंड पर बातचीत। पेश है प्रमुख अंश-

आपकी पार्टी क्या कर रही है चुनाव में?

हम भी मैदान में हैं। हमारे पास फंड तो है नहीं, सिद्धांत की लड़ाई लड़ रहे हैं। जो जनता कल तक भ्रष्टाचार के आंदोलनों में हिस्सा ले रही थी, अब उसे फैसला करना है कि उसके वोट भ्रष्टाचारियों के पास जाएंगे या फिर ईमानदार लोगों को चुनेंगे।

क्या सभी दल भ्रष्ट हैं?

जो चुनाव जीतकर भी जनता के लिए काम न करे, उसे क्या कहा जाए? राजनीतिक दल जिस तरह से चुनाव में पैसे खर्च कर रहे हैं, उससे तो यही कहा जा सकता है। आप राजनीतिक दलों के चुनावी फंड को देखें, तो पता चल जाएगा कि पैसे कहां से आ रहे हैं? ये सब काला धन है।

लेकिन राजनीतिक दल तो फंड के स्रोत को चंदा कहते हैं?

हां, चंदा तो मैं भी कहता हूं। लेकिन वह चंदा पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता का नहीं होता। किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता और जनता चंदा नहीं देते। फंडिंग के दो स्रोत हैं। एक भ्रष्टाचार का काला धन और दूसरा कॉरपोरेट चंदा। इन दोनों फंडों से तमाम राजनीतिक पार्टियां चल रही हैं। फिर जो कंपनी चंदा देगी, वह उसका लाभ भी तो लेगी। सरकार बनने के बाद यही कंपनियां अपने हित के मुताबिक जनता को लूटने का काम करती हैं।

चंदे पर सरकार की कोई नीति?

नीति है। भारत सरकार ने कॉरपोरेट चंदा के नियम बना रखे हैं। नियम के मुताबिक कोई भी कॉरपोरेट कंपनी अपनी आय का 7़5 फीसदी चंदा दे सकता है। विचित्र बात तो यह है कि सरकार इन कंपनियों से 7़5 फीसदी चंदा देने की बात कहती है, जबकि सामाजिक सेवाओं के लिए इन्हीं कंपनियों से मात्र 2 फीसदी खर्च करने की बात होती है। अगर ये सारे पैसे सामाजिक सेवाओं में खर्च हों, तो देश समाज के लिए बेहतर हो सकता है। लेकिन सभी राजनीतिक दलों को चंदा लेना है, इसलिए सामाजिक सेवा से ज्यादा चंदा को प्राथमिकता दी गई है।

आपकी नजर में उत्तर प्रदेश में क्या स्थिति दिख रही है?

अभी इस बारे में कुछ भी बोलना ठीक नहीं है। किसी भी पार्टी के लिए जनता के मन में मोह नहीं है। लेकिन चुनाव होंगे और लोग वोट डालेंगे। ऊपरी तौर पर कहा जा सकता है कि जो लोग आज एक दूसरी पार्टी को गाली दे रहे हैं और एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं, सरकार बनाने के लिए एक हो सकते हैं। कांग्रेस सपा के साथ जा सकती है और भाजपा बसपा के साथ गलबहियां कर सकती है। किसी भी हाल में उन्हें सत्ता चाहिए। ऐसा नहीं है कि जनता यह सब नहीं समझ रही है।

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