Saturday, March 17, 2012

देश को हांक रहे जेबी संगठन

अखिलेश अखिल

देश में कई ऐसे राजनीतिक दल हैं, जिनके सर्वे-सर्वा के रूप में सिर्फ एक ही व्यक्ति है, यहां तक कि मुखिया का विकल्प तक नहीं है। इस तरह के कुछ दल तो विभिन्न राज्यों में ताकतवर पार्टी के रूप में मौजूद हैं या फिर सरकार ही उन्हीं की है। अब सोचिए, यदि ऐसे किसी दल के मुखिया को अचानक ‘कुछ’ हो जाए, तो पार्टी छिन्न-भिन्न नहीं हो जाएगी?

तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक की मुखिया और राज्य की मुख्यमंत्री जयललिता के बाद किसी दूसरे नेता को जानते हैं आप? वहां की जनता भले ही कुछ नेताओं के नाम गिना दे, लेकिन देश की बाकी जनता के अलावा राजनीति करने वाले चतुर सुजान भी जयललिता के बाद के दो चार नेताओं के नाम से परिचित नहीं होंगे। इसी कड़ी में तमिलनाडु की राजनीति की धुरी रहे डीएमके प्रमुख करुणानिधि, जिसे देश जानता और पहचानता है, उनके बाद डीएमके के नेताओं को जानना मुश्किल हो जाएगा। उधर, बीजू जनता दल को हांकने वाले राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के बाद पार्टी को कौन चलाएगा या पार्टी की बागडोर किसके हाथ जाएगी, कहना मुश्किल है। इसी श्रेणी में आप ममता दीदी को भी ले सकते हैं। पश्चिम बंगाल की बाघिन कही जाने वाली ममता बनर्जी ने अपने बूते राज्य की सत्ता पर कब्जा तो जमा लिया है, लेकिन उनके बाद पार्टी की बागडोर कौन संभालेगा, नहीं कहा जा सकता। ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष भी हैं और राज्य की मुख्यमंत्री भी। कोलकाता से लेकर दिल्ली तक में इस पार्टी का कोई भी ऐसे नेता नहीं है, जिसे आम जनता जानती और पहचानती है।

मामला यहीं तक नहीं है। चुनाव आयोग में दर्ज देश के विभिन्न राज्यों में कार्यरत राज्य आधारित 53 पार्टियों को देख लीजिए और उनके आकाओं को समझ लीजिए, तो पता चल जाएगा कि क्षेत्रीय पार्टी चलाने वाले तमाम नेता अपनी पार्टी को ‘जेबी संस्था’ कैसे बनाए हुए हैं। पार्टी चलाने वाले ये लोग अपने या अपने परिवार के सदस्यों के अलावा किसी को भी आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं लेते। अब आप बहन मायावती को ही लीजिए। अभी-अभी उत्तर प्रदेश चुनाव में सपा के हाथ बुरी तरह पराजित हुई उनकी पार्टी बसपा का कोई भी नेता माया के अलावा मीडिया के सामने नहीं आया। जो चुनाव हार गए हैं, उनकी तो बात ही नहीं कीजिए, जो जीतकर विधानसभा पहुंचे भी हैं, वे भी खुली हवा में कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं। बुंदेलखंड इलाके से बसपा के एक सांसद कहते हैं, ‘मैडम के अलावा पार्टी के बारे में किसी को कुछ भी बोलने का हक नहीं है। आप इसे जिस रूप में देखें, लेकिन आदेश यही है। क्या बसपा माया मैडम की जेबी संस्था है? इसका जवाब सांसदों के पास नहीं है।

मामला यहीं तक नहीं है। मायावती के बाद पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेताओं का भी अभाव है। 18 सांसदों में से कोई भी सांसद या प्रदेश अध्यक्ष अपने को नेता कहलाने की स्थिति में नहीं हैं। कहते हैं कि कांशीराम मरते समय माया को यही बात सिखाकर गए थे कि सत्ता की बागडोर हमेशा अपने पास रखना। पार्टी को चलाना है और दूर तक राजनीति करनी है, तो किसी पर विश्वास करने की जरूरत नहीं है। आप कह सकते हैं कि बसपा में माया के बाद अभी दूसरा कोई विकल्प नहीं है। यही हाल झारखंड आंदोलन से निकली पार्टी झामुमो का है। जब से झारखंड मुक्ति मोर्चा का निर्माण हुआ है, तब से गुरुजी, यानी शिबू सोरेन पार्टी को अपने तरीके से हांक रहे हैं। गुरुजी का अपना वोट बैंक है और चुनाव लड़ने के अपने तरीके भी। बुढ़ापे में गुरुजी ने अपने दूसरे बेटे पर यकीन तो किया है और पार्टी की आधी जबावदेही हेमंत सोरेन पर रख दी है, लेकिन देश में आज भी लोग झामुमो का नाम लेते ही शिबू सोरेन को ही जानते हैं। यह बात और है कि इस पार्टी में कई नेता ऐसे हैं, जिनका अपना जनाधार है और अपनी पहचान भी है, लेकिन गुरुजी को किसी दूसरे पर विश्वास नहीं। आगामी लोकसभा चुनाव या फिर विधानसभा चुनाव में इस पार्टी की स्थिति क्या होगी, कहना मुश्किल है। इतना तय है कि इस पार्टी की कमान आज किसी दूसरे के हाथ में दे दी जाए, तो संभव है कि उसमें और भी जान आ जाए।

लेकिन अभी ऐसा गुरुजी को पसंद नहीं है। बिहार में राजद का भी यही हाल है। जबसे राजद बनी है, तभी से लालू यादव उसके मुखिया पद पर कायम हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में राजद की बुरी हार के बाद यह बात उठी थी कि अगर लालू यादव पार्टी की बागडोर किसी दूसरे नेता के हाथ में सौंप दें, तो संभव है कि विधानसभा चुनाव में पार्टी जिंदा हो जाए। लेकिन कोई अपनी जेबी संस्था को किसी के हवाले क्यों करे? लालू ने ऐसा नहीं किया और पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया। रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति का भी यही हाल है। यह पार्टी भी उनकी जेबी पार्टी है, उन्हें भी किसी और पर विश्वास नहीं। कोई नहीं बता सकता कि लोजपा में रामविलास के सिवा कोई और भी नेता काम कर रहा है। जदयू के वरिष्ठ नेता रामसुंदर दास शायद ठीक ही कहते हैं कि आज देश में सबसे ज्यादा लोकतंत्र का अभाव राजनीतिक पार्टियों के बीच है। अगर राजनीतिक पार्टी में लोकतंत्र आ जाए, तो राजनीति की दशा ही बदल जाएगी। पार्टी चलाने वाले ही जब लोकतंत्र में आस्था नहीं रखते, तो बाहरी लोगों से क्या अपेक्षा की जा सकती है। इसी तरह जम्मू कश्मीर की नेशनल कान्फ्रेंस, पैंथर्स पार्टी, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी ‘वन मैन शो’ की तरह संचालित है। इन जेबी संगठनों के मुखिया के अलावा किसी को भी लोग नहीं पहचानते।

पंजाब में अकाली दल की अभी-अभी जीत हुई है। प्रकाश सिंह बादल और उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल के अलावा इस पार्टी के अन्य नेताओं के बारे में देश की जनता शायद ही जानकारी रखती हो। अकाली दल भी इसी बादल परिवार की जेबी संस्था है। महाराष्ट्र में शिवसेना बाल ठाकरे की जागीर है। यह बात और है कि शिवसेना से बहुत सारे नेता निकले हैं और देश के निर्माण में अपनी भूमिका निभाई है, लेकिन आज भी शिवसेना बाल ठाकरे से बाहर नहीं निकल सकी है। उत्तर प्रदेश में रालोद अजित सिंह की जेबी संस्था के रूप में संचालित है। अजित सिंह हर बार चुनाव में उतरते हैं और अपने कुछ साथियों के साथ किसी न किसी सरकार में शामिल हो जाते हैं। अनुराधा चौधरी बहुत सालों तक अजित के साथ रहीं, लेकिन उन्हें भी खास तवज्जो नहीं मिली, तो वह मुलायम के साथ चली गईं। उधर, अजित अब अपने बेटे जयंत को पार्टी की बागडोर संभालने का गुर सिखा रहे हैं। हरियाणा में चौटाला परिवार भी इंडियन नेशनल लोकदल चलाते हैं। चौटाला और उनके दो पुत्रों के अलावा इस पार्टी के किसी नेता को शायद ही देश के लोग जानते होंगे। इसी राज्य में भजनलाल के पुत्र कुलदीप विश्नोई ‘हरियाणा जनविकास पार्टी’ चलाते हैं और खुद ही पार्टी के अध्यक्ष-सांसद भी हैं। हजपा से और कितने नेता जुड़े हुए हैं, शायद ही किसी को मालूम हो। देश के कई राज्यों में इसी तरह की जेबी संस्था के रूप में 53 राजनीतिक पार्टियां कार्यरत हैं।

हैरत की बात तो यह है कि जो क्षेत्रीय दल विभिन्न राज्यों में सरकार चला रहे हैं, उनके मुखिया को ‘माइनस’ कर दिया जाए, तो उस पार्टी के दूसरे नेता को पहचानना भी मुश्किल हो जाएगा। आप कह सकते हैं कि देश की कई क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां अपने आकाओं के नाम पर ही फल-फूल रही हैं। आलम यह है कि इन पार्टियों के नेताओं ने दूसरी या तीसरी पंक्ति के नेताओं को आगे बढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं ली है। हरियाणा में कभी सख्त प्रशासक के रूप में पहचान बनाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बंसीलाल ‘हरियाणा विकास पार्टी’ के एकमात्र मुखिया थे। उनके बाद बागडोर उनके पुत्र सुरेंद्र चौधरी ने संभाली, लेकिन दोनों के न रहने के बाद पार्टी ही खत्म हो गई। ऐसे में ये पार्टियां कुछ खास नेताओं की जेबी संस्था बनकर रह गई हैं। जिन्हें हम ‘वन मैन शो’ पार्टी भी कह सकते हैं।

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