Thursday, March 29, 2012

क्या फिर लौटेगा ‘यादवी’ राज

अखिलेश अखिल

जिस दिशा में देश की राजनीति की हवा बह रही और राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस, भाजपा व बसपा के खिलाफ लोगों में आक्रोश उभरता जा रहा है, उससे एक नई राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के अचानक मजबूत होकर उभरने के बाद अन्य क्षत्रपों ने भी कमर कसने शुरू कर दिए हैं। इसी क्रम में अगर बिहार के लालू यादव अपनी वापसी करने में कामयाब हो जाते हैं, तो बहुत संभव है कि अगले लोकसभा चुनाव में मुलायम की अगुआई में एक नई राजनीति की शुरुआत हो जाए। ऐसा तभी संभव है, जब तीनों यादव नेता आपस में लड़ें नहीं।

ऐसी स्थिति में कई सवाल खड़े होते हैं। पहला सवाल यह कि क्या आगामी लोकसभा चुनाव में यूपीए महत्वहीन हो जाएगी? क्या सरकार बनाने की दौड़ में एनडीए पिछड़ जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या देश की तमाम समाजवादी धारा की पार्टियां एक मंच पर आकर यूपीए और एनडीए को ललकारेंगी? इन सवालों पर राजनीतिक विश्लेषक माथापच्ची भी शुरू कर चुके हैं। अब यह बात और है कि जदयू अध्यक्ष शरद यादव डंके की चोट पर कहते फिर रहे हैं कि तीसरे मोर्चे की अभी कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन इस बात की संभावना बढ़ गई है कि अगले लोकसभा चुनाव में इनतीनों जिद्दी यादवों के बीच या तो जंग होगी या फिर ये तीनों मिलकर देश में एक नई राजनीति की शुरुआत करेंगे। सपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘आम चुनाव में हम कुछ अलग तरह की राजनीति की कल्पना कर रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा को अलग करके हम क्षेत्रीय पाटियों की मजबूत संभावना पर ध्यान दे रहे हैं। इसके लिए लालू और मुलायम, अंदरखाने एक ही हैं। यह बात और है कि समाजवादी एक नहीं हो पाते, लेकिन इस बार हम एक होकर मुलायम सिंह पर दांव खेलने की तैयारी में हैं।’

अब सवाल यह है कि क्या वाकई में लालू प्रसाद इसके लिए तैयार हैं? राजद ने पूरी ताकत अगले चुनाव में अपनी हैसियत बढ़ाने में झोंक रखी है। बिहार विधानसभा चुनाव में पटखनी खाने के बाद लालू की कद्र केंद्र में भी कम हो गई है। एक बार फिर से वह यादव-मुसलमान और अगड़ों को एकजुट करने में लगे हुए हैं। हालांकि, लालू यादव कहते हैं कि अभी किसी तीसरे मोर्चे की संभावना नहीं है, लेकिन क्या जब कांग्रेस और भाजपा सरकार बनाने के स्थिति में नहीं होगी और उत्तर व दक्षिण की तमाम पार्टियां बड़ी संख्या में सीटें जीत कर आएंगी, तब क्या होगा? उत्तर से दक्षिण की राजनीति पर गौर करें, तो साफ हो जाता है कि क्षेत्रीय पार्टियां जनता के बीच मजबूत होती जा रही हंै। ऐसे में बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति महत्वपूर्ण हो गई है। राजनीति के तीन अहंकारी और जिद्दी यादव नेताओं- मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव यहीं से आते हैं।

इन तीनों दिग्गजों की राजनीतिक रणनीति पर बात करने से पहले इन तीनों के बायोडाटा पर गौर करना जरूरी है। सबसे पहले बात करते हैं मुलायम सिंह यादव के बारे में। पेशे से कभी शिक्षक रहे मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक बार देश के रक्षा मंत्री रह चुके हैं। इस दफा चौथी बार वह यूपी के मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन अपने सुपुत्र अखिलेश यादव को सूबे की सबसे बड़ी कुर्सी देकर राष्ट्रीय राजनीति में अंतिम पारी खेलने की जुगत में लग गए हैं। खांटी लोहियावादी और गैर कांग्रेसवाद की राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव को अयोध्या के विवादित ढांचा विध्वंस के बाद मौलवी के खिताव से भी नवाजा गया था। इटावा के सैफई गांव में जन्मे मुलायम की पहचान उसूलों पर चलने वाले जिद्दी नेता की है। 1967 में मुलायम पहली बार विधानसभा पहुंचे और 1989 में पहली बार उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली। मंडल आंदोलन के दौरान वीपी सिंह का विरोध किया और चंद्रशेखर के साथ मिलकर 1992 में सपा का गठन किया। 1993 में बसपा के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई, लेकिन बहुत दिनों तक सरकार नहीं चल सकी। 1996 में मुलायम सिंह पहली बार लोकसभा पहुंचे और रक्षा मंत्री बने। देवगौड़ा के हटने के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर इनकी नजरें गर्इं, लेकिन प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना पूरा नहीं हुआ। 2002 में तीसरी बार उन्होंने यूपी की सत्ता संभाली। वह 14वीं और 15वीं लोकसभा के सदस्य बने। राजनीति में इतना लंबा सफर तय करने के बाद मुलायम में काफी बदलाव आ गया है। जिंदगी भर गैर कांग्रेस की राजनीति करने वाले मुलायम पिछले कुछ सालों से कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। भले ही अब तक मुलायम केंद्र की यूपीए सरकार में शामिल न हुए हों, लेकिन हर बार यूपीए सरकार को संकट से उबारा जरूर है। राजनीतिक जानकर यह मान कर चल रहे हैं कि कांग्रेस के प्रति यह ‘मुलायमियत’ दूर की राजनीति को लेकर है। अगर अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा सौ सीटों पर सिमट जाती है, तो मुलायम तमाम समाजवादी पार्टियों को एकजुट कर कांग्रेस का समर्थन अपने नाम पर ले सकते हैं। हालांकि, अभी यह दूर की कौड़ी है, लेकिन जिस तरह से देश में कांग्रेस और भाजपा की साख घटी है, उससे क्षेत्रीय पार्टियों की मजबूती को बल मिल रहा है।

जदयू के अध्यक्ष और मधेपुरा से सांसद शरद यादव का भले ही कोई बड़ा जनाधार नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत पकड़ की वजह से उन्हें राजनीति का जादूगर कहा जाता है। जबलपुर जिले के बाबई गांव में जन्मे शरद जेपी आंदोलन के दौरान जबलपुर विश्वविद्यालय के छात्र नेता थे। इमरजेंसी के ठीक पहले बतौर जनता पार्टी उम्मीदवार जबलपुर से उपचुनाव जीतकर वह लोकसभा पहुंचे और चरण सिंह की लोकदल युवा शाखा के अध्यक्ष बने। 1977 में शरद यादव लोकसभा पहुंचे, लेकिन 1980 में हार गए। बहुत दिनों तक शरद भटकते रहे, लेकिन उनका बनवास मुलायम सिंह यादव और लालू यादव ने तोड़ा। शरद राजनीति की जकड़ को समझते हैं और इसी तहत पहले उन्होंने मुलायम का साथ छोड़ा, फिर लालू से भी अलग हो गए। अभी शरद यादव मधेपुरा से सांसद हैं, लेकिन उनका न बिहार में जनधार है, न ही यादव वोट बैंक पर पकड़। यह नीतीश की ही कृपा है कि बिहार में यादवों के वोट बैंक को देखते हुए शरद यादव को जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए हुए हैं। अभी हाल ही में शरद को अपनी ताकत का पता उत्तर प्रदेश चुनाव में चल गया। चले थे मुलायम के यादव वोट पर डाका डालने, बुरी तरह से चोट खाकर लौटे। फिर भी राजनीति के इस कुशल खिलाड़ी के अगले दांव पर सबकी नजरें लगी हुई हैं।

लालू प्रसाद यादव के बारे में ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है। जेपी आंदोलन की कोख से निकले लालू प्रसाद शुरुआत में पटना विश्वविद्यालय के छात्र नेता थे। जनता पार्टी की आंधी में पहले लोकसभा और फिर 1981 से 1995 तक लगातार लोकसभा पहुंचते रहे। 1990 में वह बिहार के सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरे और पत्नी के साथ मिलकर बिहार में 15 सालों तक राज किया। इस दौरान लालू सामाजिक न्याय के पुरोधा भी कहलाए। गरीबों के राजा कहलाए, लेकिन गरीबों का यह राजा चारा घोटाला के उजागर होते ही भ्रष्टाचार के प्रतीक बन गए। हवाला कांड के बाद दिल्ली की राजनीति में आए और केंद्रीय मंत्री भी बने। लालू अभी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। राजद नेता राजनीति प्रसाद कहते हैं, ‘लालू को आप कम नहीं आंक सकते। भले ही बिहार में हमारी हार हुई है, लेकिन अभी भी हमारे पास वोट है। समय का इंतजार कीजिए, बहुत कुछ बदलेगा।’ भारतीय राजनीति के यह तीन ऐसे चरित्र हैं, जो अहंकारी तो हैं ही, जिद्दी भी हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में यादवी महाभारत की शुरुआत करने वाले तीनों नेता भी यही हैं। 120 लोकसभा क्षेत्रों वाला यह दोनों प्रदेश देश की राजनीति को एक नई दिशा देता रहा है। तीनों नेता पिछले कुछ सालों से एक-दूसरे को नेस्तनाबूत करने में लगे हुए हैं।

हालांकि, शुरुआती दौर में तीनों ने एक-दूसरे को आगे बढ़ाने का काम किया। जब तीनों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ीं, तो अहंकार भी बढ़ा गया और तीनों एक-दूसरे की जड़ों में तेजाब डालने से भी परहेज नहीं किया। लेकिन अब समय भी बदल गया है और इनकी राजनीति भी। लालू कांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी थे, बाद में कांग्रेस के सबसे बड़े समर्थक बने। उधर, मुलायम भी गैरकांग्रेस की राजनीति को अपने दम पर तो आगे बढ़ाते रहे, लेकिन पिछले 10 वर्षों से परोक्ष रूप से कांग्रेस को बचाते भी रहे हैं। आप कह सकते हैं कि ये दोनों नेता कांग्रेस को अभी जिंदा रखने में लगे हुए हैं। इसके पीछे राजनीति भी है और उनकी अपनी रणनीति भी। यह रणनीति अगले लोकसभा चुनाव को लेकर है। समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर कहते हैं, ‘कांग्रेस विरोध के नाम पर राजनीति शुरू करने वाले बाद में उसी के आगे-पीछे करते हैं। यह आज की बात नहीं है। कुछ सालों से तो लालू और मुलायम कांग्रेस को और आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। इसके लिए उनकी अपनी नीति है। उन्हें मालूम है कि भाजपा उनको साथ सटा नहीं सकती, जबकि कांग्रेस के साथ मिलकर उनकी मंशा पूरी हो सकती है। बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को इन नेताओं से पूछना चाहिए कि कांग्रेस विरोध के नाम पर वोट लेने के बाद वह कांग्रेस का समर्थन क्यों कर रहे हैं? इसे ठगी की राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता।’

शरद यादव को लेकर कई तरह की बातें कही जा रही हैं। शरद अभी भाजपा के पाले में हैं और नीतीश के रहमो-करम पर। राजनीति के इस चतुर खिलाड़ी की अंतिम भूमिका क्या होगी? इसे लेकर मुलायम भी अभी कुछ तय नहीं कर पाए हैं। ऐसे राजनीतिक हालात में कहा जा सकता है कि 2014 का आम चुनाव इन्हीं तीनों यादव नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती नजर आएगी।

No comments:

Post a Comment