Friday, June 8, 2012

जातीय हित के लिए निजी सेना



अखिलेश अखिल
बिहार में निजी सेनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है।  इन्हीं सेनाओं के खूनी आतंक की वजह से बिहार को ‘डार्क जोन’ कहा जाता था। 1980 से लेकर 2000 तक बिहार निजी सेनाओं के चंगुल में फंसा था। आलम यह था कि हर जाति और समाज के लोग अपनी जिद और अहंकार की तुष्टि के लिए हथियार उठाकर सत्ता और शासन के लिए चुनौती बन गए थे। समय बदला, तो इन सेनाओं की भूमिका भी बदली। हम आपको बिहार की कई निजी सेनाओं से परिचित कराएंगे, लेकिन सबसे पहले बिहार में ‘आतंक का पर्याय’ बन चुके रणवीर सेना के प्रमुख रहे मुखिया की मौत पर एक नजर।
पहली जून को रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर नाथ सिंह की आरा जिले के एक मुहल्ला कतिरा में ताबड़तोड़ गोलियों से छलनी कर दिया गया। उन्हें बिहार में ‘मुखिया’ के नाम से भी जाना जाता था। अगड़ी और सामंत जातियों के लिए मुखिया भले ही देवता तुल्य थे, लेकिन दलितों और पिछड़ों के लिए वे किसी आतंक से कम नहीं थे। यह बात और है कि जिस तरह से नीतीश सरकार ने नौ साल जेल में रहने के बाद मुखिया को अभी पिछले महीने ही आजाद किया था, मुखिया के दुश्मन उनके पीछे लग गए थे। मुखिया की मौत के बाद बिहार में क्या जातीय संग्राम एक बार फिर शुरू होगा, इसको लेकर सत्ता, प्रशासन से लेकर राजनेता भी भयभीत हो गए हैं। यह बात और है कि नीतीश कुमार से लेकर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान मुखिया की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाने से नहीं चूके। नीतीश ने कहा कि मुखिया किसानों के प्रेरणादायी थे और इनकी हत्या की जांच हाई लेवल पर की जाएगी। लालू प्रसाद ने मुखिया को योद्धा की उपाधि दे दी। उधर, पासवान ने मुखिया की हत्या की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि लोकतंत्र में हत्या की राजनीति को कभी सराहा नहीं जा सकता। इसकी जांच सीबीआई से होनी चाहिए।
भोजपुर से लेकर आरा और गया से लेकर जहानाबाद के कई दलित और पिछड़ों के गांवों में भय का माहौल है। दलित छात्रावास खाली हो चुके हैं और गांव के गांव खाली हो रहे हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कर रहे हैं, लेकिन मुखिया के लोग क्या उनकी बातों का पालन करेंगे, कहना मुश्किल है। इस पूरे मामले को देखते हुए ऐसा लगता है कि बिहार में एक बार फिर जातीय सेनाओं का दौर शुरू हो सकता है। यह अंदेशा इसलिए कि गरीबों, दलितों और शोषितों की राजनीति करने वाली पार्टी सीपीआई माले ने मुखिया की मौत को ‘नेचुरल जस्टिस’ करार दिया है। याद रहे, यह वही माले है, जो पहले हथियार बंद राजनीति में विश्वास करती थी और जमींदारों के खिलाफ आंदोलन चला रही थी। मुखिया की रणवीर सेना इन्हीं माले और पार्टी यूनिटी जैसे संगठनों के खिलाफ आगे आई थी। सीपीआई माले नेता संतोष समर कहते हैं कि  मुखिया मानवता के लिए आतंक था, उसकी हत्या एक ‘नेचुरल जस्टिस’ के समान है। सरकार के लोगों ने तो उसे छोड़ दिया था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वह सभी वर्ग के लोगों को सताता था। आरा के जिस मकान में उसकी मौत हुई है, वह भी किसी ब्राह्मण का मकान था, जिसे मुखिया ने कब्जा कर लिया था। बहरहाल, मुखिया की मौत आगे क्या गुल खिलाती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय मानिए, नीतीश सरकार के लिए मुखिया की मौत ताबूत में कील के समान ही है ।
आइए, निजी सेनाओं के बारे में कुछ चर्चा कर लें। बिहार में सामंती दमन के खिलाफ जो पहली सेना बनी वह थी ‘लाल सेना’। यह नक्सलियों की सेना थी। गरीब, भूमिहीन और छोटे किसान इस सेना में शामिल थे। इन सेनाओं के पास हथियार थे। खूब हत्याएं हुर्इं और किसानों के खलिहान वर्षों तक जलते रहे। भला जमींदार पीछे कैसे रहते! नक्सलियों से लोहा लेने के लिए जमींदारों ने आवाज उठाई और नक्सलियों के खिलाफ कई सेनाओं का गठन किया। सबसे पहले 1979 में भोजपुर में जमींदारों ने ‘कुंवर सेना’ का गठन किया। इस सेना ने भी कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया। इसी साल पटना, गया और जहानाबाद में कुर्मी जाति के लोगों ने ‘किसान सुरक्षा समिति’ का गठन किया और लाल सेना के विरोध में आवाज उठाई। फिर 1983 में पटना, नवादा, गया और जहानाबाद में कुर्मी जाति के किसानों ने ‘भूमि सेना’ का गठन किया। इसके बाद तो बिहार में निजी सेनाओं की बाढ़ आ गई। इसी साल राज्य के यादव किसानों ने ‘लोरिक सेना’ बनाई, जो हथियारों से लैस थी।
1984 में मध्य बिहार के भूमिहार किसानों ने अपना संगठन बनाना शुरू किया और अपनी खेती को बचाने के लिए ‘ब्रह्मर्षि सेना’ का गठन किया। इधर, बिहार में ब्रह्मर्षि सेना का गठन हुआ और तभी दक्षिण बिहार, यानी पलामू, गढ़वा के इलाकों में  ठाकुर और ब्राह्मणों ने मिलकर ‘किसान संघ’ बना डाला। कहने के लिए यह किसान संघ था, लेकिन इनके पास आधुनिक हथियार थे और दहशतगर्दाें से लड़ने के लिए पूरी फौज भी थी। इससे भी जब काम नहीं चला, तो ठाकुर और ब्राम्हणों ने मिलकर एक नई सेना ‘सेवक संघ’ बना डाला। 1989 में ‘सनलाइट सेना’ बनी। यह काफी मारक और खतरनाक सेना थी। गढ़वा, पलामू, औरंगाबाद और गया में इस सेना का काफी आतंक था। इस सेना में अधिकतर लोग मुस्लिम सामंती पठान और ठाकुर समुदाय से थे।
1990 में जहानाबाद और गया के भूमिहार किसानों ने ‘लिबरेशन फं्रट’ का गठन किया। इसी समय भूमिहार किसानों ने किसान संघ बनाया और फिर   90 में ही ‘गंगा सेना’ का गठन हुआ। इन तमाम सेनाओं के बावजूद दहशतगर्दाें के सामने वे टिक नहीं पा रहे थे। अंत में ‘रणवीर सेना’ सामने आई, जो नक्सलियों के खिलाफ सबसे ताकतवर सेना के रूप में उभरी। इस सेना की चर्चा अंतर्राष्टÑीय स्तर पर भी हुई। यह अपने आप में एक मजबूत निजी सेना थी, जिसके अपने कोष थे और हर साल नए हथियार खरीदने के लिए अकूत दौलत भी। कहते हैं कि इस सेना की जड़ें बिहार के हर जिलें में थीं और इसका आतंक भी।  1990 से 2000 के बीच में इन सेनाओं की वजह से हजारों लोगों की लाशें गिरीं, लेकिन राजनीतिक स्तर पर इसका कोई समाधान नहीं खोजा गया। यही वह समय था, जब बिहार को ‘डार्क जोन’ से लेकर ‘जंगलराज’ कहा जाने लगा था। बिहार के एक भाजपा विधायक साफ कहते हैं कि जिस तरह से मुखिया की हत्या की गई है, उसे कभी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। सरकार को जाना है, तो जाए, लेकिन इसका बदला तो लिया ही जाएगा। जब कानून के मुताबिक मुखिया को अपराध मुक्त कर दिया गया था, तब उसे मारने वाले समुदाय को जवाब देना होगा। हमें फिर से सेना खड़ी करनी पड़े, तो वह भी संभव है।

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