Sunday, June 17, 2012

माधुरी को तड़ीपार करने की साजिश



अखिलेश अखिल
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी प्रदेश की सरकार को किसी एक महिला से खतरा उत्पन्न हो सकता है? क्या वहां का पुलिस-प्रशासन उस महिला के सामने बौना भी पड़ सकता है? उस महिला के रहते पूरे शहर की शांति-व्यवस्था भंग हो सकती है? नहीं न?....सच तो यह है कि एक अकेली महिला ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ झंडा बुलंद किया हुआ है। आदिवासियों पर होने वाले प्रशासनिक अत्याचारों और दमनकारी सरकारी नीतियों के खिलाफ वह गाहे-बगाहे तनकर खड़ी हो जाती है। बस, मुश्किल यहीं है। उसके मौजूद रहते सरकार के नुमाइंदे आदिवासियों का शोषण नहीं कर पा रहे हैं। लूट-खसोट का मौका नहीं मिल पाता है उन्हें। इसलिए उसके खिलाफ षड्यंत्र करने में ही ऐसे बेगैरत लोगों का समय बीतता है? उस पर ऐसी धाराएं लगा दी जाती हैं, जिनके बल पर उसे शहर से ‘तड़ीपार’ किया जा सके।
जो भाजपा अन्ना के आंदोलन से फूले नहीं समा रही है, उसी के शासन वाले राज्य मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार, शोषण और सरकारी लूट के विरोध में आवाज उठाने वाली इस महिला को ‘जिला बदर’ का फरमान जारी किया गया है। आंदोलनकारियों ने सरकार के इस फरमान को तुगलकी फरमान मानकर भाजपा के विरोध में जाने का फैसला कर लिया है।  किस तरह से एक बेइमान, ईमानदार पर भारी पड़ता है, इसका उसका जीता जागता उदाहरण है बड़वानी का ‘माधुरी बाई प्रकरण’। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के कलेक्टर श्रीमन शुक्ला 10 मई 2012 ने  अपने आदेश क्रमांक 15/जिला बदर/2010 में आदिवासियों की लड़ाई लड़ने वाली माधुरी कृष्णास्वामी पर आपराधिक गतिविधियों के दर्जनों मामलों का जिक्र किया है और उसे जिलाबदर करने की बात कही है। नोटिस के अंतिम पैरा में कलेक्टर माधुरी पर आरोप लगाते हुए वह कहते हैं कि राज्य की सुरक्षा और लोक व्यवस्था के विरुद्ध उसके द्वारा संगठन के माध्यम से आपराधिक, असमाजिक, जनकल्याण विरोधी गतिविधियां इतनी विस्तृत हो गई हैं कि जन सामान्य और शासकीय कर्मचारी-अधिकारियों में भय और आतंक का वातावरण निर्मित हो गया है। शासन की जन कल्याणकारी विकास संचालित योजना में अवरोध उत्पन्न कर, शासकीय कार्यालय का घेराव कर, शासकीय और आम जन के कार्यों में बाधा पहुंचाई जा रही है। आपकी आपराधिक गतिविधियों के कारण क्षेत्र का आम आदमी और शासकीय कर्मचारी/ अधिकारी आतंकित और स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहा है। क्षेत्र की आम जनता शांति पूर्वक अपना जीवन यापन कर सके तथा शासन की जनकल्याणकारी विकास कार्य योजनाएं सुचारू रूप से संचालित करने के तथ्यों को देखते हुए आपको इस सूचना पत्र के जरिए सूचित किया जाता है कि मध्य प्रदेश राज्य सुरक्षा अधिनियम (रासुका) 1990 की धारा 5 ख के तहत आपको बडवानी जिले तथा उससे लगे हुए अन्य सीमावर्ती जिलों खरगौन, खंडवा, धार, झाबुआ, बुरहानपुर और अलीराजापुर से क्यों न जिला बदर किया जाए?’    उल्लेखनीय है कि जिला प्रशासन द्वारा माधुरी कृष्णास्वामी के विरोध में जिलाबदर का नोटिस जारी होने के बाद न सिर्फ बडवानी के आदिवासियों की त्यौरियां चढ़ गई हैं, बल्कि देश के तमाम सामाजिक संगठनों से लेकर मानवाधिकार संगठनों ने सरकार की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। पीयूसीएल के अध्यक्ष चितरंजन सिंह माधुरी कृष्णास्वामी के मामले को लेकर काफी तल्ख हैं। उनका मानना है कि इस देश में जहां-जहां भी जनता की आवाज उठाई जा रही है, सरकार वहां दमन करने से बाज नहीं आ रही है। माधुरी गरीब आदिवासियों की लड़ाई सालों से लड़ रही है और आदिवासियों को उसका फायदा भी हुआ है। लेकिन सरकारी अधिकारी ऐसा चाहते नहीं। सरकार के लोग यही चाहते हैं कि उनका शोषण चलता रहे, लेकिन कोई कुछ बोले नहीं। जनआंदोलन चलाने वाले अगर जिला बदर के हकदार हैं, तो जो लोग भ्रष्टाचार करते पकड़े जा रहे हैं, उन्हें सरकार जिलाबदर और देशबदर क्यों नहीं करती। पीयूसीएल इस मामले की भर्त्सना करती है और आदिवासियों के शोषण को तुरंत बंद करने की मांग भी करती है।’
यह बात और है कि तमाम सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों की आवाज के सामने वडवानी जिला प्रशासन ने फिलहाल चुप्पी साध ली है, लेकिन जागृति आदिवासी  दलित संगठन से जुड़े 5 हजार से ज्यादा लोगों ने थाने का घेराव कर सरकार की दमनात्मक नीति और माधुरी को जिला बदर करने के आदेश का पुरजोर विरोध किया है। आदिवासियों ने अब जिला प्रशासन को जिलाबदर करने की ठान ली है। उन्होंने जिला अधिकारी को एक कड़ा पत्र भी दिया है, जिसमें कई तरह के शोषण की बात कही है और प्रशासन से कई सवाल भी पूछे हैं। आदिवासियों ने सरकार से पूछा है कि ग्रामीण विकास के लिए जिला पंचायत में हर रोज एक करोड़ से ज्यादा की राशि आती है, फिर भी हम आदिवासियों की हालत जस की तस क्यों है? कहां गए हमारे पैसे? हमारे गांवों में मूलभूत सुविधाएं क्यों नहीं हैं? आज भी अधिकतर गांवों में गधे पर लादकर पानी क्यों लाना पड़ रहा है? संविधान ने हमारी ग्राम सभाओं को सभी विकास कार्यों पर नियंत्रण का हक दिया है, लेकिन प्रशासन ग्राम सभाओं को बैठने नहीं देता? अस्पतालों में न कोई डॉक्टर है, न कोई दवा।
गर्भवती महिलाओं और बच्चों की मौत के मामले   में बडवानी देश में सबसे आगे क्यों है? हमारे राशन की चोरी हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट के 35 किलो अनाज के आदेश के बाद भी हमें 20 किलो अनाज ही क्यों दिया जाता है? गरीब एपीएल सूची में और अमीर बीपीएल सूची में कैसे आ रहे हैं? जब हम इसकी मांग करते हैं, तो हम पर झूठा मुकदमा बना दिया जाता है। कानून सरकार के लोग तोड़ते हैं और हमें अपराधी घोषित किया जाता है। संविधान के तहत हमें जो अधिकार मिले हैं, हम उसकी लड़ाई लड़ते रहेंगे। अंत में अगर माधुरी बाई आसमाजिक अपराधी है, तो हमारे संगठन के हजारों आदिवासी परिवार भी आसमाजिक अपराधी हैं। उनके साथ हम सभी परिवारों को भी जिला बदर किया जाए।बडवानी के आदिवासियों ने जिला प्रशासन को एक तरह से चुनौती दे दी है। इस बावत जिला कलेक्टर श्रीमन शुक्ला से भी बात करने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। लेकिन जिले के एक अन्य अधिकारी ने कहा है कि यह सही है कि आदिवासियों की लड़ाई लड़ने वाली माधुरी की मांग जायज होती है। लेकिन उनके आंदोलन से विकास कामों पर असर भी पड़ रहा है। जहां तक जिलाबदर का सवाल है, वह कहीं से भी जायज नहीं है। लोकतंत्र में अपनी जायज मांग रखने का सबको अधिकार है।’ बडवानी का मामला भोपाल तक अब पहुंच गया है। माधुरी के बारे में सरकार क्या निर्णय लेती है, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन आदिवासियों ने सरकार के बारे में अपना निर्णय ले लिया है कि आगामी चुनाव में इस सरकार के लोगों को अपना मत नहीं देंगे।

जिला प्रशासन का जिलाबदर हो : माधुरी
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सुशासन की बात तो करते हैं, लेकिन सुशासन किसे कहते हैं, उन्हें मालूम नहीं। भ्रष्टाचार में संलिप्त राज्य के सरकारी अमले गरीब आदिवासियों और दलितों के लिए चलाई जा रहीं तमाम योजनाओं को ‘लूटते’ रहें और जनता की आवाज न उठे। जो भ्रष्टाचार के विरोध में आवाज उठाए, उसे या तो जेल के हवाले कर दिया जाए या फिर जिला बदर। प्रस्तुत है, जागृति आदिवासी दलित संगठन की मुखिया माधुरी कृष्णास्वामी से ‘हमवतन’ की बातचीत के अंश-

अक्या आप सरकार के विरुद्ध काम करती हैं?
अगर सरकार के लोग संविधान के मुताबिक काम करें, तो कौन उसका विरोध करेगा? भ्रष्ट सरकारी लोगों की नजर में मैं अपराधी हूं लेकिन जिनकी लड़ाई मैं लड़ रही हूं वे अपराधी नहीं मानते। जब सारा काम जनहितों के विरुद्ध ही हो, तो क्या आवाज उठाना गलत है? शोषण और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने की वजह से मुझे बडवानी जिला प्रशासन ने अपराधी घोषित कर रखा है।
अलेकिन आपके ऊपर तो कई आपराधिक मुकदमें हैं?
आप उन मुकदमों को ठीक से देखिए। आंदोलन करने से लेकर दलितों और आदिवासियों के हक की लड़ाई के लिए अनशन-प्रदर्शन की बात कही गई है। क्या हम अपने अधिकारों को लेकर लड़ नहीं सकते? हम पर जितने भी केस दर्ज किए गए हैं, सब में हम बरी हो चुके हैं। कुछ ऐसे झूठे केस भी हम पर चल रहे हैं, जिनकी जांच पुलिस कई सालों से कर रही है।
अआप पर आरोप है कि आप सरकारी कामों में दखल देती हैं और सरकारी कर्मचारियों में भय फैलाती हैं?
हम तो लोगों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं और भ्रष्टाचार दूर करने की बात करते हैं। जब हम कानून और शासकीय योजनाओं के सही पालन की मांग करते हैं, तो उनको किस बात का डर? दरअसल, वे कानून और नियमों का पालन नहीं करना चाहते। वे नहीं चाहते कि चौकस जनता उनकी निगरानी करे और उनसे हिसाब मांगे।
अआपको जिला बदर क्यों किया गया?
इस देश में जनतंत्र की सरकार है। सरकार को जनता का सामना करना चाहिए। हमें आंदोलन करने, हक मांगने और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने से कोई रोक नहीं सकता। इन्हीं सब वजहों से जिला प्रशासन ने हम पर झूठे मुकदमें डालकर पांच जिलों से बाहर चले जाने को कहा है। अब तो यहां की जनता जिला प्रशासन को ही जिला बदर करने की बात कर रही है। ऐसी भ्रष्ट सरकार आज तक नहीं आई थी।
अजागृति आदिवासी दलित संगठन का असली उद्ेश्य क्या है?
देखिए, बडवानी आदिवासी बहुल इलाका है। यहां एक नहीं, तमाम तरह की समस्याएं हैं। यहां रोजगाार नहीं है। मजदूरों का शोषण होता है। साहूकार का दमन अलग से। यहां कोई मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं।  बिजली, पानी, शिक्षा नहीं है। सरकार योजनाएं चला रही है, लेकिन योजनाएं कहां हैं और किसे उसका लाभ मिल रहा है, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। हमारा संगठन इनत तमाम बातों के लिए लड़ रहा है।
अप्रशासन की नजरों में आप दबंग हैं?
जो हक की बात करेगा, उसे कोई सरकारी कर्मचारी देखना नहीं चाहता। ऐसे लोग हमें दबंग ही मानेंगे। लेकिन इलाके के हजारों आदिवासी हमें दबंग मानते हैं या नहीं, यह महत्वपूर्ण मामला है। उनसे जाकर पूछें। संगठन की वजह से ही अब पुलिस का जुर्म कम हुआ है। शोषण करने से पहले साहूकार सौ बार सोचते हैं। पहले यहां रोजगार गारंटी थी ही नहीं। अब वह संभव हो सका है। देश में पहली दफा 2006 में इसी जिले में रोजगार गारंटी के तहत काम नहीं मिलने वालों को बेरोजगारी भत्ता मिला। यहां के लोग जंगल पर आश्रित हैं और माफिया जंगलों को काट रहे हैं। क्या इसका विरोध नहीं होना चाहिए?

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