Friday, June 8, 2012

हे प्रधानमंत्री, फिर कौन है दोषी?



एक बार देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगा चुके अन्ना हजारे ने फिर से लंगोट कस लिया है। लगता है, इस बार उनकी रणनीति पिछली बार से कहीं ज्यादा मजबूत और सुनियोजित है। तभी तो केंद्र सरकार के 15 मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों का पुलिंदा लेकर टीम अन्ना मैदान में आ रही है? सरकार की ‘हवा’ खराब है, इसीलिए खुद पर जब आरोप लगा, तो पीएम मनमोहन सिंह ने ऐसा बयान दिया, जिससे टीम अन्ना को ‘घेरने’ का मौका कांग्रेसियों को मिल जाए? देखें, क्या हैं आरोप और क्यों विचलित हुए मनमोहन सिंह.......?

अखिलेश अखिल
खुद पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बेचैन हो गए हैं। कोल ब्लॉक आवंटन के कथित घोटाले में टीम अन्ना ने जिस तरह से मनमोहन सिंह को आरोपित किया है, उससे वे नाराज भले न हों, खुद को अपमानित महसूस जरूर कर रहे हैं। पहले वे अपने कैबिनेट के अन्य साथियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बारे में संसद के भीतर और बाहर जवाब देते रहे थे, लेकिन जब उनके ऊपर ही अन्ना टीम के प्रशांत भूषण और शांति भूषण ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, तो वे बिफर पड़े।
यह बात और है कि प्रशांत भूषण ने पहले प्रधानमंत्री को शिखंडी तक कह दिया और बाद में पलट भी गए, लेकिन  देश जनता की राय इस सरकार को लेकर ठीक नहीं है। एक तरफ महंगाई से टूट चुके लोगों के मन में गुस्सा और दूसरी तरफ सरकारी धन की लूट के साथ मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की आय में तेजी से बढ़ोतरी सत्ता और सरकार के प्रति घृणा का वातावरण पैदा कर रहा है। प्रधानमंत्री द्वारा  पिछले दिनों दिया गया वह बयान कि ‘मेरे ऊपर लगाए गए आरोप अगर साबित हो गए, तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे’, को राजनीतिक हलकों में प्रधानमंत्री की बेचैनी के रूप में ही देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि प्रधानमंत्री को अपनी ईमानदारी की पड़ी है और इधर देश का दिवाला निकल रहा है। अगर वह देश नहीं चला सकते, तो गद्दी से उतर क्यों नहीं जाते?  जहां तक कानून की बात है, वह सब पर लागू होता है। वे गलत नहीं हैं, तो उन्हें किसी बात की चिंता नहीं करनी चाहिए। लेकिन जो लोग भ्रष्ट हैं और गलत तरीके से धन कमा रहे हैं, उन्हें मंत्रिमंडल में भी रखने की क्या जरूरत है? ऐसे में तो राजनीति से भी लोगों का विश्वास खत्म हो रहा है।
अन्ना टीम के अरविंद केजरीवाल साफ कहते हैं, ‘हमारी टीम ने प्रधानमंत्री पर आरोप नहीं लगाए हैं। यह आरोप तो सीएजी ने लगाए हैं। क्या सीएजी की रिपोर्ट गलत है? इससे पहले भी कई इसी तरह की रिर्पोट को आधार मानकर जांच हुई हैं और कई मामलों में आरोप सिद्ध भी हुए हैं। प्रधानमंत्री पर लगे आरोप गलत साबित हुए, तो उन्हें सबसे ज्यादा खुशी होगी। लेकिन बिना जांच कराए यह संभव भी नहीं है। जांच होने के बाद ही सब कुछ साफ हो पाएगा।’
अब सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री बेचैन क्यों हैं? देश की जनता की नजर में वह भले ही ईमानदार हैं, लेकिन उस ईमानदारी का क्या मतलब कि जब देश पूरी तरह से लुट जाए? क्या प्रधानमंत्री यह बताने या कबूल करने को तैयार हैं कि पिछले कुछ सालों में देश के नेताओं और सरकार में शामिल लोगों ने बड़े पैमाने पर जनता के धन को लूटने का काम किया है? अगर प्रधानमंत्री इस बात की घोषणा करते, तो संभव था कि अन्ना टीम को उन पर आरोप लगाने की हिम्मत नहीं होती। लेकिन मनमोहन सिंह ने ऐसा नहीं किया।
समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर कहते हैं, ‘भ्रष्टाचार में सभी राजनीतिक पार्टियां शामिल तो हैं, लेकिन जो पार्टियां सत्ता में हैं, वही ज्यादा भ्रष्ट हैं। प्रधानमंत्री कितने भी ईमानदार क्यों न हों, अगर उनके शासन में लूट होती है, तो बदनामी उन्हीं की होगी। ऐसे में यह कह कर नहीं बचा जा सकता कि वे ईमानदार हैं। अब देश की जनता को सत्ता और सरकार से विश्वास उठ गया है। प्रधानमंत्री को सबसे पहले इस बारे में सोचना चाहिए। आरोप लगने से कोई भ्रष्ट नहीं हो सकता। जांच के बाद ही मामला सामने आएगा। लेकिन क्या वह बता सकते हैं कि उनके मंत्रिमंडल में शामिल लोग पाक-साफ हैं? और अगर ऐसा नहीं है, तो फिर या तो वे मजबूर हैं या फिर बेकार की बातें कर रहे हैं।’
भाजपा समेत कई पार्टियों ने प्रधानमंत्री के पर लगे आरोपों पर भले ही कुछ नहीं बोला, लेकिन इतना जरूर मान रहे हैं कि अगर देश का प्रधानमंत्री सब कुछ जानते हुए भी चुप है, तो जाहिर है कि इस पूरे खेल में उनकी मौन स्वीकृति है। भाजपा के कीरीट सोमैया कहते हैं कि यहां अंधेर नगरी, चौपट राजा वाली कहानी दिखाई पड़ रही है। चारों तरफ जनता बेचैन है, लेकिन सरकार को कोई मतलब नहीं। ऐसे में प्रधानमंत्री पर लगे आरोपों की जांच की जानी चाहिए। ऐसा होता है, तो सब कुछ सामने आ जाएगा और प्रधानमंत्री की इज्जत भी बच जाएगी।
जानिए, 10 मंत्रियों की संपत्ति को
देश की जनता तो यही जानती है कि उसने एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के हाथ में सत्ता की बागडोर सौंपी है। उनकी सरकार में शामिल लोग भी उनकी तरह ही होंगे। लेकिन ऐसा है नहीं। क्या डंके की चोट पर प्रधानमंत्री यह कहने को तैयार हैं कि उनके शासन में सरकारी धन की लूट नहीं हुई?   और अगर देश की संपत्ति की लूट हुई है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं?
फिर सवाल यह भी है कि अंधे राजा के हाथ में शासन की बागडोर दी जानी चाहिए? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 2009 में लोकसभा चुनाव के समय जिन उम्मीदवार नेताओं ने अपनी आय और संपत्ति की जानकारी सरकार को दी थी, चुनाव जीतने के बाद उनमें से कई लोग मंत्री बन गए। पिछले साल केंद्र के सभी मंत्रियों ने जब अपनी संपत्ति का ब्यौरा जनता के सामने रखा, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की 2009 में कुल संपत्ति 4.41 करोड़ थी, जो 2011 में बढ़कर 5.10 करोड़ हो गई। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की संपत्ति 2009 में 2.89 करोड़ थी, जो 2011 में बढ़कर 3.08 करोड़ हो गई। रक्षा मंत्री ए के एंटोनी 2009 में 10.25 करोड़ के मालिक थे, लेकिन 2011 में वे 35.11 करोड़ के मालिक हो गए। दो साल के भीतर तीन गुना से ज्यादा एंटोनी की संपत्ति कैसे बढ़ी, यह जानकर देश की जनता विस्मित है? एचआरडी मंत्री कपिल सिब्बल 2009 में 30.34 करोड़ के मालिक थे, लेकिन 2011 में वे 38.01 करोड़ के मालिक हो गए।
कपिल साहब किस तरीके से धन पैदा कर रहे हैं, देश की जनता को उनसे यह गुर सीखना चाहिए! कमलनाथ 2009 में 14़17 करोड़ के मालिक थे, 2011 में वे 41 करोड़ के मालिक हो गए हैं। इसी तरह शरद पवार के पास  2009 में 8.72 करोड़ की संपत्ति थी, जो दो साल बाद 12.45 करोड़ की हो गई। प्रफुल्ल पटेल 2009 में 79 करोड़ के मालिक थे। इनकी संपत्ति 2011 में अचानक बढ़कर 122 करोड़ हो गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास 2009 में 14.90 करोड़ की संपत्ति थी, जो दो साल बाद 32.66 करोड़ की हो गई है। केंद्र के एक मंत्री हैं, एस जगत रक्षाकन। इनकी संपत्ति 2009 में 5़ 91 करोड़ थी, जो 2011 में 70़ 42 करोड़ की हो गई है। और ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे की संपत्ति 2009 में 8़ 80 करोड़ थी, जो 2011 में 17़ 80 करोड़ की हो गई। याद रहे, यह केवल केंद्रीय मंत्रियों का ही मामला नहीं है। जिन राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें हैं, वहां की भी कमोबेश यही स्थिति है। ऐसा कोई राज्य नहीं बचा है, जहां के मंत्री और विधायकों, सांसदों ने पैसा बनाने का खेल नहीं किया है। क्या इस देश की आम जनता इतनी तेजी से अपनी संपत्ति बढ़ा सकती है?
मंत्रियों पर आरोप
भ्रष्ट नेताओं को जनता चाहे जिस किसी भी नाम से पुकारे, वे खुद को अपराधी या भ्रष्ट मानने को तैयार ही नहीं हैं। खुद को जनता का सेवक मानते हैं। लेकिन सिविल सोसायटी अब इनका ‘नकाब’ उतारने में लगी है। टीम ने प्रधानमंत्री समेत 15 मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं और सरकार से इस बावत 25 जून तक जांच करने की बात कही है। इन मंत्रियों में देश के गृह मंत्री पी. चिदंबरम भी शामिल हैं। चिदंबरम पर 2जी घोटाले का आरोप है और मामला अभी कोर्ट में लंबित है। आरोपी मंत्रियों में एचआरडी मंत्री कपिल सिब्बल भी हैं, जिन पर रिलायंस पर लगाए गए 850 करोड़ के जुर्माने को कम करके पांच करोड़ करने का आरोप है। शरद पवार पर लवासा जमीन घोटाले में शामिल होने का आरोप है, तो श्रीप्रकाश जायसवाल पर कोयला घोटाला करने का मामला है। अजित सिंह पर पैसा लेकर यूपीए को समर्थन देने का आराप है, जबकि फारुख अब्दुल्ला पर जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन में 50 करोड़ का घपला करने का आरोप है।  इसी तरह कमलनाथ पर बासमती चावल के आयात-निर्यात में घपला करने का मामला है। प्रफुल्ल पटेल से लेकर एसएम कृष्णा, सुशील कुमार शिंदे, विलासराव देशमुख, एमके अजागीर और जीके वासन पर कथित रूप से धन कमाने के गंभीर आरोप लगे हैं। इन आरोपों के बीच राजनीति खूब हो रही है। कांग्रेस इस पूरे मामले को सरकार को बदनाम करने का षड्यंत्र मान रही है और अपना दामन बचाने की कोशिश में है।
केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद कहते हैं, ‘सच कोई छिपा नहीं सकता। लेकिन जो टीम अन्ना केंद्र के 15 मंत्रियों के खिलाफ जांच की मांग कर रही है, वही लोग पहले अपनी टीम के सदस्यों की जांच क्यों नहीं करते? लगता है, देश में केवल एक ही आदमी सच्चा रह गया है।’  पूरे मामले को देखने से लगता है कि सरकार आगामी चुनाव को देखते हुए पहले टीम अन्ना के साथ ही लड़ने के मूड में है। अरविंद केजरीवाल कहते हैं, ‘क्या मान लिया जाए कि देश में भ्रष्टाचार नहीं है? और है, तो देश में एक स्वतंत्र जांच एजेंसी बनाए बगैर इसे दूर नहीं किया जा सकता। पिछले काफी समय से 15 मंत्रियों के खिलाफ जांच के आरोप हैं, लेकिन किसी के खिलाफ जांच नहीं हो रही है। ऐसे में क्या कहा जाए? लगता है, हम देश और समाज के दुश्मन हो गए हैं, जो भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं।’
कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी का मानना है कि भ्रष्टाचारियों को छोड़ा नहीं जा सकता। लेकिन जिन लोगों के खिलाफ अन्ना टीम के पास सबूत हैं, उनके खिलाफ उन्हें थाने में जाकर रिपोर्ट दर्ज कराना चाहिए। केवल हल्ला करने से कुछ नहीं होने वाला। लेकिन प्रधानमंत्री के सवाल पर अल्वी चुप हो जाते हैं। कानूनविद सुभाष कश्यप की नजरों में यह सारा खेल राजनीति से प्ररित है। वे कहते हैं कि  ‘भ्रष्टाचार को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां शोर तो मचा रही हैं, लेकिन दोषियों के खिलाफ कुछ होते दिख नहीं रहा है। पिछले दिनों जितने घपले हुए हैं, वे सबके सामने हैं, लेकिन हुआ क्या? मामले   की जांच जरूरी है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जब तक नहीं होगी, तब-तक कुछ नहीं होने वाला।’  सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील एमके चौधरी कहते हैं, ‘आरोप लगाने भर से कोई दोषी नहीं हो सकता। आरोप के तथ्यों पर सही तरीके से जांच होने के बाद ही सच्चाई सामने आती है। प्रधानमंत्री अगर आरोप के घेरे में हैं, तो उनकी भी जांच की जानी चाहिए। अगर कैग की रिपोर्ट में प्रधानमंत्री पर सवाल उठाए गए हैं, तो उसकी जांच जरूर होनी चाहिए, क्योंकि कैग सरकारी संस्था है। जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाते, तब तक जो भी हो रहा है, उसे राजनीति से ज्यादा नहीं कहा जा सकता।’
देश इस समय प्रधानमंत्री की ओर देख रहा है। उनकी हरकतों को भांप रहा है। यह बात और है कि अन्ना टीम के भी कुछ सदस्यों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, लेकिन इसका मतलब कतई नहीं है कि जिन लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उन पर जांच नहीं होनी चाहिए। हालांकि राजनीति में यह कहा जाता है कि दायां हाथ बाएं हाथ को दंडित नहीं करता, लेकिन जब प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा ही दांव पर लगी हो, तो एक बार मनमोहन सिंह को अपनी ताकत का एहसास कराना चाहिए, ताकि देश की जनता उन्हें जान सके।
राजनीति से प्रेरित खेल?
कानूनविद सुभाष कश्यप की नजरों में यह सारा खेल राजनीति से प्ररित है। वे कहते हैं कि  ‘भ्रष्टाचार को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां शोर तो मचा रही हैं, लेकिन दोषियों के खिलाफ कुछ होते दिख नहीं रहा है। पिछले दिनों जितने घपले हुए हैं, वे सबके सामने हैं, लेकिन हुआ क्या? मामले की जांच जरूरी है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जब तक नहीं होगी, तब-तक कुछ नहीं होने वाला।’  सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील एमके चौधरी कहते हैं, ‘आरोप लगाने भर से कोई दोषी नहीं हो सकता। आरोप के तथ्यों पर सही तरीके से जांच होने के बाद ही सच्चाई सामने आती है। प्रधानमंत्री अगर आरोप के घेरे में हैं, तो उनकी भी जांच की जानी चाहिए। अगर कैग की रिपोर्ट में प्रधानमंत्री पर सवाल उठाए गए हैं, तो उसकी जांच जरूर होनी चाहिए, क्योंकि कैग सरकारी संस्था है। जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाते, तब तक जो भी हो रहा है, उसे राजनीति से ज्यादा नहीं कहा जा सकता।’

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