Wednesday, October 16, 2013

गनतंत्र को नाथने का अस्त्र, राइट टू रिजेक्ट

अखिलेश अखिल

अब लोकतंत्र के नाम पर गुंडई का खेल नहीं चलेगा। अब देश के लोग उन नेताओं को बर्दास्त नहीं करेंगे जो करते हैं गुंडई और असामाजिक काम और पहन कर घूमते है राजनीतिक चोला। धर्म, जाति और गुडई के नाम पर दबंगई दिखाकर, जनता को डरा धमका कर और लोकतंत्र में राजनीति का ताना बाना रचकर गनतंत्र के बदौलत संसद से लेकर विधान सभा  और पंचायतों में पहुंचने वाले नेता अब सुप्रीम कोर्ट के रडार पर आ गए है। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में देश की जनता को राइट टू रिजेक्ट का अधिकार देकर लोकतंत्र  को तो मजबूत किया ही है, चुनाव की राजनीति को भी एक दिशा देने की शुरूआत की है। अब इस अधिकार के जरिए देश के लोग चुनाव लड़ रहे उन लोगों को बहिष्कार कर सकेंगे, जिन्हें वे पसंद नहीं करते हैं। लेकिन इस फैसले के बाद समाज और राजनीति में एक नई बहस भी शुरू हो गई है। फैसले में अदालत ने इस सवाल को उनुत्तरित ही छोड़ दिया है कि यदि नन आफ द एवभ नोटा वोटों की संख्या उम्मीदवारों को पड़े वोटों से ज्यादा हो गई तो क्या होगा?चुनाव रद्द हो जाएगा या फिर से चुनाव करवाया जाएगा?अदालत ने मतदाताओं को सिर्फ उम्मीदवारों को अस्वीकार देने का अधिकार दिया है, उन्हे खारिज करने या बुलाने का नहीं। अदालत का यह फैसला आगे क्या कर जाएगा और इसकी राजनीतिक मार कहां तक जाएगी देखना होगा। हालाकि जाहिर है कि  केवल इसी अधिकार  के दम पर समाज और राजनीति में फैली कीचड़ को समाप्त नहीं किया जा सकता लेकिन इतना तय है कि राईट टू रिजेक्ट का अधिकार बजबजाती चुनावी राजनीति को बदलने में एक अहम भूमिका निभाएगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लोकतंत्र को नया जीवन देने जैसा है और इससे चुनाव सुधार में आसानी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 27 सितंबर के फैसले में कहा है कि ‘चुनाव आयोग इवीएम और मतपत्रों में उम्मीदवारों की सूची के अंत में ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ नोटा विकल्प मुहैया कराए ताकि मतदाता उपलब्ध प्रत्याशियों से असंतुष्ट होने की स्थिति में उन्हें अस्वीकार कर सके’। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की चैतरफा सराहना की जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के वकील संजय पारिख ने कहा है कि ‘लोकतंत्र का मौलिक सिद्धांत वोटर के पास विकल्प होना हैं।यह विकल्प ही लोकतंत्र की प्रकृति और गुणवत्ताको निर्धारित करने का मानक होना चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यही साफ किया है कि हालाकि मत देने का अधिकार कानूनी अधिकार है,लेकिन जब वोटर उसे किसी उम्मीदवार के पक्ष में देने या न देने का फैसला करता है तो यह उसकी अभिव्यक्ति का अधिकार हैजो उसे संविधान से मिलता हैं ।अदालत ने साफ किया है कि जब इस आजादी के अधिकार का प्रयोग करने का मामला आता है तो वोट देने और वोट न देने के अधिकार एक समान हो जाते है।अब तक होता यह था कि यदि वोटर किसी उम्मीदवार के पक्ष में वोट दे रहा है तो उसकी पहचान गुप्त रखी जाती थी,पर अगर वह वोट नहीं देता है तो तो नियम 49 ओ के तहत उसकी गोपनीयता का उलंघन होता है।’ राइट टू रिजेक्ट को परिभाषित करते हुए शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि ‘वोटर के दोनो अधिकार पवित्र हैं और उन्हें एक समान धरातल पर रखने की जरूरत है। इसलिए अदालत ने नियम 49 ओ और फार्म 17 ए के एक हिस्से को रद्द कर दिया। हलाकि यह सवाल भी सही है कि क्या नई हालत में 20 फीसदी वोट पाने वाला ब्यक्ति चुना हुआ घोषित किया जाएगा।कानून न होने की स्थिति में यह सही हो सकता है।मगर बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे व्यक्ति के चुनाव को सही कहा जा सकता हैजो लोकतंत्र के बुनियादी सिंद्धांत के ही खिलाफ है।
     सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर ब्यापक स्तर पर होगा। अब मतदाता के लिए मजबूरी में किसी प्रत्याशी को नहीं चुनना पउ़ेगा। अब तक ऐसा ही हो रहा था। दर्जन भर दागी और भ्रष्ट उम्मीदवारों के बीच मतदाता फंस जाता था और अंत में वह सबसे कम दागी कौन और किसकी सरकार बन सकती है का मन बनाकर वोट देते रहे है। इस कानून के बाद अब नेताओं की मुश्किले बढ जाएगी। मतदाता अब उन लोगों को रिजेक्ट कर सकेंगे जो उनके लायक नहीं हांेगे । इसके अलावा इस कानून के लागू होने से चुनाव आयोग या फिर सरकार को कोई अतिरिक्त खर्च भी करने की जरूरत नहीं है।  वोटिंग मशीन या चुनाव पत्र पर किसी को न चुनने वाला वटन लगाने या इनमें से कोई नहीं लिखने से  कोई कोई खर्च नहीं बढना है। इस फैसले के बाद सभी राजनीतिक दलों को अब सतर्क हो जाना पड़ेगा। राजनीतिक दलों को अब ऐसे उम्मीदवारों को ही चुनाव में उतारने होंगे जो आरोपी नहीं होगे या फिर जिनकी जनता में पहुंच होगी। चुनाव लउ़ने वालें  खलनायक नेताओं के लिए अब चुनाव लड़ना आसान नहीं होगा। इस कानून का एक और लाभ होगा। इस कानून से नकारात्मक बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन होने से बचाया जा सकेगा।  पीयूसीएल के राष्ट्ीय सचिव चितरंजन सिंह  ने हमवतन को कहा है कि ‘सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत है।  बदलते माहौल में इससे चुनाव प्रक्रिया में भारी सुधार होगा और जनता को यह अधिकार मिल जाएगा  िकवह तमाम दागी प्रत्याशियों को खारिज कर सके। इस फैसले के बाद अब लोग धन और बाहुबल के बूते पर जनप्रतिनिधि बनने का सपना देख रहे दागियों के खिलाफ राष्ट्ीय अभियान चलाऐंगे। जनता के पक्ष में खड़ी होने वाली शक्तियों को संसदीय लोकतंत्र को कलंकित करने वाली इन पार्टियों के खिलाफ भी अभियान चलाना होगा तभी जाकर संसदीय लोकतंत्र बचेगा।’
    आगे इस पर और चर्चा की जा सकती है लेकिन थोड़ी जानकारी राइट टू रिजेक्ट के बारे में भी। ऐसा नहीं है कि राईट टू रिजेक्ट की कहानी पहली दफा भारत में अपनाने की बात सामने आई है। दुनिया के दर्जन भर से ज्यादा देशों में यह कानून लागू है और इस पर अमल भी हो रहा है। भारत में भी इस कानून को लेकर मानवाधिकार संगठन कई सालों से संघर्ष कर रहा था। पीयूसीए के इसी जायज संघर्ष को देखते हुए 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान  चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया था कि बैलेट पेपर के अंत में ‘इनमें से कोई नहीं’ का कालम भी लगाया जाए। लेकिन सरकार ने इसे नहीं माना। अब चुनाव आयोग के उसी आग्रह को देखते हुए और पीयूसीएल की मांग को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बजबजाती राजनीति पर नकेल कसने के लिए जनता को यह अधिकार देने का फैसला किया है। ‘इनमें से कोई नहीं’ अर्थात ‘नन आफ द एवभ’ । इसे नोटा कानून के रूप में दुनिया के कई देशों में जाना जाता है।  नेताओं को अस्वीकार करने का यह अधिकार देश की जनता  के साथ ही लोकतंत्र को कितना पाक रख पाएगा यह देखने की बात होगी। यह बात इसलिए कही जा रही है कि कोर्ट के फैसले के बाद इस पर बहस शुरू हो गई हैं।  वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि यह जनता का मौलिक अधिकार है और दागियों को संसद में नहीं आना चाहिए। लेकिन भाजपा का बयान सतर्क रूप से दिया गया है। भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा है कि  सरकार ने भी चुनाव सुधार के लिए कई समितियां गठित की है और सभी ने चुनाव सुधारों पर सूझाव दिए है। सरकार को चुनाव सुधार के लिए कदम उठाने चाहिए। उधर जदयू नेता केसी त्यागी ने इस फैसले का स्वागत किया है लेकिन यह भी कहा है कि जेपी आंदोलन के समय से ही इस अधिकार की मांग की जा रही है लेकिन यह भी सही है कि यह ब्यवहारिक नहीं है। कांग्रेस के संदीप दीक्षित ने कहा है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने की आजादी है लेकिन खारिज करने से बेहतर होगा अच्छे उम्मीदवार को ही मैदान में उतारा जाए। आप कह सकते हैं कि जितने लोग उतनी बाते। आगे भी इस पर राजनीति होगी। सरकार इस पूरे मामले में आगे क्या करती है और विपक्ष का क्या रूख होता है इस पर सबकी नजरें टिकी होगी। राजनीति यह है कि भाजपा अभी इस मसले पर खुल कर नहीं बोल रही है लेकिन नरेंद्र मोदी ने इस फैसले का स्वागत किया है और इस फैसले को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया है। 
      लेकिन इस नोटा का एक डर भी है। अगर देश भर में छाए नक्सलियों ने इस नोटा का सही इस्तेमाल कर दिया तो क्या होगा? सरकार ही कह रही है कि देश के 60 से ज्यादा जिले नक्सलियों की चपेट में है। नक्सली लोग लोकतंत्र के विरोधी हैं और राजनीति से घृणा करते है। जिन इलाकों में नकलियों का प्रभाव है वहां नक्सलियों की दया पर ही अब तक किसी भी पार्टी के लोग चुनाव लड़ते है औत जीतते भी है। लेकिन नोटा के बाद अगर नक्सलियों ने अपने इलाके के लोगों में यह फरमान जारी कर दिया कि वोट डालने वाले लोग नाटों का ही बटन दबाए तब क्या होगा? हालाकि यह कल्पना की बात है। लेकिन अगर ऐसा संभव हो गया तो नक्सली इलाके से किसी का जीतना मुश्किल हो जाएगा।    

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