Thursday, October 17, 2013

भूदानी जमीन पर बिल्डरों का डाका


                   अखिलेश अखिल

  आजद देश के रहनुमाओं ने इस देश को किस किस तरह से लूटा है इसकी कहानी हमें  बार बार टुकड़ों  टुकड़ों में देखने सुनने को मिल रहा है। लेकिन आजाद भारत में गांधी के सच्चे अनुयायी और सर्वोदयी नेता विनोवा भावे के भूदान आंदोलन के तहत भूमिहीनों के लिए  मिली दान की लाखों एकड़ जमीन की खोजबीन की जाए तो इस देश का सबसे बडा घोटाला सामने आएगा। जमीन से जुड़े इस घोटाले में मंत्री से संतरी और नौरशाहों से लेकर देश के बड़े बड़े गैर सरकारी संस्थाएं और विल्डरों की संलिप्तता दिखेगी। इस खेजी रपट के जरिए   भूदान आंदोलन की जमीनों  की लूट के बारे में कुछ जानकारियां लेने की कोशिश की गई है ताकि हमारी सरकार इस दिशा में कोई कारगर कदम उठाकर भावे के सपने को साकार करने की कोशिश कर सके । हम खबरों की तह में आपको ले चलेंगे और बताऐंगे देशवार भूदानी जमीनों की हकीकत और उसकी लूट की कहानी को। लेकिन सबसे पहले थोडी जानकारी भूमिहीनों को लेकर की गई  भावे के आंदोलन की ली जाए ।    
         भारत जैसे देश में आजादी के बाद से ही आवादी का एक बड़ा हिस्सा भूमिहीनों का रहा है।  इनके पास खेती करने की जमीन की बात तो दूर ,दफन होने के लिए 6 गज जमीन भी मयस्सर नही है ।भूमिहीनों का यह तबका हर बार चुनाव में झुंड के झुंड चुनाव केंद्रों पर जाता हैं और  सड़े गले , चोर उचक्कों ,डकैत, अपराधियों से लेकर कथित तौर पर साफ सुथरे लोगों को  जीताकर संसद से लेकर विधान सभा तक में भेजता हैं। लेकिन कोई भी नेता या पार्टी इन्हे आजतक भूमिहीन की श्रेणी से उपर लाने की कोशिश नही की है ।
      आज जो नक्सनवाद देश में फैला है उसका एक बहुत ही बड़ा कारण लोगों का भूमिहीन होना और कुछ लोगों के पास अधिक जमीन होना है। गांधी के लोगों ने आने वाले समय की कल्पना की थी। इसिलिए गांधी के सच्चे आदमी विनोबा भावे ने भूमिहीनों को जमीन देने के लिए गांव गांव जाकर जमींदारों से भूमि मांगने की शुरूआत की । इसके लिए सबसे पहले  विनोबा जी 1951 में अपने पनवार  आश्रम से चलकर हैदराबाद के दक्षिण में शिवरामपल्ली गांव पहुंचे ।वहां तीसरे सर्वोदय सम्मेलन का आयोजन था ।18 अप्रैल 1951 को विनोबा जी नांगलोंड पहुंचे।यह इलाका तब भी लाल सलाम के नारों से गूंजता था ।विनोबा जी पोचमपल्ली गांव में ठहरे। 700 की आवादी वाले इस गांव में दो तिहाई लोग भूमिहीन थे ।भूमिहीनों ने विनोबा जी से 80 एकड़ जमीन की मांग की।  विनोबा जी के आग्रह पर गांव के जमींदार रामचंद्र रेउ्डी 100 एकड़ जमीन देने की घोषणा की । इसके बादी विनोबा जी ने इसे आंदोलन का रूप् देकर पूरे देश से अपने जीवन में 47 लाख एकड़ जमीन दान में ली। ये जमीने बांटने का काम राज्य और जिला भूदान समिति को दी गई। चूकि भूमि राज्य का मामला है  इसलिए राज्य सरकार का सहयोग जरूरी है। लेकिन देखा जा रहा है कि भूदान की जमीने लूट की शिकार होती गई हैं।  आगे बढे इससे पहले एक नजर भूदानी जमीनो  पर।
            देश भर में स्थापित भूदान यज्ञ समिति के अनुसार  सर्वोदयी नेता विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के तहत कुल 47 लाख,63 हजार,676 एकड़ जमीन  भूमिहीनों के लिए दान में मिली थी। यहां पेश है कुछ राज्यों में पिछले 2 साल तक भूदानी जमीनों के आंकड़े  एकड़ में -
 राज्य      दान की जमीन      बांटी गई जमीन    बची जमीन
बिहार       6,48,593         2,78,320          3,40,273
आंध्रा       2,52,119           1,8,770           1,43,349
झारखंड     14,69,280          4,88,735          9,80,545
उड़ीसा      6,38,706            5,79,984          58,722
राजस्थान    5,46,965            1,42,699          4,04,266
उत्तरप्रदेश   4,36,362           4,18,958         17,404
दिल्ली      300                180             120
मध्यप्रदेश   4,10,151             2,37,629         1,72,522
महाराष्ट्    1,58,160             1,13,230         44,930
जम्मू कश्मीर 211                 5               206
असम       877                 877             0
पंजाब      5168                 1026           4,152
तामिलनाडू  27677                22837          4,840
केरल      26,293                5,774          20,519
कर्नाटक   15,864                 5017          10,847
हिमाचल   5,240                  2,531           2,709
गुजरात    1,03,530               50,984          52,546
        आपको बता दें कि संयुक्त बिहार से सबसे ज्यादा जमीनें भूदान आंदोलन को दान की गई थी । कोई 22 लाख एकड़ जमीने  संयुक्त बिहार से मिली थी ।  इनमें से बिहार के जमींदारों ने 6,48,593  एकड़ और झारख्ंड के जमिंदारों ने 14,69,280 एकड़ जमीने विनोबा जी को दी थी । 45 सालों के बद भी  ये जमीनें आज तक भूमिहीनों को नही दी गई है। बिहार और झारखंड में 2 लाख 32 हजार लोगों ने ये जमीने दान दी थी।   बिहार में में मात्र 2,78,320 एकड़ जमीने ही आज तक बंट पायी है जबकि झारखंड में मात्र 4,88,735 एकड़ जमीने ही भूमिहीनों तक पहुंच पाई है। इनमें भी जिन भूमिहीनों को जमीने दे भी दी गई है उसका मालिकाना पट्टा आज तक अधिकतर लोगों को नही मिली है। राजस्व विभाग सारे कागजात अपने पास रखे हुए है और कागज देने के नाम पर मोटी रकम की मोग कर रहे है।  बिहार और झारखंड से मिली लगभग 22 लाख एकड़ जमीनों में से अधिकतर जमीनों को दलालों और भ्रष्ट नौकर शाहों से लेकर भूदान समिति से जुड़े लोगों ने अनफीट और बेकार की जमीन घोषित किए हुए है। नदी नाला और पहााड़ी जमीन के नाम पर ये जमीने लूट की शिकार हो रही है । इसके अलावा बहुत सारी जमीने तो ऐसी भी है जिसे दानदाताओं ने नाम कमाने के लिए दान तो दे दिया किन्तु आज भी उन जमीनों पर कब्जा उन्हीं का बना हुआ है।  झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता  ठाकुर प्रसाद  कहते हैं कि -‘आदिवासियों ,गरीबों और भूमिहीनों की बात करने वाली बिहार और झारखंड सरकार से कौन पूछने जाए कि भूदानी जमीन कहां है और उन जमीनों को सही तरीके से भूमिहीनो के बीच क्यों नही बांटा जा रहा है । जो सरकार इतना भी काम नहीं कर सकती भला उससे उम्मीद क्या की जाएगी। सही बात तो यह है कि भूदानी अधिकतर जमीनों पर बिल्उरों ने हड़प लिया है और इसमें राज्य सरकार के लोग सदा से मिले रहे हैं। कभी कभी तो लगता है कि पूरे देश में नकली सरकार की भरमार सी हो गई है।’ ठाकुर प्रसाद की बातों में दम है। राज्य बने 10 साल हो गए हैं और भूदानी जमीनों को लेकर आज तक किसी मुख्यमंत्री ने अपनी सक्रियता नहीं दिखाई। राज्य के भू राजस्व मंत्री हैं मथुरा महतो। जमीनी आदमी हैं और लोकप्रिय भी । लेकिन भूदान  से संबंधित जमीन वितरण के बारे में जब इस संवाददाता ने सवाल किया तो महतो साहब चुप हो गए । कहने लगे कि- ‘कुछ जमीनें पहले भूमिहीनों को बांटी गई थी अभी इस पर फिर से काम किया जाना हैं जमीन की मानिटरिंग की जा रही है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि यहां  का भूदान समिति डिफंक्ट है। वह ठीक से काम नहीं कर रहा है। एक अन्य  सवाल  पर महतो साहब भड़क गए। कहने लगे कि आप लोग केवल निगेटिव सवाल ही करते हैं । राज्य में अच्छा काम भी हो रहा है उसे आप लोग नहीं दिखाते।’
     अब आप को ले चलते हैं नीतीश जी राज्य में । कहा जा रहा है कि वहां सब कुछ हरा भरा हो गया है। लेकिन भूदानी जमीन के मामले में बिहार में भी लूट पाट कम नहीं हुई है। बिहार में भूमि सुधार के नाम पर  डी बंदोपाध्याय आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 11 जून 2007 को राज्य सरकार को सौप दी। आयोग का कहना है कि 1 सरकार के पास भूदानी जमीन के अलावा किसी भी जमीन की सही जानकारी नही है और न ही उसका हिसाब किताब है।2 भूदान की जमीन में भारी गड़बड़ी  हुई है। भूदान यज्ञ समिति और राजस्व विभाग के जमीन संबंधी आंकड़ों में काफी अंतर है।3 1961 में भू हदबंदी कानून बनाया गया लेकिन आज तक लागू नहीं हुआ।4 500 एकड़ से उपर जमीन रखने वाले भूस्वामियों की नई नई सूचियां तैयार होती रही है।इस प्रकार की सूची 1070.76एवं 1982.83 और 29 जून 1990 को बिहार  विधान सभा के अंदर 500 एकड़ से उपर जमीन रखने वाले 35 भूस्वामियों की सूची प्रस्तुत की गईथी लेकिन मामला वहीं दब कर रह गया।
      बिहार में कई मामले तो चैंकाने वाले हैं । उपरोक्त कमीशन की रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि भूदान की 11130 एकड़ जमीन 59 संस्थाओं को दे दी गई जो भूदान कानून के विरूद्ध. है।औसत एक संस्था को 189 एकड़ जमीने दी गई है। चूकि यह मसला राज्य सरकार से संबंधित है इसलिए कहा जा सकता है कि सरकार के बाबूओं और भूदान समिति के लोगों ने मिलकर यह सारा खेल किया है। बिहार में भूदानी जमीनों की कैसे लूट की गई है इसकी कुछ बानगी आप देख सकते हैं ।बिहार के पूर्णिया जिला में भूदान कार्यालय मंत्री हैं मुस्तफा रजा आलम। आलम ने अपनी पत्नी रेहाना खातुन के नाम 4 एकड़ जमीन खाता नंबर 444 ,खेसरा नंबर 405  के नाम 23 जुलाई 2008 को  करवा दी हैं। यह जमीन पूर्णिया जिले के रूपौली थाना के मउआ परबल गांव में दी गई है।  इसका प्रमाण पत्र संख्या है 778549। इसी महिला के नाम पूणिर्या जिले के गोपालपुर थाना के जहांगीरपुर बैसी में 2 एकड़ की एक और जमीन दी गई है ।इस जमीन का खाता नंबर 866 और खेसरा नंबर है 101। इसका प्रमाणपत्र संख्या है 768166। यह जमीन 3 नवंबर 2007 को दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट का इस मसले में साफ आदेश है कि भूमिहीनों को जमीन दी जाएगी और नह भी स्थानीय भूमिहीनों को। लेकिन यहां तो एक ही आदमी को दो जगह जमीन दी गई है और वह भी स्थानीय आधार पर नही। इसे लूट नही तो और क्या कहा जाए? इसी परिवार से जुडा एक और केस है पटना  का। पूर्णिया के मुस्तफा रजा का सगा भाई मो0 इसराफिल पटना भूदान आफिस में काम करते हैं। इन्होने अपनी पत्नी रजिया खातून के नाम 4 एकड़ जमीन पूर्णिया के ही भउआ परबल गांव में करबा दी है। इस जमीन का प्रमाण संख्या है 778530 ।यह जमीन 23 जुलाई 2008 को रजिया खातुन के नाम की गई है। इसी महिला के नाम एक एकड़ जमीन जहांगीर पुर बैसी में  भी  की गई है  जिसका प्रमाण संख्या 768211 है। यह जमीन 3 नवंबर 2007 को लिखी गई है।  इस परिवार के लोगों ने सरकार के लोगों से मिलकर या फिर राजनीति के तहत जमक र भूदानी जमीनों की लूट की है। एक 2 एकड़ की तीसरी जमीन भी इसी रजिया खातून के नाम जहांगीरपुर बैसी में की गई है जिसका खाता नंबर है896 और खेसरा नंबर है 101। इस जमीन का प्रमाण पत्र देने वालों में  विजय कुमार शर्मा , कार्यालय मंत्री , भागलपुर भूदान कार्यालय के हस्ताक्षर हैं।  आपको यह भी बता दें कि ये सारी जमीने नीतीश कुमार के शासन में बांटी गई है। बंटी यह जमीन जाएज है या नाजायज यह जांच का विषय हो सकता है।  बिहार भूदान यज्ञ समिति के अध्यक्ष शूभमूर्ति उपरोक्त मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहते हैं कि  ‘जिस मामले की आप चर्चा कर रहे हैं वह सही है। लेकिन सही ये भी है कि मुस्तफा रजा और और इसराफिल की पत्नी के नाम से जो जमीने दी गई थी उसे वापस ले ली गई है। गलती हुई थीलेकिन उसे सुधार दिया गया है। अब उस जमीन के कागजात रद्द हो गए हैं और उसके प्रमाणपत्र भी वापस कर लिए गए हैं। आपको बता दें कि हमारे कुछ विरोधी हैं जो हमें बदनाम करने की चाल खेल रहे हैं। गलती राज्य सरकार करती है और बदनाम भूदान कमेटी को किया जाता है। ’  जैविक खेती अभियान के संयोजक  क्रांति प्रकाश कहते हैं कि ‘विनोबा जी ने देश में घूम घूम कर जमीने हासिल की ताकि गरीब और भूमिहीनों को जमीन दी जस सके। लेकिन इस देश की राजनीति ने विनोबा भावे के सपनों को भी तोड दिया । कुछ जमीने बांटी गई जबकि अधिकतर जमीने लालफीताशाही के चककर में फंसी है। इसके अलावा कुछ जमीने तो अभी भी लठैतों के कब्जें में हैं । या तो जमीन बंटनी चाहिए या फिर उस जमीन को वापस कर देनी चाहिए।’
         बिहार भूदान कमेटी के अध्यक्ष हैं शुभमूर्ति लंबे समय से भूदान आंदोलन से जुड़े रहे हैं।  इन पर आरोप लगाया जा रहा है कि इनको हर महीने 43801 रूपए बेतन के रूप में मिल रहे हैं। इनको महंगाई भत्ता के रूप में 4320 रूपए, अतिथि भत्ता के रूप् में 14 हजार रूपए, क्षेत्रीय भतता के रूप में12 हजार रूप्ए और उ्ाइबर भत्ता के रूप में 5481 रूप्ए भी मिल रहे हैं। सवाल है कि क्या अवैतनिक लोगों को महंगाई भत्ते दिए जाते है? आपको बता दें कि बिहार भूदान समिति से जुड़े सैकडों कार्यकर्ता 27 माह से बेतन न मिलने की शिकायत कर रहे हैं जबकि हर साल राज्य सरकार भूदानी लोगों के लिए 60 से 70 लाख रूपए देती हैं। शुभमूर्ति कहते हैं कि ‘ इसे मैं कहता हूं कि मुझे बदनाम किया जा रहा है। दरअसल अध्यक्ष का पद राज्य मंत्री का होता हैं । आज की तिथि में एक राज्य मंत्री को 60-70 हजार बेतन के रूप में मिलते हैं ,उपर से घर और गाड़ी अलग से ।चूकि मैं भूदान कमेटी से जुड़ा हूं इसलिए मैं आधा वेतन ही ले रहा हूं। लेकिन भाइयों को यह पसंद नहीं।’
      भूदानी जमीन की लूट केवल बिहार या गुजरात में ही नहीं की गई है। जहां जहां से जमीने मिली है ,जमीने लूट की शिकार हुई है। आंध्र में कुल 2,52,119 एकड़ जमीने दान में मिली थी। इनमें से 1,08,770 एकड़ जमीन अनियमितता पूर्वक बंट तो गई है बाकि लगभग एक लाख जमीन बिल्डरों और संस्थाओं के हाथ में चली गई है। बिल्डरों के कई मामले अभी अदालत में चल रहे हैं। तामिलनाडू में तो भूदानी जमीन को लूटने के लिए भूदान एक्ट में ही संशोध कर दिया गया।  तामिलनाडू में कुल 27677 एकड़ जमीन दान में मिली थी । इनमें से 22837 एकड़ जमीन किसी तरह तो बंट गई है वाकि के 4840 एकड़ जमीन संस्थाएं और विल्डरों के चुगुल में है। राज्य सरकार ने भूदान कानून में बदलाव करके कानून बना रखा है कि अगर भूदानी जमीन का उपयोग सार्वजनिक काम के लिए होता है तो इसे बाजार दर से दोगुनी दर पर ली जा सकती है।  उडीसा में भी भूदानी जमीन को लूटा गया हैं । उड़ीसा में  भूदान आंदोलन के तहत कुल 6,38,706 एकड़ जमीने दान में मिली थी। इसमें से 5,79,984 एकड़ जमीनें बांट दी गई है। इनमें भी कई जमीनें ऐसे लोगों को दे दी गई हैं जो भूमिहीन बर्ग में नहीं आते हैं। इसके अलावा खुर्दा जिले के पीपली तहसील में 171 एकड़ जमीन बिल्डर के हाथों बेच दी गई है। बिल्डरों ने इस पर निर्माण भी कर लिया था जिसे एफआईआर के बाद खुर्दा के कलेक्टर ने तोड़ दिया है। लेकिन अभी तक जमीन बेचने वाले और खरीदने वाले पुलिस के हाथ नहीं लग पाए हैं। राज्य के राजस्व और आपदा मंत्री सूर्य नारायण पात्रों कहते हैं कि ‘दोषी चाहे जो भी हो हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे। भूदानी जमीन किसी को नहीं दी जा सकती। यह भूमिहीनों के लिए है। जिन लोगों ने जमीन की लूट की है हम उसे तलास रहे हैं।’
 विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के तहत भूमिहीनों के लिए देश भर से दान में मिली जमीनों की पहली शर्त ये है कि स्थानीय भूमिहीनों के अलावा किसी और को न तो दी जा सकती है और न हीं किसी भी सुरत में किसी को भी ये जमीने बेची जा सकती हैं । भूदानी कानून के अलावा माननीय सुप्रीम कोर्ट का भी यही आदेश है।  लेकिन इस आदेश की धज्जियां सबसे ज्यादा गुजरात सरकार और  राज्य भूदान समिति से जुड़े लोगों ने उड़ाई है। हालाकि  ऐसा नही है कि गुजरात के  अलावा अन्य राज्यों में भी  भूदानी जमीन की लूट नहीं  की गई है। हम उस पर भी चर्चा करेंगे। लेकिन सबसे पहले आइए नजर  डालते हैं गुजरात में  भूदानी जमीनों पर । सरकार के लोगों और राज्य भूदान समिति के लोगों ने मिलकर पैसे की लालच में भूदानी जमीनों को विल्डरों के हाथ बेच दी है। ऐसा कोई एक मामला नहीं है । जरा इन मामलों पर आप भी गौर कर ले।गुजरात का ब्लाक नंबर542। गांव भदज। इस इलाके को आधुनिक समय में साइंस सिटी के नाम से जाना जाता है। राज्य सरकार और भूदानी समिति से जुड़े लोगों ने यहां की लगभग 12 एकड़  भूदानी जमीन एक बिल्डर रश्मिकांत छगान भाई पटेल को मात्र एक करोड़ 18 लाख में बेच दिया। बर्तमान समय में यहां एक एकड़ जमीन की कीमत 2 करोड़ के आसपास है। यानि 24 करोड़ की जमीन लगभग सवा करोड़ में बिल्डर लोगों को खिलापिला कर  ले उड़े। आज तक किसी की इस पर नजर नहीं गई है।
    गुजरात के ही खेड़ा जिला के राधु गांव की ही भूदानी 5 एकड़ जमीन भूदान समिति और राज्य सरकार के लोगों ने सभी नियमों को ताख पर रखकर मात्र 3 लाख में बिल्डर दिनेश भाई रमण भाई पटेल को बेच दी है । इस जमीन का सर्वे नं0 है 1662 और 1664। आपको बता दें कि भूदान के तहत पहले यह जमीन अलेफ खान और गुलाब खान पठान को दी गई थी। बाद में इन खानों से जमीन छीन कर बिल्डर के हवाले कर दिया गया। अहमदाबाद शहर में ही सावरमती आश्रम के पास ग्राम स्वराज आश्रम स्थित है। यहां की लगभग आधा एकड़ जमीन 3 नवंबर 2009 को एक ब्यापारी के हाथ  मात्र 39 लाख रूपए में  बेच दी गई है।  बेची गई जमीन पर आश्रम की पांच कमरे थी, एक बड़ा हाल था और खुली जमीन थी।  अभी अहमदाबाद में 40-45 लाख में एक कमरा मिलना भी मुश्किल है । चूकि ब्यापारी के हाथ में सीधे जमीन बेचने में दिक्कत आ सकती थी इसलिए दलालों ने पहले एक संस्था बनाई फिर इस जमीन को बेच दी।
     गुजरात के ही बड़ोदरा शहर में भी दलालों और भूदान समिति से जुड़े लोगों ने भूदानी जमीन को बेचने में कोई कोताही नही बरती हैं बाघोरिया रोड पर पापोद मुहल्ला की 1.4 हेक्टेयार  भूदानी जमीन प्रणव पंचाल,बैकुंठ नाथ बिल्डर को 2004 में बेच दी गई है।  अहमदाबाद के ही नरोदा में एक और भूदानी जमीन को बिल्डर के हवाले किया जा चुका है। 0.43.43 हेक्टेयर जमीन 2008 में प्रवीण भाई मणि भाई पटेल के हाथ बेच दी गई है। इस जमीन का रजिस्ट्ी नं0 है 5160/2008 ।
       जरा दिल्ली का हाल तो देखें। भूदान यज्ञ में दिल्ली के लोगों ने विनोबा भावे को 300 एकड़ जमीन दान में दी थी। इन जमीनों में से 180 एकड़ जमनों का वितरण दिल्ली सरकार कर देने का दावा कर रही है। बाकि 120 एकड़ जमीन कहां है और किसके कब्जे में इसका कोई रिकार्ड किसी के पास नहीं है। आप को बता दें कि यहां कि अधिकतर भूदानी जमीनों पर माफियाओं का कब्जा हो चुका है। फरीदाबाद और नोएडा की भूदानी जमीनों को विल्उरों ने कब्जा रखा है।डिफेंस हाउसिंग के नाम पर माफियाओं ने सहां की 30 एकड़ जमीन लूट ली है । यह मामला अदालत में है। कहा जा रहा है कि दिल्ली और हरियाणा के तीन नेताओं ने मिलकर यह धंधा किया था और करोड़पति बन गए थें।  इसी तरह महाराष्ट् से भूदान के तहत 1,58,160 एकड़ जमीन मिली थी। इसमें से 1,13,230 एकड़ जमीन बंट चुकी है। बाकि की 44,930 एकड़ जमीन अभी विवादों में फंसी हुई है। विनोबा भावे ने सबसे पहले भूदान आंदोलन की शुरूआत बर्धा से की थी। लेकिन बाद के दिनो में बर्धा और थाने इलाके में भूदानी जमीन की जमकर लूट की गई। बर्धा में सबसे ज्यादा विल्डरों ने भूदानी जमीन को कब्जा कर रखा है और थाने इलाके में भूदान समिति औा सरकार से मिलकर विल्डरों और कई संस्थाओं ने सैकडों एकड़ जमीन कम भाव में ले रखी है।
     
   

 

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