Tuesday, October 29, 2013

हम प्रदेश की जनता के मुलाजिम हैं:हेमंत सोरेन

झारखंड की दागी राजनीति को बेदाग और सियासत व सरकार से निराश हो चुकी जनता को अपने आचरण, ईमानदारी और काम से उसकी उम्मीदों पर खरा उतरने में लगे राज्य के युवा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हाल ही में अपनी गठबंधन वाली सरकार के 100 दिन पूरे किए हैं। हेमंत शासन के इन चंद महीनों की सरकार पर राज्य की जनता अब चर्चा कर रही है। चर्चा विरोध में भी है और पक्ष में भी। विरोध इस बात को लेकर है कि सरकार ने अब तक जो काम किए हैं, उसे और विस्तार करने की जरूरत है। जब तक ग्रासरूट तक लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता, तब तक सूबे की हालत नहीं सुधर सकती। सरकार के पक्ष में जो तर्क दिए जा रहे हैं, उसमें जनता की राय यह है कि इतने कम दिनों में जो हुआ, कम नहीं है। चर्चा के दोनों पक्षों को मिलाकर देखें, तो साफ हो जाता है कि हेमंत सरकार से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं और लग रहा है कि अगर सालभर भी सरकार रह गई, तो प्रदेश की दशा में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। यह बात और है कि काम और राजनीति दो अलग-अलग चीजें हैं, लेकिन इतना साफ है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने पूर्ववर्ती तमाम सरकारों की राजनीति और काम से सीख लेते हुए अपनी सरकार को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में जुटे हुए हैं। प्रदेश की राजनीति से लेकर सरकार के अब तक के तमाम कार्यों और भविष्य की तमाम योजनाओं को लेकर राष्ट्रीय साप्ताहिक ‘हमवतन’ के राजनीतिक संपादक अखिलेश अखिल ने रांची में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से लंबी बातचीत की। पेश है, बातचीत के मुख्य अंश़.़.़
झारखंड की राजनीति में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इसी वजह से पिछली सरकारों में भ्रष्टाचार के सिवा कुछ भी नहीं हुआ। आप इससे कैसे निपट रहे हैं?
यह बात और है कि मैं भी राजनीति करता हूं, लेकिन मेरी राजनीति औरों से अलग है। कौन क्या कहता और क्या करता है, इसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। हमें अपने बारे में पता है। हमारी अब तक की कोशिश तो यही है कि जो हम कहें, वही करें। यह आचरण का सवाल है। अगर हमारा आचरण ही ठीक नहीं है, तो फिर हम पर यकीन कोई क्यों करेगा? फिर हम बोलने में भी यकीन नहीं रखते। हम पर इस प्रदेश की जनता ने बड़ी जिम्मेदारी दे रखी है। कोशिश कर रहे हैं कि हम उनकी उम्मीदों पर खरा उतरें। प्रख्यात उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का एक पात्र है ‘नमक का दारोगा।’ आज की राजनीति में ‘नमक का दारोगा’ बनना कठिन है, लेकिन हम उस राह पर चलने की कोशिश कर रहे हैं। हम प्रदेश की जनता के मुलाजिम हैं। शपथ लेते समय ही हमने तय कर लिया था कि कुर्सी रहे या जाए, न अधिकारियों का दबाव झेलेंगे और न ही भ्रष्टाचार बर्दाश्त करेंगे।
-झारखंड की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार रही है। आपने इस पर काबू करने के लिए अब तक कौन-कौन से कदम उठाए हैं?
इस मामले में हम और हमारे साथी लोग गंभीरता से काम कर रहे हैं। शपथ लेने के 100 दिन के अंदर कुल 64 कर्मचारियों एवं अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिसमें 10 लोगों को निलंबित भी किया गया। ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी भी सरकार के गठन के बाद लापरवाह एवं भ्रष्टाचा
र में कथित तौर पर लिप्त अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए हैं। पहली बार किसी राज्य सरकार ने टेलीवीजन के विज्ञापन में भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होने और सीधा मुख्यमंत्री से शिकायत करने का आह्वान किया है। यह अभियान जारी है और जारी रहेगा। भ्रष्टाचार से कतई समझौता नहीं होगा और राज्य की छवि और धूमिल नहीं होने दी जाएगी। एक बात याद रखें कि कोई भी भ्रष्ट सरकार ज्यादा दिनों तक सत्ता में नहीं रह सकती। जनता सब जानती है।
-लेकिन चर्चा यह भी है कि आप सख्त प्रशासक नहीं हैं। ऐसे में ईमानदार शासन की बात कैसे की जा सकती है?
सख्त और मुलायम प्रशासन की बातें कौन करता है, इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। हमारी रुचि केवल बेहतर शासन देने और जनता का कल्याण करने के साथ ही प्रदेश को आगे बढ़ाने में है। जहां तक शासन की बात है, हम आपको बता दें कि हमने अपने ही विधानसभा क्षेत्र दुमका के मसलिया प्रखंड में नव-निर्मित अस्पताल का उद्घाटन करने से मना कर दिया, क्योंकि नव-निर्मित अस्पताल के भवन निर्माण में भारी अनियमितता बरती गई थी और भवन की गुणवत्ता निम्न स्तर की थी। हमने  अस्पताल का उद्घाटन नहीं किया और दुमका उपायुक्त को तत्काल संबंधित अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश दिया। हम केवल वाहवाही लूटना नहीं चाहते, बल्कि राज्य के विकास के प्रति चिंतित हैं और व्यवस्था में सुधार चाहते हैं।
-अभी हाल ही में आपने पत्रकारों के लिए कई सुविधाएं देने की बात कही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप इन सुविधाओं के जरिये मीडिया पर नकेल कसना चाह रहे हैं?
करो तब भी बदनाम और न करो तब भी बदनाम होने वाली बातें हैं। देखिए सच्चाई तो यह है कि मीडिया और पत्रकारों के प्रति हम सम्मान रखते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि क्या मीडिया के लोग इस समाज के अंग नहीं हैं? क्या उनको कल्याण योजना की जरूरत नहीं होती? क्या मीडिया वाले किसी के दबाव में रह सकते हैं?  मीडिया को अपना काम करते रहना चाहिए। ईमानदारी से काम करने वाला हमेशा परेशान   रहता है। यही वजह है कि हमने उनके लिए कुछ करने की पहल की है। मीडियाकर्मियों के दुख दर्द और समय-समय पर आने वाली दिक्कतों को हम समझते हैं। हमने पत्रकार कल्याण ट्रस्ट के गठन की कवायद शुरू कर दी है और ऐलान किया है कि राज्य के सभी मान्यता प्राप्त पत्रकारों का पांच लाख रुपये का बीमा कराया जाएगा। इसके अलावा गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों के असामियक मृत्यु या दुर्घटना में गंभीर अपंगता की स्थिति में ट्रस्ट के माध्यम से पांच लाख रुपये की सहायता राशि दी जाएगी। इसे राजनीतिक प्रयास नहीं कहना चाहिए।
-आपके राज्य की राजनीति भी विशेष राज्य की मांग को लेकर हो रही है। क्या आप इससे सहमत हैं? विपक्ष इस मसले को गंभीरता से उठा रहा है?
सबसे पहली बात तो यह है कि जो लोग इस मसले को आज उठा रहे हैं, पहले क्यों नहीं उठा पाए? राजनीति यही है। हालांकि यह केंद्र का मामला है और उसे ही इस बारे में सोचना है। जहां तक राज्य का हित है, हम कहीं पीछे नहीं हैं। लेकिन इससे पहले आज जरूरत है राज्य के खनिज संपदा को बचाने की। अगर ऐसा हो जाता है और ईमानदारी से सरकार चल जाती है, तो प्रदेश की तस्वीर अलग हो जाएगी।
-इसके लिए आप क्या कर रहे हैं? 
झारखंड में अकूत खनिज संपदा है। देश भर में कोयला उत्पादन में झारखंड देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है। झारखंड को खनिज के बदले में जो मिलना चाहिए, वह अब तक नहीं मिला। हम लगातार इस मसले पर केंद्र सरकार से बात कर रहे हैं। हमने पहली बार इस मुद्दे को उठाया है कि जब निजी व्यक्ति की जमीन सरकार लेती है, तो उसे मुआवजा दिया जाता है, तो फिर सरकार की जमीन अगर कोल इंडिया ने ली है, तो झारखंड सरकार को मुआवजा क्यों नहीं दिया जाएगा?  मामला इतना ही नहीं है। कोल इंडिया लीज का पट्टा खत्म होने के बावजूद खनन कर रहा है। पट्टे के नवीकरण नहीं होने से राजस्व का नुकसान हो रहा है और जमीन का मुआवजा नहीं मिलने से राज्य सरकार को ब्याज जोड़ने पर लगभग दस हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। हम इस दिशा में गंभीरता से काम कर रहे है।
-नीतीश कुमार की तरह आपने भी जनता दरबार की शुरुआत की है? इससे जनता को कोई लाभ हो रहा है?
पहली बात तो साफ कर दें कि हम कोई जनता दरबार नहीं लगाते और न ही किसी की नकल करते हैं। हम लोगों से मिलना चाहते हैं। हम उन लोगों से संवाद करना चाहते हैं, जिन्होंने हम पर यकीन करके सेवा का मौका दिया है। हमें लगता है कि जनता से सीधा संवाद कई समस्याओं को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देता है। यही वजह है कि सचिवालय परिसर में जन शिकायत प्रकोष्ठ की शुरुआत की गई है। जन शिकायत प्रकोष्ठ में उपसचिव स्तर के एक अधिकारी के नेतृत्व में पांच समर्पित कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं, जो जन शिकायतों को दर्ज करने के साथ समस्याओं के समाधान में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। हमारी कोशिश रहती है कि हम भी वहां उपस्थित रहें। आपको बता दें कि इस संवाद से कई छोटी-छोटी समस्याएं अपने आप समाप्त हो रही हैं। जन शिकायत प्रकोष्ठ में शिकायत पेटी भी रखी गई है, ताकि कोई व्यक्ति अगर अपनी पहचान छुपाए रखकर शिकायत करना चाहता है, तो वह उस शिकायत पेटी में अपना शिकायत पत्र डाल सकता है।
-लेकिन इन तीन महीनों में आपने जो विकास करने की बातें कही हैं, उससे जनता संतुष्ट है?
जनता को खुशी तो तब मिलेगी, जब संपूर्ण विकास होगा। हमने सरकार बनाने के साथ ही 100 दिनों का एक रोडमैप तैयार किया था। ईमानदारी से हमने उस पर अमल करने की कोशिश की है। कई अहम काम को हमने अंजाम भी दिया है और वे दिखाई भी दे रहे हैं। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए हमारी सरकार विशेष रूप से काम कर रही है। राज्य के हर आदमी और हर समाज के लोगों को एक बेहतर, ईमानदार, सक्षम, शासन और सरकार का अहसास कराने में हम जुटे हैं। हमें बहुत कुछ करना है और कर भी रहे हैं। जब तक राज्य के अंतिम लोगों को व्यवस्था का लाभ नहीं मिल जाता, हम चैन से बैठने वाले नहीं हैं। हम पहली बार  सभी प्रखंड मुख्यालयों में प्रखंड विकास पदाधिकारी द्वारा जनता दरबार लगाकर जन-समस्याओं के निदान की योजना चला रहे हैं। अब प्रखंड स्तर पर ही लोगों की शिकायतें खत्म हो रही हैं।
-आपकी पार्टी के लोगों पर अक्सर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। आप अपने को कहां पाते हैं?
देखिए, संगठन आदमी से बड़ा होता है। राजनीति में आरोप लगाने की राजनीति चलती रहती है। यह लोकतंत्र का एक अलग मिजाज हो सकता है, लेकिन आरोप सही साबित हो यह देखने की बात होती है। गुरुजी पर भी कई आरोप लगे। आखिर में सच्चाई सामने है। जो लोग जनता की राजनीति करते हैं और जिनके पास लोगों का समर्थन होता है, ऐसे नेता हमेशा निशाने पर होते हैं। हम जिस परिवार से आते हैं, पूरी दुनिया जानती है कि गुरुजी की राजनीति क्या है? गुरुजी असंभव काम को भी संभव करते रहे हैं। गुरुजी जब राज्य बनाने की राजनीति कर रहे थे और आंदोलन कर रहे थे, देश और प्रदेश के लोग उन पर हंसते थे, लेकिन धुन के पक्के गुरुजी ने असंभव को संभव बनाया। हम आलोचनाओं से डरते नहीं। हम काम करना चाहते हैं और कर भी रहे हैं। हमें गुरुजी से प्रेरणा मिलती है। उनका संघर्ष ही हमारा संबल है। हम इस कोशिश में लगे हैं कि गुरुजी   ने जिस व्यवस्था की कल्पना की थी, उसे साकार करें। इंसान होने के नाते हमारी भी कुछ कमजोरी हो सकती है, लेकिन तय मान लीजिए कि हम जो भी करेंगे, वह भ्रष्टाचार रहित होगा और ईमानदार प्रयास ही होगा।

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