Thursday, October 17, 2013

राजनीति पर जाति भारी


                         अखिलेश अखिल
 आजादी के बाद इस देश की राजनीति और नेताओं की नैतिकता को मापने की कोशिश की जाए कुछ एक उदाहरण को छोड़कर देश की पूरी राजनीतिक जमात ठगों और गिरहकटों के कारटेल से ज्यादा कुछ भी नहीं है। यहां कौन क्या बोल रहा है, उस बोल के क्या अर्थ हैं, नैतिकता के क्या मायने हैं, लोकतंत्र में जनसेवा और जनसेवा के बदले बजबजाती  राजनीति में शिखंडी राजनेताओं की पैंतरेवाजी को जनता कितना महत्व देती है यह किसी से अब  छुपा नहीं रह गया है।  पिछले दो दशक से यहां हर नेता दूसरों का ऐब  निकालने और अपने को महाबली साबित करने का जो प्रयास कर रहा है, इसकी जानकारी भी जनता जनार्दन को है लेकिन वह इस मसले पर चुप रहना ही होशियारी समझती है। ये तमाम बातें इसलिए कही जा रही है कि पिछले दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने को नैतिक बताते हुए  बिहार और बिहार के नेताओं पर जातिवाद फैलाने का कटाक्ष किया और यह भी कहा कि इसी जातिवादी सोंच की वजह से बिहार विकास के पायदान पर पीछे रह गया।  नैतिक  नरेंद्र मोदी से तो यह पूछा ही जाना चाहिए कि  देश को नैतिकता की पाठ पढाने से पहले डन्हें अपने गिरेवान में झांकना चाहिए। जो आदमी अपनी पत्नी जशोदा बेन के साथ सामाजिक नैतिक धर्म वहन नहीं कर सका और पत्नी के साथ 2 माह गुजारने के बाद उसे सदा के लिए अपने करम पर छोड़ दिया वह नैतिक कैसे हो सकता है?  भाजपा के लाखों समर्थकों को शायद ही मोदी के इस खेल की जानकारी होगी। पालनपुर  ब्राम्हणबाड़ा गांव की रहने वाली जशोदा अब शिक्षक से रिटायर होकर मोदी नाम की माला आज भी जप रही है। 
      बिहार के नेताओं ने मोदी के जातिवादी  बयान का प्रतिकार किया है। इसकी अलग राजनीति हो सकती है। लेकिन इतना तय है कि बिहार में राजनीति पर जाति भारी है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि जातिवाद का खेल केवल बिहार में ही है। जातिवाद उस गुजरात में भी हावी है जहां पटेलवाद  का डंका बजता है। वहां भी दलितों , पिछड़ों और अगड़ों की अपनी जमात है और उसके इसारे पर राजनीति संचालित होती है। दक्षिण के किसी राज्यों में चले जाएं, राजनीति पर जाति भारी है। जाति को गौण करके कोई भी राजनीतिक दल एक कदम आगे बढने को तैयार नहीं है। लेकिन बिहार  और उत्तरप्रदेश का मसला वाकई अन्य राज्यों से भिन्न है। हम इस रिपोर्ट के जरिए बिहार की जातीय राजनीति की ओर आपको ले चलेंगे  और बताऐंगे कि हर काल में राजनीति कैसे जाति से संचालित होती रही है। लेकिन सबसे पहले एक नजर नरेंद्र मोदी पर। जब से नरेंद्र मोदी भाजपा की आंेर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में सामने आए हैं लगता है उनका दंभ कुछ ज्यादा ही बढ गया है। उन्हें पता है कि बिहार की राजनीति उन्हें कभी भी  प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में स्वीकार नहीं करेगी। इसके कई वजह हो सकते हैं। बिहार की राजनीति जानती है कि मोदी न सिर्फ पाखंड से लबरेज है वल्कि भाजपा को अपने दम पर घूमाने का कौशल भी रखे हुए हैं । यह भाजपा का अंदरूनी मामला हो सकता है लेकिन इतना तय है कि बिहार की सेकुलर राजनीति के सामने मोदी को तामझाम बेकार है। इसके लिए बिहार की गठबंधन सरकार ही क्यों न चली जाए। 
      अब जरा एक नजर बिहार की जातीय राजनीति पर। अभी हाल में प्रतिबंधित रणबीर सेना के प्रमुख रहे मुखिया की मौत के बाद कहा जा रहा है कि फिर से बिहार में जातीय संग्राम शुरू हो सकता है। इसके बारे में भविष्यवाणी तो कोई नहीं कर सकता। समाज में हर चीज की संभावनाएं बनी रहती है। लेकिन एक बात साफ है कि अब रणबीर सेना नाम से वहां कोई संगठन नहीं है। मुखिया अपने जीते जी रणवीर सेना को राष्ट्वादी किसान संगठन में बदल दिया था। अब इस संगठन की बागडोर मुखिया के बेटे इंदूभूषण सिंह के हाथ में है। यह वहीं इंदूभूषण सिंह हैं जिन्होने मुखिया की मौत के बाद इसका बदला लेने का ऐलान किया था लेकिन अब यही इंदूभूषण सिंह जदयू के पाले में चला गया है। राजनीति यहां तक हो गई है कि बिहार के डीजीपी अभ्यानंद जो खुद मुखिया की बिरादरी से आते हैं, ने इंदूभूषण सिंह को जदयू के पाले में लाने में काफी मेहनत की है। संभवतः शर्त यह रखी गई है कि नीतीश कुमार अगले लोक सभा चुनाव में उन्हें पार्टी का उम्मीदवार बनाएगी। आप कह सकते हैं कि जिस रणबीर सेना पर भाजपा के कुछ नेताओं का संरक्षण होने की बात सामने आ रही थी? अब पूरी सेना ही नीतीश के खेमे में है। बिहार की यह अद्भुद राजनीति अपने आप में बेजोर है।
       लेकिन समय का अपना महत्व है। आजादी के 65 साल के बिहार  की राजनीति  पर नजर डाले तो कई बदलाव देखने को मिलते हैं । बिहार की  जातीय राजनीति को कम से कम तीन चरणों में बांट कर देखा जा सकता है। पहला चरण 1947 से 1967 का है। यह वही चरण है जहां कांग्रेस का बोलबाला है और काग्रेस को चलाने में सूबे की तमाम सवर्ण जातियां शामिल दिखती है। इस काल में विपक्ष नाम को कोई चीज नहीं है। ब्राम्हण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ  कोग्रेस के प्रमुख वोट बैंक थे। इसके अलावा दलितों , मुसलमानों समेत तमाम पिछड़ी जातियां भी कांग्रेस की वोट बैंक थी। राजनीति का दूसरा चरण 1967 से 1990 का है। यह वहीं काल है जहां कांग्रेस के प्रति लोगों का मोह भंग हो रहा था और समाज से लेकर राजनीति में कई नई जातियां भी अपनी भूमिका तय कर रही थी। सूबे की राजनति किस तरह से जातीय रंग में सराबोर हो रही थी इसकी बानगी निम्न तालिका से आप जान सकते हैं ।
जाति के आधार पर सदन की सीट प्रतिशत में   तालिका एक
 जाति          1962      1967     1975    1977
सवर्ण            59        55      53.9      48.6
उच्च पिछड़ा      28        31.6     32.1      34.9
निम्न पिछड़ा      1.7        2.9      2.5       3.6  
 कुल  ओबीसी     30.5      34.5     34.6      38.5
मुस्लिम            8.8       7.4       7.8      10.0
बंगाली             1.7       2.9       3.7      2.8  
तालिका 2
 बिहार में जातीय आधार पर मंत्री की स्थिति  प्रतिशत में
जाति   
 1962 से लेकर 1977 की राजनीति पर नजर डालें तो जातियां  राजनीति में जातियों के खेल साफ नजर आते हैं । 1962 में राज्य के मुख्यमंत्री बीएन झा थे। उनके  कैविनेट मंत्रिमंडल में 58 फीसदी मंत्री सवर्ण जाति से थे जबकि पिछड़ी जाति से 8 फीसदी और 8 फीसदी मुस्लिम मंत्री बनाए गए थे। 1967 में एमपी सिंहा मुख्यमंत्री बने। इनके मंत्रिमंडल में 67 फीसदी सवर्ण,27 फीसदी पिछड़ी  जातियां और 7 फीसदी मुस्लिम व अन्य जातियां शामिल थी। केदार पांडे 1972 में सीएम बने। इस समय राजनीति में पिछड़ी जातियों से कई नेता राजनीति में आ चुके थे। पांडे जी के मंत्रिमंडल में 38 फीसदी सवर्ण,23 फीसदी पिछड़ी जाति और 15 फीसदी मुसलमान शामिल थे।  लेकिन 1977 आते आते राजनीति सवर्णों से हट कर पिछड़ी जातियों के इर्द गिर्द जाने लगी। कर्पूरी ठाकुर 1977 में सीएम बने। इनके मंत्रिमंडल में 24 मंत्री शामिल थे निमें 29 फीसदी सवर्ण,42 फीसदी पिछड़ी जाति और 13 फीसदी मुसलमान शामिल थे। बिहार की राजनीति 1979 में एकदम बदल गई। इसी साल केंद्र में मोरारजी भाई के नेतृत्व में सरकार बनी और पिछ़ड़ी जाति को आरक्षण देने के नाम पर बीपी मंडल की अध्यक्षता में आयोग गठित की गई। 1980 में इस कमीशन की रिपोर्ट आ गई। इसी समय 1980 में फिर केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी।  मंडल कमीशन लागू होने के बाद देश की राजनीति में पिछड़ो का उभार चाहे जितनी हुई हो  लेकिन उत्तरप्रदेश और बिहार में पिछड़े वर्ग में  न सिर्फ सामाजिक , शैक्षणिक स्तर पर बदलाव हुए वल्कि राजनीतिक स्तर पर भी काफी बदलाव हुए।  बिहार की राजनीति को तीसरा चरण 1990 से अगर माने तो कहा जा सकता है कि राजनीति को यह काल पिछड़ों के उभार का काल रहा है। इसी समय बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद, नीतीश कुमार जैसे पिछड़े नेता सामने आते हैं और अपनी जाति विरादरी के दम पर राजनीति को बनाने और बिगाड़ने को काम करते हैं । आंकड़ों के आधार पर आप कह सकते हैं कि 1983 में  कुल 71 मंत्रियों में जहां 44 फीसदी सवर्ण बिहार मंत्रिमंडल में शामिल थे वहीं 1994 में इनकी संख्या घटकर 27 फीसदी रह गई।1983  के मंत्रिमंडल में 24 फीसदी ओबीसी  शामिल थे जो 1994 में बढकर 46.5 फीसदी हो गया।  इसी समय  राजनीति में हासिए पर जा रहे सवर्णो ने जातीय सेना बनाना शूुरू किया और बिहार की धरती रक्त रंजित होती रही। यह बात और है कि पिछड़ों की राजनीति के अगुआ रहे लालू प्रसाद की राजनीति औकात अभी कम दिख रही है लेकिन उनके औकात को कम करने वाला और कोई नहीं एक पिछड़ा समुदाय का नेता नीतीश कुमार ही है। लेकिन ऐसा कोई बिहार और उत्तरप्रदेश का ही हाल नहीं है आप देश के किसी इलाके में चले जाएं जाति सिर चढकर बोल रही है और राजनीति उसके सामने बौनी नजर आ रही है। अगर गुजरात के पटेल और हिंदुत्व का राग अलापने वाले गुजराती अपनी औकात में आ जाए तो नरेंद्र मोदी को अपनी औकात का पता चल जाएगा।
             
       

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