Thursday, October 17, 2013

दलों के गेमचेंजर


अखिलेश अखिल
अंत में कांग्रेस की राजनीति सब पर भारी पड़ गई। आगामी चुनाव में अपना वोट बैंक पुख्ता करने के लिए कंाग्रेस ने  लोक सभा में फुड सिक्यूरिटी बिल को पास करा ही लिया। पिछले एक महीने से प़क्ष विपक्ष में इस बिल को लेकर रार और तकरार होते रहे लेकिन कांग्रेस ने विपक्ष को ऐसी हालत में लाकर खड़ा कर दिया कि आखिर में विपक्ष को घुटने टेकने पर गए। यह बात और है कि कांग्रेस के इस चुनावी गेम चेंजर कार्यक्रम का कितना असर चुनाव के दौरान पड़ेगा कहना मुश्किल है लेकिन तय मानिए तमाम आरोपों के बीच फंसी मनमोहन सिंह की सरकार के लिए अगले चुनाव में जनता के सामने कुछ कहने की हिम्मत तो हो गई। कांग्रेस के लिए केवल फुड सिक्यूरिटी बिल ही चुनावी गणित को बदलने के लिए एकल हथियार नहीं है। संसद सत्र के दौरान ही उसने वर्षों से डिब्बा में बंद उस भूमि अधिग्रहण से जुड़ें बिल को भी पास करा लिया है जिसकी मांग देश के किसान सालों से कर रहे थे। कहा जा रहा  है कि भूमि अधिग्रहण कानून के बनने के बाद किसानों की दशा ही बदल जाएगी । किसानों की दशा कितनी बदलेगी इसे तो देखना होगा   लेकिन इसका असर आगामी चुनाव पर पड़ेगा और देश की एक बड़ी जमात कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद हो सकती है। यह जमीन के जरिए वोट उगाहने की राजनीति है।कांग्रेस की नजर 67 फीसदी किसानों और मजदूरों पर है। इसी तवके को फांसने के लिए कांग्रेस ने पिछले चुनाव में किसान कर्ज माफी का पासा फेंका था और उसमें सफल भी रही। यह वही वर्ग है जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का वोटर रहा है। आगे यह वर्ग क्या कुछ करता है देखना होगा। कांग्रेस के इस दूसरे गेम चेंजर कार्यक्रम से विपक्ष को कितना हानि होगा इस पर कई दल अपने अपने तरीके से आकलन कर रहे है।
      देश में अभी कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है जो  चुनावी खेल नहीं कर रही है। सबके अपने अपने खेल हैं। कोई जनता को तोड़ने का खेल कर रहा है तो कोई जनता को अपने साथ जोड़ने का खेल कर रहा है। सब इसमें लगे है कि किसका खेल किस पर भारी पड़े। सबकी चाहत है कि उसके गेम के सामने सब चित हो जाए। कुल मिलाकर आप कह सकते हैं कि देश की जनता को दाव पर लगाने के साथ ही जनता पर दाव खेलने  की रणनीति बन रही है। होशियार जनता सब देख रही है और सब समझ भी रही है लेकिन बोलने से परहेज कर रही है। वह अंतिम समय में केवल अंतिम मुहर लगाने के मूड में है। यह मूड ही है जिसे जिसे राजनीतिक पार्टियां पढ नही पा रही है। अगर वह जनता का मूड पढ ले तो राजनीति में कमाल हो जाएगा। लेकिन यही तो संभव नहीं है। इसी असंभव को संभव बनाने के फेर में सभी राजनीतिक दल जनता के मष्तिष्क  को खंगालने के लिए गोता लगाते फिर रहे है।
   लेकिन सवाल है कि क्या केवल कांग्रेस ही गेम चेंजर में लगी हुई है?क्या भाजपा, सपा, राजद, जदयू ,बसपा से लेकर तमाम उत्तर से लेकर दक्षिण की पार्टियां खेल नहीं कर रही है? जरा भाजपा के खेल को भी समझिए। सबसे पहले तो इस बार भाजपा के साथ ही खुलकर संघ परिवार भी चुनावी जंग में शामिल है। इस बार चुनाव भाजपा नहीं संघ लड़ रहा है। संघ ने सोंच समझ कर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना गेम चेंजर बनाया है। साफ शब्दों में आप कह सकते हैं कि भाजपा का गेम चेंजर नरेंद्र मोदी है।  यह बात और है कि नरेंद्र मोदी आगामी चुनाव में कितना चल पाऐंगे  या भाजपा के लिए कितना लाभदायक सावित होंगे कहना मुश्किल है।  उपर से भले ही सब कुछ नरेंद्र मोदी के पक्ष दिख रहा हो लेकिन आडवाणी गुट मोदी को बर्दास्त कितना करेगा कहना मुश्किल है। यह विरोध की ही राजनीति है कि अभी तक मोदी को खुले तौर पर पी एम उम्मीदवार भाजपा घोषित नहीं कर रही है। अभी हाल में ही तीन चुनाव सर्वेक्षण हुए हैं अलग अलग एजेंसियों की तरफ से कराए गए हैं । तीनों सर्वे रिपोर्ट अगर कांग्रेस के पक्ष में नहीं है  तो भाजपा के लिए भी उत्साहवर्द्धक नहीं है। फिर भी संघ को उम्मीद है कि मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में भाजपा ऐलान करेगी तब देश का जनमानस बदल सकता है। इसकी संभावना भी है। लेकिन यह भी सच है कि भारत जैसे देश का जो सामाजिक और राजनीतिक मिजाज है उसमें भाजपा और मोदी के लिए कोई बहुत बड़ा ग्राउंड खाली नहीं दिखता। लेकिन आज की तारिख में भाजपा के पास मोदी जैसे गेम चेंजर नेता है और फिर अयोद्धया जैसा मसला।एक तरफ सेकुलरवाद तो दूसरी तरफ हिंदुत्ववाद।  वादों के इन खेलों को अब गेम चेंजर के रूप में परोसा जा सकता है।
जरा सपा का खेल तो देखिए। सबसे पहले अखिलेश सरकार ने लैपटाप योजना चलाई। यह हर कोई जानता है कि इस योजना से आम जनता को कोई लाभ नहीं है। देश की जनता की एक बड़ी कमजोरी यह है कि उसे डारेक्ट कोई वित्तिय लाभ हो रहा हो तो वह सीधे नेताओं के फांस में आ जाती है लेकिन फिर भी सपा सरकार ने लैपटाप योजना के जरिए युवाओं को बड़े स्तर पर साधने की कोशिश की है। संभव है कि यह योजना सपा के लिए सबसे बड़ा गेम चेंजर सावित हो जाए। देश का युवा मिजाज अखिलेश यादव को भी पसंद कर रहा है । अखिलेश यादव को कोई कम करके नहीं आंक सकता है। इधर  उत्तरप्रदेश की सपा सरकार ने  राज्य के 30 विभागों के 85 योजनाओं में अल्पसंख्यकों के लिए 20 फीसदी आरक्षण की बात कही  है। कहने का मतलब है कि राज्य सरकार जो भी योजनाएं प्रदेश में चला रही है उन योजनाओं में 20 फीसदी योजना मुसलमानों के लिए होगी या फिर सभी योजनाओं में 20 फीसदी मुसलमानों के हित की बात होगी। सरकार ने कहा है कि सच्चर आयोग ने जो बाते कहीं थी उसी को घ्याान में रखकर घोषणा की गई हैं। इससे राज्य के मुसलमानों का कल्याण होगा और अधिक से अधिक लोगों को रोजगाार के अवसर भी मिलेंगे।  लेकिन क्या ये सभी योजनाएं चलेगेी? या फिर चलेगी भी तो कितने बजट की? यह तो आने वाला कल ही बताएगा। लेकिन सपा लैपटाप योजना चलाकर  और योजनाओं में मुसलमानों को आरक्षण देने का ऐलान करके प्रदेश में संभावित भाजपा की राजनीति को रोकने की चाल चली है। यह सपा का सबसे बड़ा गेम चेंजर प्लान है।  दरअसल  राज्य में मुसलमानेां की आवादी कोई 19 फीसदी के बराबर है और आगामी चुनाव में मुसलमान क्या करेंगे इसको लेकर सभी दलों में होड़ मची हुई है। सपा को भय है कि जिस तरह से प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस,बसपा और अन्य दलों की रणनीति बन रही है उससे मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लग सकती है। भाजपा भी पिछड़े मुसलमानों को साधने की कोशिश कर रही है अगर वह अपने इस कोशिश में कुछ हद तक भी कामयाब हो गई तो मुलायम सिंह को झटका लग सकता है। यह झटका से बचने की कवायद भर है। इसे आप सपा सरकार का गेम चेंजर कार्यक्रम कह सकते हैं। अगर मुसलमानों के मन में सपा और अखिलेश सरकार के प्रति विश्वास हो गया तो सपा को इसका फायदा मिलेगा और संभव है कि मुलायम सिंह की राजनीति कामयाब भी हो सकती है। लेकिल क्या प्रदेश के मुसलमान सपा के साथ ही रहेंगे भला इसकी गारेटी कौन ले सकता है?यह तो जुआ है और पासा फेंकने की तरकीब। इस पासा में कौंन और कितना फंसता है यह भला कौन जाने। लेकिन उत्तरप्रदेश की सपा सरकार ने पूरी इमनदारी के साथ पासा फेंका है। तय मानिए यह सपा सरकार का सबसे बड़ा गेम चेंजर कार्यक्रम है  और अगर यह निशाने पर बैठ गया तो मुलायम सिंह की किस्मत बन सकती है।
     गेम चेंजर की राजनीति में सभी दल लगे हैं। नीतीश कुमार , लालू प्रसाद राजनीति को पलटने के लिए अपने अपने गेम चेंजर योजना में लगे हैं। कोई अगड़ो को रिझाने में लगा है तो कोई पिछड़ों को अपने फंास में लाने में लगा है। राजस्थान में गहलौत अपनी राजनीति को और कैसे चमकाए इसके लिए कई तरह की योजनाओं के लिए केंद्र से सहायता मांग रहे है।  छत्तीस गढ में रमण सिंह केवल भाजपा के भरोसे नहीं है। वे अपना दाव भी खेल रहे है। अजीत जोगी कांग्रेस को पलटने के लिए कई तरह के दाव लगा रहे है।तो मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह सत्ता में बने रहने के लिए मुसलमानों को अपने फांस में लाते दिख रहे है। कुल राजनीति ये है कि केंद्र से लेकर राज्य स्तर पर सभी दल और सभी नेता जीत के भरोसे में तरह तरह के खेल करने और जाल फेलाने में लगे है।  राजनीति के इस महा चैसर में कौन किस पर भारी पड़ेगा और किसका खेल कितना सटीक बैठेगा यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा।

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