Thursday, October 17, 2013

आडवाणी बन सकते हैं खेवनहार


                                            अखिलेश अखिल
यह बात और है कि वक्त के थपेड़ों ने भाजपा के लौह पुरूष कहे जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को छत्तीसगढ में जाकर मोदी के नाम का माला जपना पड़ा लेकिन यह भी सच है कि आडवाणी और भाजपा के बीच तलवारें खींच गई है।  और यह भी साफ है कि भाजपा की नई राजनीति में आडवाणी की  हस्ती को चाहे जितना कमजोर करने की कोशिशे  चल रही हो लेकिन आडवाणी की हस्ती को अभी भाजपा में चुनौती देना आसान नहीं होगा। राजनीति के चतुर खिलाड़ी आडवाणी राजनीति को बदलने का मादा रखते हैं और वक्त ने साथ दिया तो मोदीमय हुई भाजपा की राजनीति लोक सभा चुनाव के बाद  मोदी के इर्द गिर्द घूमते नजर आ सकती है। लेकिन इसके लिए अभी आडवाणी भी अपने को तैयार कर रहे है और आप को भी इंतजार करना पड़ेगा। देश में आज ऐसे बहुत कम नेता ही बचे हैं जो देश की राजनीति और जनता के मिजाज को बेहतर तरीके से जानते हैं।  चुनावी मुददे और नारे चाहे जो भी हो राजनीतिक परिणाम क्या होने हैं इसका आकलन सिर्फ चंद नेता ही कर पाते है। इस पर हम चर्चा करेंगे लेकिन पहले राजनाथ की नई राजनीति पर एक नजर।
          भाजपा की नई राजनीति  आडवाणी के रडार पर मोदी नहीं हैं। पूरा संघ भी आडवाणी के रडार पर नहीं हैं । संघ के कुछ लोग और भाजपा के वे तमाम मौकाटेरियन नेता आडवाणी के रडार पर हैं जो समय के साथ पाला बदलते रहे है और जनाधार नहीं होते हुए भी राजनीति करते दिखते रहे है। आडवाणी बनाम मोदी की राजनीति जिस तरीके से की गई और जिस हड़बड़ी में मोदी के नाम पर प्रधानमंत्री उम्मीदवार की दुदुंभी बजायी गई उस तरह की राजनीति इसी देश में कई दफा हो चुकी हैं। लेकिन इस पूरे खेल में राजनाथ सिंह की भूमिका को राजनीतिक नजरिए से देखा जा सकता है। आडवाणी भी इस बात को मान रहे हैं कि जिस तरह से उन्हें दरकिनार करने की कोशिश की गई उसमें राजनाथ सिंह के अलावा किसी और को ज्यादा लाभ भला क्या हो सकता है? राजनीतिक विश्लेषक राजनाथ सिंह के खेल पर नजर लगाए बैठे हैं और इस बात की भी खोज खबर ले रहे हैं कि 13 सितंबर को राजनाथ सिंह  शाम साढे पांच बजे भाजपा कार्यालय में पहुंचते हैं और साढे छह बजे मोदी के नाम  का ऐलान कर देते है। आखिर राजनाथ सिंह इतनी हड़बड़ी में क्यों थे? आडवाणी का विरोध मोदी के नाम को लेकर नहीं था। उनका विरोध तो केवल इस बात को लेकर था कि विधान सभा चुनाव तक मोदी के नाम की राजनीति को रोका जाए। आखिर आडवाणी की इस मांग को पूरा क्यों नहीं किया गया? संघ या भाजपा को इस पर क्या आपत्ति थी?
       दरअसल,भाजपा की राजनीति साफ तौर पर दो खेमों में बंटी हुई है। आडवाणी विरोधी मोदी का खेमा इस बात की राजनीति करता रहा है कि आडवाणी किसी भी सूरत में अब आगे नहीं आए। राजनाथ सिंह इन दोनों खेमो की राजनीति को भली प्रकार समझ रहे हैं और अपना फायदा देखते रहे है। मोदी के चयन में भी ऐसा ही हुआ। राजनाथ सिंह और मोदी समर्थकों को लगा कि अगर आगामी विधान सभा चुनाव में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान अगर भाजपा की सरकार बन जाती है तो आडवाणी की राजनीति और आगे बढ सकती है। इसका श्रेय भी आडवाणी ले सकते है। इसके अलावा शिवराज सिंह चैहान, रमण सिंह और बसुंधरा राजे की राजनीति आडवाणी से ज्यादा मेल भी खाती है और ये सभी आडवाणी के करीब भी है। ये सभी लोग आडवाणी के नेतृत्व में काम करना भी पसंद करते है। भाजपा के भीतर की इस राजनीति को राजनाथ सिंह समेत संघ के लोग भी जानते है। मोदी को भी इस बात की जानकारी थी। और इसी जानकारी की वजह से मोदी भी भाजपा के लोगों को कह दिया था कि जो भी करना है अभी कर लो। राजनाथ सिंह बदलती राजनीति को समझ गए थे। जो राजनाथ सिंह अभी कुछ महीना पहले तक मोदी की जगह आडवाणी को ज्यादा तरजीह दे रहे थे नागपुर के कई दौरों के बाद और संघ का मोदी के नाम पर हिंदुत्व की राजनीति का नया कार्ड खेलने की रणनीति के बाद मोदी के पक्ष में चले गए। मोदी का माला जपने लगे राजनाथ सिंह। संघ ने राजनाथ सिंह को साफ कह दिया था कि जिस हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढाकर आडवाणी ने भाजपा को आगे बढाया था, अब सेकुलर राजनीति की बात करने लगे है और ऐसी हालत में भाजपा का आगे बढना कतई संभव नहीं है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता और आडवाणी के समर्थक ने इस बात की पुष्टि की है कि संघ को आडवाणी से कोई गुरेज नहीं है लेकिन अभी संघ को किसी भी सूरत में भाजपा को आगे लाना है। और ऐसी हालत के लिए मोदी सबसे बेहतर विकल्प है। अगर मोदी को आगे बढाकर भाजपा हिंदुत्व वोट का लाभ उठा ले जाती है और 180 से ज्यादा सीटें पा लेती है तो मोदी के की राजनीति को लाभ मिलेगा। अगर ऐसा नहीं होता है और फिर गठबंधन बनाने की बात होती है तो वहां आडवाणी की राजनीति काम आएगी । फिर भाजपा के भीतर की राजनीति क्या होगी देखने की बात होगी।
    राजनीति के बेहतर खिलाड़ी राजनाथ सिंह गोवा बैठक में भले ही आडवाणी के नाम की माला जप रहे थे लेकिन सच्चाई यह थी कि वे आडवाणी की इज्जत को उतार रहे थे। राजनाथ सिंह की राजनीति से आडवाणी बेहद आहत थे लेकिन वे कुछ बोल भी नहीं रहे थे। देश की जनता और भाजपा के भीतर यह बात फैल रही थी कि आडवाणी मोदी का विरोध कर रहे हैं लेकिन असलियत यह थी कि आडवाणी ,राजनाथ सिंह की राजनीति का विरोध कर रहे थे। यही हाल आज भी है। मोदी के बहाने राजनाथ सिंह की पूरी राजनीति का आडवाणी विरोध कर रहे है। जिस तरह की राजनीति राजनाथ सिंह कर रहे हैं वह आडवाणी के आंखों में खटक रही हैं। आखिर राजनाथ सिंह की राजनीति है क्या? राजनाथ सिंह मोदी के नाम पर अपनी राजनीति को साध रहे है। आज भी मोदी का पूरा कमान राजनाथ सिंह के हाथ में है। संघ और मोदी के नाम पर राजनाथ सिंह आडवाणी को ठिकाना लगा रहे हैं ताकि आने वाले समय में उनका रास्ता साफ हो जाए। भाजपा और संघ के लोग भी जानते हैं कि मोदी कोई बहुत बड़ा करिश्मा नहीं कर पाऐंगे। ज्यादा से ज्यादा 50 सीटें और भाजपा के पाले में चली जाएगी। फिर सरकार बनाने के लिए सेकुलर जमात की जरूरत पड़ेगी। मोदी के नाम पर देश का कौन सा सेकुलर जमात सरकार बनाने आएगी? राजनाथ सिंह चाहते हैं कि चुनाव के बाद एनडीए बनाने में उनकी भूमिका होगी और फिर राजनीति इस बात की होगी कि एनडीए के घटक यह शर्त रखे कि राजनाथ सिंह को पी एम बनाया जाए। लेकिन आडवाणी के रहते राजनाथ की यह मंशा पूरी कैसे हो सकती है? आडवाणी राजनाथ के इस खेल को गोवा अधिवेशन से पहले ही समझ गए थे।
 लेकिन आडवाणी देश के उन चुनिंदा राजनेताओं में शुमार है जो देश की राजनीति का नब्ज पहचानते हैं। भले ही मौजुदा राजनीति में आडवाणी आज हासिए पर जाते दिख रहे हो लेकिन सच्चाई ये भी हैं कि भाजपा  की राजनीति को अंतिम लाभ वही दे सकते हैं। भाजपा को लाभ दिलाने का वही समय एक बार फिर आडवाणी के लिए सौगात लेकर आ सकता है। और तब राजनाथ की राजनीति तार तार हो सकती है।

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