Monday, October 21, 2013

तीन यादवों पर सबकी नजरें


                      अखिलेश अखिल
 जिस तरह की राजनीति चल रही है और केंद्रीय पार्टी कांग्रेस, भाजपा  व बसपा  के खिलाफ  लोगों में आक्रोश उभरता जा रहा है  इससे  एक नई राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना  बढती जा रही है । मुलायम सिंह के अचानक मजबूत होने के बाद आगामी लोक सभा चुनाव में अगर  मुलायम की मजबूती इसी तरह बनी रह जाती है और लालू प्रसाद अपने जनाधार को मजबूत कर लेते हैं तो बहुत संभावना दिख रही है कि मुलायम  की अगुआई में एक नई राजनीति की शुरूआत हो सकती है। लेकिन राजनीति की यह नई शुरूआत तभी संभव होगी जब तीन दिग्गज यादव नेता आपस में लउ़े नहीं। मुलायम के मजबूत होने के बाद उत्तर से दक्षिण तक की राजनीतिक गलियारों में जो सवाल  तैर रहे हैं वे तीन यादवों पर ही केंद्रीत हैं।
क्या आगामी लोक सभा चुनाव में यूपीए सत्ताहीन हो जाएगी? क्या एनडीए सरकार बनाने  की दौड़ में आगे होगी?  और सबसे बड़ा सवाल यह  कि देश की तमाम समाजवादी धारा की पार्टियां एक मंच के नीचे आकर यूपीए या एनडीए को सरकार बनाने के लिए अपनी शर्तों पर झुकने के लिए मजबूर कर देगी? ये ऐसे सवाल हैं जिसपर राजनीतिक विश्लेषक काम कर रहे हैं ।  इसी साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं  और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गुजरात में भले ही असली लड़ाई कांग्रेस और भाजपा के बीच ही हो लेकिन हिमाचल में इस बार पहली दफा भाजपा और कांग्रेस से  नाराज नेताओं ने जो हिमाचल विकास पार्टी की स्थापना की है, वह कांग्रेस और भाजपा  की जमीन को कमजोर करने के लिए काफी है । अगर हिमाचल में कोई तीसरी ताकत उभरती है तो संभव है कि अगले लोक सभा चुनाव में एक नई राजनीति देखने को मिलेगी। इस  विश्लेषण  पर  फिर चर्चा की जाएगी, लेकिन सबसे पहले समाजवादी नेताओं की रणनीति पर एक नजर। यह बात और है कि जदयू अध्यक्ष शरद यादव डंके की चोट पर कहते फिर रहे हैं कि तीसरा मोर्चा की अभी कोई गुंजाईश नहीं है लेकिन हालिया चुनाव में जिस तरह से मुलायम सिंह यादव ताकतवर बन कर उभरे हैं और लालू यादव वोट पाकर भी संख्या बल के आधार पर कमजोर होकर अगले चुनाव पर नजर गड़ाए हुए हैं, इस बात की संभावना बढ गई है कि आगामी लोक सभा चुनाव में देश के तीन जिद्दी यादवों के बीच या तो जंग होगी या फिर आपस में मिलकर एक नई राजनीति की शुरूआत करेंगे।  सपा के ही एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ‘आगामी लोक सभा चुनाव में हम कुछ अलग तरह की राजनीति की कल्पना कर रहे हैं । कांग्रेस और भाजपा को मानस करके हम क्षेत्रीय पार्टी की मजबूत संभावना पर ध्यान दे रहे हैं।  इसके लिए लालू और मुलायम भीतरी तौर पर एक भी हैं । यह बात और है कि समाजवादी एक नहीं हो पाते लेकिन इस बार हम एक होकर मुलायम सिंह पर दाव खेलने की तैयारी में है’। लेकिन क्या वाकई में लालू प्रसाद इसके लिए तैयार हैं ? राजद की पूरी ताकत आगामी चुनाव में अपनी हैसियत को मजबूत करने के लिए लगी हुई है। विधान सभा चुनाव में पटकनी खाने के बाद लालू की हैसियत केंद्र में भी कम हो गई है। लालू फिर से यादव मुसलमान और  अगड़ों को समेटने में लगे हुए हैं ताकि आगामी चुनाव में हैसियत बरकरार रहे। वोट की राजनीति में अपनी हैसियत को बनाए रखने के लिए इस बार बिहार में लालू क्या कुछ करेंगे इस पर सबकी नजरे लगी हुई है।  हालाकि लालू यादव खुद कह रहे हैं कि अभी किसी तीसरे मोर्चे की संभावना नहीं हैं लेकिन क्या  जब कांग्रेस और भाजपा सरकार बनाने के हालत में नहीं होगी और उत्तर और दक्षिण की वे तमाम पार्टियां जो कांग्रेस और भाजपा का विरोध करती रही है, सीटें लेकर आ जाती है तबकी राजनीति क्या होगी?   उत्तर से दक्षिण की राजनीति पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि कांग्रेस और भाजपा का जनाधार लगातार कम होता जा रहा है और क्षेत्रीय या फिर राज्य स्तरीय पार्टियां जनता के बीच मजबूत होती जा रही है। ऐसे में बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति और महत्वपूर्ण हो गई है और अहम हो गए हैं राजनीति के तीन अहंकारी और जिद्दी  यादव नेता मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव।
        इन तीनों दिग्गज यादव नेताओं की संभावित अगली राजनीतिक रणनीति  पर बात करें, इससे पहले  हम आपको इन तीनों महामानव के बायोडाटा से परिचय करा दें। सबसे पहले मुलायम सिंह यादव। शिक्षक से नेता बने मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक बार देश के रक्षा मंत्री बन चुके हैं। इस दफा चौथी बार वे सूबे के मुख्यमंत्री बन सकते थे लेकिन अपने बेटे अखिलेश यादव को सूबे की कुर्सी देकर वे केंद्रीय राजनीति में अंतिम पारी खेलने की जुगत में लग गए हैं । एक बात और साफ कर दें कि अपने बेटे अखिलेश यादव को सीएम बनाने का फैसला मुलायम सिंह यादव का था न कि प्रदेश की जनता और पार्टी कार्यकर्ता का। हां तो खांटी लोहियावादी और गैर कांग्रेसवादी राजनीति पर चलने वाले मुलायम सिंह यादव बाबरी विवाद के बाद मौलवी के खिताव से भी नवाजे गए और मुल्ला मुलायम हो गए। इटावा के सैफई गांव में जन्में मुलायम वसूलों पर चलने वाले  और जिद्दी हैं। लोहियावादी राजनीति को मानने वाले मुलायम 1967 से विधान सभा जीतते आए  और 1989 में पहली बार सीएम बने। मंडल आंदोलन के दौरान वीपी सिंह का विरोध किया और चुद्रशेखर के साथ मिलकर 1992 में सपा का गठन किया। 1993 में बसपा के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई लेकिन बहुत दिनों तक सरकार नहीं चल सकी। 1996 में मुलायम सिंह लोक सभा पहुंचे और रक्षा मंत्री बने। देवगौड़ा के हटने के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर इनकी नजरें गई लेकिन  उनका सपना पूरा नहीं हुआ। 2002 में फिर सीएम बने  और उसके बाद 14 वी और 15 वीं  लोक सभा के सदस्य बने। लेकिन इधर मुलायम सिंह में भी बदलाव आया है । जिंदगी भर गैर कांग्रेस की राजनीति करने वाले मुलायम पिछले कुछ सालों से कांग्रेस के इर्द गिर्द घूम रहे हैं । भले ही मुलायम केंद्र की यूपीए  सरकार में शामिल न हों, लेकिन बार बार और हर बार यूपीए सरकार को संकट से उबारने में लगे रहे हैं। राजनीतिक जानकर मान रहे हैं कि मुलायम की कांग्रेस के प्रति यह मुलायमियत दूर की राजनीति को लेकर है । अगर आगामी लोक सभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा सौ सौ के आंकड़ें के पास सिमट जाते हैं तो मुलायम तमाम समाजवादी पार्टियों को एकजुट कर कांग्रेस का समर्थन अपने नाम पर ले सकते हैं।  हालाकि अभी यह दूर की बात है लेकिन जिस तरह से देश में कांग्रेस और भाजपा की राजनीति चल रही है उससे क्षेत्रीय पार्टी की मजबूती को बल मिलता है ।
    जदयू के अध्यक्ष और मधेपुरा से सांसद शरद यादव का भले ही कोई बड़ा जनाधार नहीं हैं लेकिन राष्ट्ीय राजनीति में दखल की वजह से इन्हें जादूगर कहा जाता है । जबलपुर के पास बाबई गांव में जन्में शरद जेपी आंदोलन के दौरान जबलपुर वि0 वि0 के छात्र नेता थे।एमरजेंसी के ठीक पहले बतौर जनता पार्टी उम्मीदवार जबलपुर से उपचुनाव जीतकर वे लोक सभा पहुंचे और चरण सिंह की लोकदल युवा शाखा के अध्यक्ष बने। 1977 में शरद यादव लोक सभा पहुंचे लेकिन 1980 में साफ हो गए। बहुत दिनों तक शरद भटकते रहे। फिर उनका बनवास टूटा मुलायम सिंह यादव के साथ बदायूं में और लालू के साथ मधेपुरा में। शरद राजनीति को जानते हैं । इसलिए  राजनीति को भंापते हुए  उन्होने पहले मुलायम का साथ छोड़ा फिर लालू से अलग हो गए।  अभी शरद यादव मधेपुरा से सांसद हैं । लेकिन शरद का न बिहार में जनधार है न यादव वोट बैंक पर पकड़। यह नितीश की कृपा है कि बिहार में यादवों को  कथित लुभाने के नाम पर  शरद को झेल रहे हैं । अभी हाल में ही शरद को अपनी असली औकात का पता भी उत्तरप्रदेश चुनाव में चल गया। चले थे मुलायम के यादव वोट पर डाका डालने बूरी तरह से चोट खाकर लौटे। लेकिन राजनीति के इस कुशल खिलाड़ी के अगले दाव पर सबकी नजर लगी है ।
      उधर लालू प्रसाद यादव के बारे में ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है। जेपी आंदोलन की कोख से निकले लालू प्रसाद जेपी आंदोलन के समय पटना वि0 वि0 के छात्र नेता थे। जनता पार्टी की आंधी में पहले  लोक सभा और फिर 1981 में से लगातार विधान सभा पहुंचते रहे। फिर 1990 में बिहार में सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरे और लगातार खुद और पत्नि मिलकर बिहार में 15 सालों तक राज किया।  इस दौरान लालू सामाजिक न्याय के  पुरोधा भी कहलाए। गरीबों के राजा कहलाए। लेकिन गरीबों का यह राजा चारा घोटाला  उजागर होते ही भ्रष्टाचार के प्रतीक बन गए। हवाला कांड के बाद दिल्ली की राजनीति में आए और केंद्रीय मंत्री भी बने। लालू अभी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। राजद नेता राजनीति प्रसाद कहते हैं कि ‘लालू को आप कम नहीं आंक सकते। भले ही बिहार में हमारी हार हुई है लेकिन अभी भी हमारे पास वोट है। समय का इंतजार करिए बहुत कुछ बदलेगा। हम आगामी राजनीति पर नजर रखें हुए हैं।’
        भारतीय  राजनीति में ये तीन ऐसे चरित्र  हैं  जो अहंकारी तो हैं ही जिद्द भी हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में यादवी महाभारत की शुरूआत करने वाले ये तीनो नेता ही हैं। 120 लोक सभा वाला यह दोनो प्रदेश देश की राजनीति को एक नई दिशा देता रहा है । ये तीनों नेता पिछले कुछ सालों से एक दूसरे को नेस्तनाबूत करने में लगे हुए हैं। शुरूआती दौर में तीनो एक  देसरे को आगे बढाने का काम किया। जब तीनों की महत्वकांक्षांएं बढी  और यादवी अहंकार पैदा होने लगे तो तीनों ने ऐ दूसरे की जड़ों में तेजाब भी डालने से परहेज नहीं किया। लेकिन अब समय भी बदला है और इनकी राजनीति भी। लालू कांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी थे, बाद में कांग्रेस के सबसे बड़े समर्थक बने। उधर मुलायम भी  गैर कांग्रेस की राजनीति को अपने दम पर तो आगे बढाते रहे लेकिन पिछले 10 सालों से वे परोक्ष रूप से कांग्रेस को बचाते भी रहे हैं। आप कह सकते हैं कि ये दोनो नेता कांग्रेस को अभी जिंदा रखने में परोक्ष रूप से लगे हुए हैं। इसके पीछे राजनीति भी है और उनकी अपनी रणनीति भी। यह रणनीति आगामी लोक सभा चुनाव को लेकर है । समाजवादी चिंतक रधु ठाकुर कहते हैं कि ‘कांग्रेस विरोध के नाम पर राजनीति शुरू करने वाले बाद में उसी के आगे पीछे करते हैं। यह आज की बात नहीं है। कुछ सालों से तो लालू और मुलायम कांग्रेस को और आगे बढाने में लगे हुए हैं । उनकी अपनी नीति है इसके लिए। उन्हें मालूम है कि भाजपा उनको साथ सटा नहीं सकती और कांग्रेस के साथ मिलकर उनकी मंशा पूरी हो सकती है। बिहार और उत्तरप्रदेश के उन लोगों को इन नेताओं से  पूछा जाना चाहिए कि कांग्रेस विरोध के नाम पर वोट लेने के बाद वे कांग्रेस का समर्थन क्यों कर रहे हैं? इसे ठगी की राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता।’
    शरद को लेकर कई तरह की बातें कही जा रही है। शरद अभी भाजपा के पाले में हैं और नितीश के रहमो करम पर । राजनीति के इस चतुर खिलाड़ी  की अंतिम भूमिका क्या होगी इसको लेकर मुलायम भी अभी कुछ तय नहीं कर पाए हैं लेकिन इतना तय मानिए की आगामी राजनीति इन्हीं तीनो यादव नेताओं के इर्द गिर्द घूमती नजर आएगी।
       


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