Thursday, October 17, 2013

कौन है राष्ट्ीय नेता ?


                                              अखिलेश अखिल

क्या देश में अभी कोई ऐसा नेता है जिसके पिछे जनता जनता फिदा हो? क्या कोई भी ऐसा नेता है जो समग्र देश,समग्र जनता,धर्म की  और जाती की राजनीति से अलग कोई मौलिक तथ्यों की बात करता हो? पार्टी लाईन से उठकर क्या कोई भी नेता है जिसे दलों के नेता और लोग पसंद कर रहे हो?राष्ट्ीय राजनीति से लेकर क्षेत्रिय राजनीति करने वाले नेताओं को ढूढ लीजिए लेकिन कोई भी ऐसा चेहरा सामने नहीं है जिस पर जनता दाव खेल सके। राजनीतिक इतिहास के पन्नों में जाएं तो साफ हो जाता है कि इंदिरा गांधी, राजीव गांधी , जय प्रकाश नारायण, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी और कुछ हद तक जार्ज फर्नांडिस की राजनीतिक अवसान के बाद देश में पिछले कई सालों से कोई नेता पैदा नहीं हुआ है जिसे सुनने और देखने के लिए दूसरी पार्टी के नेता और उनके समर्थक आगे आ रहे हों।लगता है देश में नेताओं का अकाल हो गया है। और जो लोग नेतागिरी कर रहे हैं उनकी औकात अपनी पार्टी और चहेतों से उपर की नहीं हुई है। राजनीतिक पार्टियों की हालिया हालत को देखकर लगता है कि तमाम पार्टियां एक कीर्तन मंडली की तरह काम कर रही है और हर मंडली के अलग अलग कथा वाचक है।जैसे कथा वाचक वैसी उनकी मंडली।एक ही पार्टी के भीतर कई मंडली और कई कथा वाचक।  क्या सोनिया गांधी को राष्ट्ीय नेता माना जाए? क्या राजनाथ सिंह या फिर नरेंद्र मोदी को राष्ट्ीय नेता माना जाए? या फिर बाम दलों के नेताओं के साथ ही मायावती, सपा नेता मुलायम सिंह, जदयू नेता शरद यादव से लेकर शरद पवार और दक्षिण में किसिम किसिम की राजनीति करने वाले नेताओं का राष्ट्ीय नेता माना जाए? मामला यहीं तक नहीं है । देश के कई इलाकों में जो कई ऐसी राजनीतिक पार्टियां चल रही है जो कुछ नेताओं की जेबी संगठन से ज्यादा कुछ भी नहीं।आइए इस पर भी एक नजर डाल लें।
       तामिलनाडू में सत्तासीन अन्नाद्रमुक की मुखिया और राज्य की मुख्यमंत्री जयललिता के बाद किसी दूसरे नेता को आप जानते हैं? तामिलनाडू की जनता भले ही कुछ नेताओं के नाम गिना दे लेकिन देश की बाकी जनता के अलावा  राजनीति करने वाले चतुर सुजान भी जयललिता के बाद के दो चार नेताओं के नाम से परिचित नहीं होगें। इसी कड़ी में तामिलनाडू की राजनीति की धुरी रहे डीएमके प्रमुख करूणानिधि जिसे देश जानता और पहचानता है, उसके बाद डीएमके नेताओं को जानना मुश्किल हो जाएगा। उधर बीजू जनता दल को हांकने वाले राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के बाद पार्टी को कौन चलाएगा या पार्टी की बागडोर किसके हाथ जाएगी कहना मुश्किल है । इसी श्रेणी में आप ममता दीदी को भी ले सकते हैं ।पश्चिम बंगाल की बाघिन कही जाने वाली ममता दीदी  ने अपने बूते पर राज्य की सत्ता पर कब्जा तो जमा लिया है लेकिन उनके बाद पार्टी की बागडोर कौन लेगा नहीं कहा जा सकता। ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष भी है और राज्य की मुख्यमंत्री भी। कोलकाता से लेकर दिल्ली तक में इस पार्टी के कोई भी ऐसे नेता नहीं है जिसे आम जनता जानती और पहचानती है । मामला यहीं तक नहीं हैं ।  चुनाव आयेग में दर्ज देश के विभिन्न राज्यों में कार्यरत  राज्य आधारित 53 पार्टियों को देख लीजिए और उनके आकाओं को समझ लीजिए तो पता चल जाएगा कि  क्षेत्रीय पार्टी चलाने वाले तमाम नेता अपनी पार्टी को जेब की संस्था  कैसे बनाए हुए हैं । पार्टी चलाने वाले ये लोग  अपने या अपने परिवार के सदस्यों के अलावा किसी को भी आगे बढाने में दिलचस्पी नहीं लेते।
         अब आप  बहन मायावती को ही लीजिए। पिछले साल  उत्तरप्रदेश चुनाव में सपा के हाथ बूरी तरह से पराजित हुई है । चुनाव लड़ने से लेकर चुनाव हारने के बाद भी माया के अलावा मीडिया के सामने कोई नहीं आया। जो चुनाव हार गए उनकी तो बात ही नहीं पूछिए, जो जीतकर विधान सभा पहुंचे हैं वे भी खुली हवाओं में अपने पंचाायत मे जनता के सामने अपनी पार्टी के बारे में कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं। बुंदेलखंड इलाके से बसपा के एक सांसद कहते हैं कि ‘मैडम के अलावा पार्टी के बारे में किसी को कुछ भी बोलने का हक नहीं है। आप इसे जिस रूप में देखें लेकिन आदेश यही है । क्या बसपा माया मैडम की जेब संस्था है? इसका जबाव इस सांसद के पास नहीं हैं। वे कहते हैं कि अभी तक तो ऐसा ही चल रहा है। यही वजह है कि पार्टी एक राज्य से आगे नहीं बढ पा रही है।’ मामला यहीं तक का नहीं है। मायावती के बाद पार्टी में दूसरे लाईन के नेताओं का भी अभाव है। 18 सांसदों में से कोई भी सांसद या  प्रदेश अध्यक्ष अपने को नेता कहलाने की स्थिति में नहीं है। कहते हैं कि कांशीराम ने मरते समय माया को यही बात सिखा कर गए थे कि सत्ता की बागडोर हमेशा अपने पास रखना। पार्टी को चलाना है और दूर तक राजनीति करनी है तो किसी पर विश्वास करने की जरूरत नहीं हैं। आप कह सकते हैं कि बसपा में माया के बाद अभी दूसरा कोई विकल्प नहीं है। यही हाल झारखंड आंदोलन से निकली पार्टी झामुमों की है। जब से झारखंड मुक्ति मोर्चा का निर्माण हुआ है तब से गुरूजी पार्टी को अपने तरीके से चला  रहे हैं। गुरूजी का अपना वोट बैंक है और चुनाव लड़ने के अपने तरीके भी।  गुरूजी ने अपने दूसरे बेटे पर यकीन तो किया है और पार्टी की सभी  जबावदेही  मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के उपर रख दी है लेकिन देश में आज भी लोग झामुमो का नाम लेते ही शिबू सोरेन को ही जानते हैं। यह बात और है कि इस पार्टी में कई नेता ऐसे है जिनका अपना जनाधार है और अपनी पहचान भी लेकिन गुरूजी को किसी दूसरे पर विश्वास नहीं। बिहार में राजद का भी यही हाल है । जबसे राजद बनी लालू यादव उसके मुखिया है। 2009 के लोक सभा चुनाव में राजद की बूरी हार के बाद यह बात उठी थी कि अगर लालू यादव पार्टी की बागडोर किसी दूसरे नेता के हाथ में सौंप दे ंतो संभव है कि विधान सभा चुनाव में पार्टी जिंदा हो जाए। लेकिन कोई अपनी जेबी संस्था को किसी के हवाले क्यों करे? लालू ने ऐसा नहीं किया और पिछले विधान सभा चुनाव में पार्टी का सुपरा सुपरा साफ हो गया। रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति का भी यही हाल है । यह पार्टी भी रामविलास की जेबी पार्टी है। उन्हें भी किसी और पर विश्वास नहीं। कोई नहीं बता सकता कि लोक जनशक्ति पार्टी में रामविलास के सिवा कोई और भी नेता काम कर रहे हैं । जदयू के वरिष्ठ नेता  रामसुंदर दास शायद ठीक ही कहते हैं कि ‘आज देश में सबसे ज्यादा लोकतंत्र का अभाव राजनीतिक पार्टियों के बीच है। अगर राजनीतिक पार्टी में लोकतंत्र आ जाए तो राजनीति की दशा ही बदल जाएगी। पार्टी चलाने वाले ही जब लोकतंत्र में आस्था नहीं रखते तो बाहरी लोगों से क्या अपेक्षा की जा सकती है’। इसी तरह जम्मू कश्मीर की नेशनल कंफ्रेंस पार्टी,पैंथर्स पार्टी,पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी वन मैन सों की तरह संचालित है। इन जेबी  पार्टी के नेताओं के अलावा किसी को भी लोग नहीं पहचानते। पंजाब में अकाली दल की अभी अभी जीत हुई है। प्रकाश सिंह बादल और उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल के अलावा इस पार्टी के अन्य नेताओं के बारे में देश की जनता शायद ही जानकारी रखती हो । अकाली दल भी इसी बादल परिवार की जेब संस्था है। महाराष्ट् में शिवसेना बाल ठाकरे परिवार  की जागीर है। यह बात और है कि शिवसेना से बहुत सारे नेता निकले हैं और देश के निर्माण में अपनी भूमिका निभाई है लेकिन आज भी शिवसेना बाल ठाकरे से बाहर नहीं निकल सकी हैं ।उत्तरप्रदेश में रालोद अजित सिंह की जेबी संस्था के रूप में संचालित है।   अजित सिंह हर बार चुनाव में उतरते हैं और अपने कुछ साथियों के साथ कोई न कोई सरकार में शामिल होते हैं । अनुराधा चैधरी  बहुत सालों तक अजित के साथ रही लेकिन उसे भी अंत में रास नहीं आया और मुलायम के साथ चली गई।  इधर अजित ने अब अपने बेटे जयंत को पार्टी की बागडोर संभालने का गुर सिखा रहे हैं । हरियाणा में चैटाला परिवार भी इंडियन नेशनल लोकदल चलाते हैं। चैटाला और उनके दो पुत्रों के अलावा इस पार्टी के किसी नेता को शायद ही देश के लोग जानते होंगे। इसी राज्य में भजनलाल के पुत्र हजपा चलाते हैं और अपने ही पार्टी के अध्यक्ष है और सांसद भी । हजपा से और कितने नेता जुड़े हुए है शायद ही किसी को मालूम हो । देश के कई राज्यों में  इसी तरह की जेबी संस्था के रूप में 53 राजनीतिक पार्टियां कार्यरत है।        
    लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि जो क्ष्ेात्रीय दल विभिन्न राज्यों में सरकार चला रहे हैं उनके मुखिया को माइनस कर दिया जाए तो उस पार्टी के दूसरे नेता को पहचानना भी मुश्किल हो जाएगा। आप कह सकते हैं कि देश की कई क्ष्ेात्रीय राजनीतिक पार्टियां अपने आकाओं के नाम पर ही फल फूल रही है। आलम यह है कि इन पार्टियों के नेताओं ने अपने दूसरे या तीसरे लाईन के नेताओं को आगे बढाने में कोई दिलचस्पी नहीं ली है। ऐसे में ये पार्टियां कुछ खास नेताओं की जेबी संस्था बनकर रह गई है। इसे आप वन मैन सो पार्टी भी कह सकते हैं।

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