Thursday, October 17, 2013

नौकरशाह चला रहे नीतीश की सरकार?


 अखिलेश अखिल

बिहार के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा खूब हो रही है कि भाजपा से तलाक होने के बाद नीतीश कुमार की राजनीति बदल रही है।  नीतीश अब अपने दल के नेताओं पर भरोसा कम कर रहे हैं और पूर्व नौकरशाहों के सहारे ज्यादा राजनीति कर रहे है। अब नीतीश के किचेन कैविनेट से लेकर सरकार की कैबिनेट में नौकरशाहों की ही ज्यादा चल रही है। चमचे टाईप के नेता अब नीतीश के दरबार से बाहर से हो गए है। आइए जरा उन नौकरशाहों से आपका परिचय कराए जो नीतीश की राजनीति को बल देने में लगे है ।अभी सबसे ज्यादा जदयू में आर सी सिंहा की चल रही हैं । सिंहा साहब पूर्व नौकरशाह है। उत्तरप्रदेश कैडर के आई ए एस अधिकारी रह चुके है। पहले ये नीतीश के प्रधान सचिव थे अब सांसद है। अभी पार्टी की पूरी बागडोर इन्हीं के हाथ में है। नीतीश कुमार के साथ पूर्व नौकरशाह एन के सिंह भी है ।सिंह साहब भारत सरकार के वित्त सचिव रह चुके है। अभी नीतीश की राजनीतिको आगे बढाने में लगे है ं। सिंह साहब अभी सांसद भी है और कहा जा रहा है कि अभी नीतीश की कांग्रेस के प्रति जो रबैया है उसमें सिंह साहब की बड़ी भूमिका है ।एन के सिंह नीतीश को आर्थिक और राजनीतिक मसलों पर राय देते है। अभी हाल में नीतीश कुमार के साथ भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी पवन कुमार वर्मा जुड़े है। वर्मा लिखने पढने वाले जानकार माने जाते है। इन्हें देश की संस्कृति की भी बेहद अच्छी जानकारी है। वर्मा जी नीतीश को कला संस्कृति और पर्यटन पर सलाह देंगे। वर्मा जी के सलाह से प्रदेश को कितना लाभ होना है और नीतीश की राजनीति कितनी चमकनी है इस पर सबकी नजरें टिकी हुई है । अभी हाल तक केंद्रीय गृह सचिव रहे आर के सिंह भी नीतीश की मंडली से जुड़े है।  आर के सिंह को नीतीश कुमार ने राज्य में बुनियादी संरचना के विकास में सलाह देने के लिए  इन्हें नियुक्त किसा है । आर के सिंह नीतीश के साथ पहले भी काम कर चुके है। राज्य में ये सड़क सचिव रह चुके है। इन्होने राज्य में कई बेहतरीन सड़के बनाई और इनके सड़को को ही दिखाकर पिछली बार भाजपा और जदयू ने लोगों से वोट मांगे थे। नीतीश कुमार ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व महा निदेशक मंगला राय को प्रदेश का कृषि सलाहकार बनाया है ं। मंगला राय के उपर राज्य में कृषि ब्यवस्था को और आगे ले जाने की जिम्मेदारी दी गई है । इसके अलावा पटना के ही सामाजिक आर्थिक विशेषज्ञ शैवाल गुप्ता भी नीतीश के कोर गु्रप में शामिल हैं। इसके अलावा आधा दर्जन से ज्यादा और ऐसे लोग है जो नीतीश कुमार को अलग अलग तरह का सलाह दे रहे है।  जदयू के कई नेता मान रहे है ंकि नीतीश को अपने नेताओं पर भरोसा नहीं है और वे अफसरशाहों के जाल में फंस रहे है। लेकिन जदयू नेता नवल राय कहते हैं  कि ‘अधिकारियों को लेकर राजनीति नहीं की जा सकती।  राज्य के विकास के लिए अनुभवी लोगों की जरूरत होती है और जो अपने काम में एक्सपर्ट होगा उसकी सेना किसी भी सकार को लेना चाहिए।  आज जो लोग नीतीश सरकार के साथ काम कर रहे हैं इससे राज्य का विकास होगा और प्रदेश की सूरत भी बदलेगी। बिहार विकास के राह पर है और आगे भी रहेगा। इन बातों को लेकर राजनीति नहीं की जा सकती। ’
कहते हैं कि भाजपा से संबंध टूटने के बाद जिस तरह से जदयू के भीतर पद और जगह को लेकर मारामारी चल रही है उससे मुख्यमंत्री बेहद परेशान है। दर्जन भर से ज्यादा मंत्रालय का बोझ मुख्यमंत्री स्वंय लेकर घूम रहे हैं लेकिन किसी को मंत्री बनाने से हिचक रहे है। माना जा रहा है कि जिस दिन नीतीश कुमार मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे जदयू में फूट की संभावना बढ सकती है।  भाजपा वाले भी इसी ताक में है। राजनीति के चतुर खिलाड़ी नीतीश कुमार भला अपनी पार्टी को टूटने तो देंगे नहीं उनकी नजर तो भाजपा के  कई बागी नेताओं पर टिकी है। वे अवसर की तलाश कर रहे है। उनका जिद है कि वे भाजपा को सबक सिखा कर रहेंगे।लेकिन राजनीति को भला कौन रोक सकता है? किसी की आवाज को भला कौन रोक सकता है? इसी संभावित राजनीति को देखते हुए नीतीश कुमार पहले से ज्यादा सतर्क हो गए है । नेता लोग कब नीतीश को दगा दे दे इसे देखते हुए ही नौकरशाहों की एक मजबूत टोली नीतीश ने तैयार की है। लेकिन सवाल है कि चुनाव जीतने के लिए जो गणित चलते हैं उसमें क्या ये नौकरशाह फिट बैठेगे?
       सवाल  यह भी है कि है  आखिर नीतीश कुमार किससे से सतर्क है?क्या वे बदलती राजनीति को लेकर चिंतित है?  क्या इसी सतर्कता की वजह से नीतीश कुमार अपनी पैनी राजनीति को बदल रहे हैं?  माना जा रहा है कि भाजपा से संबंध विच्छेद के बाद बिहार की राजनीति में कई बदलाव आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक तो यहां तक कह रहे हैं कि अगले चुनाव में नीतीश तीसरे नंबर पर चले जाऐंगे। अभी प्रदेश की तमाम बनिया और अगड़ी जाति भाजपा के पाले में हैं । भाजपा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो रही है। दूसरी तरफ लालू प्रसाद की राजनीति ज्यादा तेज हुई है। लालू प्रसाद के साथ यादव और मुसलमान तो हैं ही राम विलास पासवान का साथ होने से पास और अन्य दलित जातियां के साथ ही राजपूत भी  लालू पासवान गंठबंधन को आगे बढाने में लगे है। फिर उपेंद्र कुशवाहा भी नीतीश का कब्र खोदने के लिए भाजपा के साथ जाते दिख रहे है। अब तक नीतीश को अति पिछड़ी और महा दलित जातियां ही वोट देती रही है। वह भी तब जब कोई दबंग जाति उनके पीछे खड़ा हो। अभी अधिकतर दवंग और अगड़ी जाति लालू और भाजपा के साथ है। यही वजह है कि नीतीश कुमार राजनीति के एक नए समीकरएा बनाने के लिए नौकरशाहों की सेवा ले रहे है। नीतीश को लगता है कि समावेशी विकास के दम पर फिर जीत हासिल कर सकते हैं और उसी को चमकाने और विकास की नई कहानी लिखने के लिए ही नौकरशाहों का साथ ले रहे है।  खैर आगे की राजनीति क्या होगी  पटना से लेकर जहानाबाद और दरभंगा से लेकर पूर्णियां तक के राजनीतिबाज यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि नीतीश को अब अपने नेताओं पर भरोसा नहीं रह गया है। नेताओं और अपने खासम खास रहे लोगों को अब नीतीश कुमार राजनीतिक प्लानिंग में शामिल नहीं कर रहे है। जिन नेताओं के सहारे नीतीश पिछले 8 साल से राजनीति करते नजर आ रहे थे उन्हें अब रणनीति बनाने में शामिल नहीं कर रहे है। नीतीश में आए इस बदलाव से वे नेता तो हतप्रभ है कि प्रदेश की जनता और नेताओं के लगुए भगुए भी टुकुर टुकुर ताक रहे हैं। आप कह सकते हैं कि नीतीश में आए इस बदलाव से सब हैरान परेशान है। इस बदलाव के लोक सभा चुनाव पर क्या असर पड़ेगा इसके बारे में अभी दावे के साथ तो कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना तय है कि नीतीश कुमार कोई बड़ी राजनीति करने के फिराक में है। क्या उनकी राजनीति प्रधानमंत्री कुर्सी की ओर है?
 

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