Thursday, October 17, 2013

अमीरी की कब्र पर पनपती गरीबी


                         अखिलेश अखिल

 कहने के लिए आप कुछ भी कहे लेकिन सच्चाई  ये है कि देश के भ्रष्ट और दगावाज नेताओं ने देश की चमरी उधेर कर रख दी है। और योजनाओं का हाल? भोजपुरी में एक कहावत है कि दुल्हन वही जो पिया मन भाए। इस देश की योजनाओं का भी यही हाल है। यहां वही योजनाएं बन रही है जो नेता से लेकर नौकरशाह  और दलाल से लेकर लुटेरे चाहते है। ऐसी योजना जिससे रातों रात अमीर बन सके। यही वजह है कि हर साल देश को साफ सुथरा रखने और मलीन बस्ती को खत्म करने के नाम पर अरबों रूपए खर्च होते रहे लेकिन मलीन बस्ती का भाग्य नहीं बदला । परिणाम के तौर पर गवाही इस बात की है कि अब पूरा देश ही स्लम बस्ती में तब्दील होता दिख रहा है।  आप इसे विकास का साइड इफेक्ट कहें या फिर  अमीरी की कब्र पर पनप रही गरीबी । हाल में आए आंकउ़ों के मुताबिक करीब 10 करोड़ की स्लम आवादी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौति खड़ी कर दी है ।
पर्यटकों को अपनी ओर खींचने वाला गोवा और पूर्वोत्तर के सभी राज्य अब शायद ही लोगों को अपनी ओर खीच पाऐंगे।  भीड़ और स्लम ने इन राज्यों को तबाही के कगार पर ला खड़ा किया है । कहीं नागरिक सुविधाओं की वजह से मारकाट मची हुई है तो कहीं स्लम आवादी के सामने सरकार सिर झुकाए खड़ा दिख रही है । लोगों को सुनने में भले ही यह सब गलत मालूम पड़ता हो लेकिन 2011 के जनसंख्या आंकड़े और  केंद्रीय आवास एवं शहरी गरीबी निवारण मंत्रालय ने जो तथ्य पेश किए है उसे देखकर ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में गोवा समेत देश के तमाम राज्यों के शहर स्लम में तब्दील हो जाऐंगे। लेकिन सवाल ये है कि 70 के दशक में सरकार ने  देश से स्लम को समाप्त करने का  जो वादा किया था, आज वही सरकार देश में स्लम शहरों की गिनती करती फिर रही है। देश में स्लम की बढती तादात को रोकने के लिए आवास और शहरी गरीब अपशमन मंत्रालय कई योजाएं तो चला रही है लेकिन ये योजनाएं उंट के मूंह में जीरा के समान है।  केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा देश के शहरी इलाकों में लगातार बढ रहे स्लम से चितित दिखती है लेकिन योजना चलाने के  जबाव  के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। शैलजा कहती है कि ‘देश की आवादी तेजी से बढ रही है और रोजगार की तलाश में लोग शहरों की ओर भागे आ रहे हैं। सरकार  इन समस्याओं को हल करने के लिए तमाम तरह के प्रयास कर रही है लेकिन उसकी भी एक सीमा है। लेकिन उम्मीद है कि आने वाले समय में स्लम इलाकों की तस्वीर बदलेगी।’ ये तस्वीर कब बदलेगी कहना मुश्किल है।
           कहते हैं कि भारत में अमीरों की संख्या पिछले दस सालों में सबसे ज्यादा बढी है । देश की प्रति व्यक्ति आय पिदले 10 साल की तुलना में दोगुनी हो गई है।  सरकार कहती है कि नई आर्थिक नीति के चलते गांव और शहरों में रहने वाले लोगों का जीवन शैली बदला है। शहरी करण में बढोतरी हुई है और गांव से लेकर शहरों में गरीबों की संख्या में कमी आई है। इसमें बहुत हद तक सच्चाई भी है। लेकिन सरकार की इन्हीं तथ्यों के बीच सबसे चैकाने वाले तथ्य ये है कि पिछले दस सालों में देश मलीन बस्ती में तब्दील हो गया है। पहले मेट्ों शहरों तक ही स्लम की तस्वीरें देखने को मिलती थी लेकिन अब देश का ऐसा कोई कोना  नहीं बचा है जहां स्लम बस्ती नहीं पहुंच गई हो। आलम ये है कि मुंबई,दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई की दहलीज को पार करते हुए स्लम अब छोटे शहरों में दिखाई पड़ने लगे है। आंकड़ों में जाएं तो तो 2001 के जनगणना में देश में स्लम इलाकों में रहने वालों की तादात करीब 5 करोड़ 23 लाख के आसपास थी जो 2011 के जनगणना में बढकर 9 करोड़ 30 लाख पहुंच गई है। सीधे शब्दों में आप कह सकते हैं कि देश के शहरों में अभी कोई साढे नौ करोड़ लोग स्लम में जीने को अभिशप्त हैं।   आर्थिक विकास के इस दौर में इंसान पेट पालने के लिए किस तरह  गांव छोड़कर शहरों की ओर भागता फिर रहा है  और किस तरह वह शहरी स्लम का हिस्सा होता जा रहा है इसकी बानगी देश के मेट्ों शहरों में बढती  स्लम आवादी को देखकर हो रहा है।  सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2001 में चेन्नई की स्लम बस्ती की आवादी 8 लाख 19 हजार थी। इसी तरह दिल्ली स्लम बस्ती की आवादी 18 लाख 51 हजार के पास थी। 2001 में सबसे ज्यादा स्लम आवादी ग्रेटर मुंबई की थी जहां 64 लाख 75 हजार लोग स्लम जीवन जीने को अभिशप्त थे। इसी तरह कोलकाता में 14 लाख 85 हजार,हैदराबाद में 62 लाख 26 हजार और नागपुर में 7 लाख 32 हजार लोग स्लम में रह रहे थे। लेकिन आर्थिक विकास के बावजूद  स्लम आवादी में कमी आने की बजाए बढती ही गई है। अब इन मेट्ो शहरों के स्लमों में  में रहने वालों की तादात 2001 की तुलना में दो गुनी हो गई है।
     मामला केवल केवल मेट्ो शहरों का ही नहीं है। 2001  और 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो साफ हो जाता है कि पिछले दस सालों में उन इलाकों में भी स्लम की पहुंच हो गई है जो पहले इससे बंचित थे। आगे बढें इससे पहले देश के शहरों में बढ रहे स्लमों पर एक नजर-
 देश में स्लम जनसंख्या की स्थिति
राज्य            2001                               2011
आंध्रा             62 लाख 68 हजार              81 लाख 88 हजार
असम             90 हजार                       10 लाख 70 हजार
बिहार             8 लाख 18 हजार                16 लाख 83 हजार
छत्तीसगढ         11 लाख                        21 लाख 11 हजार
गोवा              18 हजार                       1 लाख 54 हजार
गुजरात             20 लाख                      46 लाख 62 हजार                    
हरियाणा            17 लाख                      32 लाख 88 हजार
जे एंड के           3 लाख 74 हजार               4 लाख 94 हजार
झारखंड             3 लाख 41 हजार               9 लाख 31 हजार      
कर्नाटक             23 लाख 30 हजार              36 लाख 31 हजार
मध्यप्रदेश            37 लाख 77 हजार              63 लाख 93 हजार      
महाराष्ट्ा             1 करोड़ 20 लाख               1 करोड़ 82 लाख
मेघालय              1 लाख 10 हजार               2 लाख 5 हजार
ओड़िसा               10 लाख 90 हजार             17 लाख 36 हजार          
पंजाब                 14 लाख 84 हजार              27 लाख 98 हजार
राजस्थान              15 लाख 63 हजार              38 लाख 26 हजार
तमिलनाडू              42 लाख 40 हजार              86 लाख 44 हजार
त्रिपुरा                 47 हजार                       1 लाख 31 हजार
उत्तरप्रदेश             57 लाख 57 हजार                1 करोड़ 88 लाख
उत्तराखंड             3 लाख 50 हजार                 8 लाख 26 हजार
प0 बंगाल             46 लाख 63 हजार                85 लाख 46 हजार
अंडमान समूह         16 हजार                         33 हजार
चंडीगढ              1 लाख 7 हजार                   3 लाख 32 हजार
दिल्ली               20 लाख 29 हजार                 31 लाख 64 हजार
पांडीचेरी             92 हजार                          1 लाख 36 हजार
केरल                75 हजार                          5 लाख 33 हजार
मणिपुर              ----                             75 हजार
मिजोरम              ----                            1 लाख
नागालैंड            ------                           83 हजार
 सिक्किम            -----                            13 हजार
कुल               लगभग 5 करोड़                        9 करोड़ 30 लाख

      आंकड़ों को देखने से  कई नई जानकारियां भी मिल रही है। गोवा को ही देख ले। इस छोटे राज्य में स्लम बस्ती न होने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका। 2001 में यहां स्लम बस्ती में रहने वालों की आवादी मात्र 18 हजार थी जो दस साल बाद 2011 में बढकर 1 लाख 54 हजार के पास पहुंच गई है । गांव से शहरों की तरफ आवादी किस तरह बढ रही है और बेरोजगारी की वजह से किस तरह स्लम में रहकर पेट पालने के लिए स्लम में रहने को विवश हैं लोग, गोवा इसका उदाहरण मात्र है । जरा उस त्रिपुरा को देखिए जहां लोग जाने से भी कतरा रहे थे। उग्रवाद से परेशान त्रिपुरा में स्लमों की आवादी कहा संे और कैसे बढी है यह जांच का विषय हो सकता है। याद रहे त्रिपुरा बंग्लादेश से सटा इलाका है । पहले यहां स्लम आवादी 47 हजार की थी अब यहां एक लाख 31 हजार की स्लम आवादी हो गई है। समुद्र के बीच में रहने को कौन जा सकता है। लेकिन बेरोजगारी और बढती आवादी की वजह से अंडमान द्वीप समूह में भी स्लम आवादी तेजी से बढ रही है ।2001 में यहां की स्लम आवादी 16 हजार की थी जो अब बढकर 33 हजार की हो गई है । इसी तरह मणिपुर,मिजोरम, सिक्किम और नागालैंड में स्लम आवादी देखने का नहीं थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। प्रकृति की सुंदरता वाले इन राज्यों में भी तेजी से स्लम बस्तियां फैल रही है।  इन चारो राज्यों में 2001 की जनगणना में स्लम के नामोनिशान नहीं थे लेकिन 10 साल बाद 2011 में यहां स्लम आवादी प्रकट हो गई है । मणिपुर में अब 75 हजार, मिजोरम में 1 लाख,नागालैंड में 83 हजार और सिक्किम में 13 हजार ऐसे लासेगों की पहचान सरकार ने की है जो स्लम बस्ती में रह रहे हैं।  इस आवादी के पास कोई नागरिक सुविधा उपलब्ध नहीं है। पिछले 10 सालों में सबसे तेज गति से स्लम असम और केरल में बढे हैं।  2001 में असम में 90 हजार लोग स्लम में रह रहे थे जबकि 75 हजार लोग केरल में थे। लेकिन अब असम की सलम बस्ती में 10 लाख 70 हजार लोग स्लम में जीने को अभिशप्त है। और केरल में स्लम की आवादी 75 हजार से बढकर 5 लाख तक पहुंच गई है। मंत्रालय से संबंधित नेशनल बिल्उिंग संगठन के एक अधिकारी कहते हैं कि ‘जब तक आवादी वर नियंत्रण नहीं होगा तब तक स्लम को खत्म करना मुश्किल है।  सरकार के लोगों को गांव स्तर पर रोजगार देने की पहल की जानी चाहिए इसके साथ ही गांव से लेकर छोटे शहरों में विकास की तमाम सुविधाएं देनी चाहिए ताकि लोग शहरों की तरफ पलायन नहीं कर सके। सरकार सबके लिए मकान बना नहीं सकती है।’
     उल्लेखनीय है कि इन स्लम बस्तीयों में  दलित और आदिवासियों की तादात सबसे ज्यादा है । 2001 की जनगणना  के अनुसार पूरे देश के  स्लम इलाकों में पांच करोउ़ लोग स्लम में रह रहे थे, उनमें दलितों की आवादी लगभग एक करोड़ की थी और 15 लाख आदिवासी शामिल थे। यह आंकड़ा अब दो गुना से भी ज्यादा हो गया है।  शहरी गरीबी अपशमन मंत्रालय हलाकि स्लम  इलाको को बेहतर बनाने में लगी हुई है और स्लम  इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए मकान समेत कई अन्या तरह की सुविधाएं मुहैया कराने का प्रयास कर रही है लेकिन  बढती आवादी के सामने सरकार की तमाम योजनाएं फेल होती दिख रही है ।


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