Tuesday, November 5, 2013

सिंधिया के सारथी ‘नाथ’


मध्य प्रदेश में लगातार दो बार हुई हार ने कांग्रेस को झकझोर दिया था। नेताओं की लंबी फेहरिश्त होने के बावजूद कांग्रेस भाजपा के हाथों दो चुनावों में बुरी तरह पिटी। इस बार भी ज्यादा उम्मीद नहीं थी, लेकिन उपाध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने जब से पार्टी की कमान संभाली है, तब से प्रदेश के सभी दिग्गज नेता एक छतरी के नीचे आ गए हैं। कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के रूप में ईमानदार एवं युवा चेहरे को मैदान में उतारा है, तो प्रबंधन के माहिर खिलाड़ी कमलनाथ ने भी इस बार अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। ऐसे में चुनाव बेहद दिलचस्प हो गया है। राज्य की जनता कमान किसे सौंपेगी, इसका पता तो 8 दिसंबर को ही चलेगा। लेकिन इतना तो तय है कि शिवराज की राह अब आसान नहीं है। अखिलेश अखिल की रिपोर्ट... 

  क्या इस बार ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ की जोड़ी मध्य प्रदेश के चुनावी समीकरण को बदल देगी? जिस तरह से कांग्रेस ने युवा चेहरा सिंधिया को प्रदेश में चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया है, क्या इसका लाभ कांग्रेस मिल सकेगा? जिस तरह से कमलनाथ ने पूरे प्रदेश में सिंधिया के साथ प्रचार का बीड़ा उठाया है, क्या इससे कांग्रेस को कोई फायदा होगा? और अंत में क्या गुटों में बंटी कांग्रेस शिवराज सरकार को चुनौती दे सकेगी? ये तमाम ऐसे सवाल हैं, जिस पर प्रदेश की जनता के साथ ही देश के तमाम राजनीतिक विश्लेषक मंथन कर रहे हैं। प्रदेश की अगली राजनीति क्या होगी? इस पर सटीक जवाब भला कौन दे सकता है? लेकिन जिस तरह की राजनीति कांग्रेस खेल रही है और जिस तरह से कमलनाथ अपनी मांद छिंदवाड़ा से निकलकर पहली दफा निकलकर सिंधिया के साथ निकल रहे हैं, इसके असर को कमतर नहीं कहा जा सकता है। संभव है कि इसका लाभ कांग्रेस को मिले, भले ही वह सरकार बनाने की हालत में न हों। सिंधिया और कमलनाथ के साथ-साथ की राजनीति पर हम बहस करेंगे, लेकिन इससे पहले मध्य प्रदेश चुनाव के बारे में जारी एक सर्वे रिपोर्ट पर एक नजर।
  अगर चुनावी सर्वे सच पर खरे उतर गए, तो इस बार मध्य प्रदेश चुनाव में भी शिवराज सिंह चौहान तीसरी बार जीत का पताका लहराएंगे और भारी अंतर से कांग्रेस को मात देंगे। हालिया सर्वे के मुताबिक, मध्य प्रदेश की 230 सीटों में से भाजपा को 148 से 160 सीटें मिल सकती हैं और कांग्रेस 52 से 62 सीटों पर सिमट सकती है, जबकि अन्य को 3 से 18 सीटें मिलने का अनुमान है। यह ताजा सर्वे कांग्रेस की नींद उड़ाने वाला है। सर्वे के मुताबिक, मध्य प्रदेश में भाजपा के सामने कांग्रेस की हालत तरस खाने वाली है और वह सत्ता की दौड़ से बाहर हो चुकी है। राज्य में भाजपा बहुमत ही नहीं, दो तिहाई सीटें जीतने के करीब दिख रही है। सर्वे के मुताबिक, जहां मध्य प्रदेश में भाजपा को 148 से 160 सीटें मिल सकती हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में 61-71 सीटें मिलने का अनुमान है। सर्वे के मुताबिक, भाजपा के वोट शेयर में छह फीसदी से ज्यादा का इजाफा दिख रहा है, जबकि कांग्रेस के वोट शेयर में करीब आधा फीसदी की बढ़ोतरी बताई जा रही है, लेकिन दोनों पार्टियों के वोट का गैप पांच फीसदी की बजाय 11 फीसदी तक बढ़ जाएगा। यानी मध्य प्रदेश में भाजपा पूरी तरह से कांग्रेस का बैंड बजाने की मूड में है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 37.6 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन ताजा सर्वे के मुताबिक, पार्टी को 44 फीसदी वोट मिलेंगे। कांग्रेस को बीते चुनाव में 32.4 फीसदी वोट मिले थे और अब उसे 33 फीसदी ही वोट मिलेंगे, लेकिन दोनों के बीच वोट का अंतर 11 फीसदी होगा। यह है चुनावी सर्वे का सच। यह कितना सच होता है और कितना गलत, अभी इस पर फैसला नहीं हो सकता। लेकिन 2008 के चुनावी परिणाम पर गौर करें, तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 37 फीसदी वोट के साथ 143 सीटें हाथ लगी थीं। 70 सीटों पर भाजपा दूसरे नंबर पर आकर रुक गई थी और तीसरे व चौथे नंबर भाजपा क्रमश: 12 और दो सीटों पर थीं। कांग्रेस को इस चुनाव में लगभग 32 फीसदी वोट मिले थे और 71 सीटें हाथ लगी थी। 125 सीटों पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर आकर रुक गई थी। इसी तरह तीसरे और चौथे नंबर पर कांग्रेस क्रमश: 19 और सात उम्मीदवार रह गए थे।
  2003 के विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस और भाजपा की स्थिति
  क्षेत्र भाजपा कांग्रेस
  च्ांबल 22/34 9/34
  विंध्य प्रदेश       38/52 6/52
  महाकौशल       43/57 8/57
  मालवा ट्राइबल   22/28 5/28
  मालवा नॉर्थ       48/59 0/59
  2008 के विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस  और  भाजपा की स्थिति
  क्षेत्र                  भाजपा           कांग्रेस
  च्ांबल                16/34           13/34
  विंध्य प्रदेश        38/56           10/56
  महाकौशल        30/48           18/48
  मालवा नॉर्थ       42/63           19/63
  मालवा ट्राइबल   17/28             11/28
  इन आंकड़ों के अलावा इस बात पर भी नजर रखने की जरूरत है कि प्रदेश में भले ही अभी बसपा मजबूत हालत में नहीं है, लेकिन उसके वोट बैंक लगातार बढ़ते जा रहे हैं। 2003 के चुनाव में बसपा को दो सीटें ही मिली थीं, लेकिन उसे सात फीसदी वोट मिले थे। 2008 के चुनाव में बसपा को सात सीटें मिलीं और नौ फीसदी वोट मिले। इसी तरह सपा भी वहां एक उभरती ताकत के रूप में है। 2003 के चुनाव में सपा को सात सीटें और लगभग चार फीसदी वोट मिले थे, जबकि 2008 के चुनाव में सपा की सीटें कम होकर एक पर आ गर्इं और वोट बैंक तीन फीसदी रह गया। इस बार के चुनाव में सपा और बसपा की राजनीति कुछ और ही होगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। बसपा की नजरें इस बार के चुनाव में दलितों के लिए आरक्षित उन 35 सीटों पर टिकी हैं, जो अब तक कांग्रेस और भाजपा के बीच बंटती रही हैं। इसी तरह सपा भी पिछड़ी जाति की राजनीति को उभार कर कई दलों के साथ एक अलग राजनीति कर रही है। संभावना है कि इस बार के चुनाव में बसपा और सपा की सीटें बढेÞंगी।
  2008 के चुनाव में उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी अलग से चुनाव लड़ रही थी। इस चुनाव में उमा भारती की पार्टी को करीब पांच फीसदी वोट के साथ पांच सीटें मिली थी और दूसरे नंबर पर सात व तीसरे नंबर पर 28 उम्मीदवार आकर अटक गए थे। प्रदेश में बसपा का भी अपना जनाधार है। बसपा लगाता अपने जनधार को बढ़ा भी रही है। 2008 के चुनाव में बसपा को हालांकि सीटें तो सात ही मिली थी, लेकिन उसका वोट प्रतिशत लगभग 10 फीसदी थीं। 19 सीटों पर बसपा दूसरे नंबर पर थी और 91 सीटों पर तीसरे नंबर पर। अब जरा 2003 और 2008 के वोट की राजनीति पर ध्यान दें, तो कई नई बातें सामने आती हैं। प्रदेश के 230 सदस्यीय विधानसभा में 35 सीटें अनुसूचित जाति और 48 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। प्रदेश के पांच भौगोलिक इलाके हैं, जिनमें चंबल इलाके के सात जिले की 34 सीटें हैं।
  विंध्य प्रदेश के 10 जिलों की 52 सीटें हैं। महाकौशल बेल्ट से 57 सीटें, मालवा आदिवासी इलाके से 28 सीटें और मालवा नॉर्थ से 59 सीटें आती हैं। 2003 के चुनाव में भाजपा को 173 सीटों के साथ 42 फीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस्ां को 38 सीटों के साथ 31 फीसदी वोट मिले थे। इसी तरह सपा को सात सीटों के साथ करीब चार फीसदी वोट मिले थे। बसपा को हालांकि सीटें तो दो ही मिली थीं, लेकिन उसे कुल वोट सात फीसदी मिले थे। बाकी की सात सीटें अन्य दलों को मिली थी। अब सवाल यह है कि राजनीति के इस खेल में कांग्रेस कहां जाएगी? कांग्रेस की संभावना क्या बनती है? मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया कहते हैं कि चुनाव के पहले तमाम तरह की राजनीति होती है। तमाम तरह के सर्वे होते हैं, लेकिन सर्वे के जरिये राजनीति नहीं होती। राजनीति धरातल पर होती है और सच्चाई यही है कि कांग्रेस पहले से बेहतर हालत में है और हम सरकार बनाने जा रहे हैं। शिवराज सरकार के पास कहने के लिए कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार की वजह से पूरा प्रदेश परेशान है। शासन सत्ता कहीं दिखाई नहीं देता। सच क्या है? इसकी जानकारी चुनाव के बाद ही मिल पाएगी। कांतिलाल भूरिया अभी पूरे जोश में हैं। मुख्यमंत्री के एक उम्मीदवार वे भी हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अगर कांग्रेस के नेताओं के बीच सचमुच एकता हो गई है, तो भाजपाा के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। पिछले दो चुनाव में कांग्रेस की हार पार्टी के भीतर की राजनीति और तमाम नेताओं के बीच गुटवाजी की वजह से हुई थी। कांग्रेस की हार की सबसे बड़ी वजह आदिवासी और दलित वोट कट जाना था। फिर सिंधिया की अलग राजनीति, अर्जुन सिंह परिवार की अलग राजनीति, सुरेश पचौरी,  दिग्विजय, कमलनाथ और सुभाष यादव की अपनी-अपनी राजनीति ने कांग्रेस को बेदम कर दिया था। ये सभी नेता अपने लोगों को टिकट देने और अपनी छवि और ताकत बनाने में ही लगे रहे और पार्टी रसातल में चली गई। लंबे समय के बाद राहुल गांधी की सक्रियता की वजह से प्रदेश के सभी नेता अभी एक छतरी के नीचे दिखाई पड़ रहे हैं। तय मानिए, अगर चुनाव तक ये नेता ईमानदारी से एक छतरी के नीचे खड़े रहे, तो कांग्रेस की राजनीति बेहतर होगी और सीटें भी बढेÞगी। 
          यह अलग बात है कि भ्रष्टाचार के तमाम तरह के खेल और लूट की तमाम कहानियों के बीच आज भी शिवराज सिंह की सरकार जनता के बीच में कांग्रेस से ज्यादा पॉपुलर दिख रही है। शिवराज सिंह की ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता है, लेकिन सरकार के लोगों की ईमानदारी की बात बेमानी ही है। जहां तक विकास की बात है, उस पर ज्यादा कुछ कहना ठीक नहीं। शिवराज के विकास के दावे उतने ही खोखले हैं, जितना नरेंद्र मोदी का सामान्य ज्ञान, लेकिन कांग्रेस के पास अब कोई सरकार विरोधी एजेंडा नहीं होने की वजह से भाजपा की राजनीति चल रही है। लेकिन कांग्रेस ने जो चाल चली है, संभव है उस चाल के सामने शिवराज बेदम हो जाएं। कांग्रेस ने सिंधिया के चेहरे को बेचने की राजनीति की है। साफ छवि के सिंधिया शिवराज को चुनौती देने की स्थिति में हैं। सिंधिया के साथ कमलनाथ को लगाया गया है। कमलनाथ की विशेषता चुनावी प्रबंधन में बेजोड़ है। बिना कोई जातीय वोट के कमलनाथ छिंदवाड़ा से चुनाव जीतते रहे हैं और हर बार संसद में पहुंचते रहे हैं। सिंधिया के साथ कमलनाथ पहली दफा पूरे प्रदेश की राजनीति करने निकले हैं। राजनीति में माहिर कमलनाथ पर कांग्रेस की आस टिकी है और कमलनाथ सिंधिया के चेहरे को कितना बेच पाते हैं, इस पर उनका प्रबंधन कौशल टिका हुआ है। कमलनाथ की आदिवासियों में बेहतर पकड़ है। कांग्रेस इस बार मुख्यत: आदिवासी वोटों को टारगेट कर रही है और आदिवासी कैसे टारगेट होंगे, इसकी पूरी थ्योरी कमलनाथ बना चुके हैं। कमलनाथ मालवा और महाकौशल में कांग्रेस को भारी जीत दिलाने में लगे हुए हैं। मालवा इलाके में कांतिलाल भूरिया की राजनीति भी चलती है और आदिवासियों के बीच भूरिया खासे चर्चित भी हैं। आगामी चुनाव में कांग्रेस की रणनीति भाजपा को सत्ता से बेदखल करना है। लेकिन यह तभी संभव हो सकता है, जब कांग्रेस के तमाम नेता एकजुट होकर चुनाव लड़ें। देखना होगा कि सिंधिया के रथ के सारथी बने कमलनाथ कांग्रेस को किस मुकाम पर ले जाते हैं।
  मध्य प्रदेश में चुनावी तापमान अपने पूरे शबाब पर है। सत्ताधारी भाजपा फिर सत्ता में लौटने के लिए कुलांचे मार रही है और तमाम तरह के तिकड़म का सहारा लेते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर वार करते हुए कांग्रेस का पसीना छुड़ा रही है। चुनाव प्रदेश में, लेकिन मुद्दा राष्ट्रीय  है।
  
  

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