Wednesday, November 13, 2013

गुस्से में देश

लोग बौखलाए हुए हैं। जनता का मिजाज तल्ख है। बेदम और भ्रष्ट राजनीति, लोगों के तल्ख तेवर के सामने गिड़गिड़ा रही है। पांच साल तक देश के असली राजा जनता को बेवकूफ और बेकार मानने वाले नेता, मंत्री और विधायक से लेकर केंद्र की राजनीति करने का स्वांग रचने वाले सफेदपोश आज उसी जनता के सामने शरणागत हंै। सत्ता पक्ष की अपनी बाजीगरी है और विपक्ष की अपनी घेरेबंदी। लेकिन असली सवाल वहीं है कि आखिर इतना सब होने के बावजूद देश गुस्से में क्यों है? क्या जनता के सवालों का जवाब है राजनेताओं के पास? जनता का मूड तो यह जता रहा है कि खाली करो तख्त-ओ-ताज!


राजनीति में हो रहे बदलाव और जनता के बदलते मिजाज को देखा जाए, तो कहा जा सकता है कि जिन चारों हिंदी प्रदेशों में चुनाव हो रहे हैं, वहां सत्ता विरोधी लहरें चल रही हैं। जनता के बीच एक ऐसी अंडरकरंट बह रही है, जो मौजूदा सरकार को हटाने के लिए काफी है। अगर इस सत्ता विरोधी लहर को साफ शब्दों में कहा जाए, तो इतना कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को कांग्रेस और अन्य छोटे दलों से भारी चुनौती मिल रही है और इस बात की संभावना दिख रही है कि दोनों राज्यों में भाजपा को आपनी इज्जत बचाने में भी परेशानी होगी। भाजपा इन दोनों राज्यों में सत्ता से बेदखल हो सकती है और कांग्रेस कुछ अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है। राजस्थान में गहलोत सरकार के खिलाफ अब अंडरकरंट शुरू हो गया है और जनता का मिजाज भले ही भाजपा के पक्ष में न हो, लेकिन कांग्रेस की सरकार को हटाने की तरफ है। दिल्ली में त्रिशंकु विधानसभा की पूरी संभावना दिख रही है। कहा जा सकता है कि पिछले चुनाव की तुलना में इस बार कांग्रेस को उतनी सीटें नहीं आएंगी, जितनी सरकार बनाने के लिए चाहिए। भाजपा की हालत भी काफी पतली है और नई पार्टी ‘आप’, चाहे जो भी दर्जन भर के आसपास सीटें लाए , कांग्रेस और भाजपा की अगली राजनीति को रोकने के लिए काफी है।  साफ है कि चारों राज्यों में सत्ता विरोधी लहर है और अगर यह लहर चुनाव तक बनी रही, तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
चुनाव की दुदुंभी बज चुकी है। चुनावी बिसात पर कई जगह चालें चली जा चुकी हैं, तो कई जगहों पर इसकी पुरजोर तैयारी हो रही है। एक-दूसरे को मात देने के लिए पार्टियां और उनके गिरोह तैयार हैं। बाजार सज गया है। चुनाव आयोग के डंडे तिकड़मबाजों के सामने निस्तेज है। चालाक शहरी लोग नेताओं की ब्रांडिंग में जुटे हैं और देश के उन बहुसंख्यक मतदाओं का मूड अपने नेताओं को बता रहे हैं, जो कभी चुनाव से पहले कुछ बोलते ही नहीं। इधर कई चुनावी सर्वे आए हैं। कुछ असली, तो कुछ नकली। लेकिन असली सर्वे का दम भरने वाली एजेंसियां भी देश के असली मतदाता यानी ग्रामीणों का मूड नहीं भांप पाई हंै। यह दुरूह काम है और फिर बेहद खर्चीला भी। लेकिन कोई हारे या जीते, इससे बाजार को क्या मतलब? सर्वे का काम भी एक बाजार है। बिना लाभ का सर्वे क्यों? और जब लाभ की बात हो, तो फिर सच से मतलब क्या? क्या कोई भी पंडित जजमान से फीस लेकर उसकी ग्रह राशि को नहीं बदल देता? शनि की साढेÞसाती नहीं उतार देता? साढेÞ साती उतरे या न उतरे, जजमान को यकीन दिला दिया जाता है कि अब उनके संकट दूर हो गए। लेकिन आज के जजमान रूपी नेता भी कम चालाक नहीं हैं। सब जानते हंै। देश गुस्से में है। लोग बौखलाए हुए हैं। जनता का मिजाज तल्ख है। बेदम और भ्रष्ट राजनीति, लोगों के तल्ख तेवर के सामने गिड़गिड़ा रही है। पांच साल तक देश के असली राजा जनता को बेवकूफ और बेकार मानने वाले नेता, मंत्री और विधायक से लेकर केंद्र की राजनीति करने का स्वांग रचने वाले सफेदपोश आज उसी जनता के सामने शरणागत हैं। कई घटनाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि डर और दबाव की राजनीति तो अब लगभग खत्म हो गई है, लेकिन लोभ, लालच और भेद के बल पर एक बार फिर सब कुछ पाने की होड़ राजनीतिक खेमे में मची हुई है। सत्ता पक्ष की अपनी बाजीगरी है और विपक्ष की अपनी घेरेबंदी। लेकिन असली सवाल वहीं है कि आखिर इतना सब होने के बावजूद देश गुस्से में क्यों है? सीधा-सा जवाब है कि किसी भी सरकार ने जनता की हिफाजत नहीं की है और जनता के पैसों को लूट कर जनता को कंगाल किया है। भ्रष्टाचार और महंगाई को जनता इसी रूप में देख रही है।
कुछ पल के लिए ठहरिए... पहले थोड़ी जानकारी हिंदी पट्टी के चार राज्यों के चुनावी मिजाज के बारे में। हम आपको चारों प्रदेश के उन मुख्यमंत्रियों से भी मिलाते हैं, जो सत्ता में फिर वापसी करने के लिए पैंतरेबाजी तो कर रहे हंै, लेकिन उन चालों को को जनता जनार्दन मानने को तैयार नहीं है। जनता उन पर यकीन करने को तैयार नहीं है। आप कह सकते हैं कि चारों राज्यों की राजनीति में सत्ता विरोधी लहर कुंलाचें मार रही है। सरकार विरोधी अंतरधारा बह रही है। इस अंतरधारा में कौन बचेगा और कौन बहेगा, किसी को कुछ नहीं मालूम।
सबसे पहले मध्य प्रदेश। वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का हिसाब-कितबा देखें।  मध्य प्रदेश की राजनीति में शिव ‘भैया’ और ‘मामा’ के नाम से चर्चित मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उम्मीद है कि उन्होंने जो काम किए हंै और उनकी जो छवि है, उसके दम पर फिर सत्ता में लौट आएंगे। जनता के बीच रहने वाले शिवराज पर अब तक सांप्रदायिक दाग नहीं लगे हैं। यह भी उनकी एक खास पहचान है। लेकिन यह भी सही है कि वे भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की राह के कांटे भी हैं। बहन उमा भारती के मन में भी उनके प्रति कचोट है। उमा की राजनीति को पिछले चुनाव में  शिवराज सिंह ने जिस तरह से साफ किया था और उमा के दंभ को चकनाचूर किया था, भला साध्वी कैसे भूल सकती हैं?  वह कहने के लिए भले ही भाजपा की राजनीति ही कर रही हंै और शिवराज को भैया कहती फिर रही हंै, लेकिन सच्चाई यही है कि उन्हें एक मौके का इंतजार है। शिवराज को मटियामेट करने के लिए। यकीन कीजिए शिवराज की असली दुश्मनी अभी विपक्ष से नहीं है। विपक्ष के साथ तो राजनीतिक लड़ाई जारी है, लेकिन अपनों के साथ जो भितरघात की राजनीति चल रही है, वह शिवराज के लिए सबसे ज्यादा घातक है।
यह बात और है कि भ्रष्टाचार के तमाम तरह के खेल और लूट की तमाम कहानियों के बीच आज भी शिवराज सिंह की सरकार जनता के बीच में पॉपुलर दिख रही है। लेकिन ऐसा है नहीं। शिवराज सरकार के विरोध में भीतर ही भीतर जनमानस तैयार है। मध्य प्रदेश के कई जिलों के जमीनी हालात जानने के बाद साफ हो जाता है कि जनता को अगर यह उम्मीद हो जाए कि कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में आ जाएगी, तो शिवराज सरकार का जाना तय माना जा सकता है। मध्य प्रदेश के गांवों में शिवराज शासन का भारी विरोध है। कई मंत्रियों की करतूतों से जनता त्रस्त है और कई विधायकों की राजनीति ने जनता को भाजपा से विमुख कर दिया है। सबसे चौंकाने वाली बातें तो ये हैं कि जिस आदिवासी वोट के जरिए शिवराज सिंह चौहान दो टर्म से प्रदेश में सरकार बनाते रहे हैं, वह आदिवासी आज की तारीख में कांग्रेस के साथ ज्यादा सहज महसूस कर रहे हैं। ग्रामीण जनता के मिजाज को देखते हुए कहा जा सकता है कि प्रदेश के आदिवासी और बड़ी संख्या में दलित कांग्रेस के पास चले गए हंै। इसका वजह भी है। केंद्र सरकार की भूमि अधिग्रहण कानून और खाद्यान कानून बनने के बाद दलितों और आदिवासियों के बीच कांग्रेस की स्थिति काफी मजबूत हुई है। प्रदेश में राजनीति के बदलते तेवर का आलम यह है कि जिस बुधनी विधानसभा से मुख्यमंत्री हमेशा चुनाव जीतते रहे हैं। इस बार उन्हें वहां भी संकट के बादल दिखाई पर रहे हैं। शिवराज सिंह इसी वजह से बुधनी के साथ ही विदिशा से भी चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा के प्रति लोगों में अविश्वास इस कदर बैठ गया है कि राज्य सरकार के 10 मंत्री चुनाव में हार का सामना कर सकते हैं। कांग्रेस ने जिस तरह से एक-एक सीट पर युवाओं को उतारा है, वह भाजपा के लिए भारी खतरा हैं।
शिवराज सिंह की ईमानदारी पर संभव है कि शक की सुई नहीं जा सकती है, लेकिन सरकार के लोगों की ईमानदारी की बात बेमानी ही है। जहां तक विकास की बात है, उस पर ज्यादा कुछ कहना ठीक नहीं। शिवराज के विकास के दावे उतने ही खोखले हैं, जितने नरेंद्र मोदी का सामान्य ज्ञान। लेकिन कांग्रेस के पास अब कोई सरकार विरोधी एजेंडा नहीं होने की वजह से भाजपा की राजनीति चल रही है। लेकिन कांग्रेस ने जो चाल चली है, संभव है उस चाल के सामने शिवराज बेदम हो जाएं। कांग्रेस ने सिंधिया के चेहरे को बेचने की राजनीति की है। साफ छवि के सिंधिया शिवराज को चुनौती देने की स्थिति में है। सिंधिया के साथ कमलनाथ को लगाया गया है। कमलनाथ की विशेषता चुनावी प्रबंधन में बेजोड़ है। बिना कोई जातीय वोट के कमल नाथ छिंदवाड़ा से चुनाव जीतते रहे हंै और हर बार संसद में पहुंचते रहे हैं। सिंधिया के साथ कमलनाथ पहली दफा पूरे प्रदेश की राजनीति करने निकले हैं। राजनीति के माहिर कमलनाथ पर कांग्रेस की आस टिकी है और कमलनाथ सिंधिया के चेहरे को कितना बेच पाते हैं। इस पर उनका प्रबंधन कौशल टिका हुआ है।  कमलनाथ की आदिवासियों में बेहतर पकड़ है। कांग्रेस इस बार  मुख्यत: आदिवासी वोटों को टारगेट कर रही है और आदिवासी कैसे टारगेट होंगे? इसकी पूरी थ्योरी कमलनाथ बना चुके हैं। कमलनाथ मालवा और महाकौशल में कांग्रेस को भारी जीत दिलाने में लगे हुए हैं। मालवा इलाके में कांतिलाल भूरिया की राजनीति भी चलती है और आदिवासियों के बीच वे खासे चर्चित भी हैं।
छत्तीसगढ़ में भी इस बार भाजपा के लिए चुनाव जीतना आसान नहीं है। साफ छवि के मुख्यमंत्री रमन सिंह की प्रतिष्ठा   दांव पर लग गई है। पूरे राज्य में सत्ता विरोधी लहर ने भाजपा की नींद उड़ा दी है। ग्रामीण मतदाताओं में रमन सरकार के प्रति गुस्सा का भाव व्याप्त है। आदिवासियों में इस बात की चर्चा हो रही है कि पिछले 10 साल में भाजपा की सरकार ने आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया। राज्य के जो गरीब लोग रमन सिंह की चावल की राजनीति में मौज मार रहे थे, वे भी अब कहने लगे हैं कि केवल भोजन देने से ही हमारा गुजारा नहीं चलता। राज्य के कई जिलों में भाजपा के 10 साल के शासन के बावजूद स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की भारी कमी है और अब लोग राज्य सरकार की नाकामी पर आवाज उठा रहे हंै। आप कह सकते हैं कि इस बार के चुनाव में भाजपा सरकार के विरोध में ‘अंडर करंट’ चल रहा है। इस सत्ता विरोधी लहर में कांग्रेस को क्या लाभ मिलेगा, इसकी कल्पना अभी नहीं की जा सकती लेकिन भाजपा को भारी नुकसान होने की संभावना बताई जा रही है।
रमन सिंह को इस बार एक और परेशानी से सामना करना पड़ रहा है। सरकार में फैले भ्रष्टाचार और नौकरशाहों की मनमानी की वजह से उनकी सरकार विपक्ष के निशाने पर तो है ही, पांच क्षेत्रीय दलों के साझे मंच ने बाबा की राजनीति पर मानो ब्रेक ही लगा दी है। आदिवासी इलाके से लेकर कई अन्य इलाकों में कुछ जातियों और समुदाओं के बीच राजनीति करने वाली छोटी-छोटी पार्टियों ने साझा मंच बनाकर भाजपा की राजनीति को रोक दिया है, ऐसा लग रहा है। हालांकि कांग्रेस के पास भ्रष्टाचार के मसले के अलावा अभी कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन कांग्रेस एकता और राज्य में हुए भ्रष्टाचार की वजह से भाजपा कमजोर दिख रही है। हालात यह है कि छत्तीसगढ़  में इस बार सरकार बदलने की पूरी संभावना दिख रही है। सत्ता विरोधी लहर को भाजपा कितना रोक पाती है, यही देखना होगा, वरना भाजपा शासित यह राज्य भी इस बार भाजपा के हाथ से निकल सकता है।
राजस्थान में भी ऊपर से भले ही सब कुछ ठीक ठाक दिख रहा हो, लेकिन भीतर ही भीतर गहलोत सरकार के विरोध में लोग लामबंद हो रहे हैं। जातीय खेल पर चल रही राजस्थान की राजनीति इस बार फिर सरकार बदलने के मूड में है। कांग्रेस की केंद्रीय नीति से राज्य के लोग भी नाराज हैं और महंगाई की मार ने गहलोत सरकार को पूरी तरह से लोगों के निशाने पर ला खड़ा किया है। पिछले दिनों राज्य के कई इलाकों में गहलोत सरकार के विरोध में दर्जन भर से ज्यादा रैलियां निकाली गर्इं, जो भले ही भाजपा की तरफ से प्रायोजित थीं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जनता की उम्मीदों पर सरकार खरी नहीं उतर पाई है। भाजपा नेता वसुंधरा राजे की राजनीति कितनी सफल होगी? गहलोत को सत्ता से बेदखल करने में इसकी सही तस्वीर तो भाजपा के लोग भी नहीं जानते, लेकिन सरकार की नीतियों और जातीय खेल की वजह से गहलोत सरकार के विरोध में जनता खड़ी दिख रही है। यह बात और है कि राजस्थान में हर चुनाव में सत्ता बदलने का इतिहास रहा है, लेकिन पिछले 2 साल से जिस तरह गहलोत सरकार की नीतियां जनता को रास आ रही थीं, अब अचानक उन नीतियों से जनता का मोह भंग हो चुका है। अगर यह मोह भंग चुनाव तक बना रहा, तो गहलोत सरकार की फिर वापसी मुश्किल हो सकती है। एक संभावना यह भी दिख रही है कि प्रदेश में भाजपा की  राजनीति के साथ ही बसपा, सपा और कई अन्य दलों की तरफ भी लोगों का झुकाव बढ़ रहा है। अगर यह झुकाव वोट बैंक में परिवर्तित हो गया, तो इस प्रदेश में भी एक नई राजनीति दिख सकती है। गहलोत की पूरी राजनीति इसी संभावना को रोकने की है।
दिल्ली की राजनीति किसके पक्ष में होगी? इस पर दावे के साथ कोई कुछ नहीं कह सकता। सभी दल अपनी-अपनी सरकारें बनाने का दावा तो कर रही हैं, लेकिन कोई यह बताने को राजी नहीं कि किसे कितनी सीटें मिलेंगी। लेकिन दिल्ली की जनता कशमकश की हालत में है। वह यह बताने की हालत में भी नहीं है कि दिल्ली में विकास नहीं हुए हैं और दिल्ली की एक बड़ी जमात नरेंद्र मोदी को छोड़ने की स्थिति में भी नहीं है। तय मानिए कि दिल्ली में भाजपा के पक्ष में जो भी वोट पड़ने की संभावना दिख रही है, उसके पीछे सिर्फ मोदी की राजनीति है। दिल्ली की एक बड़ी जमात मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के मूड में है, लेकिन नई पार्टी आप ने सबकी राजनीति को खंडित कर दिया है। प्रदेश की राजनीति में आज भी कांग्रेस की हालत ज्यादा मजबूत है, लेकिन केंद्र की नीतियों की वजह से शीला सरकार को सवालों के घेरे में रखा जा रहा है। अगर केंद्र में कांग्रेस नीत सरकार नहीं होती तो साफ था कि यहां फिर शीला दीक्षित की ही सरकार बनती, लेकिन अब ऐसा नहीं है। हालात यह हंै कि यहां पूरी तरह त्रिशंकु विधानसभा के आसार दिख रहे हैं। अगर ऐसा हुआ, तो किसी के लिए सरकार बनाना कठिन होगा, क्योंकि ‘आप’ पार्टी वाले कह चुके हैं कि वह किसी के साथ सरकार नहीं बनाएंगे। यही वजह है कि कांग्रेस और भाजपा की पूरी रणनीति यही है कि उसे सरकार बनाने लायक सीटें मिल जाएं, लेकिन कैसे मिलें, यह कौन कहेगा? साफ है कि चारों राज्यों में सत्ता परिवर्तन की आहट है।

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