Tuesday, November 26, 2013

राजनीति का कारोबार

 ‘बटमार’ पार्टियों के हसीन सपने

एक तरफ जहां देश में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए आम आदमी पार्टी का गठन किया गया, तो वहीं दूसरी ओर राजनीतिक पार्टी बनाने का धंधा भी जोरों पर है। इससे मतदाता भ्रमित हो रहे हैं कि कहीं जो पार्टियां भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बनी हैं, उनका मकसद भी यही तो नहीं है... 
अखिलेश अखिल
 लोकसभा चुनाव होने में अभी छह महीने से ज्यादा का वक्त है, लेकिन जो लोग चुनाव को एक व्यवसाय के रूप में देखते हैं, उन्होंने अभी से ही अपना खेल शुरू कर दिया है। आगामी लोकसभा चुनाव में हर तरह के लाभ कमाने के लिए चालाक और चतुर लोग अभी से ही अपना जाल फैलाने लगे हैं। लोकसभा चुनाव में जनता से मनमाफिक धन वसूला जाए और राजनीतिक दलों में वोट काटने का डर पैदा कर कुछ लेन-देन की राजनीति शुरू की जाए। इसी सिद्घांत को आगे बढ़ाते हुए चुनाव आयोग में नई राजनीतिक पार्टियों के पंजीकरण की होड़ लगी हुई है। अब से पहले इस तरह की होड़ कभी नहीं देखी गई थी। आलम यह है कि बाबाओं, बिल्डर्स से लेकर प्रॉपर्टी डीलर्स और सेवानिवृत्त नौकरशाह भी अपना-अपना दल खड़ा करने की होड़ में लगे हैं और दिन-रात चुनाव आयोग का दौरा करते फिर रहे हैं। चुनाव आयोग के पास पिछले दो महीनों में 142 राजनीतिक दल पंजीकृत हो चुके हैं। अगस्त-सितंबर में राजनीतिक दलों की संख्या 1392 थी, जो नवंबर मध्य तक बढ़कर 1534 हो चुकी है। माना जा रहा है कि आगामी दो महीने में दो दर्जन से ज्यादा और संगठन राजनीतिक पार्टी बनाएंगे। चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि इतने दलों के बनने के पीछे केवल राजनीतिक वजह नहीं है, बल्कि कारोबार भी है। एक दल बनाने के लिए केवल ग्यारह सदस्यों की जरूरत होती है, ऐसे में दल बनाना आसान हो जाता है। अगर इस पर रोक नहीं लगी, तो आने वाले समय में कई तरह की परेशानियां पैदा होंगी।

हाल ही में रेप मामलों में आरोपी आसाराम के बेटे नारायण साईं ने भी एक राजनीतिक दल ओजस्वी पार्टी बनाई है। एक पूर्व नौकरशाह दिल्ली में बसपा प्रमुख हैं और मुंबई में एक बिल्डर भारतीय लोक पार्टी के अध्यक्ष हैं। दिल्ली के बुराड़ी के प्रॉपर्टी डीलर महेश त्यागी का दावा है कि उनकी भारत विकास पार्टी(एस) के चार हजार सदस्य हैं। त्यागी का कहना है कि वह दस लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे। चुनाव आयोग को दिए गए विभिन्न दलों के अध्ययन के मुताबिक, कई दलों ने साल 2009 से 2012 के बीच राजनीतिक कार्यों पर कोई खर्चा ही नहीं किया। साल 2009 के आम चुनाव परिणामों के अनुसार, उस समय के 1250 में 1150 दलों को मात्र एक प्रतिशत वोट ही मिले।
           ऐसे में कहा जा रहा है कि घास की तरह उग रही राजनीतिक पार्टियां किसी बटमार से कम नहीं हैं। इसकी बटमारी पर हम चर्चा करेंगे, लेकिन इससे पहले उदाहरण स्वरूप आपके सामने पेश है, पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव में उतरी कुछ पार्टियों की हकीकत। दिल्ली विधानसभा 2008 के चुनाव में 69 राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया था। इसके अलावा निर्दलीय उम्मीदवार अलग से। इस चुनाव मैदान में कुल 875 उम्मीदवार थे, जिनमें 359 उम्मीदवार निर्दलीय थे और बाकी के 69 दलों के 506 उम्मीदवार। 2008 के चुनाव में कांग्रेस के 70 उम्मीदवार थे और कांग्रेस को कुल 43 सीटों के साथ 24, 89, 816 वोट मिले थे। इसी तरह भाजपा ने 69 सीटों पर उम्मीदवार उतारा और 23 सीटों के साथ 22, 44, 629 वोट पाए। बसपा भी 70 सीटों पर चुनाव लड़ी और 8,67, 672 वोट पा सकी। बाकी के जितने दलों ने चुनाव में हिस्सा लिया, अपनी जमानत राशि भी नहीं बचा पाए। इस चुनाव में अखंड भारत समाज पार्टी की तरफ से तीन उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। तीनों को मिलाकर 1610 वोट मिले। अखिल भारतीय हिंदू महासभा के 11 उम्मीदवार मैदान में आए और कुल 2914 वोट पा सके। आॅल इंडिया माइनॉरिटी फ्रंट ने छह उम्मीदवार उतारे कुल 955 वोट मिले। हिंदू रक्षा सेना की ओर से एक उम्मीदवार उतरे, 98 वोट पर संतोष कर लिए। जदयू के 11 उम्मीदवार मैदान में उतरे और कुल 3047 वोट पाकर बाहर हो गए। इसी तरह अंबेडकर समाज पार्टी को 989, आॅल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक को 449, इींतंज पुनर्निर्माण दल को 342, भारतीय जनशक्ति पार्टी को 1423, इंडियन डेमोक्रेटिक पार्टी को 816, लोकदल को 229, लोक परित्रान को 77, नेशनल जन क्रांति दल को 469, दंल कंनत चंतजल व 156, राष्ट्रीय हित कांग्रेस को 73, राष्ट्रवादी जनता पार्टी को 521 और वंचित जमात पार्टी को 488 वोट मिले। इसके अलावा इस चुनाव में जितनी भी पार्टियों ने हिस्सा लिया किसी भी पार्टी के उम्मीदवार 1000 वोट से ज्यादा नहीं ले सके। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि चुनाव आयोग को इस पर भी नजर रखने की जरूरत है। अब समय आ गया है कि इस तरह के कानून भी बनने चाहिए, जिससे ऐसे दलों पर पाबंदी लगे, जो एक खास सीमा तक वोट नहीं ला पाते। अगर ऐसा हो जाए, तो यह भी एक चुनाव सुधार की राह में महत्वपूर्ण काम होगा।
          पिछले 2008 के चुनाव की तुलना में इस बार 2013 के विधानसभा चुनाव में भी दिल्ली की 70 सीटों के लिए 810 उम्मीदवार चुनाव मैदान में जनता को पटाने की जुगत में लगे हैं। इन 810 उम्मीदवारों में कांग्रेस के 70, भाजपा के 68, आप के 70, बसपा के 68, एनसीपी के 09, सीपीआई के 10, सीपीएम के 03 और अन्य खुदरा पार्टियों के   277 उम्मीदवार चुनावी मैदान को अपने-अपने तरीके से नाप रहे हैं। राजनीतिक दलों के इतने उम्मीदवार के अलावा 235 निर्दलीय उम्मीदवार भी हैं। याद रखिए, इनमें से अधिकतर राजनीतिक पार्टियां आगामी लोकसभा चुनाव में भी उतरेंगी और जनता के सामने तरह-तरह के सपने भी दिखाएंगी, भले ही वोट के नाम पर उन्हें अपने परिवार के भी वोट क्यों न मिले?
           चुनाव आयोग के विश्लेषण के मुताबिक, 200 नई राजनीतिक पार्टियों में से केवल 16 प्रतिशत ही राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हैं। कई अन्य का उद्देश्य स्टॉक एक्सचेंज, रियल स्टेट में निवेश के लिए पैसा बनाना या काले धन को सफेद करना है। राजीतिक दल की आड़ में कुछ दलों को गुप्त स्रोतों से डोनेशन भी मिलने की खबरें हंै। कहा जा रहा है कि गाजियाबाद की इंडियन यूथ पार्टी को अरुणाचल प्रदेश की एक कंपनी से साल 2012 में 15 लाख रुपये डोनेशन मिला है। राष्टÑीय विकास पार्टी को एक कंपनी से दो महीनों के अंदर 1़25 करोड़ रुपये डोनेशन मिले हैं। एक अन्य पार्टी को डोनेशन के तौर पर सोने और हीरे के जेवर मिले हैं। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का कहना है कि आयोग के पास प्रमाण हैं कि कुछ दलों को मिला डोनेशन शेयर बाजार में निवेश, प्रॉपर्टी या जेवर खरीदने में इस्तेमाल किया गया है। कुरैशी कहते हैं कि आयोग ने सरकार को सलाह दी थी कि इन दलों को मनी लॉन्डरिंग कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए, लेकिन अभी इस पर कोई अमल नहीं हुआ है।

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