Tuesday, November 26, 2013

काया की माया

नैतिकता के हमाम में सभी नंगे

आखिरकार समाज को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले मीडिया का भी सच सामने आ ही गया और इसका जरिया बने तरुण तेजपाल। वह तरुण तेजपाल जिसने राजनीतिक जगत से लेकर क्रिकेट जगत तक के माफियाओं के नींद उड़ा दी थी। खोजी पत्रकारिता को नया आयाम देने वाले तेजपाल की हरकतों से मीडिया सवालों के घेरे में आ गया है। मगर क्या यह सिर्फ मीडिया की ही हकीकत है? क्या न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका इससे अछूते हैं? अगर अछूते हैं, तो फिर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पर आरोप क्यों लगे? आखिर अमित शाह के ‘साहेब’ क्यों भागते फिर रहे हैं? और नारायण दत्त तिवारी तो 87 की उम्र में भी इसी ताक में रहते हैं। आखिर हमारा समाज कहां जा रहा है? कहीं काया की माया में सिमटता तो नहीं जा रहा है? जानने के लिए पढ़िए, अखिलेश अखिल 
की खास रिपोर्ट...
‘क्या आप लोग उस पत्रकार से भी ज्यादा पीड़ित हैं? या क्या आप पीड़ित पक्ष हैं?  पीड़ित पत्रकार ने माफी के लिए कहा था। वह मांग ली गई है। संपादक ने इस्तीफा दे दिया है। क्या यह पर्याप्त कार्रवाई नहीं है? इससे ज्यादा और क्या चाहिए? यह हमारा अंदरूनी मामला है।’
सोमा चौधरी, प्रबंध संपादक तहलका
  यह तरुण तेजपाल के कुकर्मों के बचाव में उतरीं सोमा चौधरी का बयान। यह बात और है कि सोमा के इस बयान के बाद देश के लोग उन पर थूकने से बाज नहीं आए और गोवा पुलिस ने तहलका के आंतरिक मसले को खारिज करते हुए तेजपाल पर प्राथमिकी दर्ज कर दी। जाहिर है, तेजपाल अब जेल के सलाखों के पीछे जाएंगे, लेकिन असली सवाल यही है कि पत्रकारिता और समाज में नैतिकता का चीरहरण करने वाले अकेले तेजपाल ही हैं? हम तरुण तेजपाल की कुकर्मों की गाथा आपके सामने लाएंगे और इसी बहाने ले चलेंगे देश के अन्य सामाजिक, राजनीतिक मैदान में। जहां आपको पता चलेगा कि सत्ता और पॉवर के दम पर हमारे बीच के लोग किस तरह का नंगा नाच करते हैं? संबंधों की धज्जियां उड़ाने के साथ-साथ ही पवित्र पेशे पर किस तरह कलंक का टीका लगाते हैं? लेकिन सबसे पहले तेजपाल की तरफदारी में उतरी उस तहलका की प्रबंध संपादक सोमा चौधरी की पत्रकारिता और नैतिकता पर एक नजर।
       दो बच्चों की मां सोमा चौधरी की गिनती देश के बेहतरीन पत्रकारों में होती  है। इंडिया टुडे, पायोनियर, आउटलुक और फिर तहलका में सोमा चौधरी अपनी खास रपटों और नक्सलवाद से लेकर महिलावाद से जुड़े मसलों पर लिखे आलेख की वजह से सुर्खियां बटोरती रही हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि की पत्रकारिता और आम लोगों में महिलाओं की दशा पर इनकी खबरें पत्रकारिता की थाती से कम नहीं हैं। यही वजह है कि इतनी कम उम्र में सोमा को रामनाथ गोयनका अवार्ड और चमेली देवी जैसे पुरस्कार मिले। टीवी चैनलों से लेकर सेमिनारों में महिलाओं की तरफदारी करने वाली सोमा चौधरी की एक खास पहचान यह भी है कि वे तरुण तेजपाल की खास मित्रों में शरीक रही हैं। आउटलुक से हटने के बाद तरुण और सोमा की खास भूमिका तहलका के निर्माण में रही है। जाहिर है कि सोमा तेजपाल की तमाम हरकतों को पहले से जानती होंगी। यह बात इसलिए कही जा रही है कि एक मित्र ही अपने मित्र के बारे में बेहतर जानकारी रखता है। जाहिर है कि तेजपाल की नैतिकता और अनैतिकता की पूरी कहानी सोमा से ज्यादा शायद ही कोई जानता होगा। सोमा ने पीड़ित महिला पत्रकार के बारे में मीडिया को जो बयान दिए हैं, उससे लगता है कि या तो वह तेजपाल के दबाव में हैं या फिर उनकी महिलावाद से जुड़ी पत्रकारिता ठीक उसी तरह से खोखली और दोहरे चरित्र वाली है, जिस तरह तेजपाल के नकली चरित्र को देखकर मीडिया के लोग हतप्रभ हैं। क्या सोमा यह बात स्वीकार कर सकती हैं कि जिस तरह से उसने पीड़ित महिला पत्रकार को खुश करने और तेजपाल को दंडित करने की बात कही है? क्या इसी तरह की बात वह अपने ऊपर हुए यौन शोषण के बारे में कह सकती थी? अगर इसी तरह की घटना उसके साथ हो जाती, तो क्या वह चुप रह पाती? क्या इसी तरह की घटना उसके किसी परिजन के साथ घट जाती, तो क्या वह घटना को अंजाम देने वालों के खिलाफ मौन रहती? एक तो महिलावादी और दूसरे वाम विचारधारा की पोषक होने का दम भरने वाली सोमा चौधरी यह बता सकती हैं कि जिस तहलका में वह प्रबंध संपादक की नौकरी कर रही हैं और जिसके मालिक तरुण तेजपाल खुद हैं, उसके विरोध में जाने का साहस कर सकती हैं? क्या वह इस मसले पर अपनी नौकरी छोड़ने को तैयार हैं? यह सवाल इसलिए किया जा रहा है कि प्रबंध संपादक होने और उसी के पास शिकायत होने के नाते क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि वह सबसे पहले तेजपाल के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज कराती और उसे सजा दिलाने की बात करती?  संभव है कि सोमा की असली पत्रकारिता यही होती और यही उसके लिए पत्रकारिता का सबसे बड़ा पुरस्कार भी होता। दिल्ली में हुए यौनाचार के कई मसलों पर खूब चिल्लाने वाली सोमा अपने ही संस्थान के भीतर की पीड़ित लड़की और अपने ही संस्थान के दुराचारी बॉस पर चुप क्यों हंै? इसका सही जवाब तो वही दे सकती हैं, लेकिन यह तो कहा जा सकता है कि इस हमाम में सभी नंगे हैं।
          अब जरा इस तहलका मचाने का दम भरने वाले तहलका   के संपादक तरुण तेजपाल को देखिए। यह वही तेजपाल हैं, जिसने भाजपा नेता बंगारू लक्ष्मण, समाजवादी नेता और तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिज, भाजपा-संघ परिवार और नरेंद्र मोदी को लेकर इतनी तरह के ऐसे-ऐसे तहलके किए हैं कि भाजपा के लोग इन्हें अपना दुश्मन मानते हैं। इन्हीं लोगों के खुलासे के बाद तरुण तेजपाल सत्ता की गलियारों से लेकर मीडिया के संसार में अपना लोहा मनवाते रहे हैं, लेकिन समय को भला कौन रोक सकता है? यही कारण है कि तेजपाल पर सभी पार्टियों के नेता बरस रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली सख्त
कार्रवाई की मांग करते हुए कहते हैं कि अगर तेजपाल बच गए, तो समाज में नकारात्मक संदेश जाएगा। जदयू के प्रवक्ता केसी त्यागी का मानना है कि जजों के पैनल से इसकी जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। कांग्रेस की प्रिया दत्त कहती हैं कि दफ्तरों में यौन शोषण पर रोक बहुत जरूरी है। किसी भी आदमी की असलियत भला कितने दिनों तक छुपी रह सकती है? कभी कल्पना नहीं की जा सकती थी कि तरुण तेजपाल खुद ऐसा कोई काम कर बैठेंगे, जो उनके तमाम भांडाफोड़ों से अधिक शर्मनाक और घृणित होगा। बेटी की उम्र जैसी एक युवा पत्रकार के साथ उन्होंने गोवा के एक होटल के लिफ्ट में जो कुकर्म किया, उसका पूरा ब्योरा पुलिस जांच से मालूम होगा, लेकिन इस दुराचार कांड ने तेजपाल की कलई खोल कर रख दी है। पत्रकारिता जैसा पेशा बदनाम हुआ है और कलंकित हुई है नैतिकता। तेजपाल ने जिस लड़की के साथ कुकर्म किया है, वह लड़की उनके मित्र की बेटी है। बाप ने अपनी बेटी को तेजपाल के हवाले करते हुए कहा था कि उसकी बेटी को पत्रकारिता की अच्छी तालीम देकर उसे आगे बढ़ाओ, लेकिन इस दुराचार ने दोस्ती की भी परवाह नहीं की। दोस्त की बेटी को अपनी बेटी नहीं माना। उसे भी देह ही समझा। इस घटना के बाद भला कोई दोस्त अपनी बेटी को अब किसी के हवाले कर सकता है? समाज में सबसे प्रिय दोस्त होता है, लेकिन इस भ्रष्ट आदमी ने उस दोस्ती की गरिमा को तार-तार कर दिया। दोस्त की बेटी अगर अपनी बेटी होती है, तो कहा जा सकता है कि उसने जो किया, अपनी बेटी के साथ ही किया है, लेकिन इस दरिंदे और बहुरूपिये ने रिश्ते को भी कलंकित कर दिया है। जिस तेजपाल ने अपने मित्र की पत्रकार बेटी के साथ कुकर्म किया है, वह लड़की तेजपाल की बेटी की भी मित्र है। दोनों की मित्रता सालों से है। दोनों अपने सुख-दुख की साथी रही हैं, लेकिन तेजपाल अपनी बेटी की मित्र को भी हवस का शिकार बनाने से नहीं चूके। तेजपाल के घर में पीड़िता जब भी जाती थी, तो वह तेजपाल को चाचा ही कहती थी, लेकिन तेजपाल ने उसे हवस का शिकार बनाते समय कहा था कि मैं जो भी तुम्हारे साथ कर रहा हूं, वह तुम्हारे करियर के लिए बेहतर होगा।
      फिलहाल मोटा तथ्य यह है कि तेजपाल ने खुद अपनी गलती मानी है। युवा पत्रकार लड़की ने शिकायत की, तभी वे माफी मांगने को मजबूर हुए। तेजपाल ने अपने आपको छह महीने के लिए संपादकीय के काम से अलग किया है, लेकिन इससे महिला पत्रकार संतुष्ट नहीं है। क्योंकि अब यह मामला तहलका का अंदरूनी नहीं रहा है। भाजपा ने तरुण तेजपाल की गिरप्तारी की मांग की है, तो उधर गोवा के भाजपा मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने पुलिस को जांच के आदेश दे दिए हैं। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज मांगते हुए तेजपाल को तलब करने की बात कही है। दिल्ली में भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने उन तमाम संगठनों के सांप सूंघ जाने और उनके दोहरे रुख पर सवाल उठाया है, जो ऐसे मामलों में तिल का ताड़ बना देते हैं। संदेह नहीं है कि गोवा की भाजपा सरकार तरुण तेजपाल को नहीं छोड़ेगी। जब यौन उत्पीड़न पर आसाराम इतने लंबे नपे हैं, तो तरुण तेजपाल का निपटना असंभव नहीं है। इस बात के गहरे राजनीतिक मायने हैं। संदेह नहीं है कि तरुण तेजपाल ने जो किया है, वह उनकी जमापूंजी और उनकी साख को भारी बट्टा है और इस पर आगे जो होगा, उसके कई सियासी रंग होंगे।
 मामला अब यहीं तक नहीं है। समाज को सुधारने का दम भरने वाले इस देश में कई ऐसे बाबा, पत्रकार, नेता, डॉक्टर, समाज सुधारक, पुलिस अधिकारी और न्याय के देवता कहलाने वाले जज हैं, जिन्होंने अपने दोहरे चरित्र से समाज की तमाम नैतिकता को तार-तार कर दिया है। इन्हें देखकर तो कम से कम यह कहा जा सकता है कि 70 और 80 के दशक के वे डकैत बेहतर थे, जो बेटी बहू की इज्जत के लिए अपने गिरोह के ही लोगों का सर कलम कर देते थे। अभी हाल में ही सुप्रीम कोर्ट के दो रिटायर्ड जजों पर भी अपने मातहत काम करने वाली महिलाओं के साथ यौन शोषण करने के आरोप लगे हैं। ये दोनों महाशय देश के एक चर्चित टूजी घोटाला स्कैम की जांच से जुड़े रहे हैं। पत्रकारिता में काम करने वाले दर्जनों ऐसे लोग हैं, जो मौका का फायदा उठाकर यौनाचार में डूबकी लगाते रहे हैं। दर्जनों ऐसे लोग हैं, जिन पर यौनाचार के मामले भी दर्ज हैं। दर्जनों ऐसे यादव, दुबे, शर्मा, मेहता, दीक्षित, सिन्हा, श्रीवास्तव, सिंह, कुमार, द्विवेदी, त्रिवेदी से लेकर बंसल और नामधारी पत्रकार और संपादक हैं, जो एक मिनट भी महिला के बगैर रह नहीं सकते और महिलाओं का शोषण अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं। दर्जनों ऐसे पत्रकार, साहित्यकार हैं, जिनकी लेखनी ही महिला   के साथ ही शुरू होती है और महिलाओं पर जाकर खत्म होती है। अखबारों और चैनलों में काम करने वाले ऐसे दर्जनों  पत्रकार आपको मिल सकते हैं, जिनको महिला पटाने में महारत हासिल है और नौकरी के नाम महिलाओं का शोषण करना जिनका शगल है। कई ऐसे पत्रकार संपादक हैं, जो अपने विराधियों को मात देने के लिए अपने महिला मित्र का साथ लेते हैं और मालिक तक को खुश रखते हैं। कह सकते हैं कि जिसके ऊपर नैतिकता का सबसे बड़ा बोझ है, वही सबसे ज्यादा अनैतिक और दुराचारी हैं।   उस नरेंद्र मोदी को आप क्या कहेंगे? प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का बोझ लिए देश भर में अपने को नैतिक और बाकी दुनिया को अनैतिक मानने वाले मोदी की उस कहानी को क्या कहा जाए? जो साहेब के नाम से अपने ही प्रदेश में एक महिला के पीछे घूमते रहे और पोल खुल जाने का जब भय हुआ, तो उसकी जासूसी करवाने लगे। यह बात और है कि राजनीति में यौनाचार कभी अछूत नहीं माना गया। नेहरू काल से लेकर लोहिया काल और फिर आज की राजनीति में अवैध संबंधों की जितनी कहानियां पड़ी हुई है, वह हमें शर्मसार ही करती हैं। एनडी तिवारी की कहानी को आप क्या कहेंगे? उस अभिषेक मनु सिंघवी के प्रकरण को आप किस रूप में देखेंगे? उस तरुण विजय और शेहला मसूद की कहानी को आप कैसे सामने रखेंगे? मध्य प्रदेश के राघव जी, राजस्थान के बाबूलाल नागर, महिपाल सिंह मदेरणा, मलखान सिंह और हरियाणा के गोपाल कांडा प्रकरण से आप क्या सीखेंगे? क्या इन लोगों को आप अपने घर में अतिथि बना सकते हैं? जब अतिथि नहीं बना सकते, तो क्या इनकी राजनीति में यकीन कर सकते हैं? यह सब काया की माया ही तो है। काया की लेन-देन में बड़ी ताकत है। पता करके देख लीजिए समाज के तमाम क्षेत्रों में जिन लोगों ने काया के साथ खेल किया, अपना भी बढेÞ और दूसरों को भी तार दिया। तरुण तेजपाल आज की हकीकत हो सकते हैं, लेकिन वे कोई पहले और अंतिम आदमी नहीं हैं। एक बात सच है कि सच को कोई छुपा नहीं सकता और कुकर्म को कोई दबा नहीं सकता। काया रस देती हैं, तो नास के गर्त में भी ले जाती है। आज पत्रकारिता के पतन के मूल में यही है।
महान पत्रकार और साहित्यकार कमलेश्वर ने 2007 में एक सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा था कि  ‘आज पत्रकारिता अपने सिद्घांतों और नैतिकता से हटती जा रही है। पत्रकारिता से भली तो वह वेश्या है, जो सदियों से अपने उसी सिद्घांत पर कायम है। पैसा दो और शरीर लो।’ कमलेश्वर के इस बयान की सच्चाई आज दिखाई पड़
रही है।
  पुरुष सत्ता को बदलने की जरूरत
महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीड़न की शिकायतें इधर कई ऐसे क्षेत्रों से भी आ रही हैं, जो हाल तक उनके लिए सुरक्षित समझे जाते थे। न्याय-व्यवस्था, मीडिया, राजनीति, सेना, धर्म, खेल, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े नामी-गिरामी पुरुषों की कारस्तानियों पर अचानक रोशनी पड़ने लगी है। सड़कों पर होने वाले यौन दुर्व्यवहार को लेकर देश की संवेदनशीलता पिछले एक वर्ष में काफी बढ़ी है, लेकिन जवाबदेह समझे जाने वाले बंद दायरों का हाल एक बाद एक घटनाओं के जरिये पहली बार सबके सामने आ रहा है। देश में बहुतेरी कामगार महिलाएं जब-तब शारीरिक, यौनिक और मानसिक यातना की शिकार होती रहती हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही खुद से जुड़े मामले को उजागर कर संबंधित पुरुष के लिए सजा की मांग करने की हिम्मत जुटा पाती हैं। अगर कोई पूछे कि आजादी के इतने वर्ष बाद भी आखिर ऐसा क्यों है, तो जवाब मिलेगा कि इस दिशा में कुछ ठोस दरअसल किया ही नहीं गया। कुछ गैर-सरकारी संगठन घरेलू स्तर पर होने वाले यौन उत्पीड़न के विरुद्ध सक्रिय जरूर हैं, लेकिन कार्यस्थलों और आॅफिसों के भीतर तक कारगर पहुंच बनाने की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती। महिलाओं को यौनिक प्रताड़ना देने वाले ज्यादातर पुरुष अब भी खुद को सत्ता का प्रतीक मानते हैं और स्त्री स्वर को दबाकर रखना चाहते हैं, जबकि उनकी शिकार बनने वाली महिलाएं अपनी मजबूरियों का खयाल करके उनकी बदतमीजी हद पार करने तक बर्दाश्त करती चली जाती हैं। जेंडर आधारित शोषण को सबसे ज्यादा बढ़ावा इसी से मिलता है। ये हालात बदल सकते हैं, बशर्ते हम हर कार्यस्थल पर अनिवार्य रूप से एक ऐसी व्यवस्था बनाएं, जिसमें कोई स्त्री छोटे-से-छोटे यौन दुर्व्यवहार की भी तत्काल शिकायत कर सके। सहज माहौल में पहली शिकायत करने की हिम्मत महिलाओं में पैदा हो, इसके लिए पूरी तैयारी की जरूरत है। सुनवाई बंद दायरे में और भरोसेमंद तरीके से हो और दंडात्मक कार्रवाई तुरंत की जाए। ऐसा हुआ, तो कई सारे मामले विस्फोटक सीमा तक पहुंचने से पहले ही हल हो जाएंगे और कुछ संभावित रेपिस्टों का इलाज मामूली चेतावनी भर से हो जाएगा। ऐसा न होने से दुर्व्यवहार करने वालों की हिम्मत बढ़ती जाती है और वे महिलाओं को अपनी संपत्ति की तरह देखने लगते हैं। दुर्भाग्यवश, एक बार मामला सार्वजनिक हो जाने के बाद जीत और हार, दोनों सूरतों में बदनामी महिलाओं के ही हिस्से आती है, इसलिए उनमें यौन उत्पीड़न के विरुद्ध हर स्तर पर आवाज उठाने की ताकत पैदा करना जरूरी है। समस्या का दूसरा पहलू यह है कि हमें पुरुष मानस को भी बदलना होगा। नैतिक मूल्यों का पुरातन पाठ दोहराने से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि सभी स्तरों पर सुनवाई और सजा की व्यवस्था बने और सख्ती से उसका पालन हो।

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