Wednesday, November 20, 2013

आडवाणी को नापने की तैयारी

नरेंद्र मोदी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि आम चुनाव का परिणाम चाहे कितना ही सुखद क्यों न हो, वे सिर्फ शिवसेना और अकाली दल को साथ लेकर केंद्र में सरकार का गठन नहीं कर सकते हैं। हर हाल में उन्हें सहयोगियों की तलाश करनी ही पड़ेगी। यही कारण है कि वे एनडीए के विस्तार में जुट गए हैं। जाहिर है, मोदी के इस काम के लिए अरुण जेटली से बेहतर चाणक्य कौन हो सकता है?

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और उसकी सरकार पर जोरदार हमला  बोलने वाले नरेंद्र मोदी अपनी भावी राजनीति को भी सहेज रहे हैं। वे भले ही चुनावी राज्यों में दहाड़ते नजर आते हों, लेकिन उनकी असली चिंता लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के साथ ही अपनी राह में आने वाले तमाम अवरोधों को भी समाप्त करने में की है। मोदी अब एक तीर से दो शिकार करने की जुगत में हैं। अपने सहयोगी अरुण जेटली को पार्टी अध्यक्ष बनाने में विफल रहे मोदी की रणनीति यह है कि जेटली को एनडीए का अध्यक्ष बना दिया जाए। इस खेल के पीछे की राजनीति यह है कि जेटली को एनडीए अध्यक्ष बनाकर लालकृष्ण आडवाणी को पैदल कर दिया जाए, ताकि वे भविष्य में मोदी की राह में बाधा न पैदा करें। इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने और भावी राजनीति को भांपते हुए पिछले 20 सितंबर को नरेंद्र मोदी के साथ पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी के बीच एक बैठक भी हो चुकी है। बैठक में मोदी ने राजनाथ सिंह को सुझाव दिया है कि समय और भविष्य की राजनीति को देखते हुए एनडीए अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी किसी युवा नेता को दी जाए। मोदी ने इसके लिए जेटली के नाम का प्रस्ताव भी राजनाथ सिंह के सामने रखा है। जाहिर है कि अरुण जेटली को भाजपा अध्यक्ष बनवाने में नाकाम रहे नरेंद्र मोदी अब जेटली को एनडीए का अध्यक्ष बनवाना चाहते हैं।
यही कारण है कि भाजपा में मोदी खेमे के लोग अब इस बात की राजनीति खेल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले तक मोदी की राह के सभी कांटों को साफ कर दिया जाए। भाजपा का मोदी समर्थक धड़ा अब कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। मोदी के राजनीतिक योजनाकारों की सोच है कि लोकसभा चुनाव के बाद अगर भाजपा सरकार बनाने के लायक सीटें नहीं ला पाती है, तो गठबंधन की नई राजनीति के तहत मोदी एक बार फिर निशाने पर आ सकते हैं और मोदी के बदले किसी और को भी प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल सकती है। भाजपा के भीतर हालांकि तीन चेहरे राजनाथ सिंह, आडवाणी और नितिन गडकरी ऐसे हैं, जो बाद में या तो प्रधानमंत्री पद को लेकर राजनीति कर सकते हैं या फिर बदली स्थिति में गठबंधन बनाने में इन तीनों भाजपा नेताओं में से जिसकी अहम भूमिका होगी, उसके नाम पर संघ भी अपनी सहमति दे सकता है। अगर ऐसा होता है, तो मोदी और उनके समर्थकों की सारी मेहनत बेकार जा सकती है। इसी सोच के तहत मोदी के रणनीतिकार मोदी की  राह के रोड़े को मिटाने में लगे हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि वे प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नहीं हैं और वे प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। उन्हें पार्टी की सेवा करनी है, लेकिन यह तो समय ही बताएगा कि राजनाथ सिंह क्या चाहते हैं? क्या संघ की ओर से या फिर एनडीए घटक दलों की ओर से उनके नाम का प्रस्ताव आता है, तो क्या राजनाथ सिंह पीछे हटेंगे? इस बारे में अभी समय का इंतजार करना होगा। मोदी भक्तों को सबसे ज्यादा परेशानी पार्टी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी से है।
     दरअसल, जिस तरह से आडवाणी को पिछले कुछ सालों से भाजपा की राजनीति से हटाने का खेल चल रहा है, उससे आडवाणी भी कम आहत नहीं हैं। एनडीए के नए और पुराने घटक दल भी इस बात को समझ रहे हैं कि जिस भाजपा को गढ़ने में आडवाणी की भूमिका सबसे ज्यादा रही, उसी आडवाणी की भाजपा उपेक्षा कर रही है। ऐसे में समय आने पर आडवाणी के पक्ष में कई घटक दल सामने आ सकते हैं। यही वजह है कि मोदी खेमे को लग रहा है कि आडवाणी चुनाव के बाद एक बार फिर मोदी को चुनौती दे सकते हैं और इसकी संभावना भी है। माना जा रहा है कि चुनाव के बाद मोदी के नाम पर बहुत-सी राजनीतिक पार्टियां भाजपा को समर्थन नहीं देंगी। संभावना जताई जा रही है कि आडवाणी के नाम पर कुछ पार्टियां एनडीए में आ सकती हैं। लेकिन उनकी अपनी शर्तें भी हो सकती हैं। शर्त यह भी हो सकती है कि अगर आडवाणी को भाजपा प्रधानमंत्री बनाए, तो सरकार को सहयोग मिलेगा। ऐसे में आडवाणी मोदी की राह में रोड़ा हो सकते हैं। यही वजह है कि मोदी के लोग अब आडवाणी को एनडीए अध्यक्ष पद से भी हटाने की रणनीति में लगे हैं। मोदी समर्थकों की सोच है कि आडवाणी को पहले एनडीए अध्यक्ष पद से हटा दिया जाए और उन्हें हमेशा के लिए भाजपा की राजनीति से अलग कर दिया जाए। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से पीएम इन वेटिंग का पद छीनने के बाद अब नरेंद्र मोदी उन्हें एनडीए अध्यक्ष पद से भी हटाने के लिए सक्रिय हो गए हैं। मोदी की चिंता भी कोई गलत नहीं है। नरेंद्र मोदी को लगता है कि अगर लालकृष्ण आडवाणी एनडीए अध्यक्ष पद की कुर्सी पर बैठे रहते हैं, तो भविष्य में वे उनके लिए कोई खतरा पैदा कर सकते हैं, इसलिए न सिर्फ आडवाणी को एनडीए से हटाने का प्रयास शुरू कर दिया है, बल्कि नया एनडीए बनाने के लिए एनडीए विस्तार समिति के गठन का प्रस्ताव भी किया है।
       भाजपा में मोदी के लिए काम कर रहे मोदी के एक वरिष्ठ रणनीतिकार मानते हैं कि नरेंद्र मोदी की पीएम उम्मीदवारी से क्षेत्रीय दलों का समर्थन नहीं मिलेगा, इस बात में कोई दम नहीं है। चुनाव के बाद सरकार में शामिल होना कई दलों की मजबूरी भी हो सकती है। हम लोग उन दलों की राजनीति को देख भी रहे हैं, लेकिन इस बात की आशंका है कि अगर आडवाणी एनडीए के अध्यक्ष बने रहे, तो वे जरूर मोदी के रास्ते में रोड़ा अटका सकते हैं।
       एनडीए को लेकर मोदी तीन एजेंडे पर काम कर रहे हैं। मोदी एनडीए विस्तार समिति बनाना चाहते हैं। इस समिति में मोदी के मन लायक वरिष्ठ और निर्वाचित नेता होंगे। इस समिति का काम एनडीए का कुनबा बढ़ाना होगा। यह समिति गैरकांग्रेसी दलों और एनडीए का हिस्सा रहे दलों से संपर्क करेगी। भाजपा छोड़कर गए नेताओं की भाजपा में वापसी और वापसी की स्थिति न बनने पर उनके साथ गठबंधन की कोशिश करेगी यह समिति। झारखंड में बाबूलाल मरांडी और कर्नाटक के येदियुरप्पा ऐसे लोगों में प्रमुख हैं। अभी तक आडवाणी के विरोध के कारण ही कर्नाटक में येदियुरप्पा भाजपा के करीब नहीं आ पाए हैं, जिसे देखते हुए नरेंद्र मोदी अब उन्हें एनडीए से ही हटाना चाहते हैं।
मोदी का दूसरा एजेंडा है तमाम क्षेत्रीय दलों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना। मोदी इस भ्रम को तोड़ना चाहते हैं कि वे राजनीतिक दलों के बीच नफरत के नेता हैं। एनडीए के विकल्प के जरिये वे क्षेत्रीय दलों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते हैं। मोदी का तीसरा एजेंडा है कि जिन राज्यों में भाजपा के लिए कोई खास संभावना नहीं है। वहां चुनाव पूर्व या फिर चुनाव के बाद क्षेत्रीय दलों से समझौता किया जाए। उत्तर भारत के क्षत्रपों का लगभग तय हो गया है कि उनकी राजनीतिक लाइन क्या रहेगी? अगले लोकसभा चुनाव में लगभग सभी क्षत्रप अकेले लड़ने की तैयारी में हैं। राष्टÑीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव जरूर कांग्रेस के साथ गठबंधन की उधेड़बुन में हैं, लेकिन मुलायम, मायावती, नीतीश आदि नेताओं ने अकेले लड़ने का इरादा साफ कर दिया है। इन्होंने तीसरा मोर्चा बनाने का भी इरादा लगभग जाहिर कर दिया है, लेकिन दक्षिण और पूर्वी भारत के क्षत्रपों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, ओडिशा के नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के उभरते क्षत्रप व वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगनमोहन रेड्डी ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। इन चार राज्यों में लोकसभा की 145 सीटें हैं और अंदाजा लगाया जा रहा है कि इन क्षत्रपों के हिस्से में एक सौ सीटें आ सकती हैं। इससे ज्यादा सीटें भी ये चार पार्टियां जीत सकती हैं, लेकिन इन चारों ने तय नहीं किया है कि वे अकेले लड़ेंगी या गठबंधन करेंगी।  अगर अकेले लड़ेंगी, तो चुनाव के बाद उनका क्या स्टैंड होगा? इन चार में से ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को छोड़ कर बाकी तीनों का स्टैंड ज्यादा उलझा हुआ है। पटनायक का स्टैंड तय है कि वे कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगे, लेकिन बाकी तीनों क्षत्रपों कांग्रेस और भाजपा में से किसी के भी साथ जा सकते हैं। जयललिता की नरेंद्र मोदी से दोस्ती है, लेकिन उन्होंने उनसे कोई वादा नहीं किया है। जगन मोहन ने भी कहा था कि नरेंद्र मोदी सेक्युलर मोर्चा बनाएं, तो वे उनके साथ जा सकते हैं, जबकि जगन की मां ने कहा कि वे चुनाव के बाद कांग्रेस का साथ देंगी। ममता बनर्जी कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ रह चुकी हैं। हालांकि वे संघीय मोर्चा बनाने की कोशिश में भी हैं, लेकिन अंतत: क्या होगा, यह अभी तय नहीं है। मोदी की राजनीति ऐसे ही दलों की राजनीति को साधने की है। मोदी के लोग अब अगली रणनीति के तहत चुनाव से पहले भी कुछ दलों के साथ बातचीत करने के मूड में हैं। माना जा रहा है कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद मोदी की एनडीए गठबंधन की राजनीति शुरू हो जाएगी, लेकिन असली खेल अब इस बात पर टिक गई है कि नया एनडीए कौन संचालित करेगा? ताकि मोदी की मैराथन में जीत हो सके।


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