Wednesday, November 13, 2013

मोदी के राज में दलित हिदुंओं का धर्मांतरण

रोटी और सम्मान की भूख किसे नहीं होती? गुजरात में रहने वाले अधिसंख्य दलित हिंदू भी सवर्णों की घृणा और भेदभाव से आजिज आकर धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। देश भर में घूम-घूम कर हिंदुत्व की बात करने वाले भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अपने ही राज्य में धर्म परिवर्तन रोक पाने में विफल साबित हो रहे हैं...। 


हिंदुत्ववाद की राजनीति इस बार चुनाव के बाद देश की राजनीति को किस तरह बदलती है, यह देखना होगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली दफा ऐसा लग रहा है कि राजनीति अब देश, समाज और विकास से हटकर जाति और धर्म पर सिमट रही है। इस राजनीति में उन्माद है और अहंकार भी। साथ में सांप्रदायिक बनाम धर्मनिरपेक्ष गुटों के बीच टकराहट की आहट भी। इसी राजनीति के चलते भाजपा की ओर से एक प्रचार स्लोगन सामने आया है कि शासक नहीं, सेवक की जरूरत है। इस स्लोगन से देश के नागरिकों को भला क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन सवाल यह है कि इस देश में शासक कौन है? सेवक कौन है? यह जानकारी कौन देगा? नरेंद्र मोदी सेवक हैं या शासक? देश की तमाम सरकारें सेवक हैं या शासक, इसका फैसला कौन करेगा? मोदी देश का सेवक बनने का दम भर रहे हैं, लेकिन गुजरात में पिछले कई सालों से दलित समाज के लोग धर्म बदल रहे हैं। अब तक लाखों दलितों ने धर्म बदला है। 16 अक्टूबर 2013 को जूनागढ़ में जिस तरह धर्मांतरण का खेल खेला गया और प्रदेश के शोषित, दमित और छुआछूत के शिकार हजारों दलितों ने बौद्घ धर्म को अपना लिया, इससे के मोदी के वाइबे्रंट गुजरात की कलई खुल गई। मोदी की सेवक वाली कथित राजनीति तार तार होकर रह गई।
सवाल उठे, तो सरकार की ओर से इस धर्मांतरण की जांच शुरू हो गई। पूरे देश को उस जांच रिपोर्ट का इंतजार है। इस रिपोर्ट से यह पता चल सकेगा कि मोदी के राज में दलितों की क्या दशा है? जो सेवक बनने का दम भर रहे हैं, पूरे देश में हिंदुत्व की राजनीति के नाम पर ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ का डंका पीट रहे हैं, उनके प्रदेश में हिंदुत्व की असलियत क्या है? इस रिपोर्ट से यह भी पता चल जाएगा कि कैसे मोदी दलित और पिछड़ों की राजनीति के नाम पर वोट बैंक उगाहते फिर रहे हैं? किस तरह उनके ही राज्य में दलित हिंदू, सामंत हिंदुओं और सेवक मुख्यमंत्री के होते हुए भी गुलामी का जीवन जीने के साथ ही साथ मंदिर की सीढ़ियों पर भी चढ़ने से वंचित हैं। यह पूरी रिपोर्ट गुजरात में दलित हिंदुओं की दारुण दशा के साथ ही उनके धर्मांतरण की कहानी तक आपको ले जाएगी। लेकिन इससे पहले मोदी की राजनीति पर कुछ और बातें।
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी शासक हैं या सेवक? यह सवाल इसलिए किया जा रहा है कि जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उन राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के साथ ही पूरे देश में लगे भाजपा के होर्डिंग्स में मोदी की आक्रामक छवि के साथ ‘शासक नहीं, सेवक’ का स्लोगन लोगों को खूब लुभा रहा है। मोदी की इस छवि पर लोग फिदा हैं। ‘मोदी बाले तो देश’ और ‘राजनीति बोले तो मोदी की राजनीति’ का गुणगान तमाम चौक-चौराहों से लेकर सरकारी और गैर सरकारी दफ्तरों में हो रहा है। ‘देश को गुजरात चाहिए, इसके लिए मोदी चाहिए’ के नारे गगन भेद रहे हंै। इस राजनीति में करोड़ों रुपये का खेल जारी है। यह खेल कहां से, किसके जरिए और कैसे हो रहा है, यह जांच का अलग विषय हो सकता है। मोदी की ब्रांडिंग के सामने कांग्रेस की ब्रांडिंग फीकी पड़ चुकी है। आलम यह है कि मोदी की ब्रांडिंग कुछ लोग और कंपनियां  लाखों-करोड़ों रुपये लेकर कर रही हैं, तो बहुतेरे लोग हिंदुत्व के नाम पर मोदी का झंडा उठाए घूम रहे हैं। कुछ ऐसे भी जीव हैं जिन्हें मोदी के दर्शन कभी नहीं होंगे, लेकिन मोदी की अंध भक्ति में पागल हुए जा रहे हैं। सोशल मीडिया में ऐसे अंध भक्तों की लंबी सूची देखी जा सकती है।
तो जानिए मोदी राज में दलित हिंदुओं की कहानी के साथ ही उनके धर्मांतरण की बेबसी। 16 अक्टूबर को सौराष्ट् के जूनागढ़ जिले के विशाल हडमटिया गांव के 60 से ज्यादा हिंदू दलित परिवार के सभी लोगों ने जुलूस निकालकर बौद्घ धर्म को अंगीकार कर लिया। ऐसा नहीं है कि ऐसी घटना कोई पहली बार गुजरात में घटी हो। 29 मई 2011 में भी प्रदेश के राजकोट में पांच हजार से ज्यादा दलित हिंदुओं और अति पिछड़ी जाति के लोगों ने सामंत हिंदुओं की बर्बरता से आहत होकर अपना पाला बदलने और बौद्घ धर्म में शामिल होने में ही भलाई समझी। लेकिन दो महीने पहले हुई जूनागढ़ की घटना ने राजनीतिक रंग अख्तियार कर लिया। इस जूनागढ़ के धर्मांतरण में भी करीब 10 हजार से ज्यादा दलितों ने हिस्सा लिया और सरकार के साथ ही उस हिंदू समाज के गाल पर तमाचा मारा, जो सालों से हिंदू होने के नाम पर उनसे वोट तो उगाह रहे थे, लेकिन हिंदू समाज में उन्हें बराबरी का हक नहीं दे रहे थे। जूनागढ़ के धर्मांतरण प्रकरण में प्रदेश के कई जिलों के लोग शामिल थे। राजकोट, अमेरी, पोरबंदर, भावनगर, जामनगर और सुरेंद्र नगर के दलित भी अपने बाल बच्चों के साथ आए और शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हुए बौद्घ बन गए। नरेंद्र मोदी चूंकि इसी प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं, ऐसा जानकर इस धर्मांतरण ने राजनीतिक रंग धारण कर लिया। कांग्रेस वाले मोदी सरकार को दलित विरोधी कहने लगे और संघ की कई आनुषंगिक इकाइयों ने इस प्रकरण से बेहद आहत होकर मोदी की राजनीति पर अंगुली उठाई।
फिर क्या था! जिला कलक्टर को मामले की जांच के आदेश दिए गए। जांच चल रही है और इस जांच रिपोर्ट के आने का सबको इंतजार है। रिपोर्ट आने के बाद क्या होगा? अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। असलियत यह है कि बौद्घ बने दलित हिंदू अब बेहद खुश हैं। अब वे सवर्ण और दलित के बंधन से मुक्त हो गए हैं। ताल ठोंक कर अब अपने नए धर्म में जीवन यापन कर रहे हैं। सवाल यही है कि आखिर मोदी के प्रदेश में इस तरह का धर्मांतरण क्यों हो रहा है? ऐसी ही घटना मोदी शासित गुजरात के दक्षिणी जिले अहवा डांग में भी देखने को मिली है। दक्षिण गुजरात का यह जिला अब पूरी तरह से ईसाई बन गया है। आदिवासी बहुल यह इलाका कभी संघ का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। हिंदुओं की वाचाल राजनीति और आदिवासियों के प्रति घृणा ने पूरे आदिवासी समाज को धर्मांतरण पर मजबूर कर दिया था। यह बात और है कि भले ही अहवा डांग में धर्मांतरण गरीबी की आड़ हुआ था। रोटी और दवा उपलब्ध कराकर इसाइयों ने उन्हें अपनी ओर खींचा था, लेकिन दूसरी सच्चाई यह है कि अगर हिंदू समाज में इतनी एकता और एक दूसरी जाति के प्रति हमदर्दी होती, तो क्या ऐसी घटना डांग में घटती? डांग में हुए धर्मांतरण पर अभी कई तरह के शोध भी हो रहे हैं।
जूनागढ़ की घटना कई सवालों को जन्म दे रही है। सबसे पहला सवाल यह है कि आखिर दलितों ने ऐसा कदम क्यों उठाया? इस सवाल का जवाब गुजरात के नेताओं और समाज के चिंतकों से जानते हैं। बुद्घ दीक्षा महोत्सव समिति के देवेंद्र गोविंद भाई वानवी कहते हैं कि हिंदू समाज में दलितों की हालत सामाजिक दास से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्हें आप गुलाम भी कह सकते हैं। और ऐसी हालत सालों से है। देश में काफी बदलाव हुए हैं, लेकिन इस प्रदेश के दलितों की हालत में कोई बदलाव नहीं हुआ है। भाजपा के पूर्व विधायक गिरीश परमार भी दलितों की हालत पर खफा हैं, लेकिन राजनीति के चलते खुलकर कुछ नहीं बोलते हैं। परमार कहते हैं कि प्रदेश में दलितों की हालत वाकई बहुत खराब है, लेकिन धर्म परिवर्तन कर लेने से ही उनका कल्याण संभव नहीं है। धर्म बदल देने से ही वे छुआछूत से ऊपर नहीं उठ जाएंगे। समाज को बदलने की जरूरत है। जूनागढ़ के खरचिया गांव के विशन बघेला कहते हैं कि प्रदेश की ऐसी हालत है कि गरबा तक में दलितों के बच्चों को शामिल नहीं किया जाता है। मेरे गांव में ही दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता। जब लोगों को पता चलता है कि वे दलित हैं, तो उन्हें काम भी नहीं मिलता। फिर हमारे पास धर्म बदलने के अलावा दूसरा रास्ता ही क्या है? आखिर हमें हिंदू बने रहने से क्या मिल रहा है?
दलितों के उत्थान में सालों से लगा नवसृजन जैसे गैर सरकारी संगठन के कीरीत राठौड़ कहते हैं कि गुजरात में दलितों की हालत अन्य प्रदेशों की अपेक्षा बहुत खराब है। यहां के समाज में दलितों की दशा जानवरों जैसी है। जिस तरह से दलितों में धर्मांतरण के प्रति लगाव बढ़ रहा है, आने वाले समय में प्रदेश के जातीय और धार्मिक क्षेत्रों में भारी परिवर्तन की संभावना दिख रही है। इस परिवर्तन से राजनीतिक परिवर्तन होंगे और भाजपा को इससे हानि होगी।
16 अक्टूबर के धर्म परिवर्तन के खेल में दया बघेला भी शामिल थे। 65 वर्षीय बघेला कहते हैं, ‘जब धर्म की वजह से जीवन जीने में कठिनाई होने लगे, तो उस धर्म को अपनाए रखने से क्या लाभ है? धर्म वही बेहतर है जिससे इज्जत मिलती हो और दो वक्त की रोटी। क्या समाज में गुलाम बनकर रहना और दासता में जीना कहां तक संभव है? हमारी समस्या अनंत है। हमारे गांव में ही हज्जाम हमारे समाज के लोगों की हजामत नहीं बनाते। हमें अन्य हिंदू काम नहीं देते। हमें मंदिर में नहीं जाने दिया जाता। अन्य बच्चों के साथ हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा सकते। उनके साथ खेल नहीं सकते, बैठ नहीं सकते। अब तो लगता है कि हमें अलग से मंदिरों की जरूरत होगी।’
जेथा सोलंकी दलित नेता भी हैं और भाजपा के विधायक भी। लेकिन उनकी कौन सुनता है? सोलंकी कहते हैं, ‘प्रदेश में जो दलित रह रहे हैं, उनके साथ भेदभाव की बात कोई नई नहीं है। सालों से यह सब चल रहा है। अब यह एक शाप की तरह दिखता है। दलितों को सबसे ज्यादा पानी की समस्या से जूझना पड़Þता है। नर्मदा का पानी इन्हें नहीं मिलता। सौराष्ट् इलाके में सबसे ज्यादा दलित रहते हैं। यहां के दलितों की हालत इतनी दयनीय है कि कुछ कहा नहीं जा सकता।’ मोदी के राज में दलित शोषण की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दरअसल दलितों के शोषण के पीछे का एक सच यह भी है कि प्रदेश में दलित वोटरों की आबादी तो 7 फीसदी है, लेकिन वे राजनीति को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं। राजनीतिक ताकत नहीं बनने से ही गुजरात के दलित देश के दलितों में सबसे पीछे रह रहे हैं। दलितों के इस हाल के लिए दलित चिंतक कंचा इलैया मुख्यमंत्री मोदी को ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं। इलैया कहते हैं कि एक तरफ मोदी गुजरात विकास माडल की बात कहते फिर रहे हैं और दूसरी तरफ उन्हीं के प्रदेश में दलित नारकीय जीवन जी रहे हैं। इसी प्रदेश में दलितों के साथ सबसे ज्यादा छुआछूत है। गांधी जी की आत्मा भी ऐसी हालत से कराहती होगी। मोदी के राज में दलितों के लिए कुछ नहीं किया जाता। इससे अच्छी तो आंध्र सरकार है, जहां दलित और आदिवासियों में पिछड़ी जाति के कल्याण के निए नई योजनाएं चल रही हैं और लोग खुश भी हैं।
मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। आगामी लोकसभा चुनाव जीतने के लिए देश भर में बैनर पोस्टर वार के जरिए कांग्रेस और अन्य पार्टियों को सबक सिखाने में लगे हैं। वे अपने को शासक नहीं, सेवक कह रहे हैं। लेकिन उन्हीं के गुजरात में दलित पर जो अत्याचार हो रहे हैं, उस पर वे कुछ नहीं बोलते। क्या किसी सेवक की सरकार अपने ही समाज के लोगों के साथ छुआछूत की राजनीति को सह सकती है? चौंकाने वाली बात तो यह है कि दो साल पहले एक सर्वे के जरिए यह ख्ुालासा हुआ था कि सबसे ज्यादा मैला ढोने वाले दलित आज भी गुजरात में हैं। गुजरात में 12 हजार लोग आज भी अपने हाथों से मैला उठाते हैं और इनमें से 900 परिवार सिर्फ सौराष्ट् के हैं। मोदी और भाजपा को देश के कुल 17 फीसदी  दलित वोट बैंक में से 12 फीसदी वोट मिलते हैं, लेकिन दलितों के कल्याण में यह पार्टी कोई ज्यादा रुचि नहीं लेती। 30 फीसदी दलित वोट आज भी कांग्रेस के साथ है, लेकिन पिछले कुछ सालों से कांग्रेस भी दलित कल्याण से विमुख रही है। हाल में भूमि अधिग्रहण कानून और खाद्यान्न योजना दलितों को कितना लुभा पाएगा, यह देखना होगा। हां, इतना साफ है कि मोदी गुजरात में सामाजिक तानाबाना बनाने में विफल साबित हो रहे हैं। एक दलित विरोधी समाज और सरकार कभी भी देश की आदर्श नहीं हो सकती। ऐसे में गुजरात के बाकी दलित भी अपनी इज्जत बचाने के लिए दूसरे धर्म को अपना लें, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। अपने प्रदेश में दलित हिंदुओं को तो मोदी समेट नहीं रहे हैं और चले हैं देश के हिंदुओं का कल्याण करने।

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