Wednesday, November 20, 2013

वार पर वार

चुनाव भले ही पांच राज्यों की विधानसभा के हो रहे हों, लेकिन मंच आम चुुुनाव से भी भव्य बन गया है। यही कारण है कि बड़े-बड़े नेताओं की भी जुबान फिसल जा रही है, लेकिन क्या इस बदजुबानी के पीछे कहीं मिलीभगत तो नहीं है। 

पांच राज्यों में चुनाव और नेताओं के बीच वॉर पर वॉर, बड़ा ही मनोरंजक माहौल है। देश की जनता नेताओं के नर्तन और जुबानी जंग से हतप्रभ है। जनता हंस भी रही है और हंसा भी रही है। विदूषक की भूमिका में देश के नेता हैं। कोई किसी से कम नहीं। एक से बढ़ कर एक। जहां कांग्रेस की चल रही है, वहां भाजपा वालों को पानी पीना पड़ रहा है और जहां भाजपा को मौका मिल रहा है, वहां कांग्रेसियों को अधमुंहा कर रही है। इस चुनावी खेल में कोई किसी से बाज आने को तैयार नहीं है। भला कहिए कि ये चुनाव बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में नहीं हो रहे हैं। ऐसा होता, तो कई नेताओं के नानी याद आ जाती। बिल्कुल खांटी देहाती स्टाइल में। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा आक्रामक हंै। कांग्रेस को जी भरकर पानी पिला रहे हैं। कांग्रेस वाले राहुल गांधी को धो-धो कर उतार रहे हैं। इस धोने और उतारने में चुनाव आयोग खड़ा हो जाता है। अगर चुनाव आयोग का डर नहीं होता, तो कांग्रेसियों की क्या हालत मोदी करते, कोई सोच नहीं सकता है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता और मोदी के करीबी कहते हैं कि अरे साहब, हम तो इसी चुनाव में राहुल और पूरे कांग्रेसियों की असली तस्वीर लोगों के सामने रख देते, लेकिन इस चुनाव आयोग का क्या करें? बीच में आ टपकता है। सालों से देश को लूट रहे और गाल भी बजा रहे हैं। उधर कांग्रेस वाले भी कम नहीं है। भाजपाइयों के साथ ही मोदी का नकाब उतार रहे हैं। मोदी पर ऐसे-ऐसे आरोप लगा रहे हैं कि सुन कर दिल मचल जाता है। कोई किसी को चूहा कह रहा है, तो कोई किसी को शहजादा। कोई किसी को लुटेरा कह रहा है, तो कोई किसी को सियार। नैतिकता की सारी हदें पार हो गई हैं। सब अपनी-अपनी औकात पर आ गए हैं। सबने अपने चरित्र को दर्शा दिया है। कोई किसी से कम नहीं। जनता की मजबूरी यही है कि इन्हीं लोगों में से किसी के हवाले सत्ता की बागडोर सौंपनी है।
           देश की राजनीति जिस दिशा में चल रही है और जिन लोगों के हाथों में देश की राजनीति को हांकने की बागडोर मिली है। क्या आप इन्हें देश का नेता मानते हैं? देश में जितनी पार्टियां अपने-अपने तरीके से देश को आगे बढ़ाने का ढोल पीट रही हैं, क्या उससे आप सहमत हैं? क्या आप नहीं मानते कि देश में लंपट राजनीति का बोलवाला है और लंपट लोग ही राजनीति समेत देश को हांक रहे हैं? अगर ऐसा है, तो हम कह सकते हैं कि इस तरह की लंपट राजनीति की ऐसी की तैसी। उन नेताओं की भी ऐसी की तैसी, जो केवल वोट उगाहने के लिए समाज और देश को खंड-खंड कर रहे हैं। राजनीति तो बगैर लगुए-भगुए जनता के चलती नहीं, तो जो जनता इन नेताओं की परिक्रमा कर रही है, उस जनता की भी ऐसी की तैसी? यह नेताओं की परिक्रमा का ही फल है कि 66 साल की आजादी के बाद भी लंपट राजनीति करने वाले नेता जनता को मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं मानते। जनता की यही मूर्खता उन्हें बल प्रदान करती है और उनका फेंका पासा सफल हो जाता है। जनता जनार्दन का जिस दिन इन नेताओं से मोहभंग हो जाएगा, इनकी असलियत सामने आ जाएगी, उस दिन से लंपट राजनीति के साथ ही लंपट नेताओं का खेल भी खत्म हो जाएगा।
       उपरोक्त भूमिका बनाने के पीछे की कहानी यह है कि पिछले दिनों संसद से सड़क तक जनता के नाम पर विरोध की राजनीति करने वाली तमाम राजनीतिक पार्टियां सत्ता पक्ष के साथ इस तरह एकाकार हो गईं, मानो सभी सहोदर भाई हों। बात-बात में और हर बात पर एक-दूसरे को गरियाने वाली पार्टियां, संसद में एक दूसरे का मुंह बंद करने का दावा करने वाली पार्टियां और सत्ता पक्ष को लुटेरा कहने वाली पार्टियां जिस तरह से एक हुई, इनकी कलई खुल गई। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने दागी नेताओं पर लगाम कसने के लिए और संसद को अपराध मुक्त करने के लिए जनप्रतिनिधि कानून में बदलाव लाने का फैसला किया था। इस फैसला के आते ही जैसे सभी दलों को सन्निपात हो गया हो। सबके सब अवाक थे। क्या सत्ता, क्या विपक्ष, सभी ने अदालत के उस फैसले का विरोध कर दिया। इसे लोकतंत्र के विरुद्घ बताया और सभी ने एक साथ मिलकर इस फैसले को बदलने की तैयारी कर दी। नेताओं और दलों के बीच ऐसी एकजुटता को देखकर ऐसा लगा, मानो गांव की वह कहावत ‘चोर-चोर मौसेरै भाई’ चरितार्थ हो गई। सुभाष कश्यप कहते हैं, ‘जिस तरह से सभी दलों के नेताओं ने कोर्ट के फैसले को चुनौती देने या फिर उसके ऊपर पुनर्विचार करने को लेकर आगे आए, अगर वही उत्सुकता लोकपाल बनाने से लेकर देश के कल्याण के लिए अन्य नियम कानून बनाने में होती, तो आज देश का ये हाल नहीं होता। क्या आरोपियों को संसद के भीतर होना चाहिए? क्या अपराधियों  को चुनाव जीतकर आने दिया जाए? भला इस तरह की राजनीति से देश का भला हो सकता है?’ नेताओं ने कहा कि संसद से बड़ी अदालत नहीं है। अदालत भी संसद के कानून से ही चलती है। तब भला अदालत संसद और संसदीय लोगों को भला कैसे हांक सकती है? दागी नेता लोग भले ही जनता और देश का खून पी लें, लेकिन भला इन्हें कौन दंडित कर सकता है? संसद के शीतकालीन सत्र में भले ही कोई बिल या विधेयक पास न हुआ हो, लेकिन सत्र के शुरू में ही सबसे पहले सभी दलों के प्रयास से जनप्रतिनिधि कानून को बनाए रखने की कार्रवाई कर दी गई। राजद नेता लालू यादव ने कहा कि संसद सबसे ऊपर है। अदालत संसद को गवर्न नहीं कर सकती। हम जनता की लोग हैं। हमारे ऊपर कई राजनीतिक मामले होते हैं, भला उन मामलों से हम चुनाव कैसे नहीं लड़ेंगे? हम जनता का सेवा करते हैं और हमारे कुछ अधिकार भी हैं। अगर जितने लोगों पर मुकदमे हैं, चुनाव नहीं लड़ें, तो राजनीति कौन करेगा? भला कहिए उस राहुल गांधी का, जिसने इस कानून का विरोध किया और अंत में जाकर वही हुआ, जो अदालत चाहती थी। यानी दागियों पर नकेल, लेकिन इस पूरे खेल में देश की राजनीति करने वाले सभी दलों और उनके नेताओं की कलई खुल गई। लालू यादव ने इस कानून का काफी विरोध किया था। आज जेल में हंै, लेकिन क्या भाजपा वालों ने इसका विरोध किया? क्या कांग्रेस वाले जो बेहतर सरकार चलाने का दावा कर रहे हैं और देश रसातल में जा रहा है, उसने कोई विरोध किया? क्या किसी राष्ट्रीय पार्टी ने इसका प्रतिकार किया? जिस समय इस मसले पर संसद और संसद के बाहर चर्चा चल रही थी। लग रहा था सभी राजनीतिक दल चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। मुलायम सिंह ने अदालत के फैसले को क्या माना? मायावती ने क्या इसे स्वीकार किया? सोनिया गांधी और शरद पवार ने क्या इसे जायज कहा? सबसे बड़ी बात यह कि दिन रात नेताओं के भाड़े पर भीड़ बनने वाले जनता ने इस पर आवाज उठाई?
         मामला केवल दागी नेताओं को बचाने तक ही सभी दलों ने एकता नहीं दिखाई। जब सूचना आयोग ने राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की बात कही, तो सभी दलों ने एक सुर से इसका विरोध किया है। यह इनकी एकता की दूसरी मिसाल थी। सभी दलों ने कहा कि राजनीतिक पार्टियां जनता का संगठन हैं और जनता के संगठन को सूचना के अधिकार के तहत नहीं लाया जा सकता, लेकिन सवाल है कि जब सब कुछ जनता का ही है, तो जनता से छुपाना क्या? दरअसल राजनीतिक पार्टियों को बड़े पैमाने पर राजनीतिक चलाने और खरीद फरोख्त करने के लिए काले धन की जरूरत होती है और बड़े पैमाने पर काले धन आते भी हैं। भला काले धन का इजहार कौन करे। सूचना का अधिकार बनाते समय सभी दलों ने इसे लोकतंत्र की ताकत बताया था। कांग्रेस ने तो पिछला चुनाव इसी के नाम पर जीता भी, लेकिन कांग्रेस ने भी इस मामले में बेशर्मी की हद पार दी। समाजशास्त्री आनंद कुमार कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियों को आप नहीं जानते, तो यह आपका दोष है। जिसकी पूरी राजनीति ही काले धंधों पर टिकी हो, वह भला अपना खाता आपको क्यों दिखा दे? देश की जनता को यह सब सोचना होगा कि राजनीतिक दल क्या करते हैं। आप कह सकते हैं कि हम्माम में सभी नंगे हैं।
       बात-बात में एक दूसरे को गाली देने वाले और चुनाव के समय अपने को एक-दूसरे से बेहतर मानने वाले लोग और पार्टियों की एकता एक मामले में और भी दिलचस्प है। संभव है कि संसद के अगले सत्र में इनकी एक और एकता सामने आ जाए। सांसद अपना वेतन भत्ता फिर बढ़ाने के लिए संसद में बिल पेश कर रहे हैं। यह बिल कब पास हो जाए? किसी को मालूम भी न हो। देश की जनता के कल्याण और सुख सुविधाओं के लिए 116 बिल संसद में लंबित है। कई बिल तो 20 साल से लंबित हैं, लेकिन उन बिलों को पास कराने में नेताओं की नानी याद आती हैं। किसी भी नेता के पास उन बिलों पर चर्चा के लिए समय ही नहीं है, लेकिन अपने वेतन बढ़ाने के लिए सभी एक हैं। भ्रष्ट राजनीति का इससे ज्यादा उदाहरण और क्या हो सकता है?
       तो क्या देश की जनता को राजनीतिक दलों का यह खेल समझ में आता है?  पांच राज्यों के चुनाव के बाद आगामी लोकसभा चुनाव की डुगडुगी भी बज चुकी है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने पैंतरे बदल रहे हैं। जो कल तक जनता की बात करते थे, आज वोट की बात करने लगे हैं। कैसे वोट बने और कैसे चुनावी गणित उसकी पार्टी के पक्ष में आए, इसे लेकर नीतियां बनने लगी हैं। कल तक मुस्लिमों को कुत्ता कहने वाले मोदी आज मुस्लिमों के पैरोकार दिख रहे हैं। कोई अपराधी मुस्लिमों को जेल से छुड़ाने में लगा है, तो कोई मुस्लिमों के लिए सभी योजनाओं में आरक्षण देने की घोषणा करता फिर रहा है। कांगेस फूड सिक्यूरिटी बिल पर आमदा है, तो भाजपा मंदिर की बात फिर छेड़ रही है। तरह-तरह की पार्टियां और उनके तरह तरह के खेल। हम लूटने को तैयार बैठे हैं। ताकते रहिए, हम भी किसी न किसी के जाल में फंसेंगे जरूर।

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