Thursday, December 5, 2013

नरेंद्र मोदी की अग्निपरीक्षा

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव भले ही स्थानीय मुद्दे पर लड़े गए हों, लेकिन भाजपा ने अपनी संभावित जीत का अनुमान लगाते हुए दांव नरेंद्र मोदी पर ही खेला है। हालांकि इस खेल में भी कई तरह के ‘खेल’ छिपे हैं। ऐसे में यह तो साफ है कि अगर भाजपा पांच में से कम से कम चार राज्य नहीं जीतती है, तो मोदी की फजीहत तय है...  

पांच राज्यों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। इस चुनाव को सत्ता का सेमीफाइनल कहा गया है। कहा जा रहा है कि इन पांच राज्यों में से ज्यादा राज्य जिसके हाथ में आएंगे, वही पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करेगी। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। हो सकता है, इसलिए कि जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए हैं, उनमें से तीन राज्यों दिल्ली, राजस्थान और मिजोरम में कांग्रेस की सरकार रही है और बाकी दो राज्यों मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा एक दशक से सत्ता संचालित कर रही है। अब अगर इस चुनाव के जरिये इन दोनों दलों के बीच सत्ता में दखल और सत्ता से बेदखल की नई तस्वीर सामने आती है, तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आगामी चुनाव पर इसके कुछ प्रभाव पड़ सकते हैं। लेकिन यह तस्वीर तो आठ दिसंबर के बाद ही साफ हो पाएगी, क्योंकि इस बार इन राज्यों में कुछ ऐसे दलों ने भी चुनाव लड़ा है, जो राज्यों के चुनावी माहौल को बदलने के लिए काफी हैं। फिर इन पांच राज्यों में हुए चुनाव परिणाम के असर लोकसभा चुनाव पर नहीं भी पड़ सकते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण तो यह है कि लोकसभा चुनाव में पूरा देश शामिल होगा। सभी राजनीतिक पार्टियां शामिल होंगी और सभी क्षत्रप शामिल होंगे। पिछले एक दशक में राजनीति में हुए बदलाव, जनता की बदलती सोच और जातियों के साथ ही महंगाई और धर्मनिरपेक्षता के इर्द-गिर्द होती राजनीति के दम पर जो चुनावी सर्वे सामने आए हैं, उससे साफ है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भी कोई भी अकेली पार्टी सरकार बनाने नहीं जा रही है। सर्वे यह भी कह रहा है कि वर्तमान यूपीए और एनडीए भी सरकार बनाने की हैसियत में नहीं होगी। सर्वे ने साफ कर दिया है कि आगामी चुनाव में माइनस भाजपा और माइनस कांग्रेस वाली पार्टियां आपस में मिलकर गोलबंद हो सकती है और उसी के पास सबसे ज्यादा सीटें भी होंगी। साफ है कि इस बार भी गठबंधन की सरकार ही बनेगी और कांग्रेस हो या भाजपा, उसे सरकार बनाने के लिए बड़े स्तर पर क्षत्रपों का सहयोग लेना होगा। इसके उलट आप यह भी कह सकते हैं कि संभव है कि इस तीसरी ताकत से सरकार बनाने के लिए कांग्रेस या फिर भाजपा चिरौरी करती फिरें।
     इन तमाम सवालों के बीच सबसे बड़ी बात यह है कि मिजोरम को छोड़कर हिंदी पट्टी के इन चार राज्यों में सरकार बनाने की तैयारी में कौन है? इसका जवाब है अभी कोई भी दल दावे के साथ यह कह सकने की हालत में नहीं है कि देश या प्रदेश की जनता उनमें पूरी तरह से यकीन करके उन्हें मौका दे रही है। दूसरा सवाल है कि इन राज्यों में भाजपा की जीत भी हो जाती है, तो क्या इसे मोदी की जीत कही जाएगी? कहा तो यही जा रहा है कि इन चुनावों में जीत में भी मोदी की हार है और हार में तो मोदी बेकार ही होंगे। कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश दोनों ही जगहें भाजपा को कांग्रेस से टफ फाइट मिली है। खुद भाजपा नेता और कार्यकर्ता इस बात को स्वीकार करते हैं कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में राह उतनी आसान नहीं रही, जितनी कि समझी जा रही थी। जो रुझान और बयान आ रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि भाजपा के लिए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से बड़ी चुनौती मिली है। छत्तीसगढ़ में जहां खींचतान कर भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में नजर आ रही है। वहीं, मध्य प्रदेश में स्थिति ज्यादा कमजोर हो सकती है। कारण सिर्फ ज्योतिरादित्य की मौजूदगी भर नहीं है, बल्कि भाजपा की आंतरिक राजनीति भी है।
मध्य प्रदेश की 230 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 115 सीटें जीतनी होंगी। अभी भाजपा के पास 143 विधायक थे, जबकि  कांग्रेस की ताकत भाजपा के मुकाबले बहुत कमजोर 71 विधायकों की थी। 2003 से 2013 के बीच राज्य में भाजपा की सरकार के दौरान कांग्रेस सशक्त विपक्ष होने की बजाय राजनीति की कमजोर कड़ी ही बनी रही। बीच में कांग्रेसी नेताओं को शिवराज सरकार द्वारा उपकृत किए जाने वाली खबरों ने भी कांग्रेस को कमजोर कर रखा था, तो नेतृत्व के अभाव ने भी कांग्रेस को सशक्त विपक्ष नहीं बनने दिया। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के अपने-अपने राजनीतिक दांव-पेंच के बीच कांग्रेस कहीं से भाजपा को टक्कर देती नजर नहीं आ रही थी, लेकिन ज्योतिरादित्य को मैदान में उतारकर कांग्रेस ने शिवराज सरकार के खिलाफ वही दांव चला, जैसा दांव 2003 में भाजपा ने उमा भारती को मैदान में उतारकर दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश से दरबदर कर दिया था।
अब ज्योतिरादित्य कांग्रेस के उमा भारती साबित हुए या नहीं, यह तो चुनाव परिणाम बताएंगे, लेकिन खुद उमा भारती इस बार भाजपा के लिए उमा भारती नहीं रहीं। भाजपा की राजनीतिक तिकड़मों का शिकार होकर दरबदर हुर्इं। उमा भारती को इस बार मध्य प्रदेश में प्रवेश की मनाही तो नहीं थी, लेकिन उन्होंने खुद बहुत उत्साह से न तो चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया और न ही पार्टी ने उन्हें कोई कमान सौंपी। इस बार चुनाव प्रचार में जो चेहरा दिखाया गया, वह नरेन्द्र मोदी का था और कमान खुद शिवराज, तोमर और मेनन की तिकड़ी के हाथ में थी। तो क्या उमा भारती का चेहरा चमकाकर भाजपा ने जिस मध्य प्रदेश को कांग्रेस से छीना था, मोदी का चेहरा दिखाकर उसे तीसरी बार अपने पास रख पाएगी?
 यह भी परिणाम बताएगा, लेकिन मध्य प्रदेश में अगर भाजपा इतिहास को उलटकर तीसरी बार सत्ता में आती है, तो भी भाजपा के स्टार प्रचारक मोदी की हार ही होगी। मोदी ने जिन नेताओं (सुषमा, आडवाणी, संजय जोशी) को गुजरात से दरबदर कर रखा है, वे सब मध्य प्रदेश में ही अपनी जमीन तलाश रहे हैं। अगर मध्य प्रदेश में भाजपा तीसरी बार जीतती है, तो पहले ही मोदी का विकल्प बनाए जा रहे शिवराज का राजनीतिक पलड़ा मोदी पर भारी कर दिया जाएगा। यह प्रचारित करते देर नहीं लगेगी कि विकास के मोदी मॉडल को ही नहीं, बल्कि विकास के शिवराज मॉडल को भी जनता तीसरी बार अपना विकल्प मानती है। अगर ऐसा नहीं होता है, तो मध्य प्रदेश में हार का ठीकरा मोदी के सिर फोड़ दिया जाएगा, क्योंकि मध्य प्रदेश में वही सबसे बड़े रोल मॉडल बनाकर पेश किए गए थे।
खुद मोदी के लिए मध्य प्रदेश के क्या मायने हैं? अगर राजनीतिक रूप से देखें, तो मध्य प्रदेश की हैट्रिक मोदी की अपनी राजनीति के लिए बहुत मददगार नहीं होगी। भला मोदी क्यों चाहेंगे कि सफल शिवराज उन्हें भविष्य में संकट के रूप में मिलें? यही हाल दिल्ली और राजस्थान का भी है। अगर राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार बनाने में सफल हो जाती है, तो मैसेज यही जाएगा कि वसुंधरा की मेहनत से यह सब हुआ है और प्रदेश के तमाम ब्राह्मण नेता की इसमें भागीदारी रही है। फिर राजस्थान के ब्राह्मण और सवर्ण नेता मोदी को चाहते भी नहीं। अगर वहां वसुंधरा की सरकार बन भी जाती है, तो लोकसभा चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे का जिम्मा वसुंधरा के हाथ में होगा और वसुंधरा के लोग कभी मोदी का सहयोग नहीं करेंगे।
         मप्र में वर्तमान विधानसभा चुनाव इस बार बिना किसी लहर अथवा बिना किसी बड़े मुद्दे के हुए हैं। 2003 के चुनावों में जनता के अंदर दिग्विजय सिंह के कुशासन विरोधी लहर चल रही थी, जबकि 2007 के चुनावों में भाजपा ने उमा भारती विवाद, बाबूलाल गौर के असफल और बेढब प्रयोग के बाद शिवराज सिंह चौहान जैसे युवा और फ्रेश चेहरे को मैदान में उतारा गया था। मध्य प्रदेश के लोगों के मन में दिग्गी राजा के अंधियारे शासनकाल का खौफ इतना था कि उन्होंने भाजपा को दूसरी बार मौका देना उचित समझा। देखते-देखते भाजपा शासन के दस वर्ष बीत गए और 2013 आ खड़ा हुआ है। पिछले दस वर्ष से मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़-गुजरात में लगातार चुनाव हार रही कांग्रेस के सामने इस बार बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि अक्सर देखा गया है कि जिन राज्यों में कांग्रेस तीन-तीन चुनाव लगातार हार जाती है, वहां से वह एकदम साफ हो जाती है। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, गुजरात और बिहार जैसे जीवंत उदाहरण मौजूद हैं, जहां अब कांग्रेस का कोई नामलेवा नहीं बचा है। स्वाभाविक है कि मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अधिक चिंतित है, खासकर छत्तीसगढ़ में, जहां कांग्रेस का समूचा नेतृत्व ही नक्सली हमले में मारा गया।
लेकिन मध्य प्रदेश भाजपा के सामने चुनौती दूसरे किस्म की है। वह है पिछले दस साल की सत्ता के कारण पनपे भ्रष्ट गिरोह और मंत्रियों-विधायकों से उनकी साठ-गांठ। इस मामले में इंदौर के बाहुबली माने जाने वाले कैलाश विजयवर्गीय की छवि सबसे संदिग्ध है। गत वर्षों में इंदौर का जैसा विकास हुआ है, उसमें विजयवर्गीय ने सभी को दूर हटाकर एकतरफा दांव खेला है। इनके अलावा नरोत्तम मिश्र सहित 11 अन्य मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार के कई आरोप लगते रहे हैं, लेकिन केन्द्र में सत्ता होने के बावजूद कांग्रेस उन्हें कभी भी ठीक से भुना नहीं पाई। चूंकि भाजपा ने मध्य प्रदेश में टिकट वितरण के समय शिवराज को फ्री-हैंड दिया था, इसी वजह से जनता की नाराजगी कम करने के लिए शिवराज ने वर्तमान विधायकों में से 48 विधायकों के टिकट काटकर उनके स्थान नए युवा चेहरों को मौका दिया है। हालांकि फिर भी किसी मंत्री का टिकट काटने की हिम्मत शिवराज नहीं जुटा पाए, लेकिन उन्होंने जनता में अपनी पकड़ का संदेश जरूर दे दिया। शिवराज के समक्ष दूसरी चुनौती हिंदूवादी संगठनों के आम कार्यकर्ताओं में फैली नाराजगी भी थी। धार स्थित भोजशाला के मामले को जिस तरह शिवराज प्रशासन ने हैंडल किया, वह बहुत से लोगों को नाराज करने वाला रहा। सरस्वती पूजा को लेकर जैसी राजनीति और कार्रवाई शिवराज प्रशासन ने की, उससे न तो मुसलमान खुश हुए और ना ही हिंदू संगठन। इसके अलावा हालिया रतनगढ़ हादसा, इंदौर के दंगों में उचित कार्रवाई न करना, खंडवा की जेल से सिमी आतंकवादियों का फरार होना और भोपाल में रजा मुराद के साथ मंच शेयर करते समय मोदी पर की गई टिप्पणी जैसे मामले भी हैं, जो शिवराज पर दाग लगाते हैं। इसी प्रकार कई जिलों में संघ द्वारा प्रस्तावित उम्मीदवारों को टिकट नहीं मिला, जिसकी वजह से जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में नाराजगी बताई जाती है। शिवराज के पक्ष में सबसे बड़ी बात है शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में खुद शिवराज और फिर नरेंद्र मोदी की छवि के सहारे मिलने वाले वोट। ये बात और है कि मध्य प्रदेश में शिवराज ने अपनी पूरी संकल्प यात्रा के दौरान पोस्टरों में नरेंद्र मोदी का चित्र लगाने से परहेज किया था। यह भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी हो सकती है। हालांकि शिवराज की खुद की छवि और पकड़ मध्य प्रदेश में इतनी मजबूत है कि उन्हें मोदी के सहारे की जरूरत, कम से कम विधानसभा चुनाव में तो नहीं है। कुल मिलाकर, यदि शिवराज अपने मंत्रियों के भ्रष्टाचार को स्वयं की छवि और योजनाओं के सहारे दबाने-ढंकने में कामयाब हो गए होंगे। आम भाजपाई उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शिवराज के कांधे पर सवार होकर वे पार निकल जाएंगे, जबकि कांग्रेसी सोच रहे हैं कि शायद पिछले दस साल का एंटी-इनकम्बेंसी फैक्टर काम कर जाएगा। यह विधानसभा चुनाव इसलिए महवपूर्ण हो गए हैं, क्योंकि सिर्फ छह माह बाद ही देश के इतिहास में सबसे अधिक संघर्षपूर्ण लोकसभा चुनाव होने जा रहा है और भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद यह पहले विधानसभा चुनाव हैं। जाहिर है कि सिर्फ भाजपा ही नहीं, नरेंद्र मोदी का भी बहुत कुछ इन विधानसभा चुनावों में दांव पर लगा है। यदि भाजपा इन पांच में से तीन राज्यों में भी अपनी सरकार बना लेती है, तो पार्टी के अंदर नरेंद्र मोदी का विरोध लगभग खत्म हो जाएगा और यदि भाजपा सिर्फ मध्य-छत्तीसगढ़ में ही दोबारा सत्ता में वापस आती है, तो यह माना जाएगा कि मतदाताओं के मन में मोदी का जादू अभी शुरू नहीं हो सका है। इस जीत में मोदी की कोई उपलब्धि नहीं है।

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