Thursday, December 26, 2013

कामांध समाज का सच


क्या हमारा समाज यौन उन्मुक्ता की ओर बढ़ रहा है? देश में कामांध लोगों की संख्या बढ़ रही है? युवा, वृद्ध, लड़के-लड़कियां, पुरुष-महिलाएं सारी वर्जनाओं को तिलांजलि देकर उन्मुक्त समाज के निर्माण की ओर अग्रसर हैं? आधुनिकता के नाम पर पूरे देश में समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सेक्स का नंगा नाच कर रहा है। 
क्या आप ‘स्ट्रिपर पार्टी’ से वाकिफ हैं? नहीं हैं तो जान लीजिए- यह नए जमाने का नया ‘सेक्सुअल खेल’ है, जहां पुरुष वेश्या सतरंगी रोशनी में डांस करते-करते अपने कपड़े उतार देता है। दर्शकों में शामिल महिलाएं तालियां बजाती हैं और सीटी मारकर स्ट्रिपर के शरीर और सौष्ठव पर आहें भरती हैं। जब स्ट्रिपर अपने को नंगा कर लेता है, तब भूखी शेरनी की तरह महिलाएं उस पर टूट पड़ती हैं और अपना सब कुछ लुटा देने को उद्घत हो जाती हैं। यह कल्चर आज दिल्ली की शान है। आज उस संस्कृति के वाहकों में लड़कियों की अपेक्षा वे महिलाएं ज्यादा हैं, जो अपने को स्वच्छंद और स्वतंत्र होने का दम भरती हैं। बात यहीं तक नहीं है। पिछले दिनों जापान में दुनिया का पहला ‘महिला मास्टरबेशन क्लब’ खुला, तो दिल्ली के दलालों और उन्मुक्त विचारों वाली महिलाओं की नसों में गर्माहट आ गई। जापान के उस केंद्र पर दिल्ली की महिलाओं ने प्रतिक्रिया दी और कहा, ‘काश! यह क्लब दिल्ली में खुलता और हम पहला क्लब चलाने के लिए सुर्खियां लेते।’ आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दिल्ली की ‘सेक्स हैबिट’ किस कदर बदल रही है!
  बात तो यहां तक बढ़ गई है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते! राजधानी में एक ऐसी संस्कृति पनप गई है, जो शाम ढलते ही मदहोशी के वातावरण में जीने को उद्घत हो जाती है। आइए, ऐसी ही दिल्ली की एक बाला से आपका परिचय कराते हैं, जो निशाचर संस्कृति की एक अंग है। ‘मैं गांव की महिला नहीं हूं कि बीड़ी पीऊं। सिगरेट, वह भी डनहिल और शराब के बिना रह नहीं सकती और इसमें खराबी क्या है? जीवन में आनंद न हो, तो फिर जीने का फायदा क्या?’ ये शब्द हैं दक्षिणी दिल्ली की एक बाला के, जो खबर लिखे जाने की शाम किसी पार्टी में जाने को तैयार थी। ऐसी बालाओं की एक फौज है यहां। इनकी एक गर्म संस्कृति है और अर्धनग्न जीवन शैली! स्ट्रिपर और रेव पार्टियां इन्हीं बालाओं के लिए आयोजित होती है। ‘रेव’ का अर्थ है मदमस्त और उत्तेजित होना। उस पार्टी में शामिल युवा समुदाय अफीम, गांजा, हेरोइन आदि का सेवन करता है और एक-दूसरे में खो जाता है। उस पार्टी में सेक्स है, नशा है, खुमार है और मस्ती के नाम पर वह सब है, जिसकी समाज में वर्जना है। दिल्ली के कई इलाकों में ऐसी पार्टियां होती हैं।
  सेक्सुअल आनंद की कहानी यहीं तक सीमित नहीं है। इस शहर में पति-पत्नियों के लिए भी पार्टियां होती हैं। इस पार्टी में जैसे-जैसे नशे का सुरूर चढ़ता है, पार्टी अपने-अपने अंतिम ‘लक्ष्य’ की ओर बढ़ जाती है। पत्नियों की अदला-बदली होती है और फिर रात गुलजार! यहां पवित्रता और पत्नीव्रता जैसी दकियानूसी बातें नहीं होती हैं। भ्रष्ट तरीके से कमाए गए धन की गर्मी ‘इज्जत’ से ज्यादा होती है। यह दिल्ली की नई संस्कृति है, क्योंकि यहां तपिश है।
        यह दिल्ली कभी इंद्रप्रस्थ थी, जहां कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का धर्मयुद्घ लड़ा गया था। यही दिल्ली कभी सूफी-संतों की दुनिया थी, जहां एक से बढ़कर एक सूफी-संत डेरा जमाए रहते थे। यहीं थे बहादुरशाह जफर और स्थापित थी उनकी मुगलिया सल्तनत। इसी दिल्ली में गालिब और मीर की महफिलें सजती थीं और गूंजती थीं गांधी की प्रार्थनाएं ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम़.़ .।’ इसी दिल्ली में लालकिले की प्राचीर से ‘आधुनिक भारत के जनक’ पंडित जवाहर लाल नेहरू आधुनिक भारत के सपने देखते थे। यहीं के काफी हाउस, मंडी हाउस और जेएनयू से लेकर संसद तक सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर गंभीर बहसें हुआ करती थीं। यह वही दिल्ली है, जहां महिलाओं को मां-बहन के रूप में देखा जाता था और इसी दिल्ली में ‘अंग’ से ‘अंग’ सट जाने पर तलवारें खिंच जाती थीं, लेकिन अब यहां ये सब नहीं होता!
      21वीं सदी में दिल्ली भी बदल गई है। दिल्ली में गर्मी है, तपिश है और खुलापन के साथ लूट, दुष्कर्म, हत्या, दलाली, सेक्स बाजार और झटपट धनी बन जाने की ऐसी होड़ लगी है, मानो हम कुएं में गिरने को आतुर हैं। दिल्ली का वर्तमान वह नहीं है, जो उसका अतीत था! अब यहां नए जमाने के ‘रईस’ रहते हैं। उनके पास पैसा है, सत्ता है और पुलिस की फौज है। कहते हैं कि गर्मी से गर्मी कटती है। इस शहर में गर्मी निकालने के कई ‘खेल’ हैं।
  शरीर में थकान हो, तो आप मसाज सेंटर जा सकते हैं। वहां मानसिक और शारीरिक दर्द उतारने के लिए तमाम ‘देशी’ और ‘विदेशी’ चीजें उपलब्ध हैं। रेन डांस, डिस्कोथेक, पब्स (पियो और नाचो), डीजे, म्यूजिक, फोन पर सेक्स और इन सबसे इतर इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सेक्स गेम का आनंद लिया जाता है। कनाट प्लेस के एक पुस्तक विक्रेता कहते हैं कि यहां की लड़कियां बेहद बेशर्म हैं। सेक्स की पत्रिकाएं लड़कियां बहुत पढ़ती हैं। पता नहीं, इस पत्रिका में पढ़ाई की कौन-सी बात है।’ दिल्ली पुलिस यहां के सेक्स बाजार पर कभी-कभी तल्ख भी होती हैं। पुलिस कहती है कि दिल्ली की लड़कियां सेक्स के मामले में पुरुषों से आगे हैं। लड़कियां ही पहले लड़कों को फांसती हैं, फिर मामला हत्या तक पहुंच जाता है। यहां लड़कियों की जितनी हत्याएं होती हैं, उसमें कहीं न कहीं सेक्स शामिल होता है। दिल्ली की उच्छृृंखल यौनाचार ने विवाह जैसी संस्था को अर्थहीन कर दिया है। बच्चों का पिता कौन है? मां कौन है? यह सवाल खड़ा हो गया है। 10-12 साल की कन्याएं मां बन रही हैं और लीविंग संबंध के नाम पर यौनाचार का खुलेआम खेल चल रहा है। जरा पार्कों में चले जाइए। प्रेमालाप के नए केंद्र बन चुके हैं राजधानी के कई पार्क। क्या बाला, क्या महिलाएं! दिल्ली के पार्कों में इनकी धमाचौकड़ी, देह पर देह और आलिंगन के नए-नए करतब देखकर आप भौंचक हो सकते हैं! हम यकीन कर सकते हैं कि अगली शताब्दी का नैतिक स्तर इतना गिरा नहीं होगा, जितना आज का है। चूंकि, समय परिवर्तनीय है और नैतिक स्तर पर बदलाव होता रहता है। शायद आगे इससे ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। हां, इस बात पर हमें शर्म भी आ सकती है कि उस जमाने के लोग हमारे बारे में क्या-क्या सोचेंगे? किसी भी शताब्दी का कोई वर्ग इतना बेहया नहीं होगा, जितना हमारा उच्च और मध्यम वर्ग है। यही वह वर्ग है, जो बाजार के निशाने पर है और बाजार के लिए एक कमोडिटी है। अजीब से अर्द्धनग्न कपड़े पहनकर इठलाती औरत में जितना औरताना सौंदर्य या अस्मिता है, उतनी ही मर्दानगी उस पुरुष में भी है, जो सूट, ब्लेजर पहने ब्रीफकेस लेकर चमचमाते जूते पहने, कार में जाता दिखता है। दिल्ली में बैग उठाए व्यस्त सफल दिखता पुरुष अपने बुद्घिबल और बाहुबल के दम पर कुछ नहीं रचता! दरअसल, वह दलाल है, लाइजनर है, उसकी समृद्घि और सफलता उतनी ही व्यक्तित्वहीन सौंदर्य या हमारे देश की तकनीकी और वैज्ञानिक तरक्की के किस्से। एक दलाल सभ्यता के ‘लार’ टपकाऊ  विज्ञापनों की दुनिया के आधार पर इतिहास नहीं रचा जाएगा, लेकिन यह शायद हमारी सभ्यता के सबसे प्रामाणिक साक्ष्य हैं। खुशकिस्मती है कि इन्हें साक्ष्य की तरह देखा जाएगा, तब शर्म से डूब मरने के लिए हम नहीं होंगे।
लेकिन अभी ठहरिए। दिल्ली की लंपट संस्कृति से हम फिर आपका परिचय कराएंगे और ले चलेंगे आपको काम वासना के उन तमाम अड्डों पर, जहां लोग जाकर कामोत्तेजना के शिखर पर पहुंच जाते हैं, लेकिन याद रखिए ऐसा केवल दिल्ली में ही नहीं हो रहा है। पूरे देश में और पूरे समाज में सेक्स कुलांचे मारता फिर रहा है। लगता है पूरा समाज ही कामांध हो गया हो। आज ये बातें इसलिए कही जा रही हैं कि पिछले एक साल में 16 दिसंबर की दामिनी घटना के बाद भी समाज की काम वासना अपने पूरे शबाब पर है। चरमोत्कर्ष पर है। कानून चाहे जो कहे, काम वासना की अलग-अलग कहानियां समाज में बढ़ती कामांधता को स्थापित करने के लिए काफी हैं। यहां कोई अछूता नहीं है। इस रोग के शिकार हर कोई लग रहा है। नेता हो या फिर अभिनेता, समाजसेवी हो या फिर पत्रकार, साहित्यकार हो या फिर कलाकार और बच्चे हों या फिर बूढेÞ, गांववाले हों या फिर शहर वाले, हर जगह कामांधता की हदें  पार करते दिख रही हैं। देश में बढ़ती कामांधता से आपको परिचय कराएंगे और ले चलेंगे कामांधों के पास भी, लेकिन सबसे पहले समाज में सेक्स की अवधारणा पर एक नजर।
        भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत सिंह कहते हैं कि सेक्स एक ऐसा विषय है, जिस पर हिंदी समाज कभी भी सहज नहीं रहा। किसी भी पेशे में कार्यरत लोगों में से कुछ लोग अक्सर सेक्स के कारण विवादों, चर्चाओं, आरोपों से घिर जाते हैं। मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। बाजारवाद के इस दौर में नैतिकता नाम की चीज ज्यादातर दुकानों से गायब हो चुकी है या कह सकते हैं कि इसके खरीदार बेहद कम हो गए हैं। इंद्रियजन्य सुख, भौतिक सुख, भोग-विलास सबसे बड़ी लालसा-कामना-तमन्ना है। शहरी जनता इसी ओर उन्मुख है। बाजार ने सुखों-लालसाओं को हासिल कर लेने, जी लेने, पा लेने को ही जीवन का सबसे बड़ा एजेंडा या कहिए जीते जी मोक्ष पा लेने जैसा स्थापित कर दिया है। आप नि:शब्द होने वाली उम्र में भी सेक्स और सेंसुअल्टी के जरिये सुखों की अनुभूति कर सकते हैं, यह सिखाया-समझाया जा रहा है। हर तरफ देह और पैसे के लिए मारामारी मची हुई है। फिर इससे भला मीडिया क्यों अछूता रहे? यहां भी, यही सब हो रहा है। आगे बढ़ने के लिए प्रतिभाशाली होना मुख्य नहीं रहा। आप किसी को कितना फायदा पहुंचा सकते हैं, लाभ दिला सकते हैं, सुख व संतुष्टि दे सकते हैं, यह प्रमुख होने लगा है।
लड़की है तो वह शरीर देकर फायदा पहुंचा सकती है, संतुष्ट कर सकती है, सुख पहुंचा सकती है। लड़का है तो कंपनी को या बॉस को आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से, मानसिक रूप से लाभ दिला कर फायदा पहुंचा सकता है। ग्लोबल इकोनॉमी आई है, तो अपने साथ खुलेपन की आंधी भी लाई है। मान्यताएं और धारणाएं धड़ाम हुई हैं। नए जमाने के लड़के-लड़कियों के लिए सेक्स और चॉकलेट में कोई खास फर्क नहीं है। फास्ट फूड की तरह फटाफट सेक्स चलन में है। वर्जनाएं भयानक रूप से टूटी हैं और टूट रही हैं। ऐसे में मीडिया में यौनाचार विषय पर लिखना बड़ा मुश्किल काम है। अगर कोई दो अपरिचित लोग, आपसी सहमति के आधार पर, भले ही इस सहमति में कोई लाभ-हानि निहित हो या न हो, सेक्स संबंध जी रहे हैं, तो पारंपरिक दृष्टि से इसे वेश्यावृत्ति कहकर, व्यभिचार मानकर इन पर पत्थर बरसाए जा सकते हैं। लेकिन आज का बाजार, आज का नैतिक शास्त्र, आज की लाइफस्टाइल इसे आजाद खयाली और व्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला मानता है और इन्हीं आधार पर इसे सहज और स्वीकार्य बताता है।
      दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच आपसी समलैंगिक संबंध को लेकर कितनी पर्देदारी हुआ करती थी, लेकिन बदले हुए वक्त में ये चीजें अब सामूहिक चर्चा के विषय बन गए हैं। पहले इन पर बोलना भी पाप माना जाता था। अब जिधर देखो गे और लेस्बियन की चर्चा आम है। पहले दो पुरुषों के बीच आपसी संबंध को निहायत ही घटिया, असामाजिक, अमानवीय, मानसिक रोग का प्रतीक आदि माना जाता था, लेकिन अब धीरे-धीरे इसे स्वीकार्यता मिल रही है। अब ये रिश्ते भले ही परंपरागत सामाजिक दृष्टि से अनैतिक हैं, लेकिन आज का आधुनिक समाज उसे नाजायज नहीं मान रहा। शादीशुदा स्त्री-मर्द, दोनों एक समय बाद आपसी सहमति से पार्टनर तलाशने लगे हैं। शादी से पहले चाहे जितने सेक्स संबंध बन जाएं, उसका हिसाब अब नहीं रखा जाता। सेक्स को लेकर गलत-सही का पैमाना अगर परंपरागत दृष्टिकोण है, तो कह सकते हैं कि इस समय भयानक रूप से व्यभिचार बढ़ गया है। अगर आप अति आधुनिक दृष्टि के पैरोकार हैं, तो कह सकते हैं कि जीने की आजादी बढ़ गई है, सुख के मौके बढ़ गए हैं। आप संतुलित और मध्यमार्गी हैं, तो दोनों अति को गलत मानते हुए एक संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टि की वकालत करेंगे, जिसमें सामाजिकता भी रहे और आधुनिकता भी। ज्यादातर नर-नारियों के जीवन के डार्क एरियाज में सेक्स ही होता है, लेकिन कोई इसे बताना-सुनाना नहीं चाहता, क्योंकि इस डार्क एरिया पर प्रकाश पड़ते ही उस शख्स की सामाजिक छवि के खंडित होने का खतरा पैदा हो जाता है। यही कारण है कि सेक्स शब्द का नाम आते ही ज्यादातर लोग अति अलर्ट हो जाते हैं, आशंकाओं से भर जाते हैं, आनंद व उन्माद के शिकार होने लगते हैं, पत्थर लेकर खड़े हो जाते हैं या फिर तेरी कहानी मेरी कहानी जैसी मानकर चुपचाप आगे बढ़ लेते हैं।    
क्या मान लिया जाए कि पूरा समाज ही कामुकता की आग में झुलसने के लिए कामांधता की तरफ बढ़ रहा है। कामांध वह स्थिति है, जिसमें इंसान कामवासना में लिप्त, अंधा होकर विवेक से रहित हो जाता है। ऐसे इंसान को आप परम कामातुर भी कह सकते हैं। तो क्या वाकई हमारा समाज इसी हालत की ओर बढ़ रहा है? संभव है कि ऐसे सवाल से कई लोगों को ठेस पहुंचे। ऐसे लोग इस सवाल को नकार सकते हैं, लेकिन पूरे सामाजिक परिदृश्य को देखें, तो ऐसा लगता है कि समाज का अधिकांश हिस्सा तमाम नैतिकता को ताख पर रखकर कामुकता के खेल में फंसा हुआ है। यह सवाल आज इसलिए किया जा रहा है कि पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली में कामंधता ने दामिनी की जान ले ली थी और इस घटना के बाद महिलाओं की रक्षा और बलात्कारियों को दंड देने के लिए कई तरह के कड़े कानून बनाए गए। इसके बावजूद इसके महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध और समाज में बढ़ती कामांधता में कोई कमी नहीं आई। 16 दिसंबर 2012 के बाद देश में बलात्कार की कितनी घटनाएं दर्ज हुर्इं। इसकी जानकारी अभी नहीं मिल पाई है, लेकिन अक्टूबर 2013 तक दिल्ली में हुए बलात्कार की जो तस्वीर सामने आई है, उससे लगता है कि पूरा समाज ही सेक्स के तालाब में तैरता नजर आ रहा है। 2012 में दिल्ली में बलात्कार के 642 मामले दर्ज किए गए थे। इसी मामलों में दामिनी का केस भी था। कानून बनने के बाद संभव था कि दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं में कमी आती, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अक्टूबर 2013 तक के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। दामिनी कांड के बाद भी दिल्ली में अक्टूबर 2013 तक बलात्कार के 1472 मामले दर्ज हुए हैं। दिल्ली में ही 2012 में मोलेस्टेशन के 612 मामले सामने आए थे, जो अक्टूबर 2013 में बढ़कर 3182 हो गए हैं। ईवटीजिंग के मामले 2012 में 125 थे, जो 2013 में 3850 दर्ज किए गए हैं। याद रखिए, दिल्ली के ये आंकड़े पूरे देश के आंकड़ों का एक छोटा हिस्सा भर हैं और उसमें भी इन आंकड़ों में वे सैकड़ों-हजारों आंकड़े दर्ज नहीं हैं, जो लोक-लाज की वजह से सार्वजनिक नहीं होते।
       देश का ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां तमाम आपराधिक मामलों में बलात्कार के मामले सबसे ज्यादा नहीं हों। यह हालत तब है, जब ऐसे मामलों को अक्सर गांव-देहात से लेकर शहरों में दबा ही दिए जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जिस समाज में हम रह रहे हैं, वह नैतिक है या अनैतिक? देश की जो राजनीति हमें कानून के साए में रखने की बात करती है, उस राजनीति को चलाने वालों की असलियत क्या है? जो संत-महात्मा से सेकर धर्मज्ञानी समाज को नैतिक रास्ते पर चलने का पाठ पढ़ाते हैं, क्या वे सही में संत हैं? जिसे समाज नाबालिग कह कर उसके हर क्रिया-कलापों को टाल देता है, क्या वह सचमुच बच्चा है? जिस गांव-देहात के लोगों को भदेस और सीधा कह कर संबोधित किया जाता रहा है, क्या वे अब भी ऐसे ही हैं? क्या उन पढेÞ-लिखों पर अब कोई विश्वास कर सकता है, जिसे शिक्षित मानकर लोग अपराध करने के लायक नहीं मानते रहे हैं? क्या अब बाप-बेटी, भाई-बहन, ससुर-बहू और तमाम सामाजिक संबंधों की कोई अहमियत रह गई है? क्या आज के पत्रकारों, साहित्यकारों, कलाकारों, फिल्मकारों और समाजसेवियों की ऐसी कोई विश्वसनीयता रह गई है कि लोग आंख बंद कर अपनी बेटी-बहू को उसके साथ जाने की सलाह दे सकें? साफ शब्दों में कहा जा सकता है कि बदलते परिवेश में लोग इतने काम लोलुप हो गए हैं कि किसी पर किसी का कोई विश्वास नहीं रह गया।
       हम कामंधता के अंधकूप में गिरने को कितने तत्पर हैं, इसकी बानगी उस रिपोर्ट से मिलती है, जिसमें कहा गया है कि दक्षिण एशिया में अब सबसे ज्यादा सेक्स से जुड़ी फिल्में और पोर्न साइटें भारत में देखी जा रही हैं और भारत के भीतर  सबसे ज्यादा पोर्न पश्चिम बंगाल के लोग देखते रहे हैं। देश के भीतर पोर्न देखने वाला दूसरा राज्य गुजरात है। तीसरे नंबर पर दिल्ली और चौथे व पांचवें नंबर पर मेघालय और पंजाब हैं। आप इन राज्यों में हो रहे बलात्कार के आंकड़ों को देखिए, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। सबसे कम उम्र और सबसे ज्यादा उम्र की महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा बलात्कार के मामले इन्हीं राज्यों में दर्ज होते रहे हैं। आप उन संत महात्माओं को क्या कहेंगे? जिन पर समाज को गुमान था, लेकिन उन्होंने समाज की तमाम मर्यादाओं को तोड़ते हुए अंत में कामातुर जानवर के रूप में दिखे। उस स्वामी नित्यानंद को आप क्या कहेंगे, जो भक्तों के बीच धर्म का बखान करते नहीं थक रहे थे और एकांत में कामवासना का नंगा खेल खेलते थे। उस इच्छाधारी बाबा को आप क्या कहेंगे? जो हर रोज नई-नई महिलाओं के साथ रास रचाते थे। उस गुरमीत राम रहीम को आप क्या कहेंगे, जिस पर समाज का एक बड़ा तपका विश्वास करता था, लेकिन उनकी असलियत सामने आई कामुक बाबा के रूप में। उस आसाराम और उसके पुत्र नारायण सार्इं को आप क्या कहेंगे? जिन्हें देश की जनता भगवान मान कर पूजा कर रही थी और निकले कामांध और बलात्कारी।
      कामांधता की कहानी यहीं तक नहीं है। देश को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले सैकड़ों नेताओं की कामवासना की कहानियां किसी से छुपी नहीं हैं। मध्य प्रदेश के सत्यनारायण जाटिया के सेक्स स्कैंडल को कौन नहीं जानता? कांग्रेस का यह नेता आए दिन महलाओं के साथ सेक्स करता और जनता के बीच जाकर नैतिकता की बात करता था, लेकिन जब एक महिला के साथ जाटिया की सीडी 2013 में बाजार में आई, तो सब आवाक रह गए। इसी मध्य प्रदेश के भाजपा के वरिष्ठ नेता और वित मंत्री रहे राघव जी की करतूत से तो लोग परिचित हैं ही। राघव जी बूढेÞ होते हुए भी अपने नौकर के साथ हर रोज अप्राकृतिक यौनाचार सालों से कर रहे थे। 2013 में राघव जी की कामंधता सामने आ गई। वे पकड़े गए और नेतागीरी समाप्त हो गई। 2012 में हरियाणा के मंत्री रहे गोपाल कांडा की असलियत सामने आई। कांडा एक एयर होस्टेज गीतिका के साथ सेक्स के मामले में आरोपित हुए। गीतिका ने बाद में आत्महत्या कर ली। 2013 में ही राजस्थान के नेता बाबूलाल नागर एक महिला के साथ सेक्स मामले में आरोपित हुए। महिला ने कहा था कि नागर उसे नौकरी दिलाने के बदले उसके साथ सेक्स करता था। 2011 में शेहला मसूद और ध्रुव नारायण सिंह के सेक्स का मामला सामने आया। शहला एक आरटीआई कार्यकर्ता थी और उसके भाजपा नेता ध्रुव नारायण सिंह के साथ संबंध थे। शेहला की बाद में हत्या करा दी गई। बाद में पता चला कि नारायण के कई महिलाओं के साथ अवैध संबंध थे। एक जमाने में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाहुबली के रूप में चर्चित नेता अमरमणि त्रिपाठी की कलई मधुमिता शुक्ला कांड के बाद खुली। 24 साल की मधुमिता एक कवयित्री थी। इस महिला के संबंध अमरमणि त्रिपाठी से थे और वह सात माह की गर्भवती भी थी। अमर की पत्नी को जब इस नाजायज संबंध का पता चला, तो उस मधुमिता की हत्या करा दी गई। 2011 में राजस्थान में एक और सेक्स स्कैंडल सामने आया था। कांग्रेस नेता महिपाल मदेरना के संबंध भंवरी देवी से थे। भंवरी देवी ने अपने संबंधों की सीडी भी बनाई थी। बाद में भंवरी ने इस सीडी के बदले मदेरना से पैसों की मांग की। बाद में उसकी हत्या करा दी गई। बूढेÞ नेता एनडी तिवारी की माया से भला कौन परिचित नहीं हैं। तिवारी जी जब आंध्र प्रदेश के राज्यपाल थे, तब अपने सरकारी मकान में ही तीन महिलाओं के साथ आपत्तिजनक हालत में पाए गए। एक स्टिंग आॅपरेशन के जरिये तिवारी के इस खेल को जनता के सामने लाया गया। कहा गया कि तिवारी को हर रोज नई-नई महिलाओं की चाहत होती थी। कांग्रेस के नेता और सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी भी 2012 में एक महिला के साथ अपने सुप्रीम कोर्ट के चैंबर में ही आपत्तिजनक हालत में पकड़े गए। 2003 में उत्तराखंड के नेता हरक सिंह रावत भी एक असमी महिला के साथ सेक्स मामले में पकड़े गए। हरक ने इस महिला के साथ एक बच्चा भी पैदा किया था। 2005 में संजय जोशी सेक्स कांड सबसे ज्यादा चर्चित हुआ। संजय जोशी संघ के प्रचारक रहे हैं। जोशी की एक सीडी सामने आई, जिसमें जोशी एक महिला के साथ सेक्स कर रहे थे। इस सीडी ने जोशी की राजनीति पर कालिख पोत दी। 1978 में सुरेश राम सेक्स स्कैंडल सामने आया था। सुरेश राम बाबू जगजीवन राम के पुत्र थे। 1977 में जिस तरह की राजनीति चल रही थी, उसमें कांग्रेस की हार के बाद जगजीवन राम प्रधानमंत्री के रूप में सबसे बड़े दावेदार के रूप में सामने आए थे। दलित नेता होने की वजह से वे सभी दलों में मान्य भी थे, लेकिन तभी सुरेश राम की एक महिला के साथ नंगी तस्वीर सूर्या पत्रिका में प्रकाशित हुई। जिस लड़की के साथ सुूरेश राम की नंगी तस्वीर थी, उस लड़की का नाम सुषमा चौधरी था। जगजीवन राम का सपना साकार नहीं हो सका। बाद में जनता पार्टी की सरकार भी चली गई। 1987 में  केरल की राजनीति में तब बवाल हो गया था, जब एक गैरसरकारी संस्था ने कोजीकोडे थाने में एक आइसक्रीम पार्लर के विरोध में मामला दर्ज कराया। इस शिकायत में कहा गया था कि इस आइसक्रीम पार्लर के जरिये महिलाओं के साथ सेक्स का खेल किया जाता है और इस खेल में बहुत सारे नेता और नौकरशाह भी शामिल हैं। बाद में जांच हुई और पीके कुन्हालीकुटी जैसे नेता इस मामले में फंस गए। 1982 में बिहार का बाबी कांड सुर्खियों में रहा। बाबी नाम की महिला पटना सचिवालय में काम करती थी। बाद में उस महिला की हत्या कर दी गई। जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे। बाद में इस कांड के इर्द-गिर्द कई नेताओं के नाम सामने आते रहे और अंत में पता चला कि उस महिला के साथ कई नेताओं के संबंध थे। 1999 में पटना में ही शिल्पी गौतम हत्याकांड सामने आया। इस हत्याकांड में लालू के साले साधु यादव का नाम भी उछला।
  बॉलीवुड में सेक्स के बारे में जो दर्शन है, वह देश के सेक्स दर्शन से मेल नहीं खाता। वहां काम करने वालों में सेक्स कोई विषय नहीं है। वहां फिल्म जगत में प्रवेश पाने से लेकर काम पाने के लिए हर रोज अवैध संबंधों का खेल होता है। दर्जनों ऐसे चर्चित चेहरे भी हैं, जो सेक्स में फंसे भी, लेकिन उनका काम नहीं रुका। ऐसे ही पत्रकारों के साथ भी है। नैतिकता की बात करने वाले इस पेशे के अधिकतर लोग मौके की तलाश में घूमते रहते हैं। यहां कौन बूढ़ा है और कौन जवान? कहना मुश्किल है। एक नहीं, दर्जनों संपादक भी काम वासना के शिकार रहे हैं। कई पत्रकारों ने अपनी बेटी की उम्र के साथ सेक्स किया है, तो कइयों ने बेटी की बराबर की उम्र की लड़की के साथ दूसरी और तीसरी शादी रचाई है। कई मामले में तो यह भी देखने को मिला है कि जिसने जितनी शादियां कीं, उसकी तरक्की उतनी ही हुई। फिर साहित्यकार से लेकर अन्य कलाकार और समाज के सभी वर्ग के लोग कामांधता की आग में दौड़ते फिर रहे हैं।                                                                  कामसूत्र के जनक वात्सयायन जिस समय कामशास्त्र की रचना कर रहे थे, उस समय उन्हें भी इस बात का भान नहीं रहा होगा कि आने वाली पीढ़ी कितना पतित और कामलोलुप हो जाएगा कि उसके सामने नैतिकता, संबंधों और खून के रिश्ते भी बौने पड़ जाएंगे। यह बात और है कि संसार की उत्पत्ति के साथ ही कामदेव और रति या आदम और हौआ को धरती पर आने की कहानी रची गई, लेकिन सेक्स को प्रतिष्ठित करने वाले हमारे इन पूर्वजों ने इस काम के लिए एकांतवास की भी बातें कहीं और संबंधों व नैतिकता की भी दुहाई दी, लेकिन यहां तो अब सब कुछ नंगा है।


No comments:

Post a Comment